अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
(3) स्थायी सदस्यों को ‘अखण्ड ज्योति’ की भाँति ही ‘युग निर्माण योजना’ मँगाना भी आवश्यक है। जिनने युग निर्माण का चन्दा अभी न भेजा हो उन्हें अब उसे भेज देना चाहिए
युग-निमार्ण-परिवार की तीसरी रचना में 40 हजार से घटकर 4 हजार भी हमारे साथी रह जायँ तो बहुत बड़ी बात समझनी चाहिये। यह बात आश्चर्य की मानी जायगी कि जहाँ सभी संस्थाएं, सभी नेता अपने सदस्यों और साथियों की संख्या अधिकाधिक बढ़ाने के लिये जी जोड़ प्रयत्न कर रहे हैं, तब हम अपने परिवार को घटाते क्यों चले जा रहे हैं? 24 लाख सदस्यों का गायत्री-परिवार घटकर 40 हजार के अखण्ड ज्योति परिवार में सीमित हुआ और अब युग-निर्माण परिवार में केवल 4 हजार का लक्ष्य रखा गया, यह कैसी उलटी बात हो रही है? कितने ही पत्र इस सम्बन्ध में आते रहते हैं
समय वाली डायरी में ही इनका भी हिसाब रखा जाय। (1) अखण्ड ज्योति (2) युग निर्माण योजना (3) ट्रैक्ट-इन तीन प्रकार के साहित्य में यह पैसा खर्च किया जाता रहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
एक के बिना दूसरी अपूर्ण रहती है। इसलिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को युग निर्माण योजना को भी नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए
(5) अखण्ड ज्योति में केवल विचार प्रेरणायें रहती हैं। इन प्रेरणाओं को कार्य रूप में कैसे परिणित किया जा सकता है या किया जा रहा है इसका व्यवहारिक मार्गदर्शन ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में रहता है। इस प्रकार एक दूसरे की पूरक हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
फसल काटने के समय बहुत होंगे पर जोतने बोने का समय तो आज है। आज 4 हजार जिन श्रमिकों की अपेक्षा है, उन्हें ही अखण्ड ज्योति परिवार में से छाँटा गया है। दो शर्तों ने गड़बड़ी फैलाकर 40 हजार को घटा कर 4 हजार कर दिया यह बात देखने में दुखंद सी लगती है, पर मजबूरी हमारी भी है। जो खुद ही कुछ त्याग बलिदान करने की बात कह किस मुँह से सकेंगे? अब गाल बजाने वालों का जमाना चला गया
अब तक बहुत सी जगह अखण्ड ज्योति कोने में पड़ी सिसकती रहती थी। दूसरों के दबाव में लोग चन्दा तो दे देते थे पर उसे पूरी दिलचस्पी से पढ़ते नहीं थे। ऐसे अश्रद्धालुओं को अब हटा दिया गया है
24 लाख व्यक्ति जो करते थे जो कर सकते थे उसकी तुलना में 40 हजार ने 10 गुना अधिक काम किया। अखण्ड ज्योति के विचारों को जो निरन्तर पढ़ेगा उसके जीवन में कोई आदर्शवादी परिवर्तन न हो यह सम्भव नहीं। यदि हमारी भावनायें सच्ची हैं, सजीव हैं, सशक्त हैं तो कोई कारण नहीं कि वे जहाँ पहुँचें अपना रचनात्मक काम न करें। पाठकों के जीवनों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुये—उन परिवर्तनों ने लाखों-करोड़ों को प्रभावित किया
अपने तक सीमित रहने वाले अखण्ड ज्योति के सदस्य, अपने से स्वाभाविक संबद्ध लोगों को ही प्रभावित कर सके। अब हमारी आवश्यकता उन कार्यकर्ताओं की है जो जनता में प्रवेश कर कुछ अधिक व्यापक क्षेत्र में नव-निर्माण के मिशन को प्रतिष्ठित कर सकने में समर्थ हों। 24 लाख में से जब 40 हजार निकले तो 40 हजार में से 4 हजार से अधिक की आशा कैसे की जाय? एक घंटा समय और दस पैसे नित्य की शर्त यद्यपि भौतिक दृष्टि से किसी भी व्यस्त और नितान्त निर्धन व्यक्ति के लिये भी कठिन नहीं है
5 घर में और 5 बाहर कुल मिलाकर 10 से भी क्या कम किसी व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र होगा? इस क्षेत्र में हर स्थायी सदस्य हमारे विचारों का विस्तार करेगा तो वर्तमान 4 हजार सदस्यों द्वारा 40 हजार नयों को यह विचार दिये जाते रहेंगे। इस प्रकार 40 हजार नये और 4 हजार वे स्वयं कुल मिलाकर 44 हजार पाठकों द्वारा अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना और ट्रैक्ट साहित्य पढ़ा, सुना, समझा और समझाया जाता रहेगा तो हमारा मिशन अगले वर्ष घटेगा नहीं, बढ़ेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
बहुत दिन विचार करने के बाद यह सोचा कि जो अपने मूल मन्तव्य को सुनने-समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं, केवल मन्त्र शक्ति का चमत्कार बिना उसका उचित मुख्य चुकाये देखने को आतुर हैं, इन पर शक्ति का अपव्यय न करके इस विशाल संसार में से उन लोगों को ढूँढ़ा जाय जो विचार, भावना, आदर्श और उद्देश्य का मूल्य महत्व समझते हों, अखण्ड ज्योति में व्यक्त हमारे विचारों के प्रति अभिरुचि एवं आस्था रखते हों। इस कसौटी पर 40 हजार व्यक्ति खरे उतरे। उन्होंने शरीर के प्रति आदर अभिवादन व्यक्त करने की अपेक्षा हमारे विचारों की शक्ति, उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझा
इसके लिए अधिक मजबूत, अधिक साहसी और अधिक सच्चे आदमी चाहिये। अखण्ड ज्योति परिवार पर जब नजर डालते हैं तो उनमें से अधिक ‘पढ़ाकू’ लोग दीखते हैं। पढ़ना भी एक व्यसन है। अच्छी वस्तुयें पढ़ने को अच्छा व्यसन कहा जा सकता है
युग परिवर्तन के लिए—देश, धर्म, समाज और संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए लोगों की सक्रियता, सेवा भावना और परमार्थ वृत्ति की नितान्त आवश्यकता है। यह तत्त्व जिनके अन्दर विकसित न हो सके वे अपने व्यक्तिगत जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक सुख-सुविधा ‘अखण्ड ज्योति’ की विचारधारा के प्रभाव में भले ही उपलब्ध कर लें, वह लक्ष्य तो पूरा करने में सहायक नहीं हो सकेंगे, जिसके लिए हम जीवित और कार्य संलग्न हैं। यदि भावनात्मक नव निर्माण का प्रयोजन हमारे सामने न होता—हमारे कंधों पर वह उत्तरदायित्व न आया होता— तो आज हमें इस प्रकार की न तो चिन्ता करनी पड़ती और न उखाड़-पछाड़। अपनी स्वाभाविक और सहज प्रवृत्ति के अनुरूप हम कहीं ब्राह्मणोचित तपश्चरण कर रहे होते और उससे उत्पन्न आत्मिक शक्ति से भी समाज को लाभान्वित कर रहे होते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
साधना मार्ग पर चलने वालों को गायत्री विद्या का सांगोपांग प्रशिक्षण अगले पाँच वर्ष में पूरा किया जायगा। अखण्ड ज्योति में हर महीने एक अनुपम लेख छपता रहेगा। पाँच वर्ष में इस सम्बन्ध में इतना कुछ कहा समझाया जायगा जो उच्चस्तरीय आध्यात्मिक विकास के लिए पर्याप्त सिद्ध हो सके। इसी प्रकार आत्म-शोध, आत्म-निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के प्रत्येक पहलू पर आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल महत्वपूर्ण मार्गदर्शन इस ब्रह्म-विद्यालय के छात्रों को निरन्तर नियमित रूप से मिलता रहेगा
यह अनुरोध 40 हजार में से जिन 4 हजार ने स्वीकार किया है उनका कर्तव्य है कि वे सचाई और तत्परता से हमें वह सुविधा प्रदान करें। अखण्ड ज्योति और युग निर्माण पत्रिकाओं में प्रायः 90 के लगभग पृष्ठ रहते हैं। 30 दिन में प्रतिदिन 3 पृष्ठों के हिसाब से हमारा प्रवचन अध्यापन सुना और समझा जाय। जिनके नाम पत्रिका पहुँचती है वे स्वयं एक बारगी ही पत्रिकाओं को पूरी पढ़ सकते हैं, पर घर के लोगों को इकट्ठे करके उन्हें प्रतिदिन एक लेख सुनाने और उस सम्बन्ध में विचार-विमर्श करने का क्रम चलाया जाय
ऐसा पुस्तकालय-सच्चे देवालय की आवश्यकता पूर्ण करेगा। ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण योजना’ पत्रिकायें उसी पैसे से मँगाई जाती हैं। अब अखण्ड ज्योति को पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। पत्रिकाओं के नाम दो हैं पर वस्तुतः एक ही तथ्य के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पहलुओं को अलग-अलग से समझाने के लिए दो बार उसे निकाला जाता है
‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण योजना’ पत्रिकायें उसी पैसे से मँगाई जाती हैं। अब अखण्ड ज्योति को पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। पत्रिकाओं के नाम दो हैं पर वस्तुतः एक ही तथ्य के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पहलुओं को अलग-अलग से समझाने के लिए दो बार उसे निकाला जाता है। इसलिए जिनने फर्म भरे हैं उन्हें दोनों पत्रिकाओं का अनिवार्य रूप से सदस्य रहना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
विश्व-शान्ति का लक्ष्य केवल एक ही प्रकार पूरा हो सकता है और वह है हर प्रकार से जन-साधारण में से दुर्बुद्धि का निष्कासन और उसके स्थान पर सद्बुद्धि का स्थापन। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को युग की इस सर्वोपरि आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
तब सब कुछ बदला हुआ होगा। अखण्ड ज्योति के किशोर पाठक नोट करके रख लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में लगभग हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे, अभी तो सूक्ष्म जगत में उनका बीजारोपण मात्र हो रहा है
कई परिजन आलस्य या ढीलपोल में सम्भवतः इस ओर ध्यान न दे सके होंगे। कई की अखण्ड ज्योति बन्द हो गई होगी। कई इन लेखों का अभिप्राय ठीक तरह समझ न सके होंगे। इन सभी तक हमारी यह वर्तमान विचारणा ठीक तरह—ठीक समय पर—पहुँच जाय इसके लिए यह आवश्यक है कि हर जगह कुछ प्रबुद्ध व्यक्ति उठ खड़े हों और अखण्ड-ज्योति के भूतपूर्व एवं वर्तमान सदस्यों को इस विधि व्यवस्था का ठीक तरह परिचय करा दें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
वे अपनी उसी निर्दिष्ट पथ पर बिना क्षण भर भी प्रमाद किये अनवरत रूप से चलते ही चले आ रहे है और निश्चित है कि अन्तिम साँस रहते उसी एक कार्य में निरत रहेंगे यह शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन हुआ इसलिए गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिन भी - युग - निर्माण आन्दोलन के जन्म दिन के साथ अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है। हम सब अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन जो गुरुदेव के प्रति - युग निर्माण मिशन के प्रति निष्ठा रखते हैं उनके जन्म दिन को उसी श्रद्धा और उमंग के साथ मानते मनाते रहे है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रूपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे। परिजनों के आर्थिक दबाब को ध्यान में रखकर मासिक नयी प्रकाशित होने वाली पत्रिका “युग निर्माण योजना” को भी बन्द किया जा रहा है। उसकी आवश्यकता को भी पाक्षिक द्वारा पूरा किया जायेगा
तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रूपये के स्थान पर 20 रूपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है। साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रूपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे
अब एक स्थान पर यह दोनों पत्रिकाएँ मँगायी जायें और अंखड ज्योति का चन्दा 12 रूपये के स्थान पर 20 रूपये होगा ऐसा समझा जाय। याँ हिसाब की दृष्टि से दोनों अलग-अलग ही रहेगी और अखण्ड ज्योति का चंदा “अखण्डज्योति” के पुराने पते पर, युग निर्माण योजना का चन्दा “गायत्री तपोभूमि संस्थान” के पते पर अलग-अलग भेजना पड़ेगा। तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रूपये के स्थान पर 20 रूपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है
प्रगति पथ पर दूसरा कदम पाक्षिक युग निर्माण योजना मंगाने का उठाना चाहिए। मिशन के बौद्धिक प्रतिपाद “अखण्ड ज्योति” में छपते हैं। उनके क्रियान्ययन का मार्गदर्शन इस पाक्षिक में छपा करेगा। इस प्रकार ज्ञान और कर्म का समन्वय एक बड़े अभाव की पूर्ति करेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
अखण्ड ज्योति के परिजन अपने विशेष व्यक्तित्व और विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखें-अपनी भाव शीलता को उभारें सुधारें-चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता का समावेश करने के लिए तत्पर हों तो कोई कारण नहीं कि उनमें युग-निर्माताओं के उपयुक्त समर्थ क्षमता का उद्भव न हो। इस उपलब्धि से सम्पन्न होकर अपना छोटा सा परिवार उस महान् भूमिका का सहज ही सम्पादन कर सकेगा जिसके लिए उसका सृजन हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
डाक विभाग की अनियमित वितरण व्यवस्था के कारण गत कई मासों से अखण्ड ज्योति अत्यधिक विलम्ब से पहुँच रही है। अप्रैल की पत्रिका 2-3 अप्रैल को डाक घर से रवाना कर दी गई थी फिर भी अनेक स्थानों पर अप्रैल के अन्त तक नहीं पहुँची। बहुत-सी मार्ग में भी खो गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
ब्रह्मरंध्र में प्रकाश ज्योति का ध्यान कमल पुष्प के दीपक में जलने वाली प्रकाश ज्योति के रूप में किया जाता है। इस ब्राह्मी स्थिति की प्रतीक प्रतिमा अखण्ड ज्योति के रूप में मानी जाती है। निरन्तर जलने वाला घृतदीप इस ब्रह्मरंध्र का ब्रह्मलोक का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर पूजा-उपचार में प्रतिष्ठित किया जाता है। जिह्वा को उलटकर कपालकुव्हर में प्रविष्ट कराने और भूमध्य में दृष्टि स्थिर रखने से खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है, जिसे यह हो जाती है, वह रोग मृत्यु निद्रा, भूख-प्यास मूर्च्छना से मुक्त हो जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
दर्शन का उत्तर दर्शन से, तर्क का उत्तर तर्क से और विज्ञान का उत्तर विज्ञान द्वारा देने का एक सशक्त प्रयास ब्रह्मवर्चस ने किया है। बुद्धिवादी युग व जमाने का समाधान करने का प्रयास अखण्ड ज्योति के अग्र लेखों में किया जाता रहा है व अब और भी प्रखर रूप से यह आगे प्रस्तुत होता रहेगा। प्रयोग परीक्षण का क्रम जो चलता रहा है। उस क्रम के क्या कुछ परिणाम हाथ लगे, किन निष्कर्षों पर हम पहुँचे व आगे की क्या संकल्पनाएँ हैं, यह सब इस स्तम्भ के अंतर्गत अगले दिनों प्रकाशित किया जाता रहेगा
दस परिजनों, शिक्षितों, मित्रों, संबंधियों को देवसंस्कृति की महान विशेषताओं से परिचित कराना किसी के लिए भी कठिन नहीं होगा। इसे स्वाभिमान का प्रश्न बनाने और लोगों के पास जाकर अखण्ड ज्योति दिखाकर उसकी उपयोगिता पर चर्चा करने भर की बात है। अनेक लोग तो एक तरह से प्रतीक्षा के प्यासे से मिलते हैं और तुरन्त सदस्य बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। विशेष रूप से बुद्धिजीवी वर्ग को उपरोक्त संदेश दिये जाये तो इस वसंत पर्व पर दस नये सदस्यों की श्रद्धाँजलि समर्पित करना किसी के लिए कठिन नहीं होगा
इसलिए पहली आवश्यकता तो यह है कि इसे देश के कोने कोने में प्रत्येक भाषा के प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति तक पहुँचाया जाय। अखण्ड ज्योति सात भाषाओं में छपती है, उनमें तो यह सभी सामग्री यथावत अनुवाद प्रकाशित होगी पर अभी तक जिन भाषाओं में अखण्ड ज्योति छपती नहीं उसमें भी पुस्तकाकार सामग्री देने का प्रयास किया जायेगा। इसके लिए शाँतिकुँज में तैयारियाँ की जा रही हैं। सामग्री, संचयन, संपादन, अनुरूप चित्रों, ग्राफों के संदर्भ प्राप्त करने, डिजाइनों और ब्लॉक आदि बनवाने, अन्य भाषाओं के अनुवाद में तथा उपयुक्त छपाई आदि के लिए तत्काल दौड़-भाग प्रारंभ कर दी गयी है
इस संदर्भ में समूचे वर्ष 1992 में गुरुदेव की लेखनी से निस्सृत संदेश, देवसंस्कृति के मूल भूत सिद्धाँत, धर्म व दर्शन, देव संस्कृति की जननी महामाया गायत्री, पर्व संस्कार, साधनायें, परम पू. गुरुदेव के आद्योपाँत साहित्य, मिशन के विश्वव्यापी स्वरूप का परिचय और भावी कार्यक्रमों के क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण की रूपरेखा बनायी गयी हैं ताकि लोग अनुभव कर सकें- देवसंस्कृति कितनी विज्ञान सम्मत, बुद्धिसंगत और मानवीय प्रगति और प्रसन्नता का आधार रही है। अखण्ड ज्योति का कलेवर तो उतना ही रहेगा, पर इस वसंत पर्व से अंक विशेषाँक जैसे संग्रहणीय होंगे। इसे देवसंस्कृति का समग्र परिचय-प्रशिक्षण समझा जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों ने पिछले इक्यावन वर्षों में सृजन और सुधार की दिशा में जो कुछ किया है उसकी तुलना में उन्हें कई गुना पुरुषार्थ प्रस्तुत करना है। युग संधि के शेष नौ वर्ष इसी तैयारी में जुट जाने की विशेष अवधि है। ऐसी अवधि को समय की पुकार और युग धर्म की गुहार कह सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
ज्ञान ही भौतिक जीवन की सर्वोपयोगी शक्ति है, जल-रज उस पवित्रता का, गति का निरंतर बोध कराएँगे। युग साहित्य का न्यूनतम अखण्ड ज्योति-युगनिर्माण योजना या युगशक्ति गायत्री का सतत स्वाध्याय तीसरी अनिवार्यता है। जहाँ-जहाँ भी यह कार्यक्रम चल रहे होंगे, देवशक्तियाँ वातावरण बना देख स्वतः पहुँच जाएँगी। वन्य जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ किसी जलाशय के निकट बैठ जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
समय की इस आवश्यकता को पूरा कर सकने में समर्थ प्रतिभाओं को निर्माण जिस प्रशिक्षण के माध्यम से हो सकता है, यह सत्र उसी की भूमिका है। यों यह शिक्षा कई वर्ष की होनी चाहिए पर अखण्ड ज्योति परिवार की अधिक कन्याएँ सीमित स्थान एवं सीमित समय में लाभ उठा सकेगा इसलिए थोड़े समय की ही यह शिक्षा संभव हो सकी। व्यक्तित्व का विकास पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह-महिला जागरण अभियान में योगदान इन तीनों ही विषयों का इस संक्षिप्त प्रशिक्षण में समुचित समावेश है। स्वावलम्बन के लिए अनेक उद्योगों की शिक्षा दी जाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
महिला शाखाएँ परिवार निर्माण के लिए किस प्रकार क्या करेंगी? उसका सुविस्तृत उल्लेख अखण्ड ज्योति के सीमित पृष्ठों पर सम्भव नहीं। इसके लिए 13 सितम्बर का साप्ताहिक युग निर्माण तथा सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर के महिला अभियान अंकों को देखा जाना चाहिए भविष्य में भी आन्दोलन को उपयुक्त दिशा देने का कार्य इन्हीं पत्रिकाओं में मिलता रहेगा। घरों में धार्मिक वातावरण बनाने एवं पंचशीलों का प्रचलन करने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से किन परिस्थितियों में कौन क्या कर सकता है इसकी विस्तृत विवेचना उपरोक्त पत्रिकाओं में नियमित रूप से पढ़ने को मिलती रहेगी
अखण्ड ज्योति परिवार के समस्त परिजनों को इन्हीं दिनों एक नया का सौंपा गया है। कि वे परिवार निर्माण की ओर पुराने अवसाद को छोड़ कर नये सिरे से नये दृष्टिकोण से ध्यान देना आरम्भ करें और इसके लिए विशेष रूप से प्रयास करें। यों साधारण तथा जीवन का अधिकाँश भाग, श्रम, समय एवं मनोयोग परिवार के निमित्त ही लगता है, पर वह सब कुछ बेतुका होने से मोह मात्र बनकर रह जाता है
इस संदर्भ में प्रथम चरण इन्हीं दिनों यह उठाया जाना चाहिए कि अखण्ड ज्योति, महिला जागृति, युग-निर्माण, युग शक्ति, पत्रिकाओं के सभी सदस्य मिल कर एक महिला शाखा गठित कर लें। परिवार निर्माण का नेतृत्व महिलाओं को ही करना है। इसके लिए श्रेय उन्हीं को देने की दृष्टि से शाखा को महिला शाखा ही कहा जाय और उसकी सदस्या तथा पदाधिकारी भी उन्हीं को बनाया जाय
(1) दैनिक सैनिक (2) अखण्ड ज्योति (मासिक) (3) युग निर्माण योजना (मासिक) (4) युग निर्माण योजना (पाक्षिक) (5) युग निर्माण पत्रिका (साप्ताहिक) (6) गायत्री परिवार पत्रिका (7) जीवन यज्ञ (8) युग शक्ति गायत्री (9) महिला जागृति अभियान
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
आये दिनों सामान्य व्यक्तियों में भी इस प्रकार की विलक्षण क्षमतायें कुछ समय के लिए अथवा सदा के लिए जागृत हो जाने की घटनायें देखने सुनने में आती है। इस तरह की ढेरों घटनायें अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में छपती रहती है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि चेतना, अध्यात्म, आत्म और परमात्मा को जानने मानने का भी यही प्रयोजन है। इन घटनाओं के माध्यम से यह तो सिद्ध होता है कि अध्यात्म एक सर्व समर्थ विद्यमान हैं, आत्मा विलक्षण विभूतियों का भण्डार है लेकिन उसका उपयोग इस तरह बाल क्रीड़ाओं के लिए करना न आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है और न समाज के लिए ही उनकी उपयोगिता है। इन साक्ष्यों से आत्मा की सामर्थ्य को एक अंश तो प्रमाणित किया जा सकता है पर आत्म सत्ता की शक्ति सामर्थ्य इतने तक ही सीमित नहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
अखण्ड ज्योति के फरवरी ७८ अंक में प्रकाशित
प्रसिद्ध भविष्यवक्ता 'क्रूम हेलर' की भविष्यवाणी एवं ‘जौन एडन’ की
भविष्यवाणी में विशेष साम्य है। इनके द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ कितनी सही
उतरती हैं, यह तो समय बताएगा। किंतु जिस संस्कृति के बीजारोपण का संकेत
‘जोन एडन’ ने दिया है, उससे संभावना की जा सकती है कि मनुष्य जाति यदि अपने
दुष्कर्मों को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग अपना सके तो संभव है कि विनाश पर
उतारू प्रकृति भी अपना रवैया बदल दे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
रजत जयन्ती वर्ष में अखण्ड ज्योति परिवार के प्राणवान परिजनों में से प्रत्येक के अंतःकरण में एक उमंग उठ रही है कि परिवर्तन की इस पुण्य बेला में नव सृजन की युग पुकार को पूरा करने के लिए उसका भी कुछ योगदान होना चाहिए। कृपणता कभी सह्य भी हो सकती है पर कभी तो वह नितान्त असह्य हो जाती है। आपत्ति काल में हर समर्थ से साहसिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है
अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं। अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के मध्य लम्बे समय से चले आने वाले आदान-प्रदान की परिपक्वता की घड़ियां सामने हैं। इन्हें परीक्षा काल भी कह सकते हैं। दंगल में पहलवान की-घुड़दौड़ में घोड़े की-युद्ध मोर्चे पर सैनिक की गहराई आँकी जाती हैं
“अगले जन्म में यह दण्ड तो भोगना ही पड़ते हैं इसी जन्म में जो मानसिक बोझ, व्यथा पश्चाताप की आग दहकती रहती है वही कम नहीं होती। अखण्ड ज्योति के पाठक उस विमान चालक का विवरण पिछले अंकों में पढ़ चुके हैं। जिसने नागाशाकी और हिरोशिमा पर अणु बम गिराये थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका साहित्य स्टाल पर बिकने वाली आम पत्रिकाओं से अलग है। इसी कारण इसके कुछ स्तंभ ही नियमित व उपशीर्षकों के साथ होते हैं। विविधता के साथ-साथ लोक-शिक्षण मूल उद्देश्य है
आहार-विहार, यम-नियम आदि पक्षों को तो समय-समय पर दिया जाता रहा है। वस्तुतः ‘अखण्ड ज्योति’ की विषय सामग्री जैसा परमपूज्य गुरुदेव निर्धारित कर गए हैं। उसी के अंतर्गत दी जाती रही है। प्राकृतिक चिकित्सा जैसा विषय पंचतत्वों के परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी दिया जा सकता है, पर मूलतः यह शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, स्थूल विकारों की शुद्धि से इसका सम्बन्ध है
जिनको वे अपनी इच्छानुसार नचाते और उनसे आश्चर्यजनक और अलौकिक कहे जाने वाले कार्यों को बड़ी आसानी से करवा लेते हैं। उनकी प्रेरणाएँ और निर्देश ही अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर शब्द समूह बनकर अवतरित होते रहते हैं
प्राकृतिक चिकित्सा जैसा विषय पंचतत्वों के परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी दिया जा सकता है, पर मूलतः यह शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, स्थूल विकारों की शुद्धि से इसका सम्बन्ध है। मनोविकारों से मुक्ति, उनकी चिकित्सा एवं आस्था-संकट निवारण द्वारा अध्यात्म के विभिन्न पक्षों का प्रतिपादन अखण्ड ज्योति की विषय परिधि के अंतर्गत आता है, किंतु अब चूँकि पाठकों ने माँग की है। योग के बहिरंग पक्ष को भी चिकित्साक्रम से जोड़ते हुए देते रहने का प्रयास करेंगे
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में योग प्रशिक्षण-योग थैरेपी-प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर सामग्री कम देखने में आती है। इसे भी कुछ अंशों में देते रहने का प्रयास करें
अखण्ड ज्योति के लेख-सामग्रियाँ निश्चित ही श्रेष्ठतम स्तर में हैं, किंतु पत्रिका ‘ओल्ड मॉडल’ (महावीर प्रसाद द्विवेदी युगीन) जैसी है। इसे युगानुरूप पत्रिका की शक्ल में विभिन्न स्तम्भों में
‘योग’ शब्द का जहाँ अर्थ दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में हैं, वहाँ अखण्ड ज्योति की पूरी विषयवस्तु उसी धुरी पर केन्द्रित हैं। योग चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर नियमित स्तम्भ तो पत्रिका में नहीं है, पर अब अगले दिनों यह प्रयास रहेगा कि यह पक्ष भी किसी न किसी रूप में विषयवस्तु में समाविष्ट रहे। आहार-विहार, यम-नियम आदि पक्षों को तो समय-समय पर दिया जाता रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
आज की निर्विणनिशा का कल के प्रभातकालीन अरुणोदय में परिवर्तन होना ही है। (पृष्ठ 59, 60 अप्रैल, 73 अखण्ड ज्योति)
इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जीवन जीने की कला का व्यवहारिक अध्यात्म का प्रतिपादन शिक्षण किया भी जा रहा है। अखण्ड ज्योति पत्रिका इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न है। विज्ञान और अध्यात्म का क्षेत्र सर्वथा पृथक् एक दूसरे से सर्वथा असंबद्ध है। पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही
1972-73 के बीच और वेग से बढ़ाया। उनके हाथों से लिखी कुछ पँक्तियाँ जो अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुई थी इस दृष्टि से पठनीय है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
दो तीन मकान बदलने के बाद वे वर्तमान मकान में जिसे भुतहा करार दिया गया था। पूज्यवर को यहाँ से अपनी प्राणचेतना के विस्तार हेतु अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। क्-फ्त्त् में प्रारंभ की गयी किन्तु व्यवस्थित रूप में बसंत पंचमी क्-ब् में फ्रीगंज आगरा से आरंभ की गयी यह पत्रिका श्हैण्डशेड् कागज पर पैर से चलाने वाली मशीनों पर छपने लगी। छोटी−छोटी किताबें भी लागत मूल्य पर छापी जाने लगीं
न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन अनुभूतियों के रूप में मिलता चला गया कि जिसका विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है। विश्व के कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा पाँच वीरभद्रों के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री की साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही
वे भी सूक्ष्म में विलीन हो अपनी आराध्यसत्ता से एकाकार हो गयीं। अगस्त 1994 अखण्ड ज्योति के अंक में उनका ऐ विशेष लेख प्रकाशित हुआ- ‘एक माँ की अन्तर्वेदना एवं अपेक्षा भरी गुहार। ’ कुछ पंक्तियाँ उद्धृत हैं- “अब हमारी भूमिका परोक्ष जगत में अधिक सक्रियता वाली होगी। गुरुसत्ता का आमंत्रण तीव्र पर तीव्र होता चला जाता है तथा एक ही स्वर, हर श्वाँस के साथ मुखरित होता चला जाता है- युग-परिवर्तन के लिए और अधिक और अधिक समर्पण
अभी भी सैकड़ों व्यक्ति इस ऊर्जाकेन्द्र के दर्शन को नित्य आते हैं। जहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका का कार्यालय था वह अब एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख से अधिक संख्या में प्रकाशित अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र है। कभी यहीं पर गायत्री तपोभूमि के निर्माण की वहाँ चलने वाले सत्रों की एवं क्त्त् कुण्डीय यज्ञ ;क्-भ्त्त्द्ध की रूपरेखा बनी थी। अब यहाँ वाङ्मय जो पूज्यवर की लेखनी साधनामृत अमृतवाणी एवं सूक्तियों के संग्रह के रूप में क्त्त् ब्रिटेनिका साइज के विश्वकोश आकार के खण्डों में प्रकाशित हुआ है का कार्यालय भी है
यह कार्य विभिन्न जेलों आँवलखेड़ा व आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों से आगरा नगर में सम्पन्न हुआ व क्-ब्क् में वे मथुरा प्रयाण कर गए। ;इद्ध क्-ब्क् से क्-स्त्रक् तक की तीस वर्ष तक की अवधि जिसमें अखण्ड ज्योति संस्थान एवं गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई। परमवन्दनीया माताजी उनके जीवन में आयीं तीन बार वे क्.क् वर्ष के लिए हिमालय गए। ख्ब् लक्ष के अनुष्ठानों की महापूर्णाहुति सम्पन्न हुई क्-भ्त्त् का ऐतिहासिक सहस्रकुण्डीय महायज्ञ हुआ जो थी गायत्री परिवार की स्थापना का मूलभूत आधार बना
;क्द्ध युगतीर्थ आँवल खेड़ा ;ख्द्ध अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा ;फ्द्ध गायत्री तपोभूमि मथुरा ;ब्द्ध शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ सप्त सरोवर हरिद्वार ;भ्द्ध ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्वार
2700 पुस्तकों का लेखन-प्रकाशन आर्ष-ग्रन्थों का भाष्य, भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों से लेकर वैज्ञानिक आध्यात्मवाद एवं आध्यात्मिक समाजवाद जैसे गूढ़ विषयों पर संदर्भों सहित लेखन, प्रज्ञापुराण की रचना, गायत्री यज्ञ विधा का विज्ञान-सम्मत प्रस्तुतीकरण एवं जीवन-विद्या के विभिन्न पक्षों पर बहुमुखी लेखन वे जीवन भर करते रहे। अपने स्वयं के हाथों से उनने अगस्त 1969 की अखण्ड ज्योति पत्रिका के ‘युगपरिवर्तन के छोटे किन्तु महान शस्त्रागार’ लेख में लिखा है-चेतना के उच्चतम स्वर से अवतरित हुए, अन्तःकरण की करुणा में धारण किये गये, बौद्धिक तीक्ष्णता से सँवारे गए इन विचारों में कितनी आभा है-कितनी रोशनी है, यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है जिनने इन्हें पढ़ा-तड़प कर रह गए। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा। ” यदि यह कहा जाए कि गुरुदेव का एक शरीर लेखनी की साधना में रत रहा
अखण्ड ज्योति के वर्ष 90 के स्मृति अंक एवं बाद के वर्षों में विशेष लेखमाला के रूप में यही लेख स्मरण किया जाता रहा है। उनकी लीला सहचरी वन्दनीया माताजी की पुण्य कथा भी उनके महाप्रयाण के पश्चात्-अखण्ड ज्योति के ही मातृ-स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित हुई थी। इसी बीच गायत्री तपोभूमि मथुरा से ‘प्रज्ञावतार हमारे गुरुदेव’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें हमारे आराध्य के जीवन के अनेकों अनगिनत पहलू उजागर हुए। रूप
यूँ यह चर्चा स्वयं पूज्यवर की लेखनी से ‘सूनसान के सहचर’ एवं ‘हमारी वसीयत एवं विरासत के पृष्ठों में मुखरित हुई हैं। अखण्ड ज्योति के वर्ष 90 के स्मृति अंक एवं बाद के वर्षों में विशेष लेखमाला के रूप में यही लेख स्मरण किया जाता रहा है। उनकी लीला सहचरी वन्दनीया माताजी की पुण्य कथा भी उनके महाप्रयाण के पश्चात्-अखण्ड ज्योति के ही मातृ-स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित हुई थी। इसी बीच गायत्री तपोभूमि मथुरा से ‘प्रज्ञावतार हमारे गुरुदेव’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें हमारे आराध्य के जीवन के अनेकों अनगिनत पहलू उजागर हुए
परमपूज्य गुरुदेव के इन गाँवों स्थूल शरीरों को समझने से पूर्व यह समझ लें कि क्-क्क् में आज से प्रायः त्त्म् वर्ष पूर्व जन्मी हमारी गुरुसत्ता ने सुनियोजित ढंग से अपनी जीवनावधि को चार भागों में बाँट दिया। ;अद्ध क्-क्क् से क्-ख्म् तक की पन्द्रह वर्ष की बाल्यकाल की अवधि जब उनकी गुरुसत्ता से उनका साक्षात्कार हुआ ;आद्ध क्-ख्म् से क्-ब्क् तक की पन्द्रह वर्ष की अवधि जिनमें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय प्रवेश करने से लेकर जेल जाने तक गायत्री महापुरश्चरण आरंभ करने से लेकर बापू कवीन्द्र रवीन्द्र व श्री अरविन्द जैसे महापुरुषों के साथ ड. का क्रम एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह कार्य विभिन्न जेलों आँवलखेड़ा व आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों से आगरा नगर में सम्पन्न हुआ व क्-ब्क् में वे मथुरा प्रयाण कर गए। ;इद्ध क्-ब्क् से क्-स्त्रक् तक की तीस वर्ष तक की अवधि जिसमें अखण्ड ज्योति संस्थान एवं गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
शांतिकुंज हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा की इमारतें जिनने देखी है। जो देश के कोने-कोने में विनिर्मित 2400 गायत्री शक्तिपीठें देखकर आये हैं वे जानते हैं कि इनके निमार्ण में 100 करोड़ से कम खर्च नहीं हुआ है। तीर्थ और देवालय तो पुरातनकाल में भी बने थे और वे सभी राजाओं और सेठों ने बनाये हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
हमने अच्छे-अच्छे रत्नों को ढूँढ़ा है। हमने अखण्ड ज्योति आपके पास भेजी थी। आपने मंगाई थी? नहीं, हमने भेजी थी। बेटे, जिस तरह राम लक्ष्मण को लेने विश्वामित्र दशरथ के पास गये थे, वैसे ही हमने आपके बाप के पास जाकर आपको ढूँढ़ा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
आज संस्कार महोत्सव जो स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं, एक ही विशेष लक्ष्य के साथ हो रहे हैं कि यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद उन सभी तक पहुँचे, जो कर्मकाण्ड प्रधान धर्म को परम्परागत मानते हुए उसे नकारते हैं, ताल ठोंककर स्वयं को नास्तिक कहते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में हर क्षण हर कष्ट में भगवान को याद करते हैं। अखण्ड ज्योति के विज्ञानसम्मत प्रतिपादन भी इसी उद्देश्य के साथ प्रतिमास निरन्तर 58 वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं एवं यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित ही रहेगी
जितने अधिक व्यक्तियों तक अंक पहुँचाया जा सके, इस दिशा में जितना अधिक पुरुषार्थ सम्भव है, वह अपने सभी परिजनों द्वारा गुरुसत्ता के प्रति सुमनांजलि के रूप में किया जाना चाहिए। जितनी प्रतियाँ अतिरिक्त मँगानी हों, उसके लिए ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ घीयामण्डी मथुरा से पत्र व्यवहार करें
प्रस्तुत लेख अखण्ड ज्योति पत्रिका में आज से चालीस वर्ष पूर्व छपा था। उसे पुनः प्रकाशित कर नये पाठकों को इस मिशन की आधारभूत स्थापना के बहुआयामी पक्ष से परिचित कराने का एक विनम्र प्रयास है
गायत्री माता वहाँ विद्यमान् हैं और यहाँ पर गायत्री स्थापित हैं। अखण्ड ज्योति कार्यालय में जहाँ हम रहते थे, वहाँ भी दीपक के रूप में गायत्री माता की फोटोग्राफ और तस्वीर के रूप में हमारा प्रतीक स्थापित है, पर मैं कई बार इन चीजों के बारे में आपको बुरा भला कहता हूँ। यह क्यों कहता हूँ ? प्रतीकों का कई बार मजाक उड़ाता हूँ क्यों ? प्रतीकों का मजाक मैं इसलिए उड़ता हूँ कि प्रतीकों के बारे में मैं बार-बार गरम बात इसलिए कहने लगता हूँ कि आपने प्रतीक को सबकुछ मान लिया है। प्रतीक ही सबकुछ नहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में हो रहे अनुसंधान के प्रति अखण्ड ज्योति के पाठकों एवं विशेषज्ञों की जिज्ञासा प्रारम्भ से रही है। समय-समय पर मिलने वाले उनके पत्रों में यही तत्व झलकला रहा है। इस बारे में कहना इतना ही है कि गुरुदेव द्वारा प्रेरित एवं प्रवर्तित ब्रह्मवर्चस् का शोध आयोजन मानवीय चेतना में आ गयी विकृतियों के निदान एवं उसकी अन्तर्निहित शक्तियों के जागरण हेतु किया गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
प्रश्न- “अखण्ड ज्योति” के शाँतिकुँज विशेषांक अगस्त 1996 में प्रकाशित लेख “क्या देखा-क्या पाया” पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें मात्र वरिष्ठ राजनेताओं -अभिनेताओं के ही विचार शामिल किए जाते हैं, वह भी सिर्फ प्रशंसाएं, उनके संकल्प मात्र ही। क्या ऐसा संभव नहीं कि आम जनता, टोली प्रचारक, शाखा केन्द्र के प्रतिनिधियों के विचार उसमें प्रकाशित हो सकें?
प्रश्न:- ग्रामीण परिवेश से संबंधित लेख अखण्ड ज्योति में अधिक आना चाहिए। यह जन-जन की पत्रिका है। क्या आप यह नहीं सोचते कि इसे सत्तर प्रतिशत ग्रामीण भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए?
उत्तर:-परमपूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड ज्योति” को व्यक्ति निर्माण से समग्र समाज व विश्व निर्माण हेतु, “युग निर्माण योजना” मासिक को परिवार एवं समाज निर्माणपरक प्रमुखतम शिक्षण हेतु तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक” को कार्यकर्ता, मार्गदर्शिका व मिशन की प्रवृत्तियों से सभी को अवगत कराने का निमित्त बनाकर प्रकाशित करते रहने का निर्देश दिया था। इस कुछ समय पूर्व तक पालन किया जाता रहा है। किन्हीं कारणवश “युग निर्माण योजना” मासिक में वह पक्ष जो ग्रामीण परिवेश के नव-निर्माण, परिवार-समाज निर्माण संबंधी, बहुविधि गतिविधियों संबंधी साहित्य हम दे नहीं पाए
आज हमने 65 बसंत पूरे कर लिये। हमारी अखण्ड ज्योति की साधना अनवरत रूप से चल रही है। हमने हर बसंत पर्व पर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है तथा उसे पूरा किया है। इस बसंत पर भी हमने तीन कार्यों के लिए कदम बढ़ाया है
प्रज्ञा अभियान, युग निर्माण आन्दोलन के संचालक का प्राण-प्रवाह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों एवं युग साहित्य के नाम से जानी जाने वाली हजारों पुस्तकों में अनुभव किया जा सकता है। इसमें निहित विचारों को भावनाओं को गहराई से अपनाकर पाठक न केवल विचारों की बौद्धिक गहनता से परिचित हो सकते हैं, बल्कि उस ऋषि-चैतन्य से संपर्क स्थापित कर सकते हैं, जिसका यह विचार प्रवाह है। यह सान्निध्य ही सच्चा सत्संग होगा
किन्हीं कारणवश “युग निर्माण योजना” मासिक में वह पक्ष जो ग्रामीण परिवेश के नव-निर्माण, परिवार-समाज निर्माण संबंधी, बहुविधि गतिविधियों संबंधी साहित्य हम दे नहीं पाए। अब इसे “अखण्ड ज्योति” में ही समाहित कर इसी में समग्र चिन्तन देने का प्रयास विगत कुछ अंकों से कर रहे हैं। इसी तत्व-दर्शन का एक व्यावहारिक पक्ष “युग निर्माण योजना” पत्रिका में आता रहेगा। दोनों ही पत्रिकाओं के प्रधान लेखों को गुजराती युग शक्ति गायत्री, बंगाली, उड़िया व मराठी पत्रिकाओं में अनूदित कर प्रकाशित किया जाता रहा है
प्रश्न:-क्या यह संभव नहीं कि अन्यान्य पत्रिकाओं की तरह “अखण्ड ज्योति” पत्रिका में भी शीर्षक या विषयवस्तु से जुड़े चित्र भी प्रत्येक लेख के साथ दिए जाएँ। इनसे एक नया आकर्षण तो आएगा ही, लोगों को अध्यात्म प्रधान विषय सरलता से समझ में आ सकेगा
यह भी जान लेना चाहिए कि जो भी बहिरंग जीवन में जैसा भी है, वह शांतिकुंज नामक रूपी पारस का स्पर्श पाकर जो भी अभिव्यक्ति करता है, वह उसकी अकेले की नहीं, उन विचारों का है जो अभिव्यक्त किये गये हैं। आम परिजनों के विचार यदि नामों के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हों तो पूरी पत्रिका में मात्र यही होगा। जिसका नाम नहीं होगा, वह नाराज होगा, जिसका होगा उस पर कइयों को ऐतराज भी हो सकता है। “प्रज्ञा अभियान” पाक्षिक के माध्यम से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन, विद्या-विस्तार से प्रकाशित करते हैं ताकि औरों को प्रेरणा मिले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
परमपूज्य गुरुदेव ने मई, 1970 की अखण्ड ज्योति में लिखा है कि अगले दिनों गायत्री परिवार महान प्रयोजनों के लिए भावना की शक्ति से एकत्र धन-संपदा का नियोजन करेगा। वे लिखते हैं, “(1) अगले दिनों हमें एक महान क्राँतिकारी शिक्षा योजना का शिलान्यास, संगठन और प्रसारण करना है, उसके लिए विश्वविद्यालय स्तर का एक समर्थ तंत्र खड़ा करना है। (2) कला की कामुक एवं विनाशोन्मुख प्रवृत्तियों को मोड़कर उसे एक नई दिशा देनी है
उनके गुरु प्रेम की छुअन और परम पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से ही अखण्ड ज्योति को यह स्फुरणा मिली है कि शिष्यत्व की कठिन साधना के परम रहस्यमय एवं सदा से गोपनीय रखे गए कुछ विशेष सूत्रों को साधकों के सामने प्रकट किया जाय। अब से शिष्यत्व के साधना सूत्र सद्गुरु प्रेमियों को प्रतिमाह मिलते रहेंगे। जो इनकी साधना करेंगे उन पर देश-काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी
यह जिज्ञासा शिष्यत्व के बारे में है। उनकी चाहत है कि हम सच्चे शिष्य कैसे बनें? शिष्यत्व की कठिन साधना करके गुरु प्रेम के सर्वोत्तम अधिकारी कैसे बनें? ऐसी चाहत रखने वाले अनेक परिजनों ने अखण्ड ज्योति के सम्पादक से व्यक्तिगत रूप से मिलकर, उन्हें पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण इस अखण्ड दीपक की साक्षी में ही किए गए। ‘अखण्ड ज्योति’ उसी का परिणाम है। कठोर गायत्री तप के माध्यम से युवा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी समन्वयात्मक तर्क, तथ्य, प्रमाणों सहित परोक्षजगत की विधि व्यवस्था एवं आर्ष वाङ्मय की युगानुकूल प्रस्तुति इसकी विशेषता रही है, जिसने छात्र, अध्यापक, प्रस्तुति एवं प्रबुद्धवर्ग, सभी को अपनी ओर खींचा है। एक बहुत बड़ा वर्ग नास्तिक होने से बचा है
77 वर्षों से निरंतर प्रकाशित यह पत्रिका अत्यधिक सुँदर है, आस्तिकता संवर्द्धन में सहायक रही है, किंतु यह भी वर्तमान मूल्य पर 47 पृष्ठों के साथ कुछ श्रीमंतों के अनुदानों के माध्यम से सब्सीडाइज्ड (न्यूनतम) मूल्य पर प्रकाशित होती है। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका विगत तीन वर्षों से निरंतर 72 रुपये वार्षिक (6 रुपये एक प्रति) के आधार पर परिजनों को मिल रही है। अखण्ड ज्योति संस्थान का म्रुदण प्रकाशन डिस्पैच वाला महकमा ही इतना बड़ा है कि उसे एक विराट परिवार का नाम दिया जा सकता है। उनमें कई वेतनभोगी है, उनकी आवश्यकताओं का पूरी करना भी इस संस्थान के अभिभावक का दायित्व है
आज की साप्ताहिक हिंदी पत्रिकाओं इंडिया टुडे, आउटलुक अथवा कादंबिनी (मासिक) पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि विज्ञापन भी छापने वाली ये पत्रिकाएं ‘अखण्ड ज्योति’ की तुलना में कितनी महंगी हैं। इंडिया टुडे बारह रुपये एक प्रति एवं आउटलुक दस रुपया प्रति पर (वार्षिक 441 रुपये, 45 रुपये) बचत नीति के आधार पर उपलब्ध है। कादंबिनी हिंदी साहित्य की एक स्वस्थ विधा स्थापित करने वाली पत्रिका है
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के माह अगस्त, 23 के अंक में पृष्ठ संख्या 36 पर प्रकाशित ‘क्लाथ चिकित्सा द्वारा जटिल रोगों का सरल उपचार’ शीर्षक के अंतर्गत ‘उच्च रक्तचाप नाशक क्वाथ’ का वर्णन किया गया है। उसमें कुछ सूत्र संकेत अति संक्षेप में लिखे होने के कारण समझने में किसी को असुविधा न हो, अतः उसका कुछ स्पष्टीकरण इस प्रकार है ‘-
जीवनशक्ति की दृष्टि से दुर्बल कमजोर मनोबल के व्यक्ति बढ़ते जा रहे है जबकि इससे भी अधिक तेजी से अस्पताल, मेडिकल कॉलेज एवं नर्सिंग होम खुलते चले गए है। मानवी स्वास्थ्य चिंतन पद्धति में परिवर्तन, पथ्यापथ्य के नियमों का परिपालन तथा आयुर्वेद योग यज्ञोपचार से कैसे मनुष्य जाति को स्वस्थ बनाया जा सकता है, यह मार्गदर्शन ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में नियमित रूप से देखा जा सकता है। दृष्टाँतों की शैली से जीवन में गुणों का विकास कैसे किया जाए यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में मिलता है
यही रहस्य है शिष्य के जीवन का। रहस्य के आयाम और भी हैं, जो क्रमिक रूप से अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में खुलते रहेंगे
पहले यह छह रुपया प्रति काँपी था, अब सात रुपया प्रति काँपी होगा, जो कि किसी भी स्थिति में अधिक नहीं माना जाना चाहिए। ज्ञानगंगा का अविरल प्रवाह अवरुद्ध न हो, उसका एक ही तरीका है कि इस पत्रिका के प्राप्त होते ही नए ग्राहक बनाने, पुरानों को जोड़े रखने एवं चंदे की राशि समय पर अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा पहुँचाने का क्रम चलता रहे। मिशनरी स्तर पर चल रहे इस प्रयोग को अपने परिजनों को ही सींचना होगा, आगे बढ़ाना होगा
अखिल विश्व गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना के क्रियाकलाप जिस धुरी पर चलकर 67 वर्षों की यात्रा कर वर्तमान स्थिति में पहुँचे है उसके पीछे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की एक विशिष्ट भूमिका है। यह पत्रिका परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी की प्राणचेतना की संवाहिका है। सभी को यह ज्ञात है कि 1926 ईसवी की बसंत पंचमी (18 जनवरी) की पावन वेला में सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के निर्देशानुसार एक अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित किया गया था
1971 में स्थापित यह संस्थान अगले वर्ष (24-25) अपनी रजत जयंती मना रहा है। शोध संस्थान एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण ज्ञान विज्ञान संबंधी निष्कर्ष ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से सबके पास पहुँचते है। आज की परिस्थितियों में हमारा राष्ट्रधर्म क्या हो, हम कैसे एक श्रेष्ठ नागरिक बनें यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में 66 पृष्ठों में पाया जा सकता है। टूटते परिवार, कलह द्वेष की बढ़ती महाव्याधि हेतु इसने परिवार निर्माण, सुसंस्कारिता संवर्द्धन जैसे प्रयोगों को प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है
बेटे, इस सम्बन्ध में हम कछुए का एक छोटा सा किस्सा सुनाते है। दोनों तरफ से चलने वाले एक साँप का और एक कछुए का किस्सा अखण्ड ज्योति में छपा है। एक साँप के दो मुँह थे एक आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ। यह जापान का किस्सा है
इसी के कारण ये योगीजन समाधि की अन्तिम अवस्था की ओर बढ़ चलते हैं। विदेह एवं प्रकृतिलय की अवस्था क्या है? इसे योग साधक अखण्ड ज्योति के आगामी अंक में पढ़ सकेंगे
इस पावन प्रतीक द्वारा ही युग परिवर्तन की आँधी ने जन्म लिया है। आज जनसामान्य का एक बहुत बड़ा तबका, नारीशक्ति एवं युवावर्ग आशावादी हो चला है तो उसके मूल में ‘अखण्ड ज्योति’ की भूमिका नकारी नहीं जा सकती। परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म कारणसत्ता ही इस पत्रिका रूपी कागजों के बंडल के माध्यम से जन जन को प्रकाश दे पाने में समर्थ हो पाई है। संपादक के रूप में किसी का भी नाम हो, लिखने वाले की कलम में प्राण सूक्ष्म अंतरिक्ष से गुरुसत्ता के माध्यम से आता है
इन्हीं सब कारणों को देखते हुए ‘अखण्ड ज्योति’ का वार्षिक मूल्य प्रति काँपी एक रुपया बढ़ाकर चौरासी रुपये इस दिसंबर मास से किया जा रहा है। 24 की जनवरी वाली पत्रिका अब बढ़े हुए मूल्य पर मिलेगी एवं तदनुसार ही सबको चंदा भेजना होगा। पहले यह छह रुपया प्रति काँपी था, अब सात रुपया प्रति काँपी होगा, जो कि किसी भी स्थिति में अधिक नहीं माना जाना चाहिए
‘अखण्ड ज्योति’ युगधर्म को महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड दीपक का एक प्रतीक बनी। इस पावन प्रतीक द्वारा ही युग परिवर्तन की आँधी ने जन्म लिया है। आज जनसामान्य का एक बहुत बड़ा तबका, नारीशक्ति एवं युवावर्ग आशावादी हो चला है तो उसके मूल में ‘अखण्ड ज्योति’ की भूमिका नकारी नहीं जा सकती
‘अखण्ड ज्योति’ यदि मस्तिष्क है तो पाठक परिजनों के रूप में फैला विशालकाय समुदाय उसका काय कलेवर हैं। दोनों का अस्तित्व परस्पर अन्योन्याश्रित है। परिजन ही है जो इस पत्रिका के प्रवाह को अमृत चिंतन को जन जन तक पहुँचाते है
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका विगत तीन वर्षों से निरंतर 72 रुपये वार्षिक (6 रुपये एक प्रति) के आधार पर परिजनों को मिल रही है। अखण्ड ज्योति संस्थान का म्रुदण प्रकाशन डिस्पैच वाला महकमा ही इतना बड़ा है कि उसे एक विराट परिवार का नाम दिया जा सकता है। उनमें कई वेतनभोगी है, उनकी आवश्यकताओं का पूरी करना भी इस संस्थान के अभिभावक का दायित्व है। डी टी पी, मशीन, बिजली, कागज व स्याही के खरच अतिरिक्त है एवं रुपये के अवमूल्यन के साथ ये भी जमीन से आसमान तक जा पहुँचे है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
ये दोनों भी युगपरिवर्तन योजना से जूड़े परिजन यदि गंभीरता से अपनी गुरुसत्ता के स्वरूप को इस श्रावणी पर्व की वेला में समझ सकें तो उन्हें ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस की अमृतवाणी सार्थक होती लगेगी। 1985 की अप्रैल की अखण्ड ज्योति में स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने अपना चिवगत अवतार श्रीरामकृष्ण परमहंस के रूप में अपने गुरु के माध्यम से बताया है। जिस वायव्य कोण में जन्म लेने की बात ठाकुर ने कही है, वह भी आगरा मथुरा के बीच में आता हैं। दोनों के जीवन में बड़ी समानता है
जहाँ, जिसकी छाँव में बैठने से मन की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाएँ अथवा वे दिव्य कामनाओं में बदल जाएँ। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं माता भगवती देवी के तपोमय पुरुषार्थ की एक बानगी है मथुरा की घीयामंडी में स्थापित अखण्ड ज्योति संस्थान, उनकी 1941 से 1971 की तीस वर्षीय अवधि की साक्षी पूजास्थली तथा 1953 से 1971 तक के उनके जीवंत कर्मयोग की साक्षी गायत्री तपोभूमि। मथुरा नगरी सप्तपुरियों में गिनी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है तथा आज भी लाखों तीर्थयात्री वहाँ आते व ब्रजक्षेत्र की परिक्रमा करते हैं, सभी धामों का दर्शन करते हैं
इस प्रथम सूत्र पर मनन ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होगा, त्यों-त्यों हमारी चेतना द्वितीय सूत्र के लिए तैयार हो जायेगी। यह द्वितीय अखण्ड ज्योति के लिए अगले माह के पृष्ठो में स्वयमेव प्रकट होगा। तब तक प्रथम सूत्र की साधना का क्रम बना रहे
परमपूज्य गुरुदेव के मूर्तिमान स्वरूप वाङ्मय को घर-घर पहुँचाने के लिए निष्ठावान परिजनों की आवश्यकता है। जो भाई इस कार्य हेतु अपने को योग्य समझते हो, निम्नलिखित विवरण सहित अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से संपर्क करें। समयदान की अवधि दो माह की रहेगी। टोलियाँ प्रत्येक माह की 10 तथा 15 तारीख से निकलेगी
अपने उद्देश्य को हम कभी भुला न पाएं एवं सतत साधना द्वारा शक्ति का संवर्द्धन कर जनसेवा में स्वयं को लगा दें। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं लिखा है (अखण्ड ज्योति अगस्त, 1969), “युगनिर्माण योजना एक शंखनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है। ” हम और कुछ नहीं तो उनके शब्दों पर विश्वास कर उनकी जन्म शताब्दी वर्ष ; डडडडड-डडडडड तक ही मात्र 8-9 वर्षों के लिए स्वयं को तपस्वी बना लें, वैसे ही जैसा जीवन हम सभी ने पूर्वजन्म में सौ वर्ष जिया था। इतिहास की पुनरावृत्ति सुनिश्चित ही होगी
जिस किसी को भी पूज्यवर को जानना हो, समझना हो, वह इस अंश को पढ़ सकता है। मात्र अखण्ड ज्योति नहीं, उनकी अमृतवाणी ही नहीं, उनके ये पत्र बेहद अनमोल हैं। ये सीधे अंतःपटल तक जा पहुँचते हैं और हमें भी आभास करा देते हैं कि हम कौन हैं। बस इस बार इतना ही
व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान,
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
इसी की व्याख्या में महर्षि पतञ्जलि का अगला सूत्र है। जिसकी चर्चा सभी योग साधक ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंक में पढ़ेंगे
ऐसे सदुद्देश्य व सुनिश्चित कार्यप्रणाली सामने होते हुए ढेरों व्यक्ति सामने आएँगे और विभिन्न आँदोलनों को अपने हाथ में ले लेंगे। अपने परिवार, अखण्ड ज्योति पाठकों के समुदाय में भी ढेरों ऐसे हो सकते हैं, जो अभी उस भूमिका में न उतर पाए हों। उनके लिए भी, प्रशिक्षित हो इस नवनिर्माण के महायज्ञ में भागीदारी हेतु भावभरा आमंत्रण है
‘आर्ट ऑफ लिविंग‘ जिसकी परिभाषा पूज्यवर ने सबसे पहले की, आज विविध रूपों में कमाई का साधन बनी दिखाई पड़ती है। वस्तुतः जीवन साधना क्या है? कैसे हम इस जीवनरूपी प्रत्यक्ष देवता को साधें, इस नकद धर्म को कैसे भुनाएँ, जीवनशैली किस तरह व्यवस्थित करें, उस पर विशेषज्ञ लेखनी से पूज्यवर का चिंतन जनवरी 24 की ‘अखण्ड ज्योति’ में पढ़ें। अधिक-से-अधिक नए व्यक्ति पढ़ सकें, इसलिए अभी से इन्हें जोड़ें
अखण्ड ज्योति (हिंदी) का वार्षिक चंदा अब 84 रुपये होगा। विदेश में 100 रुपये, भारत में आजीवन 1400 रुपये (सुरक्षानिधि)
अपने मित्र-संबंधी अँगरेजी भाषी क्षेत्र के हों या विदेश में पढ़ रहे या रह रहे हों, उन्हें भी नव वर्ष की भेंट की तरह से भेजा जा सकता हैं। चंदा वही 6 रुपये वार्षिक रहेगा तथा पत्राचार हेतु पता ‘अखण्ड ज्योति संस्थान इंग्लिश अखण्ड ज्योति प्रभाग, घीया मंडी मथुरा’ रहेगा। संपादकीय पत्राचार हेतु ‘शाँतिकुँज हरिद्वार’ से संपर्क करें
अँगरेजी अखण्ड ज्योति को छोड़कर मिशन की मथुरा से प्रकाशित होने वाली सभी पत्रिकाओं के चंदे में वृद्धि कर दी गई है। जनवरी 24 से नई दरें प्रभावी होंगी। बढ़ती महँगाई, छपाई की दरों में वृद्धि एवं कागज की कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण यह कदम उठाना पड़ रहा है
‘अखण्ड ज्योति’ इंग्लिश पत्रिका ने इस माह के साथ ही एक वर्ष की यात्रा पूरी कर ली है। द्वैमासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित इस पत्रिका ने एक नए ही पाठक वर्ग को तैयार किया है। अब आगामी वर्ष के लिए सभी परिजन नए ग्राहक अभी से बनाना आरंभ कर दें
गुरुदेव ही शिष्य की देह को आधार बना कर अपनी लीला करते रहते हैं पर ऐसा होता तभी है, जब उपरोक्त सूत्र का सही-सही अनुपालन हो। सूत्रों एवं व्याख्या का क्रम अभी आगे भी है- जिसे साधक अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में पढ़ेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
जिसमें महर्षि पतंजलि विकल्पवृत्ति के बारे में बताएँगे। इसका स्वरूप और महत्त्व जानने के लिए अखण्ड ज्योति के अगले अंक की प्रतीक्षा करें। परन्तु यह प्रतीक्षा भी साधकों के अनुरूप साधनामय होनी चाहिए
पढ़े-लिखे ब्रह्मराक्षस विश्वविद्यालयों से निकल रहे हैं, जो आज के जातिवाद से ग्रसित राजनीति के वातावरण में अति महत्वाकाँक्षी, उद्धत, उद्दंड एवं अपराधी बनते चले जा रहे हैं। इसीलिए पूज्यवर ने उसी लेख में लिखा, ‘संजीवनी विद्या का शिक्षण देने वाला एक सर्वांगपूर्ण विश्वविद्यालय अपना ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही चला सकता है। भावनापूर्ण परिजन यदि चाहेंगे, तो यह शिक्षणपद्धति एक स्थान से आरंभ होकर देशव्यापी होकर युगनिर्माण के उपयुक्त वातावरण उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होगी (पृष्ठ 63)
‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही विश्वविद्यालय निर्माण कर दिखा सकता है
देवालय प्रबंधन से लेकर सर्वांगपूर्ण जानकारी धर्मशास्त्रों की देने वाला यहां प्रशिक्षण समय की बहुत बड़ी आवश्यकता पूरी करने जा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की इसे विषयवस्तु बनाया और जन−जन तक इसे लोकप्रिय बनाया। आज संप्रदायवाद से ग्रसित आस्था संकट से पीड़ित जनसमुदाय को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का यह प्रशिक्षण ही कुछ राहत दे सकेगा। इसी उद्देश्य से प्रज्ञापरिषद् की प्रत्येक जनपद में स्थापना की जा रही है, ताकि जनचेतना इस महत्वपूर्ण उद्देश्य के प्रति बढ़े एवं प्रतिभाओं−बुद्धिजीवियों की भागीदारी हो
पूर्णाहुति हुई। कुमारी कन्याओं का भोजन हुआ उसी यज्ञ में 108 परिजन अखण्ड ज्योति के ग्राहक बन गए। मेरा संकल्प पूरा हो गया। मैं स्वयं देखकर गदगद था कि कितना शानदार यज्ञ रहा, जबकि मात्र पाँच कुँडीय आयोजन था एवं मेरे जैसा अनगढ़ किताब पढ़ पढ़कर उसे करा रहा था
ऐसे में वेतनभोगी कर्मचारियों (धारा 80 जीजीए) को भी उस छूट का लाभ प्राप्त होगा, जो वे दान प्राप्त करेंगे। यदि हमारे गुरुदेव की इच्छानुसार हमारा ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही इसे खड़ा करना चाहे तो पचास पैसा प्रतिदिन के हिसाब से मासिक या वार्षिक स्तर पर अनुग्रह राशि भेजकर यह पावन पुण्य अर्जित कर सकता है। यदि इस पत्रिका के साढ़े छह लाख पाठकों ने यह राशि भेजना आरंभ किया, तो हमें वर्ष भर में 3.25 लाख 365 रुपये (लगभग 12 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष) मिलना आरंभ हो जाएँगे। दस वर्ष तक यह क्रम चले तो इतने मात्र से हमारा लक्ष्य पूरा हो जाएगा
जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं। इस कथा की अगली कड़ी अखण्ड ज्योति के अगले अंक की विषयवस्तु होगी। तब तक साधकगण गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करते हुए गुरुमंत्र की साधना में संलग्न रहें
राजकुमार जी बोले, आपको तो आता है, आप ही यज्ञ संपन्न कराया। एक व्यक्ति को अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाने हेतु बिठा दिया। पूर्णाहुति हुई। कुमारी कन्याओं का भोजन हुआ उसी यज्ञ में 108 परिजन अखण्ड ज्योति के ग्राहक बन गए
ये विचार आज के नहीं हैं, आज से प्रायः चालीस वर्ष पूर्व परमपूज्य गुरुदेव पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा अपनी पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ (मार्च, 1964) के माध्यम से व्यक्त किए गए थे। उनके मन में बड़ी पीड़ा थी कि राष्ट्र को आजादी मिलने के सत्रह वर्ष बाद भी शिक्षापद्धति वही मैकाले की है। शिक्षा में विद्या का कहीं नाम नहीं है
हम विचारशील हैं, विवेकवान हैं, इसके परख की कसौटी एक ही है कि हम साधक दैनन्दिनी की इस योजना में कितने उत्साह, निष्ठ एवं श्रद्धा से भागीदार बनते हैं। इस योजना में ही अखण्ड ज्योति एवं शान्तिकुञ्ज की ओर से साधकों के लिए नववर्ष की मंगलकामनाएँ निहित हैं। इसी में परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी की दिव्य प्रेरणा एवं मंगलमय आशीष समाया है। साधक दैनन्दिनी के इन चौबीस नियमों को आपने किस तरह धारण-ग्रहण किया, इसकी सूचना शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के पते पर अवश्य दें
उनको मैं बचपन से एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में जानता था। या से लौटकर आए, तो मेरे लिए प्रसाद रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका लाए। मैं उसे पढ़ने लगा। नियमित प्रति माह पत्रिका आने लगी
स्वाध्याय के क्रम में अखण्ड ज्योति पत्रिका के किसी लेख को विचार पूर्वक पढ़ा जाय, अथवा किसी श्रेष्ठ विचारपूर्ण साहित्य को पढ़ा जाय। और उस पर कुछ पंक्तियों में समीक्षात्मक नोट लिखा जाय। इस तरह के स्वाध्याय क्रम से मौलिक सृजन चेतना जाग्रत् होती है
गुरुदेव भगवान के आदेश पर ही मैं पैसा कमाने हेतु आसाम गया। यह सुयोग सहज ही बन गया तो मैंने भी संकल्प लिया कि मैं कम−से कम 108 ‘अखण्ड ज्योति’ के सदस्य अपने काम के साथ−साथ बनाऊँगा। 1964 के मार्च में मैं आसाम चला गया था। दुमदुमा के एक भाई ने हमसे चर्चा में कहा, हम चार भाई हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
प्रस्तुत वसंत इन सभी निर्धारणों के साथ−साथ परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य, उनकी प्राणचेतना की संवाहक पत्रिकाओं (अखण्ड ज्योति हिंदी व अन्य भाषाएँ, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री, प्रज्ञा पाक्षिक) को जन−जन तक पहुँचाने के संकल्प को भी लेकर आया है। जितना अधिक युगसाहित्य घर−परिवारों तक, विद्यालयों व अन्य संगठनों के बीच पहुँचेगा, उतना ही मिशन का विस्तार होगा। प्रस्तुत वसंत आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिंतन−मनन, अपने स्तर पर अपने यहाँ छोटा दीपयज्ञपरक आयोजन, संगठन−सशक्तीकरण की दिशा में आत्ममंथन एवं विद्याविस्तार के निमित्त हमारे सुनिश्चित संकल्प, इन चारों को पूरा करने के निमित्त मनाया जाए, तो ही हमारी गुरुसत्ता के प्रति समर्पण की सार्थकता है
बावन ग्लेज पृष्ठो में सुँदर गेटअप के साथ यह पंद्रह दिन पूर्व मिल जाए, ऐसी व्यवस्था की जा रही है। मुख्य संपादक अखण्ड ज्योति ‘हिंदी’ के संपादक डॉक्टर प्रणव पंड्या ही रहेंगे, संपादक श्री शंभूदास जी होंगे। लेख संबंधी जिज्ञासाएँ शाँतिकुँज, हरिद्वार लिख भेजें। चंदा अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा भेजे
लेख संबंधी जिज्ञासाएँ शाँतिकुँज, हरिद्वार लिख भेजें। चंदा अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा भेजे। वहीं से पत्रिका प्रकाशित होगी। चंदे संबंधी सारा पत्राचार मथुरा से ही करें
टेलीफोन इंस्पेक्टर का ऑफिस ऋषिकेश था। संयोग से वह ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ता था। तत्काल शाँतिकुँज आया। सर्वे किया व एक नियम शुल्क जमा कराने को कहा
बाद में हमारे मित्र रामउदार सिंह शाँतिकुँज आए, बोले, स्वप्न में गुरुदेव के दर्शन हुए। उनने छाती पर हाथ फेरकर कहा, तुम्हारी दवा ‘अखण्ड ज्योति’ है। उसे नित्य पढ़ते रहो। उसी दिन से सुधार आरंभ हो गया
पूज्यश्री ने हरिद्वार के समाचार पूछे, निर्माण−कार्य की गति पूछी एवं अकस्मात् आने की वजह जानी। मेरा निवेदन सुनते ही भगवान बोले, “रामचंद्र, अखण्ड ज्योति में क्या छपा है, उसे अलग रख दो। तुम्हारे गाँव की प्राण−प्रतिष्ठा हेतु हमने पहले ही तीन दिन का कार्यक्रम दे दिया है। तुम तीन वर्षों से हमारे सपने को पूरा करने में लगे हो
अंग्रेजी की ‘अखण्ड ज्योति’ इस वसंत से आरंभ
1972 में परमपूज्य गुरुदेव का बिहार का अंतिम यज्ञ कार्यक्रम (विदाई से पूर्व) ‘अखण्ड ज्योति) में प्रकाशित हुआ। मैंने अपने गाँव के लिए भी निवेदन किया था, पर उसका कहीं उल्लेख नहीं था। अपने छोटे−से गाँव में प्रयत्न−परिश्रम करके मेरी अनुपस्थिति में भी गाँव वालों ने मंदिर का निर्माण कर ही लिया था
इंग्लिश भाषा में बड़े दिनों से स्तरीय ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की माँग थी। अब इसे शाँतिकुँज हरिद्वार से संपादित कर ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से इसी वर्ष द्वैमासिक (बायमंथली) पत्रिका के रूप में इस वसंत से आरंभ किया जा रहा है। प्रारंभ में इसे फरवरी, अप्रैल, जून, अगस्त, अक्टूबर व दिसंबर इस तरह छह अंकों के रूप में प्रतिवर्ष निकाला जाएगा
इंग्लिश भाषा में बड़े दिनों से स्तरीय ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की माँग थी। अब इसे शाँतिकुँज हरिद्वार से संपादित कर ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से इसी वर्ष द्वैमासिक (बायमंथली) पत्रिका के रूप में इस वसंत से आरंभ किया जा रहा है। प्रारंभ में इसे फरवरी, अप्रैल, जून, अगस्त, अक्टूबर व दिसंबर इस तरह छह अंकों के रूप में प्रतिवर्ष निकाला जाएगा। परिपूर्ण व्यवस्था बन जाने पर यह मासिक आवृत्ति के रूप में भी निकल सकेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
आयोजन स्थलों का चयन इस पर निर्भर करता है कि जिस स्थान से माँग आ रही है वहाँ समुचित तैयारी पहले से है कि नहीं? अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान पत्रिका के सुनिश्चित संख्या में सदस्य पहले से वहाँ बना लिए गए हैं कि नहीं? प्रयाज के रूप में क्षेत्रीय छोटे-छोटे कार्यक्रम वहाँ पहले से संपन्न हो चुके हैं कि नहीं, ज्ञानघट कितने सक्रिय हैं वह कितने संकल्पित? पुराने दीक्षित परिजनों, संस्कारों से जुड़े परिजनों से संपर्क बन सका या नहीं? सातों आँदोलनों में कुछ गति आई या नहीं? यदि आई तो उपलब्धियाँ क्या-क्या हैं? उन सभी का पर्यवेक्षण करके ही यह आयोजन दिए जाएंगे
आने वाला भूखा रह ही नहीं सकता था। वह माँ अन्नपूर्णा कैसे सारी व्यवस्था करती थी, कोई नहीं जानता, किंतु अभावग्रस्त (ओढ़ी हुई गरीबी) परिस्थितियों में तत्कालीन अखण्ड ज्योति संस्थान आने वाला अतिथि-परिजन-पारिवारिक रिश्तेदार आदि कोई भी उनके इस आतिथ्य से, स्नेह भरे शब्दों के साथ भोजन के आग्रह एवं अपना जी खोलने से बचा नहीं। साँवला-सा-चेहरा, गोल-सी आकृति एवं सरल नाक-नक्श के साथ जो अंत गहराई वाला निश्छल प्रेम उनकी आँखों में रहता था, वह बुजुर्ग को भी बेटी बनकर उनसे कुछ पाने को, वात्सल्य के कण बटोरने की विवश कर देता। इसीलिए तो गुरुदेव कहते थे कि वह जन्म से ही माताजी के रूप में जन्मी हैं, माताजी ही रहेंगी और माताजी ही कहलाएँगी
व्यवस्थापक : अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अपने 22 वर्षीय पुत्र पर एक महती जिम्मेदारी डाल उससे भी उनका विछोह होना था। परमपूज्य गुरुदेव तो अपनी अंतर्वेदना ‘अपनों से अपनी बात’ के रूप में अखण्ड ज्योति में लिखकर हल्के हो जाते थे, वे वहाँ किसके पास अपनी व्यथा-वेदना के बोल लेकर जातीं व सुनाती। उन्हें तो घर का सारा अंदर का काम भी देखना था, संगठन को भी मार्गदर्शन देना था एवं सबसे भारी पीड़ादायी कार्य अपने आराध्य से 3 जून को हरिद्वार में हमेशा के लिए विदाई देने का करना था। वे हिमालय जा रहे थे
परमपूज्य गुरुदेव के मूर्तिमान स्वरूप वाङ्मय को घर-घर पहुँचाने के लिए निष्ठावान परिजनों की आवश्यकता है। जो भाई इस कार्य हेतु अपने को योग्य समझते हों, निम्नलिखित विवरण सहित अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से संपर्क करें। समयदान की अवधि दो माह की रहेगी। टोलियाँ प्रत्येक माह की 1 तारीख से निकलेंगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
हम लोगों को आगे बहुत महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। इसलिए अपना संपर्क और प्रभावक्षेत्र अखण्ड ज्योति के माध्यम से बढ़ाना ही पड़ेगा
स्पष्ट निर्देश है कि प्रबुद्ध वर्ग में श्री बिजेंद्रलाल जी अखण्ड ज्योति को आधार बनाकर पैठ बनाएँ। चूँकि वे विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। उनको लिखा भी इसी तरह गया है, चुनावों जैसा दौर सुशिक्षित वर्ग को प्रभावित करने के लिए वे करें
युग निर्माण योजना को व्यापक बनाने के लिए अखण्ड ज्योति का प्रसार आवश्यक है। इस दिशा में आप जो प्रयत्न कर रहें हैं, निश्चय ही उससे इस विचारधारा को सुनिश्चित बनाने में बहुत सफलता मिलेगी
गायत्री तीर्थ हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं क्षेत्रों में विगत दिनों काफी कुछ गतिविधियाँ हुई हैं। परिजन पाक्षिक (प्रज्ञा अभियान) समाचार-पत्र के माध्यम से काफी कुछ पढ़ते रहते हैं, पर ‘अखण्ड ज्योति’ जितने लोगों तक पहुँचती है, उतनों तक पाक्षिक नहीं जाता। अतः दिसंबर 2002 से अप्रैल 2003 तक की गतिविधियों का एक लेखा-जोखा इस बार की अपनों से अपनी बात में दिया जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
गायत्री के प्रति परिपूर्ण श्रद्धा विकसित करने की बात पितृवत् लेखनी से पूज्यवर कर हरे हैं, साथ ही गायत्री महाविज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान एवं ‘अखण्ड ज्योति’ के स्वाध्याय को एक नियमित रुटीन बनाने की बात भी कह रहे हैं। उनका स्पष्ट मत, शुरू के भी कई पत्रों का जब हम अनुशीलन करते हैं, तो यही रहा है कि अपनी सारी समस्याओं का समाधान ‘अखण्ड ज्योति’ में ढूँढ़ने का प्रयास करें। यही नहीं, वास्तविक ज्ञान, आत्मज्ञान भी उसी से मिलता है, यह वे लिखते रहे हैं। वस्तुतः पत्र−लेखन व पाती की ही तरह से ‘अखण्ड ज्योति’ का लेखन−संपादन उनकी दैनिक साधना का एक अंग था, चाहे वे मथुरा हों या बाहर
यही नहीं, वास्तविक ज्ञान, आत्मज्ञान भी उसी से मिलता है, यह वे लिखते रहे हैं। वस्तुतः पत्र−लेखन व पाती की ही तरह से ‘अखण्ड ज्योति’ का लेखन−संपादन उनकी दैनिक साधना का एक अंग था, चाहे वे मथुरा हों या बाहर। पहले के पत्र में हम पढ़ चुके हैं कि दस हजार पत्रिकाएँ उस समय छपती थीं। अब छपती हैं साढ़े छह लाख, लगभग पैंसठ गुना अधिक
तुम हर महीने अखण्ड ज्योति पत्रिका अवश्य पढ़ती रहा करो। इससे तुम्हें अनेक महत्त्वपूर्ण बातें विदित होती रहेंगी
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह महाराष्ट्र की यात्रा पूर्ण कर मध्य भारत के गुना क्षेत्र तक आ चुकी थी। अब वसंत पर्व पर गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा रहकर यह फरीदाबाद, नोएडा होकर 13 फरवरी की शाम तक शाँतिकुँज आ जाएगी। पत्रिका सबके पास पहुँचने तक यह यात्रा पूरी हो चुकी होगी। भारत इतना बड़ा देश है
सारी किताबें अँगरेजी में ही उपलब्ध हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ व उसकी सहयोगी पत्रिकाओं ने हिंदी जगत की कितनी बड़ी सेवा की है, इसका जब भी मूल्याँकन होगा, तब लोग जानेंगे
परमपूज्य गुरुदेव जीवन भर आचरण से सीख देते रहे, एक कर्मठ लोकसेवी का जीवन जी गए। पत्रों से, प्रत्यक्ष मिलन से, अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा एवं समय−समय पर अपने विराट आयोजनों के माध्यम से उनने कितने व्यक्तियों को प्रभावित किया होगा, उनके अंतःकरण को सराबोर किया होगा, गणना भी नहीं की जा सकती
गायत्री के प्रति परिपूर्ण श्रद्धा विकसित करने की बात पितृवत् लेखनी से पूज्यवर कर हरे हैं, साथ ही गायत्री महाविज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान एवं ‘अखण्ड ज्योति’ के स्वाध्याय को एक नियमित रुटीन बनाने की बात भी कह रहे हैं। उनका स्पष्ट मत, शुरू के भी कई पत्रों का जब हम अनुशीलन करते हैं, तो यही रहा है कि अपनी सारी समस्याओं का समाधान ‘अखण्ड ज्योति’ में ढूँढ़ने का प्रयास करें। यही नहीं, वास्तविक ज्ञान, आत्मज्ञान भी उसी से मिलता है, यह वे लिखते रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
अखण्ड ज्योति पत्रिका वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के माध्यम से परिष्कृत अध्यात्म का रूप लिए प्रबुद्ध वर्ग को प्रभावित करती हुई निरंतर प्रकाशित होती रही है। यह प्राण−प्रवाह यों तो गायत्री महाशक्ति के तत्वज्ञान एवं राष्ट्र सहित युग के नवनिर्माण हेतु सतत प्रवाहित होता था, परन्तु पूज्यवर इतने से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें सतत यही लगता था कि युवाशक्ति, पढ़ा-लिखा, विज्ञान पढ़ा तबका कैसे मिशन से जुड़ेगा? इसी क्रम में उसने 1967-68 में अपने लेखन को 180 डिग्री का मोड़ देते हुए अखण्ड ज्योति पत्रिका में एक लिखा, जिसमें अभिव्यक्त विचारों का सार-संक्षेप था, ‘हम अपने पाठकों के माध्यम से पढ़ना चाहते हैं
अंग्रेजी की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका शाँतिकुँज से संपादित होकर अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा (उ.प्र.)-281003 से प्रकाशित होना आरंभ हो चुकी है। अभी तक जनवरी-फरवरी तथा मार्च-अप्रैल के दो संस्करण आ चुके। वर्ष में 6 बार निकलने वाली यह द्विमासीय पत्रिका नए प्रबुद्ध पाठकों तक पहुँचाई जानी चाहिए
यह प्राण−प्रवाह यों तो गायत्री महाशक्ति के तत्वज्ञान एवं राष्ट्र सहित युग के नवनिर्माण हेतु सतत प्रवाहित होता था, परन्तु पूज्यवर इतने से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें सतत यही लगता था कि युवाशक्ति, पढ़ा-लिखा, विज्ञान पढ़ा तबका कैसे मिशन से जुड़ेगा? इसी क्रम में उसने 1967-68 में अपने लेखन को 180 डिग्री का मोड़ देते हुए अखण्ड ज्योति पत्रिका में एक लिखा, जिसमें अभिव्यक्त विचारों का सार-संक्षेप था, ‘हम अपने पाठकों के माध्यम से पढ़ना चाहते हैं। कुँडलिनी, मानवी संरचना आदि के विषय में जो वैज्ञानिक तथ्य जिनके पास हों, वे पुस्तकों से निकालकर हमें भेजें। इस संबंध में एक प्रकोष्ठ यहाँ बनाया गया है
गुरुदेव का बताया हुआ विधान व्यवहार में उतर आया था। महापुरश्चरण साधना के साथ अखण्ड ज्योति का भी अवतरण उसी दिन वसंत पंचमी पर संपन्न हुआ। तभी से यह अखण्ड दीपक प्रज्वलित है। क्रमशः आगरा, मथुरा होकर 75 वर्ष की यात्रा कर चुका है
इसका वार्षिक मूल्य साठ रुपये (विदेश के लिए छह सौ रुपये) है। चंदा अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी, मथुरा भेजें तथा पत्रिका में सुधार-मार्गदर्शन हेतु सुझाव संपादक के नाम हरिद्वार भेजें। अधिकाधिक पत्रिका के पाठक बढ़ें, यही इस गायत्री जयंती पर सभी व्रत लें
अध्यात्म और विज्ञान के समन्वयात्मक प्रतिपादनों के संग्रह में उनका बड़ा योगदान रहा है। निश्चित रूप से सतत गुरुसत्ता से प्राप्त प्रेरणाओं ने ही उनसे यह कार्य कराया कि क्रमशः 1970 के बाद की अखण्ड ज्योति तर्क, तथ्य, प्रमाणों के साथ प्रस्तुत होने लगी। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना (1971) इसी पृष्ठभूमि पर हुई है। उन्हीं को संबोधित एक पत्र और है, जो पूज्यवर की अपने शोध-साधनों पर मजबूत पकड़ को प्रमाणित करता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
इसकी चर्चा और इसका चिन्तन महर्षि के अगले सूत्र की विषय वस्तु है। जो अखण्ड ज्योति के अगले अंक में प्रकट होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
ऐसा न हो कि इस थोड़ी−सी ही देर में शैतान बहका दे और तेरे देने के इरादे को बदल दे। ” (अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1982, पृ.सं. 58)
पता− अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
ये ज्ञानघट उन सब घरों में स्थापित किए जा सकते हैं, जो अभी नए हैं, मिशन से अपरिचित हैं, परंतु उद्देश्य बताए जाने पर उत्साह दिखा रहे हैं या इस प्रयोजन से जुड़ना चाह रहे हैं। प्रयास किया जाए तो ये ज्ञानघट देखते−देखते प्रबुद्ध वर्ग—भावनाशीलों, विभूतिवानों, हमारी अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युग शक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों के परिचितों के घर स्थापित हो सकते हैं। इस विशिष्ट ज्ञानघट की लागत भी बड़ी कम मात्र दस रुपये ही रखी गई है। प्रतिमाह इस राशि के संग्रह एवं भेजने के लिए एक तंत्र खड़ा करना होगा, जो कि आसानी से किया जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
पता- ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा
कई दिन से यज्ञ समिति इस प्रश्न के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है पर अभी कुछ निर्णय नहीं हो सका है। इसलिए यह निश्चय किया है कि गायत्री परिवार की शाखाओं तथा अखण्ड ज्योति परिवार के सुलझे हुए मस्तिष्कों की सलाह से इस प्रश्न का निर्णय किया जाय। यह अंक हाथ में पहुँचते ही समस्या के विभिन्न पहलुओं पर विचार करके सभी वरिष्ठ सदस्य अपनी सम्मति भेजने की कृपा करें, ताकि यज्ञ समिति बहुमत के आधार पर अन्तिम निर्णय कर सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-August
गायत्री-परिवार-पत्रिका के गत 4 अंकों में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एवं गायत्री संस्था के आगामी कार्य-क्रमों के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण लेख छपे हैं। अखण्ड ज्योति के पाठकों के ऐसे अनेक पत्र आए हैं कि वे उन लेखों के पढ़ने से वंचित रह गए। इसलिए अगले अंक में पत्रिका के आवश्यक लेखों को अखण्ड-ज्योति में छाप रहे हैं। अगला अंक एक प्रकार से ‘गायत्री महायज्ञ अंक’ ही होगा
आज के वैज्ञानिक युग की चकाचौंध उस अखंड ज्योति की एक किरण के तुल्य भी नहीं है। जितने ज्योतिर्मय पदार्थ विश्व में देखने को मिलते हैं वे उसी अखण्ड ज्योति से ही प्रकाशमान हैं। दुर्जन तोष न्याय से उसके अभाव में सकल संसार असार है। प्राणिमात्र में भी जो गति तथा ज्योति दृष्टिगोचर हो रही है वह भी उसी अखण्ड ज्योति से ही बल पाकर सत्तारूढ़ है
आप अवश्य समझ गए होंगे कि वह अखण्ड ज्योति क्या है? उसे मनुष्य ब्रह्म, भगवान् विष्णु, ओऽम्, खुदा, शक्ति, कुदरत आदि-आदि नामों से अपने विश्वास अनुसार पुकारते हैं। एक मात्र सभी का अंगुलि निर्देश उस दिव्य अखण्ड ज्योति भगवान् की ही ओर है। वास्तव में प्राणिमात्र का, विशेषतः मानव समाज का कल्याण एवं मंगल उस अखण्ड ज्योति की प्राप्ति में ही है। अतः वेद भगवान कहता है “ऋतस्यपथा प्रेत” उस अखण्ड ज्योति की ओर चलो
एक मात्र सभी का अंगुलि निर्देश उस दिव्य अखण्ड ज्योति भगवान् की ही ओर है। वास्तव में प्राणिमात्र का, विशेषतः मानव समाज का कल्याण एवं मंगल उस अखण्ड ज्योति की प्राप्ति में ही है। अतः वेद भगवान कहता है “ऋतस्यपथा प्रेत” उस अखण्ड ज्योति की ओर चलो
आप अवश्य समझ गए होंगे कि वह अखण्ड ज्योति क्या है? उसे मनुष्य ब्रह्म, भगवान् विष्णु, ओऽम्, खुदा, शक्ति, कुदरत आदि-आदि नामों से अपने विश्वास अनुसार पुकारते हैं। एक मात्र सभी का अंगुलि निर्देश उस दिव्य अखण्ड ज्योति भगवान् की ही ओर है। वास्तव में प्राणिमात्र का, विशेषतः मानव समाज का कल्याण एवं मंगल उस अखण्ड ज्योति की प्राप्ति में ही है
आज का भोला संसार उस अखण्ड ज्योति की सत्ता के सम्बन्ध में पूछने पर ‘नेति’-’नेति’ का उत्तर प्रदान करता है, किन्तु ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ जो गम्भीरतापूर्वक सूक्ष्म ईक्षिका से उस अखण्ड ज्योति की खोज करता है वह एक दिन उसे पाकर अथाह आनंद सागर में गोते लगाता है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का संकेत उसी अखण्ड ज्योति की ओर है
पर सन्तान निग्रह किस प्रकार किया जाय, इस सम्बन्ध में बहुत मतभेद है। ‘अखण्ड ज्योति’ के किसी पिछले अंक में इस विषय पर काफी प्रकाश डाला गया था। वर्तमान समय में संतति-निग्रह का जो प्रचार किया जा रहा है उसमें प्रधानतः कृत्रिम साधनों का प्रयोग ही बतलाया जा रहा है। पर इसी कारण अनेक व्यक्ति इसके विरोधी भी बन जाते हैं
वास्तव में प्राणिमात्र का, विशेषतः मानव समाज का कल्याण एवं मंगल उस अखण्ड ज्योति की प्राप्ति में ही है। अतः वेद भगवान कहता है “ऋतस्यपथा प्रेत” उस अखण्ड ज्योति की ओर चलो
दुर्जन तोष न्याय से उसके अभाव में सकल संसार असार है। प्राणिमात्र में भी जो गति तथा ज्योति दृष्टिगोचर हो रही है वह भी उसी अखण्ड ज्योति से ही बल पाकर सत्तारूढ़ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
जो होता यजमान न बन सकें, मथुरा भी न आ सकें वे इस यज्ञ की आसुरी अनुष्ठानों से रक्षा के लिए एक माला प्रतिदिन का नियम लेकर संरक्षक बन सकते हैं। अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक के इस यज्ञ में होता, यजमान या संरक्षक किसी भी रूप से सम्मिलित रहने का हमारा विशेष अनुरोध है। इस अंक के अन्तिम पृष्ठों में दो फार्म जुड़े हुए हैं उन्हें भरकर स्वयं भेजें तथा इनकी नकल सादे कागज पर बनाकर और भी साथियों को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए फार्म भरावें
यह समुद्र मंथन करके रत्न निकालने जैसा कठिन कार्य है। इसके लिए एकमात्र उपाय यही है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने क्षेत्र के घर-घर में गायत्री यज्ञ का सन्देश पहुँचाने के लिए वैसे ही घूमे जैसे वोट माँगने के लिए घूमना पड़ता है। इतने बड़े आयोजन की घोषणा कर देने पर अपने परिवार के ऊपर महायज्ञ की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। इसकी असफलता एक महान् धार्मिक आवश्यकता का अपूर्ण रह जाना, विश्व मानव का एक दुखद दुर्भाग्य तो है ही-साथ ही अपने परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
माकडौन (उज्जैन) में श्री सत्यनारायण जी मोदी के स्थान पर अखण्ड ज्योति जलाई गई और 7 लाख 68 हजार जप व 4320 आहुतियों का कार्यक्रम पूर्ण किया गया। महिला समाज में श्री सीताबाई के स्थान पर भी 4 लाख 32 हजार जप व 3240 आहुतियों का हवन किया गया
श्री धुन्दीसिंह शर्मा (बड़ेसरा, अलीगढ़) से लिखते हैं कि हमारे यहाँ के श्री हुन्डीलाल टेलर मास्टर अखण्ड ज्योति का गायत्री अंक पढ़ने से गायत्री उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 चैत्र की नवरात्रियों में आप तपोभूमि मथुरा भी गये थे और वहाँ आचार्य जी से अपनी मनोकामना कह सुनाई। उन्होंने साधना में लगे रहने को कहा
अखण्ड ज्योति के गत अंक में आगामी कार्तिक सुदी 12 से 15 तक होने वाली पूर्णाहुति का वृत्तान्त छप चुका है। 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं में 1 लाख होताओं द्वारा 240 लाख आहुतियाँ होने तथा सभी आगन्तुकों एवं दर्शकों के लिए निःशुल्क भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था होने का यह संकल्प इस युग का अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान है। इस आयोजन के छोटे-छोटे कार्य भी इतने बड़े हैं कि उनकी पूर्ति एवं व्यवस्था की बात सोचने मात्र से सिर चकराने लगता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
कि यज्ञ-भाव से अखण्ड ज्योति जो जला रहा
(1) गायत्री परिवार के संगठन सम्बन्धी समाचार, शाखा संचालकों तथा सदस्यों के लिये आवश्यक सूचनाएं अब ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ में ही छपने लगी हैं। अखण्ड ज्योति विशुद्ध विचार पत्रिका रहेगी, इसमें मानव जीवन को समुचित बनाने वाले विचारात्मक लेख ही रहा करेंगे। प्रचारात्मक सामग्री गायत्री परिवार पत्रिका में रहा करेगी। जिन्हें गायत्री परिवार के कार्यक्रम में रुचि है वे अपनी शाखा से लेकर या स्वयं मँगाकर गायत्री परिवार पत्रिका अवश्य पढ़ा करें
अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार के सदस्य को अपनी कमाई में से कुछ पैसे नित्य ही धर्म प्रचारक के लिए, सद्ज्ञान साहित्य के लिए बचाने चाहिए, यदि एक आना प्रतिदिन इस कार्य के लिए बचाया जा सके तो हर कोई धर्मप्रेमी अपने घर को कुछ ही वर्ष में सरस्वती का केन्द्र सद्ज्ञान का भण्डार बना सकता है। घर के बच्चों के लिए, पड़ौसी रिश्तेदार और दोस्तों के लिए यह साहित्य एक वरदान जैसे सम्पत्ति साबित हो सकती है। घर के जो लोग इसे पढ़ेंगे उनके विचारों और संस्कारों में अच्छे परिवर्तन ही होंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
यह प्रक्रिया अखण्ड ज्योति की सदस्यता से ही सम्भव है। आप यह प्रयत्न करें कि आपके क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिक से अधिक ग्राहक बनें। जिनके यहाँ अखण्ड ज्योति आती है उसे पढ़ने का लाभ अधिकाधिक लोग उठावें। स्मरण रहे अखण्ड ज्योति के प्रसार के बिना- गायत्री प्रचार से लेकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान तक कोई भी अपना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता
16- अखण्ड ज्योति इस संस्था की वाणी है। तपोभूमि की कोई भी योजना सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी आवाज अधिक लोगों तक पहुँचे। अधिक लोग उससे सम्बन्धित रहें
आप यह प्रयत्न करें कि आपके क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिक से अधिक ग्राहक बनें। जिनके यहाँ अखण्ड ज्योति आती है उसे पढ़ने का लाभ अधिकाधिक लोग उठावें। स्मरण रहे अखण्ड ज्योति के प्रसार के बिना- गायत्री प्रचार से लेकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान तक कोई भी अपना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता। इस जड़ को सींचने का ध्यान रहे अन्यथा जड़ सूखने पर अपने कार्यक्रमों में पत्र पल्लव फल प्रभृति के कोई भी सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेंगे
जिनके यहाँ अखण्ड ज्योति आती है उसे पढ़ने का लाभ अधिकाधिक लोग उठावें। स्मरण रहे अखण्ड ज्योति के प्रसार के बिना- गायत्री प्रचार से लेकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान तक कोई भी अपना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता। इस जड़ को सींचने का ध्यान रहे अन्यथा जड़ सूखने पर अपने कार्यक्रमों में पत्र पल्लव फल प्रभृति के कोई भी सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेंगे
अधिक लोग उससे सम्बन्धित रहें। यह प्रक्रिया अखण्ड ज्योति की सदस्यता से ही सम्भव है। आप यह प्रयत्न करें कि आपके क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिक से अधिक ग्राहक बनें। जिनके यहाँ अखण्ड ज्योति आती है उसे पढ़ने का लाभ अधिकाधिक लोग उठावें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
गायत्री परिवार कार्यक्रम सारे भारतवर्ष में बड़े ही उत्साहपूर्वक चल रहा है। अब उसके सारे समाचार, विज्ञप्तियाँ, परिपत्र अनुभव तथा आवश्यक सूचनायें गायत्री परिवार पत्रिका में छपते हैं कुछ आवश्यक बातें ‘अखण्ड ज्योति’ में भी ‘गायत्री-परिवार समाचार’ स्तम्भ के नीचे छपती रहा करेंगी
6- जो शाखाएं मासिक रिपोर्ट नियमित रूप से नहीं भेजतीं, जिनके मन्त्री और सदस्य अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, जिनके यहाँ कोई कार्यालय नहीं चलते, जहाँ से महायज्ञ की पूर्णाहुति में भी कोई नहीं आना चाहते, जो न अखण्ड ज्योति मँगाते हैं, न गायत्री परिवार पत्रिका, ऐसी शाखाओं को तोड़ा जा रहा है। उन शाखाओं से एक परिपत्र द्वारा स्पष्टीकरण माँगा गया है। कर्तव्य की उपेक्षा करने वाली शाखाएं अगले महीने तोड़ दी जायेंगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
गूँजे अखण्ड ज्योति का नारा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
पता-’अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति के गत अंक में (1) “युग निर्माण का मंगलाचरण” (2) तप साधना द्वारा दिव्य शक्ति का अवतरण (3) महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद- इन तीन लेखों में यह बताया गया है कि गायत्री-परिवार का आगामी सार्वजनिक कार्यक्रम उद्देश्य लक्ष, विचार तथा अरमान क्या हैं? यह कोरी आकाँक्षाएं तथा अभिलाषाएं ही नहीं है-इन्हें शेखचिल्ली के सपने ही नहीं समझना चाहिए। एक लाख व्रतधारी धर्म सेवकों की अन्तरात्माओं में जो हिलोरें उठ रहीं हैं उन्हें देखते हुए इस लक्ष तक पहुँच सकना कुछ भी कठिन नहीं है। इतना विशाल लक्ष और इतना नया-केवल दो वर्ष का बाल-संगठन-इन दोनों की तुलना करने पर यह सब ऐसा लगता है मानों छोटे मुँह बड़ी बातें की जा रही हों
इस विपन्न स्थिति को बदलने-ऋषि युग को, देव काल को पुनः वापिस लाने के लिए जो प्रयत्न चल रहे हैं, उनमें अखण्ड ज्योति परिवार को आगे बढ़ कर हिस्सा लेना है। युग युगान्तरों से संचित देवता और ऋषियों की थाती आदर्शवादिता को मटियामेट होने से बचाने के लिए हमें कुछ त्याग और बलिदान करना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना होगा। युग निर्माण की इस महत्वपूर्ण घड़ी में अखण्ड ज्योति परिवार निष्क्रिय दर्शक की तरह बैठा नहीं रह सकता
युग युगान्तरों से संचित देवता और ऋषियों की थाती आदर्शवादिता को मटियामेट होने से बचाने के लिए हमें कुछ त्याग और बलिदान करना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना होगा। युग निर्माण की इस महत्वपूर्ण घड़ी में अखण्ड ज्योति परिवार निष्क्रिय दर्शक की तरह बैठा नहीं रह सकता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
मन्दिर भले ही माँगे या किराये के कमरे में हों पर होना ऐसे स्थान पर चाहिए जहाँ सबकी निगाह पड़े और जनता को वहाँ पहुँचने में सुविधा हो। ऐसे मन्दिर का एक छोटा नमूना अखण्ड ज्योति प्रेस में स्थापित उपासना गृह देखा जा सकता है। नया मन्दिर बनाने में भी श्रमदान से, मामूली कच्चे मन्दिर बनाये जा सकते हैं जो कम खर्च में बन जाएं। बहुत बड़ी, अत्यन्त विशाल काय इमारत बनाने की अब जरूरत नहीं, वह धन तो धर्म जागृति के कार्यों में व्यय किया जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-December
महायज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आप सपत्नीक पधारे थे। उसी अवसर पर आपने यह लेख विशेष रूप से ‘अखण्ड ज्योति’ के लिये प्रकाशनार्थ दिया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
प्रकाश-लेकिन। हम कर सकेंगे सबके अज्ञान का संघन तम॥
इसमें अखण्ड ज्योति का घी मिला लिया॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
तथा आपकी भनक ही गणित गुत्थियों को सुलझा रही है। पूज्यवर की स्थूल काया हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी लेखनी का अमृत संजीवनी के रूप में अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति, एवं 3200 पुस्तकों तथा वाणी के रूप में आडियो-वीडियो कैसेट्स एवं अगणित व्यक्तियों द्वारा यथा रूप लिपिबद्ध प्रवचनों के रूप में आज भी अनेकानेकों का मार्गदर्शन कर रहा है। लखनऊ अश्वमेध यज्ञ समिति ने पूज्यवर के दो महत्वपूर्ण प्रवचनों को ही एक विशेष संदेश के रूप में प्रकाशित कर अपने अनुयाज का प्रथम चरण आरंभ कर दिया। यह बहुत अच्छी शुरुआत है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
ऋषियुग्म की तपः ऊर्जा का घृतरूपी स्नेह में परम वंदनीया माता जी की सत्ता का तथा बाती के प्रखर प्रकाश से परमपूज्य गुरुदेव के ब्रह्मवर्चस् का परिचय मिलता पाया जाए तो इस मिश्रण के सही स्वरूप को समझने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होगी। उसी प्रखण्ड दीपक की उनने न केवल सावधानी से देखभाल की इसकी प्रशंसा लेकर प्रकाशित होने वाली अखण्ड ज्योति जो महाकाल के प्राण प्रवाह के रूप में जन जन में अभिनव उत्साह का संचय खाली को भी संभाला। संचय क्या नहीं करा देती? जब अपना सारा आपा ही गुरुसत्ता को सौंप दिया तो फिर ज्योति बनकर जलने अथवा घी की बूँद बनकर बाती को स्नेहसिक्त बनाये रखने में कोई कमी कैसे हो सकती थी?
बड़े ही संकोच के साथ किंतु इस विश्वास के साथ कि पाठक हमारी दुविधा समझते हैं, हम नये वर्ष से बिना लाभ बिना घाटे के नाम पर अत्यधिक घाटे में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति पत्रिका का वार्षिक चन्दा 40 बढ़ाकर 47 की इसे स्वीकार करने का सभी से भावभरा अनुरोध करते हैं। विगत तीन वर्षों से हम सारी प्रतिकूलताओं के बीच इसका प्रकाशन कर रहे थे। कागजों स्याही वृद्धि के साथ अभी अभी घोषित नयी कागज नीति तथा व्यापार कर ने इस बढ़ोत्तरी के लिए हमें विवश कर दिया है
इस भवन की नींव बड़ी मजबूत है। अखण्ड ज्योति का दायित्व अब जिन कंधों पर आया है, वे कमजोर भले ही दिखाई दे पर इनका आश्वासन इतना अवश्य है कि गुरुसत्ता की सजलता व प्रखरता दोनों को ही पाठकों तक उसी रूप में पहुँचाने की महाकाल की व्यवस्था में सहायक की भूमिका में वे कोई कमी नहीं आने देंगे। परम वंदनीया माताजी की ममता करुणा स्नेह से विगलित अंतःकरण को तथा परमपूज्य गुरुदेव की दूरगामी भविष्य की रीति नीति बनाकर नवयुग का स्वप्न रचने वाली प्रखर प्रज्ञा को वे परिजनों को पहुँचाने का प्रयास करेंगे
किंतु उसे खरीदने का मन होते हुए भी इतना बड़ा सौदा करने को मन झिझक रहा था। तब मध्यम वर्ग के कुछ भावनाशील ही जुट पाए थे, अखण्ड ज्योति लागत मूल्य पर अब तक निकलती है, तथा कतिपय पुस्तकें (जो श्रद्धाँजलि सेट के रूप में पुनः प्रकाशित हुई हैं) के माध्यम से कुछ व्यवस्था बना पा रहे थे। प्रामाणिकता छपाई की इतनी रखी जाती थी कि एक बार गलत फार्म अलग किताब में चला जाने से पूरा स्टाक ही पूज्यवर ने जला दिया था। ऐसे में धनराशि कहाँ से आए? असमंजस माताजी ने दूर किया
अखण्ड ज्योति पत्रिका का दायित्व अपने कंधों पर लेते समय परिजनों से एक ही निवेदन करने का अपना मन है कि अब यही एक मात्र स्नेह सूत्र है जो पाती के रूप में स्वजनों को जोड़ने की प्रक्रिया संपन्न करने का कार्य करेगा। इस पत्रिका को जो मात्र कुछ छपे हुए लेखों का पुलिंदा मात्र नहीं है वरन् स्नेह सलिला शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी जी का सजल श्रद्धा स्वरूप स्फूर्त होता ममत्व तथा प्रातः स्मरणीय वेद मूर्ति तपोनिष्ठ परमपूज्य बनाने वाला क्रांति चेतना से भरे ओज को धारण कर आप तक पहुँचने वाला शक्ति प्रवाह है। इसके पाठकों की संख्या बढ़ाकर अधिकाधिक व्यक्तियों को प्रेरणा स्त्रोत से जोड़ना आप सभी का दायित्व है जो आप पूरा करेंगे ऐसी हमारी आशा है
अखण्ड ज्योति के पाठकों को हम पूरी तरह आश्वस्त करना चाहते हैं कि गायत्री परिवार रूपी भवन जिन ईंटों पर रखा गया है वे प्रयासपूर्वक गुरुसत्ता द्वारा पकायी गयी है। इसलिये इसके किसी भी हिचकोले से हिलने की तनिक भी गुँजाइश नहीं है। इस भवन की नींव बड़ी मजबूत है
इसकी पाठ्य सामग्री के साथ वह जीवन्त ऊर्जा जुड़ी हुई है जो हमें हमारी गुरुसत्ता से प्रतिमास-प्रतिदिन-प्रतिपल अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखने का प्रयास करती है। चौबीस चौबीस कक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 से 1953 तक के समय में तथा 240 करोड़ जप के कुमारी कन्याओं के अनुष्ठान 1975 तक उस अखण्ड दीपक की उपस्थिति में संपन्न हुए है जिसकी तप ऊर्जा में ही अखण्ड ज्योति के माध्यम से करोड़ों व्यक्तियों तक पहुँचकर उनके व्यक्तित्व को बदला उन्हें परिवार समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए प्रेरित किया तथा उनके माध्यम से लोकसेवियों का एक बड़ा परिकर खड़ा करके दिखा दिया। निश्चित ही इस आलोक ऊर्जा वितरण तंत्र में अभी भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आएगी यह और भी प्रचंड प्रवाह के रूप में जन जन तक पहुँचता रहेगा व उन्हें उल्लास भरा प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन देता रहेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
हम से एक लाख आदमी वे बँधे हुए हैं जो अखण्ड ज्योति पड़ते हैं। अखण्ड ज्योति कौन-कौन पढ़ता है-अपने से बँधने का यह मैंने मानदंड रखा है। इससे एक लाख आदमी बँधे हुए हैं और एक लाख के सहारे, जो उनके स्त्री-बच्चे, पड़ोसी हैं सब मिलाकर 50 लाख हो जाते हैं। एक सही अध्यात्मवादी 50 लाख आदमियों को प्रकाश देने में समर्थ है
बेटे, हमने अपनी जिंदगी में सही अध्यात्म को समझने की और जीवन में उतारने की कोशिश की और ढेरों आदमी आ गये। हम से एक लाख आदमी वे बँधे हुए हैं जो अखण्ड ज्योति पड़ते हैं। अखण्ड ज्योति कौन-कौन पढ़ता है-अपने से बँधने का यह मैंने मानदंड रखा है। इससे एक लाख आदमी बँधे हुए हैं और एक लाख के सहारे, जो उनके स्त्री-बच्चे, पड़ोसी हैं सब मिलाकर 50 लाख हो जाते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-January
पता- मैनेजर अखण्ड ज्योति, मथुरा
दूसरे दिन मैं वहाँ से चला आया उन महात्मा जी के वचनों पर मुझे पूर्ण श्रद्धा है। उसी दिन से मैंने अखण्ड ज्योति का पता तलाश करके पत्रालाप करना आरम्भ कर दिया और सत्य ज्ञान को प्राप्त करने लगा। अब मुझे यह पूर्ण विश्वास हो गया है, कि निकट भविष्य में पापों का अन्त होकर पुण्य की प्रचुरता होगी
हमें कुछ उद्देश्य दीजिए जिससे अपने जीवन को सफल बना सकें। उन्होंने कृपापूर्वक कई बातें हमें बताई जो सर्व साधारण के सामने प्रकट करने की नहीं हैं ‘अखण्ड ज्योति’ सम्पादक की जो प्रशंसा की उसके बारे में हम प्रकट करना नहीं चाहते उन बातों में सर्व साधारण के काम की एक ही बात थी वह यह कि भविष्य में नाना प्रकार की विपत्तियाँ मनुष्य जाति पर जायेगी। जनसंख्या बहुत घट आयेंगी। सम्वत् 2000 तक बहुत ही कष्ट संसार को रहेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-May
चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें। पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
ज्योति अखण्ड है जाग रही उसमें लय तू कर दे यह जीवन
कुछ आपत्ति से जून की अखण्ड ज्योति बहुत ही खराब छपी और 11 दिन लेट निकली, इसके लिए अनेक पाठकों ने पत्रों द्वारा रोष प्रकट किया है। अपना प्रेस न होने के कारण अप्रिय प्रसंगों को मन मारकर सहन करना पड़ता है। आगे से ठीक छपाई हो इसका विशेष सावधानी से प्रयत्न करेंगे और जहाँ तक संभव होगा भविष्य में ऐसे कटु अवसर न आने देंगे
अखण्ड ज्योति के सम्पादक पं श्रीराम शर्मा आचार्य ने व्यवहारिक जीवन की प्रत्यक्ष उन्नति करने वाली आध्यात्मिक शिक्षा की नवीन शैली से रचना करके यह आठ पुस्तकें लिखी है। प्रत्येक पुस्तक का मूल्य है। आठों पुस्तकें मंगाने के लिये 3) भेजने वालो से डाक खर्च नहीं लिया जायगा
अखण्ड ज्योति ऐसे ही व्यवहारिक आध्यात्मवाद का प्रचार करती है, जो तर्क प्रमाणों से युक्त है, बुद्धि ग्राह्य है और नकद धर्म की तरह तुर्त-कुर्त अपना चमत्कारी फल दिखाता है कैसी ही कठोर दुखदायी परिस्थिति में आप पड़े हुए हैं, इस महाविज्ञान की अमर बूटी का एक घूँट गले से नीचे उतरते ही शान्ति लाभ करेंगे और अपनी व्यथा में तत्क्षण समाधान पावेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
अखण्ड ज्योति के पाठकों को इस ईश्वरीय आज्ञा का पालन करने के लिये यथाशक्ति प्रयत्न करने में आज से ही जुट जाना चाहिए। सच्चिदानन्द प्रभु की भक्ति का इस समय सब से अच्छा मार्ग उनकी आज्ञानुसार कार्य करने में प्रवृत्त होना है। विचार परिवर्तन से युग परिवर्तन होगा
सतयुगी विचारों की स्थिरता से ही सतयुगी कार्यों की वृत्ति होती है, आज वैदिक उलट-पलट की आवश्यकता है, सद्भाव और सद् विचारों के प्रचार की आवश्यकता है, जिससे आगामी श्रेष्ठ समय को शीघ्र और सुन्दरता पूर्वक निकट लाया जा सके। अखण्ड ज्योति ईश्वर के इसी आदेश को पालन करने में प्राण-प्रण से लगी हुई है। पाठकों को भी कंधे से कन्धा मिलाकर, उसी मार्ग पर चलकर, प्रभु की इच्छा पूर्ण होने में सहायक बनकर, अपना जीवन सफल बनाना चाहिए
इस मास ज्ञान यज्ञ की सहायता के लिए निम्न महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से यह सहायताएं भेजी हैं, अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-November
पिछले तीन वर्षों से मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक हूँ। यों तो मेरे यहाँ कई भाषाओं के करीब 20 धार्मिक पत्रिकाएं आती हैं परन्तु उन सब में अखंड ज्योति मुझे विशेष रुचिकर होती है। इसकी लेखन शैली ऐसी है जो गले से नीचे दूध की तरह उतरती जाती है
गत अंक की इन्हीं पंक्तियों में बताया जा चुका है कि कलियुग का प्रमुख स्थान स्वर्ण में-पैसे में है। यदि अखण्ड ज्योति के पाठक अपने जीवन को सात्विक-सतयुगी बनाना चाहते हैं तो उन्हें अपना जीवनोद्देश्य पैसा बटोरना और मौज उड़ाना छोड़कर आत्मोन्नति बनाना होगा, पैसे को सर्वोच्च स्थान पर न रखकर धर्म और ईश्वर के प्रति आदर भाव बढ़ाना होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से यह सात्विक सहायता भेजी हैं। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपना आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
- मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-February
मैनेजर- “अखण्ड ज्योति” मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-March
ऐसे ईश्वर परायण भक्त की आन्तरिक ज्योति उसके बाहरी आचरण में स्पष्ट दिखाई देने लगी है। अपने को आत्म भाव से देखने वाला, ईश्वरीय अखण्ड ज्योति के प्रत्यक्ष दर्शन करने वाला, मनुष्य महात्मा—बन जाता है। वह तुच्छ स्वार्थों और इन्द्रिय लालसाओं में वशीभूत होकर दुष्कर्म नहीं करता। पवित्रता और प्रेम की अजस्र धारा उसके आचरणों में से निर्झरिणी की तरह झरती है, उसके लिए अमुक विधि से प्रार्थना करने की बाधा नहीं रहती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-June
ऐसे माई के लाल बहुत कठिनता से मिलते हैं, जिनकी भक्ति करने के लिए ईश्वर फिर प्रतीक्षा में बैठा हुआ है। अखण्ड ज्योति के पाठकों में से क्या कोई ऐसी भक्ति करेगा?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
जिनकी श्रद्धा हो इस अमावस्या को उपवास रखें और आगे भी प्रतिमास अमावस्या को निराहार या फलाहार सहित उपवास किया करें उस दिन विशेष रूप से आत्म शुद्धि और सत्कर्मों की ओर बढ़ने के कार्यक्रम पर गंभीरता पूर्ण से विचार किया करें एवं सत्य के पुनीत मार्ग पर चलने की प्रभु से प्रार्थना किया करें। अखण्ड ज्योति के पाठक सत्य की आराधना का इस प्रकार आरंभ करें सतयुग को शीघ्र लाने में इतना सहयोग तो अवश्य करें। हम श्रावण की अमावस्या के एक सप्ताह तक निराहार उपवास रखेंगे ताकि भगवान सत्यनारायण की मर्जी के मुताबिक अपने को चलाने के लिए क्षमता प्राप्त कर सकें युग परिवर्तन के पुण्य पर्व में अपने कर्त्तव्य का ईमानदारी और दृढ़ता के साथ पालन करते रहने के लिए जिस आत्मबल की आवश्यकता है उसका बहुत कुछ अंश इस एक सप्ताह के निराहार उपवास द्वारा प्राप्त होगा ऐसा हमारा विश्वास है। ईश्वर चिन्तन, आत्मशुद्धि, तपश्चर्या यही तीन कार्य प्रधान रूप से इन दिनों रहेंगे सो. 1 से 7 अगस्त तक पाठकों के पत्रों का उत्तर न दिया जा सके तो उन्हें चिन्ता न करनी चाहिए इस बीच में पत्र भेजने वालों या मिलने के लिए आने वालों से कष्ट न करने के लिए करबद्ध प्रार्थना करते हैं क्योंकि इससे हमारी साधना में विक्षेप पढ़ेगा
अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करती है
मैनेजर- अखण्ड ज्योति, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
दो अंकों में जितने पृष्ठ छपने चाहिए थे उससे अधिक हैं। सुरक्षित रखा जा सके इस दृष्टि से उसका साइज अखण्ड ज्योति जैसा बनाया गया है। सभी ग्राहकों को तो वह मिलेगा ही। एक प्रति एक रुपये में अलग से भी खरीदी जा सकेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
(2) इसके अतिरिक्त चार चरण और हैं, जो स्थानीय परिस्थिति तथा संगठन की शक्ति के अनुरूप निरन्तर उठाये जाते रहेंगे। जून की अखण्ड ज्योति में विचार-क्राँति के लिये खड़ी की जाने वाली शिक्षा-योजना की चर्चा कर चुके हैं। इसके लिये रात्रि पाठशालायें हर जगह चलाई जानी हैं और प्रस्तुत पाठ्यक्रम की वर्ष में दो बार परीक्षायें लेकर, उत्तीर्ण छात्रों को सुन्दर प्रमाण-पत्र देकर एक देशव्यापी व्यवस्थित प्रशिक्षणक्रम चलाया जाना है। जहाँ पूरे समय के विद्यालय संभव होंगे, वहाँ गृह-उद्योगों सहित उनका स्वरूप मथुरा के युग-निर्माण विद्यालय जैसा बनाया जायेगा, नहीं तो रात्रि पाठशालाएं तो हर जगह चलेंगी ही
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
जिस प्रकार हमें अपना विशाल परिवार छोड़ना कठिन पड़ रहा है। माता जी का भी अपना एक परिवार है, जो अखण्ड ज्योति कार्यालय के कार्यकर्ताओं से लेकर गायत्री तपोभूमि के आश्रम वासियों और छात्रों तक फैला है। इसमें देश व्यापी परिवार के सहस्रों परिजन भी बंध गये हैं। माता जी भी हमारी ही तरह भावुक हैं और उन्हें इस प्रकार के एकाकी जीवन का यह पहला ही अनुभव होगा
ताकि हमारे जी की कोई बात दबी छिपी न रह जाय। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रवृद्ध परिजनों को हम अपने विराट शरीर के कल पुर्जे-अंग प्रत्यंग ही मानते हैं। सो उन तक अपनी हर छोटी बड़ी- हर बुरी भली बात पहुँचाना आवश्यक समझते हैं। इससे हमारा चित्त हलका होता है और परिजनों को हमारा अंतःकरण पढ़ने समझने में सुविधा होती है चलते वक्त इतना तो हमें करना ही चाहिए था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
कुछ प्रमाणित घटनायें यहाँ दी जा रही हैं। पुनर्जन्म की अनेक घटनायें छोटे-छोटे बालकों की स्मरण शक्ति के रूप में अखण्ड ज्योति के पाठक कई बार पढ़ चुके हैं। प्रस्तुत घटना उससे भिन्न कोटि की है। इस घटना का ब्रिटेन की परामनोवैज्ञानिक संस्था द्वारा विस्तार से अध्ययन किया गया और उसके शोधकर्ताओं ने यह पाया कि मानवीय चेतना कोई पदार्थ न होकर एक प्रकार का प्रवाह है, जो कहीं से निःसृत होकर निरन्तर चल रहा है- किस लक्ष्य की ओर यह तो पता नहीं पर यह गति विराम नहीं लेना चाहती ऐसा लगता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
पता-श्री अखण्ड ज्योति अ.भा. गायत्री परिवार
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
समय कम रह जाने से हमें, सामने प्रस्तुत कार्यों को संभाल देने की इच्छा यदि जल्दी पूरी करनी पड़ती है, तो वह हमारी उतावली नहीं, मजबूरी ही समझी जानी चाहिए। अखण्ड ज्योति के परिजन भी जागरुक, सुशिक्षित और भावनाशील हैं। उन्हें कुछ करने न करने - बात के पक्ष या विपक्ष में फैसला करना कुछ अधिक कष्टसाध्य या समय साध्य नहीं लगना चाहिए। बात जरा सी है-उसके सम्बन्ध में फैसला करने के लिए एक दो दिन भी काफी हैं
हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति के परिजनों में से अधिकाँश यह स्वीकार करेंगे कि वे अपने अनुदान से और सहयोग से नव-निर्माण अभियान के संचालन में सक्रिय रहेंगे। ऐसे लोगों को बिना विलम्ब लगाये दस पैसा रोज जमा करने वाले ज्ञान घट (गुल्लकें) मथुरा से मंगवानी चाहिएं और उनमें जमा होने वाले पैसों से घरेलू ज्ञान मन्दिर की नियमित व्यवस्था जुटा लेनी चाहिए। इतना साहित्य अपने स्वाध्याय के लिए, परिवार के साँस्कृतिक निर्माण के लिए और पड़ौसी परिचितों में भावनात्मक निर्माण करने के लिए कुछ समय नियमित रूप से लगाना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
“ सुनसान के सहचर “ जैसी छन्दात्मक भाव प्रधान शैली भाव प्रधान शैली का लेख करने वाले तथा प्रतिमाह अखण्ड ज्योति के अपनों से अपनी बात स्तम्भ द्वारा लाखों
इन दिनों कागज काले करने वाले ढेरों समाचार पत्र निकलते हैं। लाखों पत्रिकायें रोज प्रकाशित होती हैं किन्तु रचनात्मक लेखन, युग परिवर्तन साहित्य सर्जन कैसे किया, यह समझना हो तो हमें परम पूज्य गुरु देव की लेखन प्रक्रिया से जुड़े प्रसंगों व उन अंतरंग क्षणों की आपको झाँकी करनी होगी जिसे देखने समझने के बाद अखण्ड ज्योति का जाज्वल्यमान विराट रूप हमारे समक्ष होता चला जाता है। क्रम चला जिन्हें आध्यात्म और विज्ञान के समन्वयात्मक प्रतिपादनों की परिधि में लाना था, विशेषकर तब, जब प्रयोग परीक्षणों एक प्रयोग शाला व ग्रंथागार विनिर्मित होने जा रही था। कार्य की विशालता व उद्देश्य के विराट स्तर पर साहित्य सृजन हेतु राशि लेकर लिखने वाले साहित्यकारों से संपर्क करना चाहिए व उनके माध्यम से हिंदी भाषी ही नहीं, सभी भाषीय क्षेत्रों को पकड़ने की योजना बनानी चाहिए पूज्यवर बोले “ जो कार्य ऋषि मनीषियों के स्तर का हो इसे खरीदी हुई अक्ल नहीं कर सकती
हमें अगले दिनों विश्व को यह बताना है कि नयी दुनिया कैसी होगी, जमाना कैसे बदलेगा तथा देखते देखते व्यक्तियों के सोचने का तरीका कैसे बदलता चला जायेगा? जैसे ब्रह्माजी ने इच्छा प्रकट की “ एकोऽहं बहुस्यामि “ व देखते देखते साकार हो गयी, उनकी कल्पना, उसी तरह प्रसंग तब तक का है, जब वैज्ञानिक आध्यात्म का सारा ढांचा नये सिरे से गढ़ा जा रहा था। 1966-67 में अखण्ड ज्योति पत्रिका में आरंभ किये गये इस उपक्रम को सभी ने सराहा और बुद्धिजीवियों के मिशन की पैठ बड़ी गहरी बनी थी। 1977-78 में उन सभी विषयों पर पुनर्मन्थन का सृजनात्मक लेखन व एक साधारण साहित्य लेखन में यही सबसे भारी अंतर है
उपरोक्त उद्धरण उन डायरियों से लेकर पाठकों की जानकारी के लिए दिये गये जिनमें समय समय पर पूज्य वर के मुखर बिन्दु से निकले हर निर्देश को नोट किया जाता रहा। 1940 से 1990 तक चली पचास वर्ष की साहित्यिक जीवन यात्रा पर हम जब दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि अखण्ड ज्योति को एक पाती की तरह स्वजनों परिजनों तक भेजने वाले पूज्यवर गुरुदेव ने “ मैं क्या हूँ “
वे अखण्ड ज्योति के अपनी प्राण ऊर्जा का प्रवाह बताते रहें, मात्र तीन उँगलियों व कलम से लिखी जाने वाली एक पत्रिका मात्र नहीं। इस अखण्ड ज्योति का वस्तुतः मत्स्यावतार की तरह विस्तार न हुआ व संदेश नहीं मैं स्वर्ग लोक को लाओ वाला कैपशन लेकर प्रकाशित प्रारंभिक पत्रिका जो 250 मात्र थी बढ़ते बढ़ते आज चार लाख से अधिक हिंदी व इतनी ही अन्य भाषाओं में (गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलगू) प्रकाशित हो अस्सी लाख पाठकों तक पहुँच रही है। अध्यात्म प्रधान चिंतन में यदि इतने व्यक्ति आज के कलियुग माने जाने वाले युग में भी रुचि लेते हैं न उनका स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है। जिसमें वे कहते थे मूलतः मनुष्य आदर्शवादी हैं व उसे अंत में वही बना रहेगा
यदि यह दर्शन प्रवाह उलटा न गया तो मनुष्य को यह पशु बनाकर रहेगा। इस युग संकट से जूझना ही मनीषा का काम है वह काम अखण्ड ज्योति को ही करना है। (11-4-1986)
जैसी जटिल आत्म चिंतन प्रधान पुस्तक से आरंभ कर जीवन जीने की कला के व्यवहारिक अध्यात्म तथा धर्मतंत्र से लोक शिक्षण व लोक जन से लोक मंगल के स्वरूप से लेकर गायत्री के तत्वज्ञान के पुण्य परमार्थ प्रधान शिक्षण द्वारा एक व्यापक समुदाय को मथा जिसकी संख्या करोड़ों में आँकी जा सकती है। वे अखण्ड ज्योति के अपनी प्राण ऊर्जा का प्रवाह बताते रहें, मात्र तीन उँगलियों व कलम से लिखी जाने वाली एक पत्रिका मात्र नहीं। इस अखण्ड ज्योति का वस्तुतः मत्स्यावतार की तरह विस्तार न हुआ व संदेश नहीं मैं स्वर्ग लोक को लाओ वाला कैपशन लेकर प्रकाशित प्रारंभिक पत्रिका जो 250 मात्र थी बढ़ते बढ़ते आज चार लाख से अधिक हिंदी व इतनी ही अन्य भाषाओं में (गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलगू) प्रकाशित हो अस्सी लाख पाठकों तक पहुँच रही है। अध्यात्म प्रधान चिंतन में यदि इतने व्यक्ति आज के कलियुग माने जाने वाले युग में भी रुचि लेते हैं न उनका स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
त्रैमासिक बंगला अखण्ड ज्योति जनवरी, 94 से मासिक होने जा रही है। इसका वार्षिक बंगला प्रकाशन संपर्क सूत्र-
समाज के नव निर्माण की दिशा में जो भी कुछ बन पड़ा है, उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को तो श्रेय है ही, हजार गुना श्रेय उनका भी है, जो इस परिकर से जुड़े हैं व अपने श्रम सहयोग से अपनी रुचि व सामर्थ्य के अनुसार नवसृजन के इन प्रयासों में लगे हैं। यदि अखण्ड ज्योति मस्तिष्क है, प्राण है तो उसका परिकर समर्थता संपन्न कायकलेवर के समान है। शरीर के बिना प्राण का अस्तित्व ही क्या है ?
अखण्ड ज्योति पत्रिका अब बदले हुए कलेवर में प्रायः साढ़े चार लाख की संख्या में छपकर चौबीस लाख पाठकों तक पहुँचती है। यदि एक लंबी छलाँग लगाकर इस वर्ष के अंत में एक बजरंगी पुरुषार्थ किया जाय तो इसे अढ़ाई करोड़ बनाया जा सकता है। गायत्री परिवार-युग निर्माण योजना का परिकर-देव परिवार-उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न द्रष्टा जो भी जन्में हैं, इस अखण्ड ज्योति परिवार से ही जन्मे हैं
अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र छपे अक्षरों के पृष्ठों से बना एक जड़ पुलिंदा मात्र नहीं है, अपितु प्रचंड प्राण-प्रवाह से युक्त एक चेतना का पुँज है। यह एक ऐसा प्रवाह है जो स्रोतों को जगाता है एवं बागों को खड़ा कर चलना व जीवन क्षेत्र में उछाल दे कर प्रगति पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देता है। विज्ञापन बाजी से सर्वथा दूर अपने ही स्तर पर युगपुरुष पूज्य गुरुदेव के एकाकी पुरुषार्थ के बलबूते इसने विगत 56 वर्षों में समाज व विश्व मानवता के लिए जो भी कुछ किया है, वह अभूतपूर्व है
गायत्री परिवार-युग निर्माण योजना का परिकर-देव परिवार-उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न द्रष्टा जो भी जन्में हैं, इस अखण्ड ज्योति परिवार से ही जन्मे हैं। समाज के नव निर्माण की दिशा में जो भी कुछ बन पड़ा है, उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को तो श्रेय है ही, हजार गुना श्रेय उनका भी है, जो इस परिकर से जुड़े हैं व अपने श्रम सहयोग से अपनी रुचि व सामर्थ्य के अनुसार नवसृजन के इन प्रयासों में लगे हैं। यदि अखण्ड ज्योति मस्तिष्क है, प्राण है तो उसका परिकर समर्थता संपन्न कायकलेवर के समान है। शरीर के बिना प्राण का अस्तित्व ही क्या है ?
यदि एक लंबी छलाँग लगाकर इस वर्ष के अंत में एक बजरंगी पुरुषार्थ किया जाय तो इसे अढ़ाई करोड़ बनाया जा सकता है। गायत्री परिवार-युग निर्माण योजना का परिकर-देव परिवार-उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न द्रष्टा जो भी जन्में हैं, इस अखण्ड ज्योति परिवार से ही जन्मे हैं। समाज के नव निर्माण की दिशा में जो भी कुछ बन पड़ा है, उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को तो श्रेय है ही, हजार गुना श्रेय उनका भी है, जो इस परिकर से जुड़े हैं व अपने श्रम सहयोग से अपनी रुचि व सामर्थ्य के अनुसार नवसृजन के इन प्रयासों में लगे हैं। यदि अखण्ड ज्योति मस्तिष्क है, प्राण है तो उसका परिकर समर्थता संपन्न कायकलेवर के समान है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती दिखाई पड़ती। ” (अखण्ड ज्योति मार्च 1971)
हर वर्ष की तरह परमपूज्य गुरुदेव की स्मृति में, सविता स्वरूप गुरुसत्ता के निर्देशों पर एक विशेषाँक जून माह की अखण्ड ज्योति के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें सूर्य के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, आधि-दैविक रूपों की व्याख्या से लेकर सूर्य साधना के मर्म, गुह्यतम पक्षों का विवेचन सरल सुगम भाषा में देने का प्रयास किया जायेगा। अधिक से अधिक व्यक्ति इस का लाभ लें, इसका पाठकगण प्रयास करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
5-शत प्रेरक, सहप्रेरक- अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री (गुजराती व अन्य भाषाओं की) पत्र पत्रिकाओं के एक सौ सदस्य बनाने वालों को “शत-प्रेरक” तथा एक हजार सदस्य बनाने वालों को “सहस्र-प्रेरक” प्रशास्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे
इसका श्रद्धाभाव से अवगाहन उपासकों की समस्त शंकाओं को निर्मूल करता रहेगा। इसके अतिरिक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित उनकी विचार चेतना की रश्मियाँ-हृदयगत संशय,अन्धकार को दूर भागने के लिए सर्व-समर्थ हैं। फिर भी जिनके मन में शंका उठे, वह शान्ति-कुंज से निःसंकोच पत्र-व्यवहार करके मार्गदर्शन प्राप्त करते रह सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
पता - अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
“दृश्य और अदृश्य दुनिया सन् 2000 की” शीर्षक से फरवरी 1979 माह की “अखण्ड ज्योति” पत्रिका में परम पूज्य गुरुदेव ने एक लेख लिखा था जिसमें आज हो रहे है, पूर्व में ही चुके तथा आगे संभावित घटनाओं का हवाला विस्तार से दिया गया है। प्रसिद्ध फ्रेंच भविष्य विज्ञानी जूलवर्न का हवाला देते हुए परम पूज्य गुरुदेव उसमें लिखते है कि उनके अनुसार “सन् 1990 तक सारी पृथ्वी विशेषकर शहरी क्षेत्रों में फैक्ट्रियों तथा कारखानों में धुआँ इतना अधिक बढ़ जाएगा कि 80 प्रतिशत वायु दूषित होगी। इस वायु प्रदूषण के कारण लोग पूरी तरह नष्ट तो नहीं होंगे पर उनकी स्थिति अर्थ विक्षिप्तों जैसी होगी
जीवित रहते क्यों एक साधारण-सा दृष्टिगोचर होने वाला जीवन जिया गया, इसे स्पष्ट करते हुए परमपूज्य गुरुदेव जनवरी 1979 की “अखण्ड ज्योति” की अपनों से बात में लिखा हैं- “जब तक रंगमंच पर प्रत्यक्ष रूप से हमारा अभिनय चल रहा है तब तक वास्तविकता बता देने पर दर्शकों का आनन्द दूसरी दिशा में मुड़ जाएगा और हम जिस कर्तव्यनिष्ठा को सर्वसाधारण में जगाना चाहते हैं, वह प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। लोग रहस्यवाद के जंजाल में उलझ जायेंगे। इससे हमारा व्यक्तित्व भी विवादास्पद बनेगा और जो करने-कराने हमें भेजा गया, उसमें भी हमें अड़चन पड़ेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
अब उसके प्रकाश एवं प्रभाव को रचनात्मक दिशा में लगाने में प्रबल प्रयत्न किया जाना चाहिए। (1)उपासना में सघन श्रद्धा, उसके लिए नित्य समय लगाने का निश्चय (2) जीवन साधना के पंचशीलों का पालन (3) दिसम्बर अखण्ड ज्योति के आह्वान आमन्त्रण एवं अपनों से अपनी बात को अपने लिए व्यक्तिगत सब मानकर कुछ करने का साहस (4) अपने संपर्क क्षेत्र में इस प्रेरणा का विस्तार। उपेक्षा को उत्साह में परिवर्तन करने के लिए जन-संपर्क का कार्य क्रम (5) महिला जागरण शाखा संगठन का आरम्भ और उसे अग्रगामी बनना। यह पाँचों कार्य करने के लिए इस बसन्त पर्व पर हमारा विशेष आग्रह हैं इस दिशा में जो जितना कर सकें उसकी सूचना शान्ति-कुँज पहुँचा दें
जहाँ भी युग-निर्माण शाखाएँ हैं- जहाँ भी अखण्ड ज्योति के दस सदस्य हैं- वहाँ महिला जागरण अभियान की शाखा अत्यन्त सरलतापूर्वक स्थापित हो सकती हैं। आन्दोलन को आरम्भ करने से लेकर उसे आगे बढ़ने तथा प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचने का मार्ग-दर्शन “महिला जागृति अभियान” मासिक पत्रिका में बराबर प्रकाशित होता रहता है। पत्रिका शान्ति कुंज हरिद्वार से छपती हैं और वार्षिक चन्दा 6) मात्र हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
ब्रह्म वर्चस् पत्र में दी जाने वाली शिक्षा एक कराई जाने वाली साधना का विज्ञान, स्वरूप, लक्ष्य एवं समझाने के लिए मार्च 77 की अखण्ड ज्योति का अंग एक विशेषांक के रूप में होगा। उस अति महत्त्वपूर्ण संग्रहणीय एवं अभिनव पाठ्य-सामग्री को विज्ञान ओर अध्यात्म का समन्वय प्रयास समझा जा सकता है। पाठक उसकी प्रतीक्षा करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
सम्पादक- भगवती देवी शर्मा, प्रकाशक व मुद्रक-मृत्युञ्जय शर्मा, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा द्वारा जन-जागरण प्रेस, मथुरा 281003 में मुद्रित
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
अखण्ड ज्योति पत्रिका इसी दिन से निकाली गई, गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास इसी दिन हुआ। शत कुण्डी और सहस्र कुण्डी यज्ञों के संकल्प इसी दिन हुए। वेद, उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, पुराण आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इसी पर्व से आरम्भ किये जाते रहे
अब से तीस वर्ष बाद युग परिवर्तन का स्पष्ट स्वरूप इसी दिन एक चमत्कारी घटना के साथ आरंभ होगा। अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य यह पर्व गत कई वर्षों से बड़े उत्साह और समारोह के साथ मनाते रहे हैं। इस वर्ष वह भी अधिक उल्लास के साथ मनाया जाना चाहिए। इस वर्ष 22 जनवरी 1969 बुधवार को बसन्त पंचमी है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
सामान्य उपासना क्रम जिसे आमतौर से हमने अपनी उपासना प्रक्रिया में सम्मिलित रखा है, अप्रैल 68 की अखण्ड ज्योति के पूरे अंक में विस्तार पूर्वक लिख चुके हैं। वह हमारे लिये जैसा उपयोगी सिद्ध हुआ,वैसा ही हर साधक के लिए फलप्रद हो सकता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री उपासना की उससे अच्छी पद्धति और कुछ नहीं हो सकती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
कुल मिलाकर छः टैप हैं। इन्हें इसलिए विनिर्मित किया गया है कि अखण्ड ज्योति परिवार के कोई भी सदस्य उनकी नकल अपने टैपों पर उतार लें और अपने क्षेत्र में जहाँ भी उनकी पहुँच हो वहाँ उन्हें सुनायें। इस प्रकार प्रचार प्रवचनों की एक नई, किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली शृंखला और भी चल पड़ेगी
अखण्ड ज्योति परिवार के कितने ही सदस्यों के पास अपने टैप रिकार्डर हैं। उन्हें प्रायः मनोरंजन के लिए काम में लाया जाता है, अब उनका उपयोग लोकमंगल के लिए भी होना चाहिए। युगनिर्माण शाखा संगठनों को इसके लिए प्रेरणा दी जाती रही है कि वे अपने टैप रिकार्डर खरीद लेने का प्रयास करे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
जिस प्रकार ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा चिर−काल से दिया जाने वाला उद्बोधन अब परिजनों को कर्मठता की राह पर घसीट कर ले आया है और उन्हें सृजन−सेना के सैनिकों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है उसी प्रकार अपना उद्बोधन, ज्ञान−यज्ञ, प्रखरता सक्रियता उत्पन्न करने वाला होना चाहिए। वानप्रस्थों की अंतर्दृष्टि इस केन्द्र पर निरन्तर केन्द्रित रहेगी और कार्य−क्षेत्र में जन−संपर्क में− जहाँ भी गहरी सहानुभूति दिखाई देगी, वहाँ उसे रचनात्मक सक्रियता की दिशा में धकेलने का प्रयत्न किया जायगा
विशेष रूप से वाणी द्वारा प्रचार−कार्य और जन−संपर्क क्षेत्र उन्हीं के लिए सुरक्षित रखा गया है। प्रस्तुत योजना के अनुसार आशा की गई है कि ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ में से पूरा समय देने वाले ‘वरिष्ठ’ और वर्ष में एक महीना देने वाले ‘कनिष्ठ’ वानप्रस्थ प्रायः बारह हजार तो आसानी से निकाले ही जा सकेंगे। इन सबका औसत समय एक एक महीने ही लोक−मंगल में लगता रहेगा, ऐसा मान लिया जाय तो पूरा समय देकर काम करने वाले एक हजार सुयोग्य,भावभरे एवं अवैतनिक लोक सेवियों की सृजन−सेवा खड़ी हो जायगी। यह जन शक्ति कार्य−विस्तार को देखते हुए निश्चय ही स्वल्प है, किन्तु आशा की जानी चाहिए ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
अखण्ड−ज्योति परिवार को−जागृत आत्माओं को कुछ विशेष प्रशिक्षण, परामर्श, प्रकाश एवं अनुदान प्राप्त करने के लिए पिछले अंकों में आह्वान किया गया है। सन् 74 की अखण्ड ज्योति में अपनों से अपनी बात स्तम्भ के अंतर्गत परिजनों को ऐसा ही आमन्त्रण भेजा गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
जिनके पत्र अभी नहीं आये हैं उनके इस महीने में अवश्य आ जायेंगे ऐसी आशा की गई है। इन उत्तरों के आधार पर अखण्ड ज्योति परिवार के नैष्ठिक उपासकों की सूची बन जायगी और उनके साथ आदान−प्रदान का एक व्यवस्थित क्रम चल पड़ेगा। यह प्रक्रिया निश्चित रूप से अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगी, ऐसी आशा है। इस सूची में पिछले प्राण—प्रत्यावर्तन सत्रों में आये हुए— आगे आने वाले—वानप्रस्थ तथा आय शान्ति−कुञ्ज में आये शिक्षार्थी तो होंगे ही जो अन्य होंगे उन्हें भी अगले दिनों एकबार हरिद्वार बुलाने के लिए प्रयत्न किया जायगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
जिनके चिन्तन में उत्कृष्टता के तत्व घुस गये है जो आदर्शवादी जीवनयापन के लिए साहस एकत्रित कर रहे हैं उन्हें आज की स्थिति में असामान्य ही कहा जायगा। अखण्ड ज्योति के पाठक अहंकारवश नहीं वस्तुस्थिति के विश्लेषण के आधार पर अपने इसी स्थिति में पायेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि उनके जीवन पुष्प को खिलने का सुअवसर आ रहा है और कोई माली उनके विकास के लिए—संरक्षण के लिए ही नहीं—देवता के चरणों तक पहुंचा देने के लिए भी अपनी भावना सँजोये बैठा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
-अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-October
यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर ‘अखण्ड ज्योति’ भेजी जाती है 1. पते में गलती 2. डाक में गड़बड़ी 3. पता बदल लेने पर भी सूचना न देना, आमतौर से यही कारण अंक न पहुंचने के होते हैं। यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास त. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति तब दुबारा भेजना कठिन होता है। गतवर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक रजिस्टर चोरी चले गये थे, इस झमेले में भी अनेक ग्राहकों के अंक पहुंचने में असुविधा हुई
“अखण्ड ज्योति” इस अंक के साथ अपने जीवन के 16 वर्ष पूर्ण करके 17वें वर्ष में पदार्पण कर रही है। इस अवसर पर वह अपने परिवार के सभी सदस्यों का अभिनन्दन करती है जिनके स्नेह सहयोग और आत्मभाव ने उसे जीवित ही नहीं रखा आगे भी बढ़ाया है
यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास त. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति तब दुबारा भेजना कठिन होता है। गतवर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक रजिस्टर चोरी चले गये थे, इस झमेले में भी अनेक ग्राहकों के अंक पहुंचने में असुविधा हुई। वह एक विशेष दुर्घटना थी उस विवशता के लिए क्षमा प्रार्थना के अतिरिक्त और कुछ करने में हम असमर्थ भी थे। गतवर्ष के कुछ अंक अभी स्टॉक में मौजूद हैं जिन्हें जो अंक न मिले हों वे सूचना देकर मँगा सकते हैं
कई वर्षों में तो काफी घाटा भी चला जाता है। पूँजी और साधनों के अभाव में भी ‘अखण्ड ज्योति’ के चलते रहने में प्रेमी पाठकों की व्यापक सद्भावनाओं को ही श्रेय है
“अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा
इसकी पूर्ति तभी सम्भव है जब इस वर्ष नये ग्राहक बढ़ाने का कुछ अधिक प्रयत्न किया जाए। इस प्रयत्न में यदि आप थोड़ा सा सहयोग दें तो आपकी प्रिय अखण्ड ज्योति सम्भावित घाटे से बच सकती है और अधिक सेवा कर सकने में समर्थ हो सकती है। हमें आपकी अब तक सद्भावना पर भारी विश्वास है और इस दिशा में हर प्रेमी से इस वर्ष कुछ अधिक आशा रख रहे हैं
अखण्ड ज्योति का एक मात्र उद्देश्य मानव जीवन को ऊँचा उठाने वाले सद्ज्ञान का प्रसार करना ही है। इसलिए उसने बाहरी विज्ञापनों से हो सकने वाली भारी आय को तिलाँजलि देकर आरम्भ के पृष्ठ से अन्तिम पृष्ठ तक केवल सद्ज्ञान को ही छापना उचित समझा है। वार्षिक चन्दा भी इतना सस्ता रखा है कि सम्पादन, प्रबंध, मकान किराया, पत्र व्यवहार आदि का कोई खर्च उस पर न लगाने पर भी कागज छपाई का मूल्य मुश्किल से पुरा हो पाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
पता :- ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
वे अब तक जन साधारण की सेवा में जीवन भर संलग्न रहे हैं, इस तप साधना के बाद वे और भी अधिक ठोस सेवा जनता जनार्दन की करेंगे। तप के लिए जितना एकान्त उन्हें चाहिए वह मिलना उचित ही है, उससे वे अब की अपेक्षा और भी अधिक सक्षम बनेंगे और अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों की ही नहीं भारतीय धर्म और संस्कृति की भी विशाल परिमाण में एक महत्वपूर्ण सेवा कर सकने में समर्थ होंगे
गायत्री तपोभूमि तथा अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा जो युगनिर्माण के कार्यक्रम अभी चल रहे हैं उनके यथावत् चलते रहने के लिये भी उनकी उपस्थित अभी आवश्यक है। दोनों ही संस्थाएँ अभी उन्हीं से मार्गदर्शन प्राप्त करती हैं। दोनों को ही देर तक अभी उनकी आवश्यकता है
अखंड ज्योति के लिए आचार्य जी ने नियमित रूप से अपनी रचनाएं देते रहने का आश्वासन दिया है। अब तक कई वर्षों से अत्याधिक कार्यव्यस्त रहने के कारण वे अखण्ड ज्योति के लिए स्वयं कुछ विशेष नहीं लिख सके थे पर अब वे पाठकों को अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर करने का मार्गदर्शन अखंड ज्योति के माध्यम से निश्चित रूप से करते रहेंगे। इस प्रकार गायत्री तपोभूमि की ही भाँति अखण्ड ज्योति का प्रकाश दीप भी अपने ढंग से जलता ही रहेगा
अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
गायत्री तपोभूमि तथा अखण्ड ज्योति के बारे में यह चिन्ता है कि कहीं भविष्य में डगमगाने न लगें पर आचार्य जी पूर्ण निश्चिंत है जिन आत्म दानियों ने गायत्री तपोभूमि तथा गायत्री परिवार का संचालन कार्य अपने जिम्मे लिया है, वे काफी विश्वस्त और कर्मठ हैं। वे अपने उत्तरदायित्वों को भली प्रकार समझते हैं और उन्हें निभाते भी रहेंगे। अखंड ज्योति के लिए आचार्य जी ने नियमित रूप से अपनी रचनाएं देते रहने का आश्वासन दिया है
-अखण्ड ज्योति प्रेस मथुरा
जो काम उन्होंने कभी भी सौंपा उसे अपनी तुच्छ योग्यता और शक्ति की परवाह न करके सदा मैंने आँख मुंह कर शिरोधार्य किया, अभी भी कर रही हूँ। आगे भी करूंगी जो आशंकाएं मेरे मनमें थी वे व्यक्तिगत रूप से समाधान कर लीं, उनका निर्णय मेरे लिए वेद वाक्य है पर मेरी ही भाँति अखण्ड ज्योति के अनेकों पाठक भी यह आशंकाएं कर सकते हैं क्योंकि अपना सारा ही अखण्ड ज्योति परिवार उन्हें मेरी ही तरह श्रद्धा आदर और आत्मीयता की दृष्टि से देखता है, सभी का उन पर अधिकार है। सभी उनसे अपने मन की व्यथा कह सकते हैं सभी को उनके वियोग का कष्ट हो सकता है, सभी को उनका सान्निध्य न रहने से हानि दृष्टि-गोचर हो सकती है, इसलिये सभी को इन प्रश्नों को उनके सामने उपस्थित करने की इच्छा हो सकती है जो मैंने उनके सामने रखे। इन आशंकाओं का उनके जो उत्तर दिये हैं वे हम सबके लिये विचारणीय हैं अतएव उन्हें इस लेख में लिपिबद्ध किया जा रहा है
अब तक कई वर्षों से अत्याधिक कार्यव्यस्त रहने के कारण वे अखण्ड ज्योति के लिए स्वयं कुछ विशेष नहीं लिख सके थे पर अब वे पाठकों को अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर करने का मार्गदर्शन अखंड ज्योति के माध्यम से निश्चित रूप से करते रहेंगे। इस प्रकार गायत्री तपोभूमि की ही भाँति अखण्ड ज्योति का प्रकाश दीप भी अपने ढंग से जलता ही रहेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है। इस वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक काफी घट जाने से आचार्यजी अज्ञातवास जाने से पूर्व काफी खिन्न और चिंतित थे। उनके लौटने से पूर्व अखंड ज्योति की ग्राहक संख्या पहले जितनी बढ़ाकर हम गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु ऋण का एक बड़ा ऋण चुका सकते हैं। एक दो नये ग्राहक बढ़ा देना हममें से किसी के लिए कठिन नहीं है, केवल उपेक्षा और आलस्य को छोड़कर दो चार आदमियों से इस सम्बन्ध में चर्चा कर दें तो एक दो ग्राहक सहज ही बन सकते हैं
जिस प्रकार किसी ब्राह्मण को भोजन कराते समय उसके जिह्वा के मधुर और तृप्त करने वाला आहार प्रदान करते है, उसी प्रकार आचार्यजी की जिह्वा ‘अखण्ड-ज्योति’ को सींच कर हम उन्हें तृप्त कर सकते हैं, उनके निश्चय को सफल बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है। इस वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक काफी घट जाने से आचार्यजी अज्ञातवास जाने से पूर्व काफी खिन्न और चिंतित थे। उनके लौटने से पूर्व अखंड ज्योति की ग्राहक संख्या पहले जितनी बढ़ाकर हम गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु ऋण का एक बड़ा ऋण चुका सकते हैं
गुरु पूर्णिमा का पर्व उसी उत्साह पूर्वक मनाये जाने का धार्मिक संस्थाओं को प्रयत्न करना चाहिए जैसे कि आजकल होली दिवाली मनाये जाते हैं यों अनेकों धार्मिक एवं शिक्षा संस्थाएँ आज भी इस पर्व को किसी रूप में मनाते हैं पर अब उसमें नवीन चेतना, नया उत्साह एवं व्यवस्थित कार्यक्रम सम्मिलित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में अखण्ड ज्योति परिवार को पहल करनी होगी। अपने परिवार ने सदा से समाज को नेतृत्व किया है। धर्म जागृति के लिए उसका नाम इतिहास में अमर रहे, इतना कार्य किया जा चुका है पर इतने में ही संतोष नहीं माना जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य परम पूज्य आचार्य जी को गुरु भाव से मानते हैं। विधिवत् गुरु-दीक्षा सम्भवतः बहुत थोड़े लोगों ने ही ली होगी पर हम में से प्रत्येक पाठक उन्हें उनके उज्ज्वल चरित्र और अब तक ही महान् जन-सेवाओं के कारण उनका आदर करता है, उनके प्रति अभाव श्रद्धा रखता है। लाखों मनुष्यों ने उनकी प्रेरणा से अपने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं और आगे इससे भी कहीं अधिक लोक हित उनके द्वारा सम्भव दिखाई पड़ता है
अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को आगामी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ता. 8 जुलाई को अपने घर पर यह पुनीत पर्व मनाना चाहिए। सामूहिक गायत्री जप, हवन, गुरु पूजन, गुरु तत्व की महत्ता पर प्रवचन, श्रद्धाँजलि और शान्ति पाठ यह प्रमुख कार्यक्रम इस पर्व में हों। जहाँ यह आयोजन सामूहिक हो सकता हो, पास-पड़ोस के या अन्य धार्मिक अभिरुचि के लोगों को बुलाया जा सके तो उत्सव का रूप सामूहिक हो सकता है, अन्यथा उसे व्यक्तिगत एवं निजी पारिवारिक आयोजन का रूप दिया जा सकता है
इतना छोटा प्रयत्न भी हमारी गुरु भक्ति की परीक्षा की एक महत्वपूर्ण कसौटी का काम कर सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को तो इस अवसर पर कदम आगे बढ़ा कर अपना कर्त्तव्य पालन करना ही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
उस समय उनकी कविताएँ देहली और आगरा के दैनिक पत्रों में छपती रही थीं। ‘अखण्ड ज्योति’ में भी अनेकों अत्यन्त सुन्दर कविताएँ छपी हैं परन्तु वह उन्होंने अपने नाम से नहीं दी हैं। अखण्ड ज्योति आदि पत्रिकाओं में छपने के लिए आने वाली कविताएँ इस सुन्दर ढंग से ठीक कर देते थे कि कवि लोग आश्चर्य चकित रह जाते थे। वह यह समझते थे कि उन्होंने किसी कवि से यह दुरुस्ती करवा ली होगी
‘अखण्ड ज्योति’ में भी अनेकों अत्यन्त सुन्दर कविताएँ छपी हैं परन्तु वह उन्होंने अपने नाम से नहीं दी हैं। अखण्ड ज्योति आदि पत्रिकाओं में छपने के लिए आने वाली कविताएँ इस सुन्दर ढंग से ठीक कर देते थे कि कवि लोग आश्चर्य चकित रह जाते थे। वह यह समझते थे कि उन्होंने किसी कवि से यह दुरुस्ती करवा ली होगी। अनेकों तरुण कवियों को उनसे मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
पता- अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा
पता- अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा
रजिस्ट्रेशन आफ पेपर्स (सेंट्रल) नियम 1956 के 8वें नियम के अंतर्गत अखण्ड ज्योति धार्मिक पत्र के स्वामित्व तथा अन्य विषयों के सम्बन्ध में प्रकाशित किया जाने वाला विवरण :-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
पता :- अखण्ड ज्योति कार्यालय, घीया मंडी, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अखण्ड ज्योति का वार्षिक चन्दा 1 रुपये मनीआर्डर से भेजना चाहिये। वी.पी. मंगाने से 1 रुपये से अधिक देने पड़ते हैं। मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है
अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाकखाने के उत्तर सहित 15 दिन के अन्दर ही लिखना चाहिये
अखण्ड ज्योति के पाठक युद्ध या विपत्ति के बुरे से बुरे समाचार सुनकर भी घबरावें नहीं वरन् धैर्य धारण करें और दृढ़तापूर्वक, आज ही इस क्षण ही भगवान सत्यनारायण की शरण में अपने को अर्पण कर दें। पाप भावनाओं को छोड़कर अपने हृदय को पवित्र बना लें। नेक बनने का निरन्तर प्रयत्न करते रहें
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
यदि एक सच भी बोलता हो तो बाकी सब झूठे ठहरते हैं। इस संबंध में कुछ निर्णय करने से पूर्व अखण्ड ज्योति के पाठकों को जरा बुद्धि पर भी जोर देना चाहिये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
कृपया ‘अखण्ड ज्योति’ का उल्लेख करते हुए, बिना मूल्य सूचीपत्र के लिए
(3)अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाकखाने के उत्तर सहित 15 दिन के अन्दर ही लिखना चाहिये
चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें। पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अनेक सहृदय और विचारवान सज्जनों ने केवल निःस्वार्थ भाव से अखण्डज्योति की सहायता एवं सद्विचारों के प्रचार को कर्तव्य धर्म समझकर ग्राहक बढ़ाने में सहायता की है। इन महानुभावों का अखण्ड ज्योति हृदय से अभिवादन करते हुए कृतज्ञता प्रकट करती है एवं अन्य सज्जनों से आशा करती है कि ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करके अखंड-ज्योति के महान मिशन की पूर्ति में सहायता करे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
अखण्ड ज्योति को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। हैवानियत और शैतानियत दोनों ही उसकी शत्रु हैं। पाप और पाखंड दोनों से उसे घृणा है
‘अखण्ड ज्योति’ सम्पादक आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने अतुलित अध्ययन और गंभीर मनन के आधार पर इन सद्ग्रन्थों की रचना की है। इनकी एक पंक्ति में आध्यात्मिक तत्वज्ञान भरा हुआ है। यह रचनाएं इसी मास छप कर तैयार हुई हैं
परमार्थ के लिये अस्थि दान करने वाले दधीचि, दिन रात प्रचार से निरत नारद, शिष्यों को अमर बना देने वाले वशिष्ठ, धर्म शास्त्रकार मनु, साहित्यिक युग निर्माता व्यास, अज्ञान का अन्धकार दूर करने वाले शंकराचार्य अब कहाँ हैं? उनके स्थान पर कान फूंके गुरु “हरे शिष्य धन पीर न हरई” की कहावत चरितार्थ करते हुए चारों ओर विचरण कर रहे हैं। अखण्ड ज्योति अज्ञान ग्रस्त-नीचे स्तर पर खड़े हुए धर्म के महत्व से अनभिज्ञ-पशुता से ग्रस्त लोगों को धर्म की ऊँची सीढ़ी पर चढ़ाना चाहती है और धर्म का पाखंड करके अपनी स्वार्थसिद्धि के निमित्त संसार में अधिक अँधेरा फैलाने वाले धर्मध्वजी महानुभावों को एक सीढ़ी नीचे उतारना चाहती है। दोनों के प्रेम के सुविस्तृत चबूतरे पर बराबर-बराबर खड़ा करके भाई को भाई के गले मिलाना चाहती है। पापी ऊंचे उठे पाखंडी नीचे उतरें
डार्विन का साथी कार्यकर्ता और साइन्स का अग्रिणी विद्वान, आलफ्रेड रसेल वालेस, इंग्लैंड की रायल सोसाइटी के सदस्य और फ्राँस की एकेडमी आफ साइन्स से स्वर्ण पदक प्राप्त एवं रेडियो मीटर आथियोस्कोप सरीखे यन्त्रों के आविष्कारक प्रोफेसर विलियम क्रुक्स, हाबर्ट कालेज के प्रोफेसर सर जेम्स, कोलम्बिया कालेज के प्रोफेसर हिर लोप, खगोल विद्या के आचार्य केमिल फ्लेमेरियोगा, आयरलैण्ड के वैज्ञानिक प्रो. वेरेट आदि अनेक महानुभावों को उनके अपने अनुभवों ने इस बात को मानने के लिए मजबूर कर दिया है कि दृश्य मनुष्यों की भाँति कोई अदृश्य प्राणी भी इस दुनिया में मौजूद है ओर वे यदा कदा साँसारिक कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। अखण्ड ज्योति के पाठक पिछले अंकों में ऐसे अनेक विवरण पढ़ चुके है जिनमें प्रेतात्माओं के कार्यों का वर्णन है
मैनेजर-अखण्ड ज्योति, मथुरा
कई सज्जनों ने लिखा है। कि अखण्ड ज्योति का चन्दा भेजने का प्रबन्ध न होने से बड़ी चिन्ता थी, पर अचानक ऐसी व्यवस्था हो गई कि पैसा आ गया और चिन्ता दूर हो गई। हमारे पाठक केवल पाठक नहीं हैं, वरन् अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे कुटुम्बी की भाँति अपना स्नेह रखते है और अखण्ड ज्योति के सत्य प्रचार के महान धर्म कार्य में क्रियात्मक सहयोग देते रहते हैं। इतना बड़ा एक समान विचारों वाला सुसंगठित परिवार इतने स्वल्प काल में बन जाना ईश्वरीय इच्छा के अतिरिक्त और क्या समझा जा सकता है
कि अखण्ड ज्योति का चन्दा भेजने का प्रबन्ध न होने से बड़ी चिन्ता थी, पर अचानक ऐसी व्यवस्था हो गई कि पैसा आ गया और चिन्ता दूर हो गई। हमारे पाठक केवल पाठक नहीं हैं, वरन् अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे कुटुम्बी की भाँति अपना स्नेह रखते है और अखण्ड ज्योति के सत्य प्रचार के महान धर्म कार्य में क्रियात्मक सहयोग देते रहते हैं। इतना बड़ा एक समान विचारों वाला सुसंगठित परिवार इतने स्वल्प काल में बन जाना ईश्वरीय इच्छा के अतिरिक्त और क्या समझा जा सकता है
इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति का तीसरा वर्ष समाप्त हो रहा है। इन थोड़े से दिनों के भीतर अखण्ड ज्योति द्वारा जनता जनार्दन की जो सेवा हुई है, उसके लिये देश - विदेशों में एक स्वर से जितनी प्रशंसा की गई है, उसे सुनते हुए कानों पर सहसा विश्वास नहीं होता
गंगा के समान एक बार वह पुनः इस भारत भूमि को पवित्र करके सौभाग्यशालिनी बनावेगा। अनेक दिव्य आशाओं और विश्वासों के साथ अखण्ड ज्योति अपना तीसरा वर्ष समाप्त करते हुए चौथे वर्ष में प्रवेश करती है। संवत् 2000 की रोमाँचकारी खण्ड प्रलय हमारे सामने है। ज्योति को कितने बड़े संकटों का सामना करना है, यह हम जानते हैं तो भी अपनी सत्यनिष्ठा, पाठकों की सद्भावना और ईश्वरीय सत्यप्रेरणा से तरंगित होकर आगे कदम बढ़ाते हैं
वहाँ तो और भी अधिक प्रचार है। हिन्दी न जानने वाले पाठक अखण्ड ज्योति मँगाते हैं और किसी हिन्दी पढ़े दुभाषिये से पढ़वाकर उसका भावार्थ समझते हैं। जिन प्रान्तों में हिन्दी बोली जाती है, उनमें से तो एक भी स्थान ऐसा नहीं बचा जिसमें ज्योति का प्रवेश न हुआ हो। हिन्दुस्तान से बाहर भी अनेक देशों में अखण्ड ज्योति मँगाई जाती है इतना विस्तार, इतना प्रचार, इतना आदर, इतनी लोकप्रियता कागज के पन्नों के कारण नहीं है
अखण्ड ज्योति के पाठकों को इतनी जानकारी से बहुत पहले हो चुकी होगी कि मन के दो भाग हैं एक बहिर्मन दूसरा अंतर्मन, बाहरी मन तो तर्क वितर्क करता है, सोचता है, काट-छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है पर अंतर्मन भोले भाले किन्तु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है वह काट छाँट नहीं करता वरन् श्रद्धा और विश्वास के आधार पर काम करता है। बाहरी मन तो यह सोच सकता है कि पाप कर्मों की रेखायें अपने ऊपर अंकित न होने दूँ और पुण्य कर्मों को बढ़ा चढ़ा कर अंकित करूं, जिससे पाप का फल न भोगना पड़े और फल का भरपूर आनन्द प्राप्त हो। परन्तु भीतरी मन ऐसा नहीं है वह सत्यनिष्ठ जज की तरह फैसला करता है, कोई लोभ, लालच, भय, स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता
जिन प्रान्तों में हिन्दी बोली जाती है, उनमें से तो एक भी स्थान ऐसा नहीं बचा जिसमें ज्योति का प्रवेश न हुआ हो। हिन्दुस्तान से बाहर भी अनेक देशों में अखण्ड ज्योति मँगाई जाती है इतना विस्तार, इतना प्रचार, इतना आदर, इतनी लोकप्रियता कागज के पन्नों के कारण नहीं है। इससे अधिक चमक दमक की बढ़िया कागज पर छापने वाली अधिक पृष्ठों की अनेक पत्रिकाएं मौजूद हैं, वे अपना क्षेत्र इतना विस्तार न कर सकी। खराब कागज पर थोड़े पृष्ठों में, बुरी छपाई में छपते हुए भी इतनी लोकप्रिय हो रही है, इसका कारण ईश्वरीय प्रेरणा के अतिरिक्त और कुछ हमारी समझ में नहीं आता
सत्य का प्रचार के लिए अखण्ड ज्योति द्वारा जो ज्ञान यज्ञ आरम्भ किया गया है, उसकी दिव्य सुगन्ध देश देशांतरों में व्यापक होती जा रही है। पच्चीसियों वर्ष निकलने वाले हिंदी के पत्र जिन प्रदेशों में पहुँच नहीं पाये थे वहाँ न जाने कैसे अखण्ड ज्योति की असाधारण प्रतिष्ठा हुई। तमिल तेलगू, कन्नड़ की प्रधानता वाले दक्षिण भारत में भी अखण्ड ज्योति का काफी प्रचार है, फिर मराठी, गुजराती, बंगला, उर्दू, गुरुमुखी भाषा भाषी प्रान्तों का तो कहना ही क्या
पच्चीसियों वर्ष निकलने वाले हिंदी के पत्र जिन प्रदेशों में पहुँच नहीं पाये थे वहाँ न जाने कैसे अखण्ड ज्योति की असाधारण प्रतिष्ठा हुई। तमिल तेलगू, कन्नड़ की प्रधानता वाले दक्षिण भारत में भी अखण्ड ज्योति का काफी प्रचार है, फिर मराठी, गुजराती, बंगला, उर्दू, गुरुमुखी भाषा भाषी प्रान्तों का तो कहना ही क्या। वहाँ तो और भी अधिक प्रचार है। हिन्दी न जानने वाले पाठक अखण्ड ज्योति मँगाते हैं और किसी हिन्दी पढ़े दुभाषिये से पढ़वाकर उसका भावार्थ समझते हैं
दोनों अपने-अपने स्थानों पर चिपके रहना चाहते हैं। इसलिये दोनों ही मोर्चों पर अखण्ड ज्योति को लड़ना पड़ता है। मनुष्यता के उपासक, सत्य के प्रेमी ज्ञान के भक्त न्यायनिष्ठ और निष्पक्ष उदार हृदय वाले व्यक्ति ही हमारी नीति के समर्थक रह जाते हैं। कितनी प्रसन्नता की बात है कि हमारे समर्थकों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है
’ असत्य को मिटाने के लिये सत्य की बलिवेदी पर प्राण देने के लिये मैं तैयार हूँ। अखण्ड ज्योति के प्यारे कान ऐसे उत्तर सुनने के लिये गर्दन उठा उठा कर देख रहे है
उसमें से भी बहुत कुछ पूर्ति श्री मुँशीरामजी गुप्त हिसार, श्री पं. जगन्नाथ राव नायडू नागपुर, पं. ऋषिरामजी गुप्त शाहपुर, पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा बाय, प्रभात धर्मात्माओं की गुप्त सहायताओं के द्वारा पूरा हो गया। सन् 42 अखबारों के लिए काल स्वरूप था, मृत्यु से लड़कर अखण्ड ज्योति जीवित रही, उपरोक्त सज्जनों की बिना माँगी आर्थिक सहायताएं प्राप्त हुई, उसके अतिरिक्त सैकड़ों सहृदय मित्रों ने अनेक मार्गों से उसका पोषण किया, इसे एक ईश्वरीय प्रेरणा के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है
अखबारों के ग्राहक बनते हैं, साल दो साल बाद वे उन्हें छोड़ देते हैं। परन्तु जिन पाठकों ने एक अखण्ड ज्योति को अपनाया, वे फिर उससे प्रथक न हुए। सैकड़ा पीछे, 90 से अधिक ऐसे ही हमारे पाठक है। कई सज्जनों ने लिखा है
निस्संदेह उसके स्थान पर सत्य की, धर्म की, प्रेम की तथा न्याय की स्थापना होगी। उसके अनेक साधनों में से प्रभु ने अखण्ड ज्योति को भी एक बनाया हो, तो कोई अचम्भे की बात नहीं है
सत्य का प्रचार के लिए अखण्ड ज्योति द्वारा जो ज्ञान यज्ञ आरम्भ किया गया है, उसकी दिव्य सुगन्ध देश देशांतरों में व्यापक होती जा रही है। पच्चीसियों वर्ष निकलने वाले हिंदी के पत्र जिन प्रदेशों में पहुँच नहीं पाये थे वहाँ न जाने कैसे अखण्ड ज्योति की असाधारण प्रतिष्ठा हुई। तमिल तेलगू, कन्नड़ की प्रधानता वाले दक्षिण भारत में भी अखण्ड ज्योति का काफी प्रचार है, फिर मराठी, गुजराती, बंगला, उर्दू, गुरुमुखी भाषा भाषी प्रान्तों का तो कहना ही क्या। वहाँ तो और भी अधिक प्रचार है
कई सौ कार्यकर्ताओं ने सत्य का विस्तार करने के लिए नित्य कुछ समय लगाना आरम्भ कर दिया है। अखण्ड ज्योति के हजारों पाठकों के कार्यों की सूची तैयार की जाए तो मालूम पड़ेगा कि कितने विशाल पैमाने पर सत्य का, प्रेम का, न्याय का, धर्म का विस्तार किया जा रहा है। नवयुग की स्थापना में हमारा यह कार्य एक बहुत छोटा अंश है तो भी जिन स्वल्प साधनों पर हम अवलम्बित है, उसे देखते हुए यह सब भी आशा से बहुत अधिक है
कागज के दाम आठ गुने हो जाने के कारण सैकड़ों पत्रों की कमर टूट गई, सैकड़ों घाटे के प्राणघातक भार से दबकर मरे जा रहे हैं। अखण्ड ज्योति को गत वर्ष केवल तेरह सौ रुपये का घाटा रहा। उसमें से भी बहुत कुछ पूर्ति श्री मुँशीरामजी गुप्त हिसार, श्री पं. जगन्नाथ राव नायडू नागपुर, पं. ऋषिरामजी गुप्त शाहपुर, पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा बाय, प्रभात धर्मात्माओं की गुप्त सहायताओं के द्वारा पूरा हो गया। सन् 42 अखबारों के लिए काल स्वरूप था, मृत्यु से लड़कर अखण्ड ज्योति जीवित रही, उपरोक्त सज्जनों की बिना माँगी आर्थिक सहायताएं प्राप्त हुई, उसके अतिरिक्त सैकड़ों सहृदय मित्रों ने अनेक मार्गों से उसका पोषण किया, इसे एक ईश्वरीय प्रेरणा के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-September
अखण्ड ज्योति का अगला अंक दस दिन लेट निकलेगा!
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
गत जनवरी मास की बात है, मैं अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा से विदा होकर अजमेर आ रहा था। रेल में ज्यादा भीड़ थी, प्रायः आगे से ज्यादा यात्री खड़े-खड़े ही आ रहे थे। इसी तरह मुझे भी बैठने को स्थान न मिला और खड़ा ही रहना पड़ा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
मूल को सींचने से जैसे पत्ते हरे-भरे हो जाते हैं वैसे ही सत्यधर्म का प्रसार होने से मानव जाति के सद्गुण विकसित होंगे और जो कठिनाइयाँ बेचैन किये हुए हैं वे बड़ी सुगमता से दूर हो जाएंगी। इसलिए सब प्रकार के सुधारकों को अखण्ड ज्योति एक प्रोग्राम देती है कि वे सत्यधर्म का प्रसार करे हर व्यक्ति को सत्यनिष्ठ बनावे
इसलिए विवेकवान मनुष्य का कर्तव्य है कि इन ऋणों को चुकाने में जरा भी भूल न करे। ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रसारित ‘सत्य आन्दोलन’ का मन्तव्य है कि मनुष्य तीन ऋणों से वाण प्राप्त करके मुक्ति का अधिकारी बने। सत्य, प्रेम, न्याय की त्रिवेणी से उन ऋणों की उऋणता हो सकती है। दैव ऋण का सत्य द्वारा, ऋषि ऋण का प्रेम द्वारा, पितृ ऋण का न्याय द्वारा परिशोध हो सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
“अखण्ड ज्योति” ब्रह्म-यज्ञ का प्रसार कर रही है!
आप अखण्ड ज्योति का प्रचार कीजिए!!
आज जब कि संसार में त्राहि-त्राहि मची हुई है और प्रलय की घनघोर घटाएं भारत की देहरी से टकरा रही हैं, हर एक जागृत आत्मा का कर्त्तव्य है कि वह सजग हो जाय। आज कलयुग के अन्त में अखण्ड ज्योति संसार के नाम एक सन्देश भेजती है कि-भूत काल में मनुष्य जाति ने जो दुष्कर्म किये हैं उनका फल उन लोगों को इस लिए भुगतना पड़ेगा , कि सब एक सूत्र में बँधें हुए हैं-एक के पाप का दूसरा भी जिम्मेदार है। किसे कितना कष्ट भुगतना पड़ेगा, यह ईश्वर जाने, पर हर एक को सावधान अवश्य हो जाना चाहिए
(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक चन्दा 1/- मनी आर्डर से भेजना चाहिए। बी.पी. मंगाने से 1/- अधिक देने पड़ते हैं। मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है
अखण्ड ज्योति के नियम
व्यवस्थापक- ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति कार्यालय ने अब तक ???? पुस्तकें प्रकाशित की हैं, वह एक प्रकार ???? कोर्स है। इस कोर्स का जिन्होंने अध्ययन कर लिया है वे अपने विषयों की परीक्षाएँ देकर उपाधि सहित प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते हैं। यह शिक्षा इस प्रकार से विभाजित है
अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक मिशन जोर जोर से खतरे का घन्टा बजा रहा है कि- खतरे की घड़ी पास है, इस विपत्ति के समय शीघ्र से शीघ्र जो काम करने का है, वह यह है कि आप सर्वतो भावेन सत्य नारायण की शरण की शरण अपने को समर्पित कर दें। बालक की तरह सत्य के अंचल में अपने को छिपा लें जहाँ कि गैस बम कुछ भी असर नहीं कर सकते। नित्य प्रभु की प्रार्थना करना, बुराइयाँ त्याग कर भलाई अपनाना और शक्ति संग्रह करना यह कार्य आज से ही प्रारम्भ हो जाने चाहिए
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
(3) अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाक के उत्तर सहित 15 दिन के अंदर ही लिखना चाहिये
मैनेजर- अखण्ड ज्योति, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
यह लेख एक विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखे जा रहे हैं, जैसा कि सत्य शोधक के लिए आवश्यक है। सत्य को नंगे रूप में पाठको के सामने विचारार्थ रखने की हमारी बहुत दिनों से इच्छा थी, पर भय यह होता था कि साम्प्रदायिक अन्य परम्पराओं के विवेक रहित अनुयायी उसे हजम कर सकेंगे या नहीं? तीन वर्ष तक स्वतन्त्र विचारों की शिक्षा देकर पाठकों से अखण्ड ज्योति यह आशा करती है कि वे उस मनोभूमि को प्राप्त कर चुके होंगे, जिस पर खड़ा होने वाला सत्य को सुनने, समझने और धैर्यपूर्वक उस पर विचार करने की योग्यता रखता है। हमारा यह कथन नहीं है कि फिरके बन्दी के- साम्प्रदायिकता के-विचारों को इसी समय छोड़ दिया जाय। इस लेख माला को आरम्भ करते समय हमारा इतना ही विनम्र निवेदन है कि इन्हें पढ़ते समय अपने को “सत्य की खोज करने वाले निष्पक्ष मनुष्य” मात्र समझते हुए इनका अध्ययन करें और उन पर इसी दृष्टि से विचार करें
कन्ट्रोल का आदेश है कि दो पैसा प्रति फार्म के हिसाब से अखबार का मूल्य रखा जाय। इस हिसाब से वर्तमान पृष्ठ संख्या के अनुसार अखण्ड ज्योति का मूल्य कम से कम एक रुपया बारह आना वार्षिक अवश्य रखना चाहिए। किन्तु हमारी ऐसी इच्छा नहीं है, इतने ही मूल्य में ड्योढ़े सवाये पृष्ठ देने की बात हम सदैव सोचा करते हैं। मूल्य बढ़ाना इस बुरे वक्त में उचित नहीं, न बढ़ाने पर सरकारी कानून टूटती है, इस द्विविधा में एक नया हल निकाल लिया गया है
मथुरा तीर्थ में दूर-दूर के ख्याति नामा धर्माचार्य पधारते रहते हैं। वे लोग प्रायः अखण्ड ज्योति में पधारने की कृपा करने हैं, निजी वार्तालाप के सिलसिले में कभी-कभी सार्वजनिक विषयों पर चर्चा चल जाती है, “धर्म के नाम पर मन्दिर मठों में केवल कर्मकाण्ड के आडम्बर के लिए हिन्दू जाति का करोड़ों रुपया प्रति मास व्यय होता है, यदि यह शक्ति गौ रक्षा, विद्या प्रचार, धर्म प्रसार जैसे शास्त्रानुमोदित कार्यों में लगे तो कितना अच्छा हो। ” हमारे इस कथन का खंडन करने को तो उनके पास कुछ नहीं होता, इसलिए चुप हो जाते हैं, और उपेक्षा के साथ प्रसंग को टाल देते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत प्रकार के लोग ज्ञान चर्चा आरम्भ करते हैं, उनके मत के विरुद्ध जो बात होती है, उसे सुन तो लेते हैं, हमारे आदर की दृष्टि से या तर्क की निर्बलता से चुप भी हो जाते हैं, पर यह बातें उनके गले नहीं उतरतीं, जो उनकी मान्यता के विपरीत कही जाती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
ज्योतिर्भिक्षु खिल-खिला कर हँस पड़े और बोले, वत्स! कर्म बन्धन तो तभी तक है जब तक कि मनुष्य उसमें बँधता है। स्वार्थ और लोभ जब तक है, तब तक कर्मों के भले-बुरे फल भी अवश्य मिलते हैं! पर जब आत्मा के असली स्वरूप को समझ लिया जाता है तो उसका अन्तर ईश्वरीय अखण्ड ज्योति से भर जाता है। उसके आचरण स्वार्थ, तृष्णा एवं भोगों के लिये नहीं वरन् सत्य, प्रेम, न्याय के लिये होते हैं। ऐसा जीवन मुक्त आत्म सर्वथा निष्कलंक है
इस महान निर्माण में अखण्ड ज्योति अपने पाठकों का सहयोग चाहती है
“सत् धर्म अन्तरंग गोष्ठी” का संगठन एक परिवार की तरह है। जिसका सञ्चालन अखण्ड ज्योति की संरक्षता में उसके सम्पादक द्वारा होगा। जो धर्म प्रेमी सज्जन इसमें प्रविष्ट होना चाहते हों वे ‘सत्य धर्म’ में दीक्षित होने का संकल्प-पत्र लिखें, दीक्षित होने के दिन उपवास रखना चाहिए, मौनपूर्वक आत्म चिन्तन करना चाहिये और स्याही में गंगाजल डाल कर पवित्रता, एकाग्रता और विचारपूर्वक निम्न संकल्प लिखना चाहिये
वैद्य, हकीम और डाक्टरों से चिकित्सा कराई, धन भी पर्याप्त व्यय हुआ, पर स्थायी लाभ न हुआ। दैवान् पं0 हरि प्रसाद जी ओझा, ‘प्रेम’ ने मुझे अखण्ड ज्योति कार्यालय में ले गये। वहाँ पर में अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाया। आपने सूर्य-चिकित्सा विज्ञान पुस्तकें उपहार में दीं
दैवान् पं0 हरि प्रसाद जी ओझा, ‘प्रेम’ ने मुझे अखण्ड ज्योति कार्यालय में ले गये। वहाँ पर में अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाया। आपने सूर्य-चिकित्सा विज्ञान पुस्तकें उपहार में दीं। इस पुस्तक को मैंने आद्योपान्त पढ़ा और नारंगी रंग की बोतल के पानी से अपना इलाज करना आरम्भ किया
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अखण्ड ज्योति कहती है कि हे सत् धर्म की दीक्षा देने वालों, अपने अन्दर सत्य को धारण करो। अपने अन्दर प्रेम को धारण करो। अपने आत्मा के सामने और परमात्मा के सामने सच्चे बनो
बस! यहाँ पर पत्रों द्वारा अखण्ड ज्योति के उदार सम्पादक पं0 श्रीराम जी शर्मा आचार्य का परिचय हो गया। पंडितजी को हमने अपने रोग का हाल लिख भेजा, पंडित जी ने ढाढ़स बँधाया और शीघ्र ही रोग से मुक्त होने का विश्वास दिलाया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
ऐसी विपत्ति से मनुष्य जाति की रक्षा धर्म कही कर सकता है। इसलिए सुख, शान्ति के इच्छुकों से ‘अखण्ड ज्योति’ मार्मिक अपील करती है कि- हे ईश्वर के अमर राजपुत्रों! अनीति को छोड़ कर नीति पर आरुढ़ हो जाओ, हे मनुष्यों! अधर्म से घृणा करो और धर्म को अपनाओ
प्रार्थना तथा आत्मशक्ति सम्बन्धी विश्वास उन्हें ‘कल्याण’ के ‘ईश्वराँक’, ‘अखण्ड ज्योति’ और ‘पर-काया प्रवेश’ पुस्तक पढ़ने से हुआ है
यह इस प्रकार का दृश्य देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उसी क्षण सारी शंकाएं जाती रही और मुझे पूरा विश्वास हो गया कि अखण्ड ज्योति दैवी प्रेरणा है और इसका निर्माण संसार के कल्याण के लिए हुआ है
किसान जीवन गृहस्थी में ऐसा होता है कि दुष्ट लोग जिसे समझते हैं कि ये महाशय झूठ नहीं बोलते, हिंसा, चोरी, कूटनीति, मुकदमेबाजी इत्यादि अवगुणों से कोसों दूर रहते हैं, उनकी फसलों को पशुओं से चरा लेना, घर में चोरी कर लेना इत्यादि कर्म करने में जरा भी संकोच नहीं करते, ऐसी कई घटनायें मेरे साथ घटित हुई जिससे धर्म पर से मेरा विश्वास उठा दिया। मैंने एक पत्र अखण्ड ज्योति सम्पादक के पास लिखा और उनसे पूछा कि जिनको मैं चोर समझता हूँ, परन्तु पकड़ नहीं पाता- उनसे मैं किस तरह बच सकता हूँ, सत्य प्रेम न्याय का पालन पूर्णरूप से करते हुए अपने और अपने ऐसे और भाइयों के साथ होने वाले अत्याचारों को किस तरह बन्द कर सकता हूँ। शर्मा जी ने मुझे लिखा- ‘जिस तरह एक डॉक्टर रोगी के फोड़े में नश्तर चुभा कर, उसे रुला कर, पाप का भागी नहीं होता, उसी तरह आपको भी दुष्टों की दुष्टता दूर करने के लिये, समाज से बुराई दूर कर भलाई की स्थापना के लिये सच्चे हृदय से प्रयत्न करने में यदि असत्य, चोरी, हिंसा, कूटनीति से भी काम लेना पड़े तो यह अधर्म का कार्य नहीं कहा जा सकता। ’ इस पत्र ने मेरी आंखें खोल दीं, मेरे मन में जितनी ही धर्म के प्रति घृणा उत्पन्न हुई थी, उतना ही दृढ़ प्रेम हो गया
अखण्ड ज्योति आपके कर्तव्य का आज भली प्रकार स्मरण करा देना चाहती है। वह मानवता के नाम अपना सन्देश भेजती है कि-”अधर्म से नीचे उतरो और धर्म की शरण में आओ। ” विश्व शान्ति का एक ही मार्ग है कि अपने संकुचित स्वार्थों, तृष्णाओं, पाखण्डों और कुविचारों को छोड़ कर सत्य का अवलंबन ग्रहण जिया जाय
देखा तो स्फटिक सा स्वच्छ आकाश दृष्टिगोचर हुआ, उसमें बिजली जैसी चमक रह-रह कर मालूम होने लगी। उसी निर्मल आकाश में चमकायमान जगमग करता हुआ “अखण्ड ज्योति” मोटे अक्षरों में अंकित बहुत विस्तार रूप से दृश्यमान हुई। उसी अवस्था में नम्रवत् इन दिव्य अक्षरों को प्रणाम किया। तत्काल क्षण मात्र में वह अक्षर लुप्त हो गये
आध घण्टे का यह सत्संग, जिसमें मूक रोदन के अतिरिक्त शब्दों का प्रयोग बहुत की कम हुआ था, मेरे लिए हजार गीता पाठों से अधिक शिक्षाप्रद साबित हुआ। उन्हीं घड़ियों से प्रभावित होकर, मैं धर्म प्रचार में लग गया और आज धर्म प्रचारक के रूप में, ‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादक के रूप में दुनिया के सामने मौजूद हूँ
राजनैतिक हलचलों के कारण कई लेखकों के चित्रों के ब्लॉक बनकर दिल्ली से न आ सके, इसलिए कई महत्वपूर्ण लेख अगले अंक के लिए रोक लेने पड़े हैं। इस प्रकार अखण्ड ज्योति का सितम्बर का अंक भी अनुभव अंक का उत्तरार्द्ध होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-July
यह कार्य कुछ भी कठिन नहीं है, वरन् प्राकृतिक धर्म होने के कारण अत्यन्त ही सरल है शरीर पर जुल्म करना यदि हम छोड़ दें तो वह अपने आप स्वाभाविक गति से निरोग और स्वस्थ रह सकता है। अखण्ड ज्योति कार्यालय की स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या’ नाम की पुस्तक जिन्होंने पढ़ी है वे भली भाँति जानते हैं कि शरीर अपने आप स्वस्थ बनने के लिए प्रयत्नशील रहता है। बीमार और कमजोर तो हम उसे मार-मार कर बनाते हैं। इसी प्रकार मन का स्वभाव अपने आप उन्नति करना है
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
पूर्व सूचना के अनुसार अखण्ड ज्योति का अगस्त का अंक अनुभवाँक होगा। इसमें सुविज्ञ पाठकों के धर्म मार्ग में प्रेरित करने वाले शिक्षाप्रद अनुभव छपने जा रहे हैं। पृष्ठ संख्या बढ़ाया जाना कठिन है तो भी यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सामग्री होगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
यह जीवन-प्राण चेतना का मिलन उपक्रम हुआ। इसकी आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि अखण्ड ज्योति के पन्नों पर छपे प्रतिपादन मात्र विचार क्षेत्र को ही एक सीमा तक प्रभावित कर सकते है। वह कमी बनी ही रहती है, जो प्राण चेतना के निकटवर्ती होने पर एक नवीन चेतना का पारस्परिक प्रत्यावर्तन संभव दिखाती है जो दूर संचार की तरह छपे कागजों द्वारा एक सीमा तक ही बन पड़ता है
अखण्ड ज्योति पत्रिका के छपे पृष्ठ, प्रस्तुत परिकर के सदस्यों को उच्चस्तरीय प्रेरणा पहुँचाते रहे हैं। उनके पाठकों ने अपने में उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ उभरते देखी हैं। इस संकेत पर उन्हें लगने लगा है कि युग-परिवर्तन की इस संधिकाल में उन पर भी कुछ अतिरिक्त उत्तरदायित्व डाले जा रहे हैं
अखण्ड ज्योति परिजनों का (1) पारिवारिक परिचय (2) पत्र व्यवहार का पता, ग्राहक नम्बर सहित (3) जन्म दिन की तारीख और समय (4) संभव हो तो पासपोर्ट साइज का फोटो यह जानकारियाँ माँगी गई है। इनके आधार पर उनके विषय की एक फाइल बन जाएगी और ऐसे अनुदान एवं प्रकाश कण प्रेषित करने का प्रयत्न शाँतिकुँज हरिद्वार से चलता रहेगा, जिनके आधार पर परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों की प्रगति का नया सिलसिला चल पड़ें
इसके लिए व्यक्तित्वों में सुधार-परिष्कार को किसी-न-किसी प्रकार समाविष्ट करना ही होगा। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में अखण्ड ज्योति परिजनों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण, साधना-संदर्भ एवं परामर्श-अनुदान की विशेष व्यवस्था की गई है। यों यहाँ पहले से ही एक-एक मास के युगशिल्पी सत्र और नौ-नौ दिन के साधना-सत्र निरंतर चलते रहे हैं, पर वर्ष 1990 में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है कि इस अवधि में मात्र अखण्ड ज्योति के स्थायी सदस्य ही शान्तिकुञ्ज आएँ और वे पाँच दिन का एक सत्र संपन्न करें। पाँच-पाँच दिन के सत्र इसलिए रखे गए हैं कि लाखों परिजनों को इस एक वर्ष में ही अभीष्ट प्रेरणा देकर लाभान्वित किया जा सके
(1) अखण्ड ज्योति पत्रिका तथा उसकी सहेलियों का प्रायः पाँच लाख की संख्या में छपना। उस साहित्य का अनेक भाषा-भाषियों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाना। पत्रिका के सदस्यों द्वारा पाँच विचारशीलों को उनका बाँटा जाना और इस प्रकार उनका वाचन,श्रवण के अतिरिक्त प्रेरणाओं को जीवनचर्या में उतारा जाना
अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के आरंभिक वर्ष में अब तक जो परिश्रम नहीं किया गया, वह अब इन्हीं दिनों छः माह की अवधि में ही किया गया है। निश्चित ही इससे पत्रिका की रोचकता बढ़ेगी, नवयुग की आधारशिला रखने के प्रयासों को मूर्त्तरूप भी दिया जा सकेगा। अन्यत्र ढूँढने में कदाचित ही कोई खोजी पाठक एक स्थान पर ऐसी सामग्री पाने में सफल हो सकेगा
आरंभ अपने घर से ही होता देखा गया है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए जिस भागीरथी प्रयत्न की आवश्यकता है, उसे कर गुजरने का भार नियंता ने अखण्ड ज्योति परिवार की छोटी मंडली को सौंपा है। क्रमशः उसके विकास-विस्तार की संभावना भी बढ़ेगी ही। इन दिनों सूत्रधार उसी का ताना-बाना बुन रहा है, श्रेयाधिकारियों को उनके संचित सुसंस्कारों के आधार पर एक छत्र-छाया के नीचे एकत्रित कर रहा है
हर महीने पाँच सत्र होंगे (1) ता. 1 से 5 (2) ता. 7 से 11 (3) ता. 13 से 17 (4) ता. 19 से 23 (5) ता. 25 से 29; बीच का एक-एक दिन आने-जाने वालों की सुविधा के लिए छोड़ा है। इसके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अखण्ड ज्योति परिजनों की एक नई सूची रखी जाने की व्यवस्था की गई है, ताकि जब वे आने का आवेदन करें, तो उनके संबंध में आवश्यक जानकारी यहाँ सहज ही तत्काल मिल जाए और मथुरा से सूचनाएँ मँगाने-भेजने में व्यर्थ समय नष्ट न हो
भविष्य के संबंध में वैज्ञानिकों-मनीषियों-नेतृत्ववेत्ताओं ने भी चिंतन किया है तथा समय-समय पर उनके अधिवेशन भी होते रहे हैं। प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों, इस विधा से संबंधित विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा लिखित पुस्तकों को न केवल शान्तिकुञ्ज में एकत्र किया गया है, वरन पत्र व्यवहार द्वारा उनसे संपर्क स्थापितकर यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि आज की परिस्थितियों व मानवी पराक्रम की भावी संभावनाओँ को देखते हुए भविष्य की, नवयुग की संरचना किस प्रकार संभव है? यह एक ऐसा विषय है, जिसे अभी तक आँकड़ों व वैज्ञानिक तथ्यों की भाषा में ही समझाया जाता रहा है, किंतु अखण्ड ज्योति के पाठक अध्यात्मपरक विवेचन, जो भविष्य विज्ञान से संबंधित हैं, आगामी माह की पत्रिका से इन पृष्ठों पर पढ़ते रह सकेंगे। जेनेटिक्स, माॅलीक्यूलर, बायोलॉजी, इलेक्ट्रोफिजियोलाॅजी, एस्ट्रोफिजिक्स, बायोमेट्रालाॅजी, काॅस्मोलाॅजी, बाॅयोकेमिस्ट्री, न्यूरोएंडोक्राइनालाॅजी, एंथ्रापोलाॅजी, आल्टरनेटिव सिस्टम आफ मेडीसिन, न्यूरोसाइकिस्ट्री आदि विधाओं के विशेषज्ञ आज के मानव को, भविष्य को, किस रूप में विनिर्मित करने की कल्पना कर रहे हैं, यह तथ्यपरक, रोचक सामग्री अखण्ड ज्योति में सार-संक्षेप में पाठकगण पा सकेंगे
आज आदर्शवादियों के उदाहरण सामने न रहने के कारण एक प्रकार से मानवी गरिमा पर ग्रहण ही लग गया है। इस सामयिक कठिनाई का समाधान इस प्रकार ढूँढा गया है कि पिछले दिनों भारत में या संसार में अन्यत्र कहीं भी आदर्शवाद के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर पुरुषार्थ करने वालों के जीवन-वृतांत और संस्मरण ढूँढ निकाले जाएँ और इन्हें अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर निरंतर प्रस्तुत किया जाता रहे। यों वर्त्तमान का अपना महत्त्व है, पर भूतकाल की प्रेरणाएँ भी ऐसी नहीं है, जिनका भावभरा स्मरण करने पर अंतराल में उस दिव्य धारा को अपनाने की उमंग-तरंग न उठे। गांधी जी बचपन में देखे हरिश्चंद्र नाटक से ही सत्यनिष्ठ होने को संकल्पित हो गए थे
यह पत्रिका मात्र छपे कागज का पुलिंदा नहीं है। यह अखण्ड ज्योति ही है जिसने अपने पाठकों को एक विशेष स्तर तक समुन्नत करने में सफलता पाई है। यह परिकर अपनी विशिष्टता को चिंतन, चरित्र और व्यवहार में निरंतर स्थान देता चला आया है। विगत आधी शताब्दी से वटवृक्ष की तरह उसकी गरिमा समुन्नत,सुविस्तृत ही होती चली आई है
अखण्ड ज्योति परिजनों और शान्तिकुँज के ऊर्जा-उद्गम के साथ अधिक घनिष्ट, अधिक प्रत्यक्ष और अधिक प्राणवान आदान प्रदान चल पड़े इसके लिए इन्हीं दिनों विशेष रूप से नया ताना बाना बुना जा रहा है। परिजन उसके लिए पूरी तरह सन्नद्ध और कटिबद्ध हो
प्रकाशन, प्रचार एवं संगठन के लिए युगनिर्माण योजना,गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान तंत्र का अनवरत रूप से तत्पर रहना भी एक ऐसी उपलब्धि है, जिसके आधार पर उपरोक्त सारी गतिविधियां चलती रही हैं। लागत मूल्य पर घर-घर युग-साहित्य को पहुँचाना प्रस्तुत समय की सबसे बड़ी सेवा— महती उपलब्धि है
'इक्कीसवीं सदी में अखण्ड ज्योति परिजनों का योगदान' के नाम से एक विशाल ग्रंथ अनेक खंडों में प्रकाशित करने की भी योजना है, जिसमें उन प्रतिभाओं का सचित्र उल्लेख रहे और जिससे असंख्यकों को यह प्रेरणा मिल सके कि सामान्यों के लिए भी असामान्य पुरुषार्थ कर सकना कैसे संभव हो सकता है? प्रस्तुत इतिहास, असंख्यों में उत्साह भरने एवं नवचेतना उभारने में खरा सिद्ध हो सकेगा, ऐसा विश्वास है। जिनके पास फोटो न हो, उनके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अति सस्ती व्यवस्था कर दी गई है
इन दिनों अखण्ड ज्योति का हर सदस्य चार और नए सदस्य बनाकर अपनी मंडली पाँच की गठित करे। उसके अनुपाठक तो पच्चीस सहज ही हो जाएंगे। इस अभिनव विस्तार से संख्या सवा करोड़ पाठकों से आरंभ होकर एक अरब छप्पन करोड़ की संख्या तक पहुँच जाएंगे
इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में अखण्ड ज्योति परिजनों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण, साधना-संदर्भ एवं परामर्श-अनुदान की विशेष व्यवस्था की गई है। यों यहाँ पहले से ही एक-एक मास के युगशिल्पी सत्र और नौ-नौ दिन के साधना-सत्र निरंतर चलते रहे हैं, पर वर्ष 1990 में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है कि इस अवधि में मात्र अखण्ड ज्योति के स्थायी सदस्य ही शान्तिकुञ्ज आएँ और वे पाँच दिन का एक सत्र संपन्न करें। पाँच-पाँच दिन के सत्र इसलिए रखे गए हैं कि लाखों परिजनों को इस एक वर्ष में ही अभीष्ट प्रेरणा देकर लाभान्वित किया जा सके। हर महीने पाँच सत्र होंगे (1) ता. 1 से 5 (2) ता. 7 से 11 (3) ता. 13 से 17 (4) ता. 19 से 23 (5) ता. 25 से 29; बीच का एक-एक दिन आने-जाने वालों की सुविधा के लिए छोड़ा है
प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों, इस विधा से संबंधित विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा लिखित पुस्तकों को न केवल शान्तिकुञ्ज में एकत्र किया गया है, वरन पत्र व्यवहार द्वारा उनसे संपर्क स्थापितकर यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि आज की परिस्थितियों व मानवी पराक्रम की भावी संभावनाओँ को देखते हुए भविष्य की, नवयुग की संरचना किस प्रकार संभव है? यह एक ऐसा विषय है, जिसे अभी तक आँकड़ों व वैज्ञानिक तथ्यों की भाषा में ही समझाया जाता रहा है, किंतु अखण्ड ज्योति के पाठक अध्यात्मपरक विवेचन, जो भविष्य विज्ञान से संबंधित हैं, आगामी माह की पत्रिका से इन पृष्ठों पर पढ़ते रह सकेंगे। जेनेटिक्स, माॅलीक्यूलर, बायोलॉजी, इलेक्ट्रोफिजियोलाॅजी, एस्ट्रोफिजिक्स, बायोमेट्रालाॅजी, काॅस्मोलाॅजी, बाॅयोकेमिस्ट्री, न्यूरोएंडोक्राइनालाॅजी, एंथ्रापोलाॅजी, आल्टरनेटिव सिस्टम आफ मेडीसिन, न्यूरोसाइकिस्ट्री आदि विधाओं के विशेषज्ञ आज के मानव को, भविष्य को, किस रूप में विनिर्मित करने की कल्पना कर रहे हैं, यह तथ्यपरक, रोचक सामग्री अखण्ड ज्योति में सार-संक्षेप में पाठकगण पा सकेंगे
राम के रीछ-वानर, कृष्ण के ग्वालबाल, बुद्ध के परिव्राजक, गांधी के सत्याग्रही, निजी स्थिति में तो अकिंचन ही थे, पर उनके साथ जुड़ी हुई दिव्य सत्ता ने ही उनके माध्यम से वे प्रयोजन पूरे करा लिए थे, जिन्हें मोटे रूप में असंभव नहीं तो आश्चर्यजनक से कम नहीं समझा जा सकता। इस शृंखला में एक कड़ी अखण्ड ज्योति परिजनों की भी जुड़ती है, जो अपनी तुच्छ संख्या और शक्ति के होते हुए भी, विश्व-व्यवस्था में असाधारण हेर-फेर कर देने की तैयारी में लगे हैं। इनके संकल्प और पराक्रम नगण्य हो सकते हैं, पर तूफानों के साथ जुड़कर धूलिकणों को भी आकाश पर छा जाते जिनने देखा है, उनके लिए इसमें अनहोनी जैसी कोई बात लगेगी नहीं
ये सत्र हर माह 1 से 2, 11 से 12 तथा 21 से 22 तारीखों में चलते रहेंगे। ये परामर्श सत्र सतत् चलते रहेंगे ताकि अखण्ड ज्योति पाठकों से सूत्र संचालकों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया व्यापक स्तर पर संपन्न हो सके। इसी निमित्त शांतिकुंज में नये कमरे बनाये गये है, आवास व्यवस्था का विस्तार किया गया है
दिसंबर 1989 अखण्ड ज्योति
क्या सन् 1990 में आपका किसी पाँच दिवसीय सत्र में सम्मिलित हो सकना संभव होगा? याद रखें सन् 1990 मात्र अखण्ड ज्योति के पाठकों के लिए सुरक्षित है। किस माह के, किस सत्र में शामिल हो सकेंगे? जो तिथियाँ आप लिखेंगे, उस सत्र की स्वीकृति भेज दी जाएगी। वह भर गया हो तो उससे अगले सत्र की स्वीकृति भेजी जाएगी
अखण्ड ज्योति परिजन अभी मात्र पाँच लाख हैं। इस छोटी मंडली द्वारा युग का गोवर्धन उठेगा नहीं। 600 करोड़ आबादी वाले संसार का कायाकल्प जैसा पुरुषार्थ कर दिखाने के लिए यह समुदाय जलते तवे पर एक बूँद पानी की तरह नगण्य ही कहा जा सकता है
इस अनोखे ढंग के प्रस्तुतीकरण में संपादन-तंत्र पर कितना अधिक भार पड़ेगा और उसका परिणाम कितने अधिक दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला सिद्ध होगा, इसका अनुमान जो लगा सकें, उन भावनाशीलों से अनुरोध है कि अखण्ड ज्योति का प्रवाह-क्षेत्र बढ़ाने में अपना साधारण स्तर का नहीं, वरन असाधारण समझी जा सकने योग्य भूमिका संपन्न करने में जुटें
नवसृजन की प्रारंभिक ऊर्जा अखण्ड ज्योति के रूप में अवतरित हुई है। वह अपने से जुड़े अनेक घटकों-पाठकों का तद्नुरूप बनने-ढालने के लिए बाधित एवं अनुप्राणित कर रही है
उपरोक्त विषयक पत्र, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के पते पर भेजें। अखण्ड ज्योति, मथुरा में तो प्रकाशन, मुद्रण प्रेस ही है; अस्तु चंदे का हिसाब-किताब ही वहाँ रहता है
भविष्य का स्वरूप क्या बनने जा रहा है और उसके अनुरूप अपना चिंतन और व्यवहार बदलने की किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए, इस संदर्भ में आगे से अब अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर विशेष पाठ्य-सामग्री रहा करेगी। संसार भर की मूर्धन्य प्रतिभाएँ इस संबंध में क्या सोचती और क्या परामर्श देती हैं, इसका अति महत्त्वपूर्ण सामयिक संकलन अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिल सकेगा
अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के बीच मात्र लेखन-वाचन के संबंध नहीं है। उनके बीच ऐसी घनिष्ठता भी विकसित होती रही है जिसके आधार पर संबद्ध घटकों का स्तर निरन्तर ऊँचा उठता रहे और उनके संयुक्त प्रयत्नों से धरती पर स्वर्ग के अवतरण का सुनहरा स्वप्न प्रभातकालीन अरुणोदय की तरह दृश्यमान हो सके
इसमें भागीदारी लेने के श्रेय से किसी भी प्रज्ञा परिजन को चूकना न चाहिए। इस ऐतिहासिक और अविस्मरणीय विशेष अवसर पर अखण्ड ज्योति के सदस्यों और अनुपाठकों को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार रीछ, वानरों, ग्वाल-बालों, बौद्ध परिव्राजकों, सत्याग्रहियों का अनुकरणीय आदर्श मानते हुए किसी-न-किसी रूप में सहभागी बनना ही चाहिए। सर्वथा उपेक्षा अपनाना और जिस-तिस कारण की आड़ में मूकदर्शक बने रहना घाटे का सौदा ही रहेगा
इतिहास में राजा-रानियों की, मार-काट करने वाले योद्धाओं की कथा-गाथाओं का ही बाहुल्य है, या फिर मोरध्वज, शिवि जैसे अतिवादियों का उल्लेख। अखण्ड ज्योति के नए निर्धारण में उन घटनाओं का ही संकलन किया जाएगा, जिनमें आज की परिस्थिति में जो किया जाना आवश्यक है, उसी को प्रधान रूप में प्रस्तुत किया जा सकें। इसे युगधर्म का पृष्ठ-पोषण करने वाली सामग्री भी कहा जा सकेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
उसकी कड़ियाँ समयानुसार खुलती ओर दृष्टिगोचर होती रहेंगी। इसमें से प्रथम चरण यह है कि अखण्ड ज्योति के सभी सदस्य एक बार समय निकाल कर नौ दिन के लिए शांतिकुंज एक सत्र में सम्मिलित होने की तैयारी करें। एक पुरश्चरण इस देव भूमि पर कर लेने से जो महानता उनके भीतर दबी पड़ी है, वह निखरेगी। महाकाल की वाणी सुन सकने लायक अपने बंद कपाट खुलेंगे
ऐसा ही कुछ अपने लिए प्राप्त कर सकना संभव हो सके, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए, युगसंधि पुरश्चरण में भाग लेने के लिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन का आह्वान किया जाना है। अच्छा हो उसके लिए बहुत दिन तक योजना बनाने में समय गँवाया न जाय और आगामी एक वर्ष में इस प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाय
जिन्हें सूक्ष्मदर्शी प्रज्ञावान अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से यह अपेक्षा की गई है कि इस परिवर्तन पर्व में वे मात्र मौन दर्शक न रहेंगे। भीम, अर्जुन, अंगद, हनुमान जैसे पराक्रम न सही तो वे शबरी, गिलहरी, गिद्ध जैसी हलकी-फुलकी भूमिका तो अवश्य निभा सकेंगे। समय का अपना महत्व होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
कार्यक्रम में लगभग 50 वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहें। एक हजार अखण्ड ज्योति के नये सदस्य बनाये गये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
युगसंधि महापुरश्चरण में सम्मिलित होने के लिए उपस्थित जनसमुदाय ने संकल्पपत्र भरे। 18 प्रज्ञामंडलों का गठन किया गया तथा 190 अखण्ड ज्योति पत्रिका के नए सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया
चायल, इलाहाबाद (उ.प्र.)— स्थानीय दीपयज्ञों की शृंखला के अंतर्गत 12 स्थानों पर दीपयज्ञ संपन्न हुए। दीपयज्ञ के माध्यम से प्रत्येक मुहल्ले में स्टीकर लगाने, सद्वाक्य लिखने तथा अखण्ड ज्योति के नए सदस्य बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया गया
इसे समूचे क्षेत्र में बहुत बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने अधिकाधिक अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने तथा प्रज्ञामंडलों की स्थापना करने का संकल्प लिया
पेपरमिल कालोनी, लखनऊ (उ.प्र.)— दीपयज्ञ आयोजन सोल्लास संपन्न हुआ। इस अवसर पर लखनऊ नगर में 24 दीपयज्ञ संपन्न कराने, हर घर, दुकान, वाहन में स्टीकर चिपकाने, अखण्ड ज्योति पत्रिका की संख्या दुगुनी करने तथा 108 भावनाशीलों को शान्तिकुञ्ज सत्रों में भेजने का संकल्प लिया गया
बाल, वृद्ध नर-नारी सभी के अंदर कार्यक्रम के प्रति अभूतपूर्व उत्साह था। प्रज्ञामंडलों के गठन के साथ-साथ प्रति रविवार को साप्ताहिक सत्संग चलाने, अखण्ड ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने का संकल्प लिया गया
लगभग 250 महिलाओं की उपस्थिति में 20 प्रज्ञामंडलों की स्थापना की गई। 20 नए अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाए गए
अलताहार, पूर्णिया (बिहार)— रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के साथ इस वर्ष प्रज्ञामंडलों की स्थापना करने, अखण्ड ज्योति पत्रिका की सदस्य संख्या दुगुनी करने तथा शान्तिकुञ्ज में चल रहे सत्रों में भावनाशीलों को भेजने का कार्य व्यापक स्तर पर सामूहिक प्रयासों से, दीपयज्ञों के माध्यम से किया जा रहा है
मौदहा, हमीरपुर (उ.प्र.)— 24 प्रज्ञामंडलों की स्थापना के साथ दीपयज्ञ आशातीत सफलताओं के साथ संपन्न हुआ। संपर्क-क्षेत्र में हर शिक्षित तक अखण्ड ज्योति पहुँचाने की व्यापक व्यवस्था बनाई जा रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है, उसने बचपन से आगे बढ़कर प्रौढ़ता में प्रवेश पाया है, फलतः चेतना का अस्तित्व और उसकी सामर्थ्य के सम्बन्ध में उपलब्ध नये तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर छपने वाली सामग्री ने न केवल भारत वरन् समस्त विश्व के बुद्धि जीवियों के सामने अधिक प्रमाण सामग्री उपस्थित की है जिसे न तो उपेक्षित किया जा सकता है और न अप्रामाणिक ठहराया जा सकता है। इस प्रस्तुतीकरण से उन लोगों का पक्ष सबल हुआ है जो आस्तिकता को उसके साथ जुड़ी हुई आध्यात्मिकता और धार्मिकता को मनुष्य के लिए उतनी आवश्यक बताते हैं जितनी कि आहार-विहार एवं शिक्षा आदि दैनिक प्रयोजनों में प्रयुक्त होने वाले सुविधा साधन
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
जिनके पास अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना महिला जागृति अभियान आदि मिशन की पत्रिकाएँ पहुँचती हैं उनमें से प्रत्येक का पवित्र कर्तव्य यह ठहराया गया है कि उन्हें अपने परिवार तथा सम्पर्क क्षेत्र में कम से कम पाँच व्यक्तियों को पढ़ा या सुना दिया करें। एक पत्रिका का प्रकाश न्यूनतम पाँच दूसरों तक पहुँचना ही चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
उसी के समतुल्य आध्यात्म तत्वदर्शन को अखण्ड-ज्योति इस प्रकार प्रस्तुत करती है जिससे अन्धविश्वास को नहीं तथ्यों को अपनाने वाली प्रखरता को ही प्रश्रय मिलता है। फलतः अखण्ड ज्योति के प्रतिपादन बुद्धिजीवी वर्ग में गहरी मान्यता प्राप्त करते चले जा रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
— अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
गुरुदेव से संबंधित व्यक्ति लगभग बीस लाख हैं। अखण्ड ज्योति उतनी नहीं छपती है। प्रतिपादन से यथासंभव जल्दी ही सभी को अवगत करा देने की इच्छा गुरुदेव की है। मौन-एकाकी-साधना एवं किसी से न मिलने के उनके निर्णय की स्थिति में अब यही एक मात्र माध्यम रह गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
अखण्ड ज्योति परिजनों में से जो प्रतिभाशील वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्र स्तर के हैं उन्हें सीनियर स्वाध्याय मण्डल के रूप से उपरोक्त कार्यक्रमों को अपनाने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है ऐसी प्रतिभाएँ हजारों की संख्या में इन्हीं दिनों उभर कर आगे आ रही हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
हमने सदा से सतयुग की वापसी का सपना देखा है। अखण्ड ज्योति परिवार, गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि “परिवार परक” सम्बोधन ही हमें अच्छे लगते रहे हैं। इसीलिये आवश्यक समझा गया कि उनका विस्तार इस असामान्य स्तर का हो कि वे एक दूसरे का प्रभाव ग्रहण कर सकें, प्रभाव दे सकें। इस से तात्पर्य है छोटे नगर
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
अखण्ड ज्योति प्रकाशन, मथुरा
परिस्थितियों की विषमता को सभी भली-भाँति समझते हैं। जून व जुलाई के अखण्ड ज्योति अंकों ने परिजनों को झकझोरा, सोये से जगाया है तो अगस्त के अंक ने एक लताड़ सी लगायी है व इस एकाकी तप साधना के फलितार्थों से भी भली−भांति अवगत करा दिया है। सूक्ष्म रूप में गुरुदेव के प्रत्यक्षीकरण को, उन्हें परोक्ष मार्गदर्शन की परिजनों को बड़ी विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। चूँकि आह्वान किया गया था, ढेरों पत्र ऐसे विवरणों से भरे इन दिनों शान्तिकुँज आ रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
इस सन् 2000 तक कौन लेखनी पकड़े रहेगा इसका प्रबन्ध भी कर दिया गया है। सन् 2000 तक अखण्ड ज्योति गुरुदेव के तात्कालिक सन्देश लेकर एवं उसके बाद भी यथा समय निकलती रहेगी। वाणी को विराम देने हेतु पहले से ही शान्ति-कुँज के कार्यकर्ता प्रशिक्षित कर दिए गए हैं। इस प्रकार भेंट मिलन का अभाव किसी को अखरेगा नहीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
स्वल्प पूँजी वाले दीपक भी देवता की आरती का श्रेय पाते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों की पुष्पमाला बाजारू मूल्य की दृष्टि से उपहासास्पद भी हो सकती है, पर उसके द्वारा युग देवता का जो शोभायमान श्रृंगार होने जा रहा है, उसे अपने स्थान पर अपने ढंग का अनोखा ही कहा जा सकता है
अखण्ड ज्योति पाठक पत्रिका मँगाते और स्वयं पढ़ कर उसे एक कोने में रख देते हैं। अब आगे से यह होना चाहिए उसे घर के शिक्षितों को पढ़ने के लिये दबाव डालें और अशिक्षितों को पढ़ कर सुनाया करें। अखण्ड ज्योति की पूरक दूसरी पत्रिका है युग निर्माण योजना
धार्मिकता आध्यात्मिकता की तरह आस्तिकता भी भावना, चेतना में उत्कृष्टता अभिवर्धन का एक नितान्त आवश्यक माध्यम है। अखण्ड ज्योति परिजन न केवल विचार विस्तार की आवश्यकता समझें वरन् उसके साथ-साथ घर में आस्तिकता का वातावरण बनाने के लिए प्रयत्न करें। इस आधार पर चरित्र चिन्तन और व्यवहार में देवत्व का अभिवर्धन होकर चिरस्थाई सुख-शांति के लिए इसकी भी महती आवश्यकता है। आस्तिकता का बीजारोपण एवं परिपोषण करने के लिए न्यूनतम उपासना की भी एक मर्यादा बन चले
अब आगे से यह होना चाहिए उसे घर के शिक्षितों को पढ़ने के लिये दबाव डालें और अशिक्षितों को पढ़ कर सुनाया करें। अखण्ड ज्योति की पूरक दूसरी पत्रिका है युग निर्माण योजना। उसे भी मँगाना आरम्भ कर दें। दो मासिक पत्रिकायें पढ़ने-पढ़ाने से युग चेतना का दीपक अपने छोटे परिवार में प्रकाश वितरण की उत्साहवर्धक भूमिका निभा सकता है
अखण्ड ज्योति के पाठक परिजनों की गरिमा का मूल्याँकन उसके सूत्र संचालक, उनकी सुरुचि श्रद्धा एवं आदर्शवादिता के स्तर को देखते हुए करते हैं। सामान्यजनों का आदर्शों के प्रति कोई लगाव नहीं जबकि पाठक न केवल उस दिशा में रुचि लेते हैं, वरन् युग धर्म के निर्वाह का यथा सम्भव प्रयास भी करते हैं। उन्हें स्वयं भी अपनी आन्तरिक वरिष्ठता और विशिष्टता का अनुभव इसी रूप में करना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के मध्य लम्बे समय से इन्हीं तथ्यों को समझने-समझाने का उपक्रम चलता रहा है। स्वाध्याय-सत्संग की आरम्भिक शिक्षा का प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो चुका। अब परीक्षा की घड़ियाँ हैं
जो आदमी अपने मुँह से, अपनी जबान से, अपने बड़प्पन की जितनी बात बताता है, वह उतना ही कमजोर होता चला जाता है और उतनी ही उसकी महत्ता कम होती जाती है। हम आपको जिन लोगों के पास में भेजने वाले हैं, वे फूहड़ लोग नहीं हैं, बेअकल लोग नहीं है, बेवकूफ लोग नहीं है हमने अखण्ड ज्योति पैंतीस वर्ष से निकाली है और पैंतीस वर्ष से जो आदमी अखण्ड ज्योति पत्रिका को पढ़ते हुए चले जा रहे है, वे काफी समझदार आदमी है। इस बात की तमीज उसको है और हर बात की अकल उसको है क्या आप स्तर का है और क्या आपके स्तर का नहीं है। अपने अहंकार के बारे में और अपने बड़प्पन के बारे में आप जितना कम बोलेंगे, उतनी आपकी इज्जत ज्यादा बढ़ती चली जाएगी और अपने अहंकार के बारे में, अपने बड़प्पन के बारे में जितनी शेखी आप बघारेंगे, उतनी ही आपकी इज्जत कम होती जाएगी और लोग यह समझेंगे कि ये कितना घमण्डी आदमी है और लोलुप आदमी है
अखण्ड ज्योति अध्यात्म एवं विज्ञान को परस्पर सहयोगी बनाने के निमित्त दार्शनिक स्तर पर ही नहीं, अनेक आधारों को लेकर प्रयत्नरत है। इन्हीं अनेकों में से एक ज्योतिर्विज्ञान को नए सिरे से समझने का प्रयास भी है। इससे ऋषि-परम्पराओं के आधार पर चलते रहे भूतकालीन प्रयासों की गरिमा को समझा जा सकता है और उसका आधुनिक विज्ञान सम्मत स्वरूप प्रत्यक्ष देखा जा सकता है
जो उत्तीर्ण होते हैं, उन्हीं का परिश्रम और मनोयोग सराहा जाता है, अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं। भावी नवसृजन का स्वरूप क्या और कैसा होगा, इन्हीं जिज्ञासाओं के समाधान के लिए अखण्ड ज्योति का नवसृजन अंक समर्पित है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
युगनिर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी सदा शक्ति ही अपेक्षित है। इसीलिए प्रारंभिक रूप अखण्ड ज्योति परिवार को भी एक धर्म संगठन का रूप दिया जा रहा है
अखण्ड ज्योति पत्रिका विद्या-विस्तार को मेरुदण्ड है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर ज्ञान की ही आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत बाँटा। अखण्ड ज्योति उसका एक माध्यम बनी और १९३७ से सतत् प्रकाशित इस ज्ञानगंगा ने लाखों-करोड़ों को जीवन जीने की राह दिखाकर उनका भविष्य मंगलमय बनाया है
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर ज्ञान की ही आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत बाँटा। अखण्ड ज्योति उसका एक माध्यम बनी और १९३७ से सतत् प्रकाशित इस ज्ञानगंगा ने लाखों-करोड़ों को जीवन जीने की राह दिखाकर उनका भविष्य मंगलमय बनाया है। भगीरथ ने राह बनायी और पतित-पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परमपूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय, उनका अंत करण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है
अखण्ड ज्योति पत्रिका के पाठकों में जितनी वृद्धि होगी, उतना ही युगपरिवर्तन का मोर्चा विजय की दिशा में अग्रसर होता दिखाई पड़ने लगेगा। अखण्ड ज्योति जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रतिपादन अपनी सरल शैली में सतत् करती चली आ रही है अब और भी अनूठे रूप में अगले दिनों पाठकों को पढ़ने को मिलेगी। आगामी दो अंक साधना-विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहें। दिसम्बर १८ का अंक युगसाधना के सैद्धान्तिक पक्ष के स्पष्ट करेगा, तो जनवरी २१ का अंक साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालेगा
इक्कीसवीं सदी के आगमन की प्रभावबेला में सवेरा बड़ा पुण्य-परमार्थ यही हो सकता है कि हम इस ज्ञान गंगोत्री का विराट विस्तार प्रदान करें, अखण्ड ज्योति पाठकों की संख्या में अधिकाधिक वृद्धि करें। वर्ष के समापन की बेला में सभी से एक भावभरा अनुरोध है कि प्रत्येक पाठक कम से कम दस अनुपाठक और तैयार कर ग्राहक संख्या बढ़ाएँ ताकि नवयुग के आगमन का समाचार कम से कम एक करोड़ व्यक्तियों के द्वारा विश्व-वसुधा को मिल सके। पत्रिका का वार्षिक चन्दा पिछले वर्ष के समाज ६. ही है, आजीवन ७५. विदेश के लिए ५. शीघ्र ही अपना व अपने साथियों का चंदा भेजकर इस पुण्य-प्रवाह को आगे बढ़ाने का श्रेय अर्जित करे
इस गंगोत्री का प्रवाह अनंतकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए। गंगा जितना आगे बढ़ती है, विराट रूप लेती चली जाती है॥ अखण्ड ज्योति के साथ भी यही हुआ है। आज उसकी पाठक संख्या प्रायः पच्चीस लाख से भी अधिक है। सहयोगी पत्रिका युगनिर्माण योजना (हिंदी), युगशक्ति गायत्री (गुजराती, उड़ीसा), बंगला अखण्ड ज्योति एवं तेलुगु व अंग्रेजी में प्रकाशित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह प्रकाश विश्व के कोने-कोने में पहुँच रहा है
सब मिलकर कटिबद्ध होंगे तो ही काम चलेगा। घड़ी के पुर्जे की तरह अखण्ड ज्योति परिवार के हर पुर्जे को अपने जिम्मे का काम निपटाने के लिए प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक तत्पर हो जाना चाहिए। “
अखण्ड ज्योति मात्र छपे कागजों का पुलिन्दा नहीं, गुरुसत्ता की प्राणचेतना ही है। इसे महाकाल की वाणी मानकर नित्य परमपुरुष पूज्यवर के सत्संग के रूप में अंगीकार किया जाना चाहिए। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने समय-समय पर उसके विषय में क्या लिखा है, इसे जरा ध्यान से पढ़ें, तो यह तथ्य समझ में आ सकेगा
अखण्ड ज्योति के लेख कागज पर काले अक्षर छाप देने मात्र की प्रक्रिया नहीं है वरन् उसकी एक-एक पंक्ति में एक दर्द, एक आग और प्रकाश भरा रहता है। आत्मिक अनुभूतियों के आधार पर उन्हें लिखा जाता है
धार्मिक-आध्यात्मिक पत्र भी अनेक निकलते है और उन्हें उस प्रवृत्ति के लोग मँगाते-अपनाते है। इस प्रक्रिया की तुलना अखण्ड ज्योति से नहीं की जा सकती। वह जानकारी मात्र देने का, पिसे को पीसने का, जो कहा जाता रहा है उसे दुहराने का ढर्रा अपनाकर किसी तरह विज्ञापन या दान के सहारे अपना जीवनक्रम चलाती रहने वाली पत्रिका नहीं है। इसका अपना ढंग, उद्देश्य, क्रिया−कलाप सबसे अनोखा व भिन्न है
निश्चित ही यह माना जाना चाहिए कि समय की विषमता कुछ ऐसी है कि अब मात्र यही एक उपचार ऐसा शेष रह गया है, जिससे मानवता उबर सकती है। अखण्ड ज्योति पत्रिका के पाठकों में जितनी वृद्धि होगी, उतना ही युगपरिवर्तन का मोर्चा विजय की दिशा में अग्रसर होता दिखाई पड़ने लगेगा। अखण्ड ज्योति जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रतिपादन अपनी सरल शैली में सतत् करती चली आ रही है अब और भी अनूठे रूप में अगले दिनों पाठकों को पढ़ने को मिलेगी। आगामी दो अंक साधना-विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहें
दैवीप्रयास ही इस युग की विभीषिकाओं का समाधान कर सकेंगे, पुरुषार्थ को और बढ़ाना चाहिए। अखण्ड ज्योति के फरवरी, १९९. के अंक में परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है “ इन दिनों नियन्ता कुम्हार की तरह अपना कालचक्र तेजी से घुमा रहा है। उद्देश्य एक ही है नए युग के अनुरूप नए मनुष्य गढ़ना। ” यदि हमें इन वाक्यों पर दृढ़ और तीव्रता लाने का संकल्प कर अभी से कटिबद्ध हो जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप के आगामी दो अंक बड़े कलेवर में विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहे है। दिसंबर १९९८ का अंक साधना विज्ञान के सैद्धांतिक तत्त्वज्ञान वाले पक्ष पर प्रकाश डालेगा, तो जनवरी १९९९ का अंक साधना विज्ञान के व्यावहारिक पहलुओं में साधनामय जीवनपद्धति का रहस्योद्घाटन करेगा। आशा है परिजन पाठक इस पत्रिका के विस्तार फैलाव में कोई कसर शेष न रखेंगे
प्रस्तुत अंक के संपादकीय में बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम दो वर्षों की क्रियापद्धति विस्तार से दी गयी है। इक्कीसवीं सदी का आगमन जिन विषम परिस्थितियों से गुजर कर हो रहा है, इसकी चर्चा परमपूज्य गुरुदेव आज से प्रायः पैंतीस वर्ष पूर्व से सतत् अखण्ड ज्योति में अपनी लेखनी एवं अमृतवाणी से करते रहे है। आश्विन नवरात्रि १९८८ की पावन बेला में इसी परिप्रेक्ष्य में एक ऐतिहासिक महाअभियान नवयुग की से युगशक्ति के उद्भव हेतु आरंभ किए गए इस साधना अनुष्ठान में प्रायः २४ लाख से २४. लाख लोगों ने प्रतिवर्ष भाग लिया एवं एक अर्द्धपूर्णाहुति आँवलखेड़ा आगरा (गुरुसत्ता की जन्मभूमि) में नवम्बर, १९९५ की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर संपन्न हुई
भगीरथ ने राह बनायी और पतित-पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परमपूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय, उनका अंत करण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है। इस गंगोत्री का प्रवाह अनंतकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए। गंगा जितना आगे बढ़ती है, विराट रूप लेती चली जाती है॥ अखण्ड ज्योति के साथ भी यही हुआ है
आज उसकी पाठक संख्या प्रायः पच्चीस लाख से भी अधिक है। सहयोगी पत्रिका युगनिर्माण योजना (हिंदी), युगशक्ति गायत्री (गुजराती, उड़ीसा), बंगला अखण्ड ज्योति एवं तेलुगु व अंग्रेजी में प्रकाशित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह प्रकाश विश्व के कोने-कोने में पहुँच रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
आज राजनैतिक पार्टियाँ कर्मकारण की रहते हैं किन्तु परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ निकालती है। बड़े-बड़े वादे उनमें रहते हैं किन्तु, परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ कहते हुए नवयुग के आगमन तक सबके लिए इसे एक दैनिक धर्मकृत्य की तरह नित्य पढ़ने, मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं। बाह्य ओर परिक्रमा करती रही हैं बाह्य कलेवर भले ही लोगों को धर्मकृत्य, कर्मकाण्ड प्रधान देखने में लगा हो, किन्तु उसका अंतरंग एक ही सूत्र पर टिका है “हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। “ उन दिनों प्रकाशित युग निर्माण सत्संकल्प पर एक दृष्टि डालकर देखें तो प्रतीत होगा कि समग्र धर्मशास्त्र-नैतिकी एवं अध्यात्म दर्शन का निचोड़ समाहित है
ब्रिटेन भारत को भी इस महासमर में घसीटने को प्रयासरत हुआ। 1940 में परमपूज्य गुरुदेव ने आध्यात्मिक पत्रिका अखण्ड ज्योति की शुरुआत करके एक नये साँस्कृतिक आँदोलन को जन्म दिया। 1941 में ब्रिटेन की हालत काफी नाजुक हो चुकी थी। जापान मित्र राष्ट्रों के लिए परेशानी का कारण बना रहा
” प्रज्ञावतार की सत्ता के मन की वेदना क्यों हो सकती थी आज हर कोई समझ सकता है आते ही परमपूज्य गुरुदेव ने दो सम्पादकीय लिखे-” क्या काफिला बिछड़ा ही जाएगा तथा मलाई को तैरकर ऊपर आने का आमन्त्रण। ये अखण्ड ज्योति की ‘अपनी से अपनी बात ‘ अंतर्गत पृष्ठ 53 से 60 तक के पृष्ठों पर अप्रैल 1982 में प्रकाशित हुए। ये वस्तुतः उनके शब्द नहीं उनके मन की पीड़ा थी महाकाल के स्तर की सत्त की अंतर्वेदना थी, जो उसमें भावों के साथ पिरोकर लिखी गयी थी। इसने अगणित पाठकों को रुलाया अंतर्मंथन हेतु उद्वेलित किया
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा कि”युग का अवसान सद्विचारों एवं सत्प्रवृत्तियों के घट जाने से होता हैं युग का निर्माण करना यदि अभीष्ट हो तो सद्विचारों एवं उच्च आदर्शों की प्रतिष्ठापना ही करनी होगी एवं तब युगपरिवर्तन का कार्य भी कठिन नहीं प्रतीत होगा” ( अखण्ड ज्योति, जनवरी 1962, पृष्ठ 44) इसी चिंतन को और भी परिमार्जित करते हुए उनने सितम्बर, 1962 की अखण्ड ज्योति में नवयुग के संविधान के रूप में -युगनिर्माण सत्संकल्प’ की घोषणा की एवं प्रत्येक की विस्तार से व्याख्या करते हुए एक विशेषाँक सबके समझ प्रस्तुत किया उनने लिखा कि अखण्ड-ज्योति परिवार उसी आधार पर सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ, कार्यक्रमों को संचालित करेगा। आज राजनैतिक पार्टियाँ कर्मकारण की रहते हैं किन्तु परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ निकालती है। बड़े-बड़े वादे उनमें रहते हैं किन्तु, परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ कहते हुए नवयुग के आगमन तक सबके लिए इसे एक दैनिक धर्मकृत्य की तरह नित्य पढ़ने, मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
वह किस का अहित करे-नुकसान पहुँचाए सोच ही नहीं पाता। आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना परमपूज्य गुरुदेव ने १९७०-७१ की अखण्ड ज्योति में वर्णित की है कि किस तरह इस साधना से उनने आत्मिक प्रगति के सोपान चढ़े। हमें भक्ति के इस स्वरूप को इसी रूप में समझना चाहिए
बिना अपनी व्यक्तिगत इच्छा का समावेश किए सदा करते रहेंगे। इसी प्रकार नवम्बर १९७० की अखण्ड ज्योति में वे लिखते है-जीवन के १५ से ६० वर्ष तक किसी महाशक्ति के इशारे पर हम कठपुतली की तरह ही चले है। अधिक से अधिक हमें एक निष्ठावान् सैनिक कहा जा सकता है, जिसने लम्बी जिन्दगी के असंख्य क्षणों में से प्रत्येक को अपने सूत्र-संचालक की इच्छानुसार ही बिताया। इसी लेख में वे लिखते है-जब शरीर और मन बेच दिया तो खरीदने वालों की आज्ञा पर चलने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं
इस दैवीयोजना के अन्य भी महत्वपूर्ण पृष्ठ हैं, जो समयानुसार अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में खुलते रहेंगे और सामने आते रहेंगे। आज तो इतना ही समझ लेना पर्याप्त है कि इक्कीसवीं सदी इस विश्व की सबसे बड़ी, सबसे व्यापक और सबसे आश्चर्यजनक उथल-पुथलों से भी क्रान्ति है। उसके परिवर्तनों और घटनाक्रमों का अंकन तो इतिहास के पृष्ठों पर रहेगा ही, बड़ी बात यह है कि इसी अवधि में इतने महामानव दूध में से मलाई की तरह उछलकर ऊपर आएँगे, जिन्हें देखते हुए भगीरथ द्वारा किया गया गंगावतरण जैसी अनुभूति की जा सके
उसकी कड़ियाँ समयानुसार अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में खुलती और दिखाई देती रहेंगी। अभी इतना ही कहा जाना है कि अखण्ड ज्योति के सभी सदस्य स्वयं महाकाल द्वारा निर्देशित साधना-पुरुषार्थ में तत्पर हों, साथ ही अगले वर्ष प्रारम्भ होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस क्रम में समय निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज में चलने वाले नौ दिवसीय सत्र में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। इसके प्रभाव से उनके भीतर दबी पड़ी महानता निखरेगी, साथ ही वे महाकाल की वाणी को अपने अंतर्मन में साफ-साफ सुन सकेंगे
दिव्य तत्व में आखिर इतनी अक्ल होती है कि मनुष्य की स्वार्थपरता और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अंतर समझ सके। ” (अखण्ड ज्योति अप्रैल ६९, पृष्ठ ६२)। वस्तुतः जब हृदय निष्कपट बच्चों की तरह सरल हो जाता है, तो उसमें वह चुम्बकत्व पैदा होता है, जो परमात्मा को स्वयं आकृष्ट कर सके
इस विशिष्टता का दिव्यदर्शी प्रज्ञावान अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से यह अपेक्षा की गयी है कि इस परिवर्तन पर्व में वे मात्र मौनदर्शक न रहेंगे भीम, अर्जुन अंगद, हनुमान जैसे पराक्रम न सही तो वे शबरी, गिलहरी, गिद्ध जैसी समर्पित भूमिका तो अवश्य निभा सकेंगे। समय का अपना महत्व होता है, जो गुजर जाने पर फिर हाथ नहीं आता। समझा जाना चाहिए कि युगसन्धि के इन बचे हुए दो वर्षों में इतना कुछ सम्पन्न होना है, जिसे चिरकाल तक स्मरण किया जा सके
ऐसा ही कुछ अपने लिए प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए युगसन्धि महापुरश्चरण की महासाधना में भाग लेने के लिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन का आह्वान किया जाता है। अच्छा हो, इसके लिए बहुत दिनों तक सोचने, विचारने में समय न गँवाया जाय, बल्कि आगामी वर्ष सम्पन्न होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रम से में बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई जाय
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
संदेशों और दायित्वों की एक निराली श्रृंखला है। उसकी कड़ियाँ समयानुसार अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में खुलती और दिखाई देती रहेंगी। अभी इतना ही कहा जाना है कि अखण्ड ज्योति के सभी सदस्य स्वयं महाकाल द्वारा निर्देशित साधना-पुरुषार्थ में तत्पर हों, साथ ही अगले वर्ष प्रारम्भ होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस क्रम में समय निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज में चलने वाले नौ दिवसीय सत्र में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपना समर्पण अपने गुरु सर्वेश्वरानन्द जी को किया, जो हिमालय में सूक्ष्मशरीरधारी कि सत्ता के रूप में विद्यमान है एवं इस समर्पण ने उन्हें इस युग का द्रष्टा-नवयुग का अधिष्ठाता, गायत्री मंत्र के माध्यम से जन-जन तक संस्कार चेतना का संचार करने वाला युग-ऋषि ही नहीं महाकाल का प्रतिनिधि, प्रज्ञावतार की सत्ता के रूप में समर्पित कर दिया। परमपूज्य गुरुदेव ने १९६९ की दिसम्बर माह की अखण्ड ज्योति में लिखा है-हम सदा ही अपने मार्गदर्शक की कठपुतली रहे है। उन्हीं के इशारे पर चलते रहे है। सो शेष जीवन की रूपरेखा बनाने तथा निभाने में भी हमारा कोई वश नहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
बीच आयी तो शक्ति रूप में वहीं परमवंदनीया माताजी के रूप में हम सबको मिली। उनकी बहुआयामी जीवनगाथा समयानुसार एक विशाल ग्रन्थ के रूप में अवश्य प्रकाशित होगी, किन्तु आज जब हम उनकी स्मृति मन−मस्तिष्क में लात है, तो उनका संगठन को सींचने वाला अति अल्प आयु में ‘अखण्ड ज्योति’ जैसी पत्रिका के संपादन के भार को सँभालने वाला नारी जागरण आंदोलन को गति देकर चरम ऊँचाइयों तक पहुँचा देना वाला एवं आश्वमेधिक दिग्विजय अभियान के माध्यम से सारे विश्व में गायत्री व यज्ञ का संदेश फैला देने वाला जगदंबा वाला एक विराट स्वरूप उभरकर आने लगता है। परमपूज्य गुरुदेव को चौबीस महापुरश्चरणों की साधना की मध्यावधि में उनसे आकर जुड़ी माताजी ने कितने ही कष्ट सहकर न केवल अपने आराध्य के तप को चरमलक्ष्य तक पहुँचाने में मदद की स्वयं के जीवन को भी वैसा ही ढालकर एक साधिका स्वयं को बनाया, यह गुरु के प्रति समर्पण की एक ऐसी मिसाल है। जो हम सबके लिए सदैव प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी
“अब हमारी भूमिका परोक्ष जगत में अधिक सक्रियता वाली होगी। गुरुसत्ता का आमंत्रण तीव्र पर तीव्र होता चला जाता है तथा एक ही स्वर हर श्वास के साथ मुखरित होता जा रहा है - युगपरिवर्तन के लिए और अधिक-और अधिक समर्पण - “प्रस्तुत पंक्तियाँ अगस्त 1994 की अखण्ड ज्योति के उस विशेष लेख से उद्धृत हैं, जो परमवंदनीया माताजी भावाभिव्यक्ति के रूप में उनके महाप्रयास (१९ सितम्बर १९९४ - महालय भाद्रपद पूर्णिमा) से पूर्व प्रकाशित हुआ था। परमवंदनीया माताजी, जिनके महाप्रयाण को आज चार वर्ष पूरे हुए हैं, सहज ही हमें ममत्व के उस महासागर की याद दिला देती हैं, जिसने इस मिशन को परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। हम कभी भी भूल नहीं सकते उस माँ को, जिसने हमें अभिभावकों से भी बढ़कर उस स्तर का स्नेह दिया, जो जीवन - नौका को सहारा देता चला गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
सो भी सच हुआ और अब उस भविष्यवाणी के उत्तरार्द्ध की प्रतीक्षा की जा रही है। प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड ज्योति का जनवरी अंक उठाकर देखे जिसमें पृष्ठ 23 पर छपा है इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फिसाद के कारण भारत तबाह हो जायेगा। यहाँ तक कि हिन्दू बौद्ध और मुसलमानों में बराबर बराबर विभक्त हो जायेगा
अखण्ड ज्योति अगस्त, 1969
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
इन्हीं सब सम्भावित परिस्थितियों को दृष्टिगत रख परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी 90 की अखण्ड ज्योति में लिखा अदृश्य वातावरण से भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषण से निपटने के लिये अध्यात्म स्तर का एक अतीव व्यापक युगसंधि महापुरश्चरण आरम्भ किया गया है। विश्वास किया गया है कि इस सामूहिक साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिये एक ही सूत्र में आबद्ध होकर एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उससे बिखराव वाली अस्त–व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है आगे वे इसी लेख में लिखते है यह साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है
दृश्यजगत के स्पन्दन किसी अदृश्य महाशक्ति के संकेतों के अनुसार तीव्रतर तीव्रतम होते चले जा रहे है। परमपूज्य गुरुदेव के हाथों लिखी ये पंक्तियाँ मई 1989 की अखण्ड ज्योति पत्रिका से उद्धृत है। इनसे हमें एक अनुमान लगता है कि भविष्य के गर्भ में जाकर संभावित भवितव्यता का दर्शन कर उनने वह सब कुछ आज से 9 वर्ष लिख ही नहीं दिया था वरन् सभी परिजनों से उसी के निमित्त वसंत पंचमी 1989 से एक अभूतपूर्व युगसंधि गायत्री महापुरश्चरण भी आरम्भ करा दिया था
एक ही प्रयोजन के लिये एक ही सूत्र में आबद्ध होकर एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उससे बिखराव वाली अस्त–व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है आगे वे इसी लेख में लिखते है यह साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है। युगसंधि का मध्यान्तर उसकी रूपरेखा लेख से उद्धृत पृष्ठ 25 अखण्ड ज्योति फरवरी 90 पूज्यवर ने लिखा कि अदृश्य वातावरण में सूक्ष्मजगत छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है
विशिष्ट तपश्चर्या के कल्पवास चांद्रायण के सत्र भी मथुरा में चले। 1962 में परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी रौद्र रूप लेती हुई अग्नि उगलने लगी थी दिसम्बर 1962 की अखण्ड ज्योति में पृष्ठ 50, 51 पृष्ठ पर लेख प्रकाशित हुआ- अग्निपरीक्षा की घड़ी में हमारा कर्तव्य। इसमें उनने धर्मयुद्ध की सफलता के लिये सभी से एक एक माला प्रतिदिन सम्पन्न करने को कहा। इसी वर्ष उनने श्री अरविन्द का उदाहरण देते हुये एक लेख में लिखा इस समय संसार में बड़ी बुरी से बुरी घटनाएँ घट रही है और मैं कहना चाहता हूँ कि अभी उससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थिति आना निश्चित है
1965 से लेकर 1988 के अक्टूबर माह तक चाहे गायत्री तपोभूमि मथुरा में वे रहे हों अथवा गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में वे समष्टि परिशोधनार्थ सूक्ष्म जगत के संशोधन हेतु स्वयं भी तप करते रहे अनेकों साधकों से कराते रहे ताकि साधना की शक्ति से निखरी हुई तप की सामर्थ्य युगपरिवर्तन में नियोजित हो सके। 1965 का भारत पाक युद्ध 1971 का बंगला देश की मुक्ति हेतु हुआ संग्राम 1968-69 में स्काईलैब के धरती पर आ गिरने से सम्भावित विभीषिका,1980-82 में जुपिटर इफेक्ट के कारण सम्भावित विपत्तियों के निराकरण हेतु विशिष्ट साधनाएँ सभी अखण्ड ज्योति पाठकों परिजनों से कराई जाती रही 1984 से 1986 तक सूक्ष्मीकरण साधना की विशिष्ट अवधि बीती जिसमें एक से पाँच बनने की पाँच वीरभद्रों के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। 1987 में भारत भर में हुये राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों 108 कुण्डीय महायज्ञों के बाद 1988 में युगसंधि महापुरश्चरणों की घोषणा कर दी गयी जो कि बारहवर्षीय था व जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में होनी थी इसी महापुरश्चरण के विषय में विस्तार से इस अंक में अन्यत्र प्रायः 24 पृष्ठों में सारी सामग्री एक ही स्थान पर पाठकों की जानकारी के लिये दी जा रही है। जो इस युगसंधि महापुरश्चरण में बाद में जुड़े अभी अभी जुड़े है वे इनके माध्यम से उस गम्भीरता को समझ सकेंगे जिसे दृष्टि में रख अब आगामी दो ढाई वर्षों के साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है
परमपूज्य गुरुदेव ने 1988 की अखण्ड ज्योति में एक स्थान पर लिखा है कुसमय का अंत होते होते कहर बरसने की वेला में हमारी साधना एक सुरक्षा कवच के
रूप में ब्रह्मास्त्र के रूप में हम सबकी ढाल बन जाये एव हम सभी इक्कीसवीं सदी में बढ़ी ब्रह्मबल के साथ प्रवेश करें। कोई भी इस काफ़िले से बिछुड़ने न पाये
इन उपलब्धियों के बाद विश्वशान्ति के मार्ग में कोई कठिनाई शेष न रह जायेगी। इसी के बाद अखण्ड ज्योति के अक्टूबर नवम्बर दिसम्बर 1967 के अंक विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हुए जिनमें भावी विभीषिकाएँ और उनका प्रयोजन महाकाल और उनका रौद्र रूप शिव का तृतीय नेत्र उन्मीलन दशावतार और इतिहास की पुनरावृत्ति जैसे शीर्षकों की लेखमालाएं थी। इन्हीं का संपादन करके महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसके कई संस्करण अब तक छप चुके है। क्राँतिकारी चिंतन अवतारी सत्ता का स्वरूप एवं हम सबके दायित्व बोध पर लिखे गये इन लेखों का एक एक वाक्य जलती हुई आग की चिनगारी के समान है बाद में वांग्मय में इन्हीं लेखों को वांग्मय कृ 29 में 1.1 से1.70 तक अनौचित्य का प्रतिकार शीर्षक से प्रकाशित कर एक स्थान पर उसी से संबंधित विषय के साथ उपलब्ध कर दिया गया है
पूर्णाहुति अवश्य ज्येष्ठ सुदी सन् 2010 गायत्री जयन्ती सन् 1943 में सम्पन्न हुई किन्तु एकाकी नहीं। पूज्यवर ने सहस्रांशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ में 125 करोड़ गायत्री का जप 125 लाख आहुतियों का हवन 125 हजार से अधिक व्यक्तियों की एक वर्ष तक भागीदारी कराके सम्पन्न कराया अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1952 में दिये गये सम्पादकीय के अनुसार। साथ में गायत्री मंत्र लेखन के लिये सवा करोड़ मंत्र लिखे जाने संकल्प भी वर्ष भर में पूरा करवाया जिसकी पूर्णाहुति गायत्री तपोभूमि की मन्दिर स्थापना व मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के रूप में सम्पन्न हुई कहने का आशय यह कि इस मिशन का जो बीज है आधारभूत पृष्ठभूमि है उसे समष्टि के हित के लिये समूह द्वारा की गयी साधना कहा जाय तो अत्युक्तिपूर्ण न होगा
1942 में जब अखण्ड ज्योति को मात्र 4-5 वर्ष ही प्रकाशित होते हुये पूरे हुये थे- भारत छोड़ो आंदोलन राजनैतिक क्षितिज पर चल रहा था, तब पूज्यवर ने आध्यात्मिक धरातल पर कैसे अब 2000 विक्रम संवत् के आगमन के साथ सतयुग का आगमन होने जा रहा है यह समझाते हुये एक विशेषांक प्रकाशित किया था। गायत्री साधना के साथ साथ आजाद होने जा रहे भारत को ऋषियों की तपश्चर्या का बल कैसे मिलेगा यह प्रतिपादन करते हुये साधकों की शंकाओं का समाधान वे प्रत्येक अंक में करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समापन एवं भारतवर्ष के विभाजन के समय उनने परिजनों से विशिष्ट साधनाएँ संपन्न कराई
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 67 के पृष्ठ 13 पर हमारी गुरुसत्ता ने लिखा वर्तमान विचारक्रान्ति महाकाल का तीसरा नेत्र ही है जो प्रचण्ड दावानल का रूप धारण कर अज्ञान युग की सारी विडम्बनाओं को भस्मसात् कर स्वस्थ और स्वच्छ दृष्टिकोण प्रदान करेगी। इन उपलब्धियों के बाद विश्वशान्ति के मार्ग में कोई कठिनाई शेष न रह जायेगी। इसी के बाद अखण्ड ज्योति के अक्टूबर नवम्बर दिसम्बर 1967 के अंक विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हुए जिनमें भावी विभीषिकाएँ और उनका प्रयोजन महाकाल और उनका रौद्र रूप शिव का तृतीय नेत्र उन्मीलन दशावतार और इतिहास की पुनरावृत्ति जैसे शीर्षकों की लेखमालाएं थी
(दिसम्बर, 1988 अखण्ड ज्योति में प्रकाशित)
अक्टूबर 1988 अखण्ड ज्योति में प्रकाशित
अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा 281003
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
(6)उन व्यक्तियों के नाम व पते - मृत्युँजय शर्मा, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
आज जब आशंका और आतंक से हर किसी का दिल धड़क रहा है, उबरने का एक ही उपाय नजर आता है-दैवी सत्ता के आश्वासन पर दृढ़विश्वास। शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ की स्थापना का मूलबीज ही यह संकल्पशक्ति रही है जिसे प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालक परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी अपने स्थूलशरीर से महाप्रयाण के बाद गायत्री-परिवार, अखण्ड ज्योति परिजनों, युगनिर्माण योजना के सृजन सेनानियों को उत्तराधिकार में सौंप गये हैं। इन दिनों उबरने का एक ही उपाय है-मानवी सुधार के प्रयास यदि असफल हो गये हैं, तो आद्यशक्ति महाप्रज्ञा का अवतरण हो, दुष्चिंतन का स्थान सद्बुद्धि ले एवं चहुँओर परिवर्तन की प्रक्रिया गतिशील हो चले। शाँतिकुँज की विगत सत्ताईस वर्ष की जीवन यात्रा बताती है कि जो प्रयास इसके द्वारा विश्व भर में बन पड़े हैं, उनसे असुरता की लंका निश्चित ही जलेगी-मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला राम स्वयं फिर से नये रूप में प्रकट होगा
इसी के लिए देवपरिवार बसाया गया। अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, युगशक्ति गायत्री पत्रिकाओं द्वारा चल रहा प्रशिक्षण-प्रतिपादन परिजनों के बौद्धिक व भावनातंत्र को प्रभावित करने के निमित्त ही था। उसने अपने दो तिहाई से अधिक यात्रा पूरी कर ली है। अब आवश्यकता इस बात की थी कि इस भावनात्मक प्रशिक्षण से उभरकर आए तंत्र से रचनात्मक कार्य संपन्न कर दिखाए जाएँ ताकि भारतीय संस्कृति के समग्र स्वरूप को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज में साकार होता देखा जा सके
कई वनौषधियां ऐसी हैं जो लुप्तप्राय-सी हैं, उन्हें भी यहाँ उगाया जायेगा, ताकि उनकी प्रजाति को नष्ट होने से बचाया जा सके। इस संबंध में विस्तार से एक विशेषाँक अखण्ड ज्योति पत्रिका के मई माह में प्रकाशित करने की योजना है। उस विशेषाँक में नये शाँतिकुँज के विस्तार से जुड़ी अपरिमित संभावनाओं, युगपुरोहितों के नालंदा-तक्षशिला स्तर के प्रशिक्षण तंत्र का भी विस्तार से विवेचन होगा। इसे पढ़कर निश्चित ही अपने चिरअतीत के गौरव को यादकर भावी संभावनाओं का एक आभास सबको हो सकेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
अखण्ड ज्योति पाठक हारमोन्स पर विस्तार से अगले दिनों पढ़ेंगे, क्योंकि अब आज की बीसवीं शताब्दी की समापन की बेला में हमारे पास आधुनिकतम शोधों के कारण बहुत कुछ जानकारियाँ उपलब्ध हैं। फिर भी एक तथ्य यहाँ इनकी प्रभाव क्षमता से सम्बन्धित बताना प्रासाँगिक होगा। अमेरिकी विश्व विद्यालयों में एक अध्ययन से पाया गया है कि प्रायः 1000 क्रूरतम अपराध करने वाले व्यक्तियों में से 60 से अधिक प्रतिशत में एड्रीनल ग्रंथियों, जो गुर्दे के ऊपर अवस्थित होती हैं, कि कार्य-प्रणाली में बिखराव पाया गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
अन्त में मैं एक दिन ब्रजमोहन प्रसाद गुप्ता की दुकान पर गया। उन्होंने मुझे “गायत्री के अनुभव” और अखण्ड ज्योति की पुस्तक दिखलाई। उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि ‘गायत्री साधना से तुम अवश्य परीक्षोत्तीर्ण होंगे। प्रथम तो मुझे विश्वास नहीं हुआ परन्तु उनके बहुत आग्रह करने पर मैंने दूसरे दिन से गायत्री साधना आरम्भ कर दी
उत्सव के विभिन्न अवसरों की चलती फिरती सिनेमा फिल्म खींची गई जो छोटे और बड़े सिनेमाओं में आसानी से दिखाई जा सकेगी। कितने ही फोटो भी लिये गये जो सम्भवतः अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में छपेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
वैसे स्टेशन पर जो ताँगे, रिक्शे मिलते हैं उनसे कहा जाय कि वृन्दावन वाली सड़क पर मथुरा से ठीक पहले मील जहाँ गढ़ा है वहीं हमें पहुँचना है तो गायत्री मंदिर से अपरिचित ताँगे वाले भी आसानी से वहाँ पहुँचा देंगे। कोई व्यवस्था न बने तो स्टेशन से घीयामंडी, अखण्ड ज्योति कार्यालय में पहुँचना सम्भव है। वहाँ से मंदिर तक पहुँचना आसान होगा। ठहरने में अधिकाँश लोगों को मंदिर में ही ठहराया जायगा
हमें आशा करनी चाहिये कि यह मंदिर एक नवीन आदर्श उपस्थित करेगा और भारतीय संस्कृति के आज मलिन हो रहे प्रकाश को कुछ अधिक उज्ज्वल एवं प्रकाशवान बनायेगा। इससे जिस अखण्ड ज्योति की स्थापना हो रही है वह अनेक आत्माओं में शक्ति, शान्ति एवं समृद्धि का विकास करेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
पता- अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-December
(6) गत वर्षों में अखण्ड-ज्योति अपना कागज छपाई और टिकट खर्च स्वयं पूरा कर लेती थी। सम्पादन, दफ्तर, क्लर्क आदि का खर्च तो अखण्ड ज्योति के हिसाब में एक पाई का भी जोड़ा नहीं जाता। इस वर्ष तिरंगा कवर लगाने के कारण प्रति ग्राहक पीछे प्रायः सात पैसे का नुकसान रहता है। अर्थात् कागज छपाई और टिकट की लागत 2 रु. आई है
हम अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्यों ने भी नारद जी के चरण चिन्हों पर चलने का व्रत लिया हुआ है। हमारा यह व्रत साधन संसार की किसी भी अन्य साधना से अधिक उत्कृष्ट है। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द प्रभृति आत्माएं इसी प्रचार मार्ग में आपका जीवन लगा चुकी हैं
(1) इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति के अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। इस लिए ग्राहकों से प्रार्थना है कि अपना चन्दा ढाई रुपये मनी आर्डर से तुरन्त भेज दें
मनीआर्डर फीस समेत 2॥) की अपेक्षा 3 रु.) की वी. पी. पहुँचती है। इसलिए अखण्ड ज्योति की वी. पी. मँगाने में प्रत्यक्ष ही दोनों ओर की हानि है। पाठकों से प्रार्थना है कि वी. पी. की प्रतीक्षा न करे। चन्दा मनीआर्डर से ही भेजें
गायत्री का महत्व अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्य भली प्रकार जानते हैं। ऋषियों के, महात्माओं के, सिद्ध पुरुषों के दिव्य अनुभवों को छोड़ भी दें तो हम लोग स्वयं अपने अपने जीवनों में जो असाधारण दिव्य अनुभव कर चुके हैं, उसके आधार पर हम लोगों की अत्यन्त दृढ़ मान्यता है कि आत्म कल्याण के पुण्य परमार्थ के विश्व हित के जितने भी उपाय हैं उनमें गायत्री माता की शरणागति एक उत्कृष्ट साधन है। इसलिए हम सब सदैव इस बात के लिए प्रयत्न शील रहते हैं, कि भारतीय संस्कृति की मूलभूत आधार शिला, अनन्त आर्य विद्याओं की उद्गम स्थली गायत्री माता की भारत भूमि की पुनः प्रतिष्ठा हो और हम अपने प्राचीन गौरव, बल, वैभव, को पुनः प्राप्त करें
(7) यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर हर महीने ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती है। अंक न पहुँचने का कारण डाक की गड़बड़ी ही होती है। जो अंक न पहुँचे उसकी सूचना उसी महीने देनी चाहिए ताकि दुबारा वह भेजा जा सके
यदि ग्राहक संख्या इतनी ही रही तो यह घाटा अगले वर्ष भी रहेगा। जो पाठक अखण्ड ज्योति से सचमुच प्यार करते हों उनसे प्रार्थना है कि अपना सब कुछ समय खर्च करके कुछ नये ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करें ताकि यह सद्ज्ञान प्रसार की ‘अखण्ड ज्योति’ ठीक प्रकार जलती रहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
एक रत्न-संचय करता है, एक न सूखी रोटी पाता!
अरे! आज मानव अपने को ‘मानव’ कहने में न लजाता,
बर्बर पशु, मोरी के कीड़े, अब क्या मानवता से नाता?
करें दूर यह तुम, जीवन में ज्योति अखण्ड जगाएं!
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
-मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’ मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-February
मानव! उर का अवलोकन कर, जलती है ज्योति अखण्ड यहीं
अब तुम अपने को ही खोजो, अपने में अपना और कहीं। मानव! उर का अवलोकन कर, जलती है ज्योति अखण्ड यहीं॥
भटको मत, अरे निराशा में, आशा का और आधार नहीं। मानव! उर का अवलोकन कर, जलती है ज्योति अखण्ड यहीं॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
पर किसी से कोई ठोस कदम उठाने बन नहीं पड़ता बात लेखन भाषण छुट पुट समायोजन लैटर पैड साइनबोर्ड तक सीमाबद्ध होकर रह जाती है कारण स्पष्ट है कि घरों की चहार-दीवार में कैद रहने वाली अशिक्षित नारी तक पहुँच सकना ओर उनके साथ संबंध मिलाकर प्रगति प्रयोजनों को कार्यान्वित कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता है। यह कार्य अखण्ड ज्योति के परिजन ही थोड़े प्रयत्न से सहज रूप से सम्पन्न कर सकते है
अखण्ड ज्योति परिवार को चाहिए की अपने भावनात्मक वैचारिक बौद्धिक चारित्रिक व्यावहारिक स्तर में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करें। दूरदर्शी विवेकशीलता अपनायें और व्यक्तित्व को प्रामाणिक प्रखर प्रतिभावना और पुरुषार्थ पराक्रम से परिपूर्ण बनाने का प्रयत्न करें चन्दन जब महकता है दो निकटवर्ती झाड़ भी महकने लगते हैं। उद्यान में खिले हुए पुष्प सारे वातावरण को सुगंधित ओर सारे क्षेत्र को सुगन्धित कर देते है
आयोजन में सम्मिलित प्रायः पाँच हजार के जन समूह में से अधिकाँश ने नशा निवारण की तथा दहेज उन्मूलन के संकल्प पत्र भरें। कार्यकर्ताओं की सक्रियता के परिणाम स्वरूप दो सौ पचास नये अखण्ड ज्योति के सदस्य कार्यक्रम के अवसर पर ही बनाये गये। इतने ही सदस्य और भी बनाने का संकल्प कार्य कर्त्ताओं ने मिल-जुल कर लिया
सूत्र संचालक की उत्कट इच्छा महाकाल की महती प्रेरणा एवं युगधर्म की पुकार है कि अखण्ड ज्योति परिकल की नारी सदस्याएं इन दिनों पाँच पाँच की मण्डली में गठित हों प्रगतिशील नारियों का ऐसा परिकल खड़ा करें जो उल्टी परिस्थितियों को उलट कर सीधा करने में समर्थ एवं सफल हो सकें। इस कार्य के लिए प्रशिक्षण हेतु त्रैमासिक प्रशिक्षण सत्रों में अग्रदूत कार्यकर्ता महिलाओं को शाँतिकुँज भेजें। जिनके पास समय कम हो वे एक माह के लिए आ सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
अखण्ड ज्योति और उसकी सहेली पत्रिकाओं के माध्यम से युग-साहित्य के प्रसारण से ऐसी भावनाओं को उभारा गया है जो मात्र अपने ही निर्वाह की बात सोचते रहने तक सीमित न रहकर समय के परिवर्तन हेतु अपना योगदान करने के लिए भी उत्साह दिखा सकें, साहस संजों सकें। इन लोगों में से जो अधिक भावनाशील हैं उन्हें एक महीने के और दस दिन वाले सत्रों में सम्मिलित किया जाता रहता है। जीवन साधना का पक्ष सत्रों का प्रमुख अंग रहता है
प्रतापगढ़ (उ.प्र.) नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की उपस्थिति में डॉ. सम्पूर्णानन्द जी द्वारा समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के वितरण की व्यापक व्यवस्था बनाई गई। इस वर्ष दो हजार अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया
हिमालय की प्रतीक देवालय प्रतिमा मात्र भारत वर्ष में इसी एक स्थान पर हैं। प्रायः आधी शताब्दी से जलती आ रही अखण्ड ज्योति की यहाँ स्थापना है, जिसके आलोक में अब तक करोड़ों की संख्या में जप किया जा चुका हैं। गायत्री माता का देवालय तो अवस्थिति है ही। नौ कुण्डों वाली यज्ञ शाला में नित्य दो घण्टे तक गायत्री महामंत्र से अग्निहोत्र होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
अखण्ड ज्योति का तेलगू संस्करण
आयोजन का उद्घाटन भेल के डिप्टी जनरल मैनेजर वंशीधर पाण्डेय तथा जिला विद्यालय निरीक्षक ने किया। 1008 घरों में दीपयज्ञ कराने व अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया
स्थानीय प्रज्ञा संस्थान में दीपयज्ञ कार्यक्रम भावनात्मक विवरण में सम्पन्न हुआ। समीपवर्ती क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिकाधिक नियमित सदस्य बनाने की व्यापक आस्था कार्यकर्ताओं ने की है। चार सौ क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को इस अवसर पर रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे गये
इस अवसर पर नवनिर्मित यज्ञशाला का उद्घाटन श्री रामाधीन दुबे ने किया। अखण्ड ज्योति को हर शिक्षित तक पहुँचाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया
वृक्षारोपण नशा निवारण, दहेज उन्मूलन तथा प्रौढ़ शिक्षा विस्तार के लिए सम्मिलित परिजनों द्वारा संकल्प पत्र भरे गये। अखण्ड ज्योति को संपर्क क्षेत्र में अधिकाधिक परिजनों तक पहुंचाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया
इससे उपस्थित प्रबुद्ध वर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ। कार्यक्रमों के व्यापक विस्तार के लिए अखण्ड ज्योति पत्रिका को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने का संकल्प भी लिया गया
आयोजन के समय बड़ी मात्र में साहित्य बिक्री हुआ। अखण्ड ज्योति पत्रिका की संख्या दुगुनी करने का संकल्प कार्यकर्त्ताओं द्वारा लिया गया
गुन्टुर (आन्ध्र प्रदेश) से अखण्ड ज्योति का तेलगू वार्षिक चंदा 15/
इसी श्रृंखला में 20 दिसम्बर को यहाँ पर दीपयज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। 24 अखण्ड ज्योति पत्रिका के सदस्य तुरन्त ही बन गये। अब अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है
तभी अब तक 10 स्थानों में कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुए। नगर में अभी तक 250 अखण्ड ज्योति पत्रिकाएं आती थी। अब यह संख्या 500 तक पहुँच गई। इससे भी अधिक संख्या बढ़ाने का प्रयास परिजनों द्वारा किया जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
ज्ञानपीठें इसी निमित्त बनी है। अब जीवन शाखा-संगठन को वहाँ मान्यता दी गई हैं, जहाँ अखण्ड ज्योति के, युगशक्ति के, युगनिर्माण योजना के अधिक संख्या में ग्राहक-पाठक है। इन सभी केंद्रों में ऐसे कार्यकर्ता रहते है। अगले दिनों और भी बढ़ेंगे, जो अपने नगर में तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में युगान्तरीय चेतना का अलख जगायें और उलटे को उलट कर सीधा करें, उसी को अपनी श्रम साधना से हरितिमा से भरी पूरी उर्वर भूमि बनायें
अस्सी करोड़ तो भारतीय जनता एवं 500 करोड़ की विश्व जनसंख्या को देखते हुए यह प्रकाश वितरण अत्यन्त अल्प है। अखण्ड ज्योति परिवार के घनिष्ठ आत्मीय सोचते हैं कि इस प्रकाश–तंत्र का विस्तार करने के लिए एक लम्बी छलाँग लगानी चाहिए एक आदर्श स्थापित किया जाना चाहिए। एक कीर्तिमान बनना चाहिए
अखण्ड ज्योति अध्यात्म और विज्ञान को परस्पर सहयोगी बनाने के निमित्त दार्शनिक स्तर पर हीं नहीं, अनेक आधारों को लेकर लक्ष्यपूर्ति के लिए प्रयत्नरत है। इन्हीं अनेकों में से एक ‘ज्योतिर्विज्ञान’ का पुनरुत्थान भी कहा समझा जा सकता है। इससे ऋषि परम्पराओं के आधार पर चलते रहे भूतकालीन प्रयासों की गरिमा को समझा जा सकता है और उसका आधुनिक विज्ञान सम्मत स्वरूप देखा जा सकता है
इस महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए कोई सुनियोजित सर्वांगपूर्ण प्रयत्न न होता देखकर अखण्ड ज्योति तंत्र ने ही अपनी स्वल्प सामर्थ्य के अनुरूप कदम उठाने का निश्चय किया। सहायकों का अभाव, पूँजी का अभाव, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बच पाना जैसे अनेक अवरोध थे। जिनके कारण समय की महत्ती माँग को पूरा करने में एक निष्टभाव से युग साहित्य का सृजन न हो सका
अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अन्तराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘श्रद्धा’ कहते है। इसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्श के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है
विज्ञापनों, चित्रों की भरमार से सजधज कर निकलने वाली पत्रिकाओं में ठोस सामग्री उनके कलेवर की तुलना में बहुत ही कम रहती है। इस प्रतियोगिता में अखण्ड ज्योति कहीं आगे है। उसमें रहने वाले कवर सहित .... पृष्ठों में ठोस और ठसाठस भरी हुई इतनी सामग्री रहती है जितनी उसकी तुलना में दूना कलेवर रखने वाली पत्रिकाओं में भी नहीं रहती
वह कुछ ही दिनों में लोगों के प्रयत्न पुरुषार्थ, वैभव वर्चस्व आदि को भूल जाती है। विस्मृति के गर्त में गिर कर बड़े पराक्रमी भी लोक दृष्टि से ओझल हो जाते है; किन्तु आत्मिक जगत की श्रद्धा शक्ति अखण्ड ज्योति ऐसी है, जिसे शाश्वत ओर अविनाशी तो कहा ही जा सकता है। उसका उत्पादन भी ऐसा है, जो सृजेता की सामर्थ्य को घटाता नहीं, वरन् बढ़ाता ही चलता है। इसके अतिरिक्त उसके उत्पादन भी ऐसे है, जो किसी छोटी परिधि तक सीमित न रहकर अनेकानेक दिशाधाराओं का सूत्र-संचालन एक साथ करने लगते है, जबकि भौतिक शक्तियाँ सीमित प्रयोजनों का सामयिक स्तर ही उपार्जित कर पाती है
बात लगभग 45 वर्ष पुरानी है। हिन्दी के एक मूर्धन्य पत्रकार के पास अखण्ड ज्योति के सत्र संचालक आरम्भिक वर्षों की दो तीन प्रतियाँ लेकर गये। उचित उद्देश्य और स्तर की बातें की और पूछा कि इसे किस प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है? उतने .... थोड़ी देर में ही वस्तुस्थिति भाँप ली और .... ही कहा- यह न पूछे कि इसे किस प्रकार चलाया जा सकता है, वरन् यह कहें कि इसे किस प्रकार जीवित रखा जा सकता है। उनने उदाहरण में भी कितनों के नाम गिनाये, उनके प्रकाशकों ने अपने जोश को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया- और अपनी पैतृक सम्पत्ति को क्रमशः इसी में खपाते हुए पत्रिका चलाने का निश्चय किया और अपने जीवन काल में उस प्रण को पूरा करते रहे
वह उसके अन्तराल में बसने वाला निराकार स्वरूप है। इसी का साकार स्वरूप है- ‘अखण्ड ज्योति’। जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बना कर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह माना जाना चाहिए कि खण्डित होने वाली-निरन्तर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक का कलेवर प्रदान किया गया
उन्हें आत्मनिर्माण परिवार निर्माण समाजनिर्माण, के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्यक्रम अपनाने के लिए कहा गया है जो कहा गया है उसे अपनाया गया है। यही कारण है कि नीति-निष्ठा अपनाने वाले जितने व्यक्ति अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों में दीख पड़ते हैं उतने अन्यत्र कहीं नहीं। परिवारों में शालीनता का परिवार के पंचशीलों का समावेश जितनी मात्रा में हुआ है उतना अन्यत्र कदाचित हीं कहीं देखा जा सके। समाज-निर्माण के निमित्त भी इस समुदाय ने जितना काम किया है उसी बूँद-बूँद को एकत्रित किया जाये, तो वे घड़ा भरने जितनी ही जाती है
अखण्ड ज्योति प्रकाशित होती है और एक महीने बाद अगला अंक आने पर पुरानी मान ली जाती है। यद्यपि उसकी उपयोगिता सदा-सर्वदा यथावत् अक्षुण्ण बनी रहती है, फिर भी उसमें थोड़े-थोड़े पन्नों वाले बहुउपयोगी लेख रहते है। इससे बहुत विषयों की थोड़ी जानकारी भर मिलती है
ग्वाल बालों के सहयोग से गोवर्धन उठा था। अखण्ड ज्योति के प्रज्ञा पुत्र भी कुछ दिखा कर ही रहेंगे। ऐसा कुछ जिसके लिए वह अनुकरणीय और अभूतपूर्व शब्दों के साथ स्मरण रखा जा सके
सामान्यतया सभी परिजन अपने पत्रों के साथ जवाबी लिफाफा भेजते है ताकि मार्गदर्शन क्रम सुनिश्चित रूप से चलता रहे एवं मिशन पर आर्थिक बोझ न आये। पत्रिका वितरण सम्बन्धी पत्राचार अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा एवं विषय वस्तु तथा व्यक्तिगत समस्याओं संगठन सम्बन्धी पत्र-व्यवहार शांतिकुंज परिवार से चलता है
बँगला वाले अपनी तैयारी अलग से करने में जुटे हुए है। यह सब प्रकारान्तर से मथुरा के प्रकाशन का ही विस्तार समझा जाना चाहिए, जो अखण्ड ज्योति के गोमुख से निस्सृत होती है और क्रमशः अग्रगामी सुविस्तृत होती चली जा रही है
किन्तु शांतिकुंज में आकर उसे व्यवहार में उतरते देख जाते है। यही है वह प्राण-प्रेरणा जो संचालकों के व्यक्तित्व से लेकर आश्रम की रीति-नीति तक तथा अखण्ड ज्योति के लेखों में प्रादुर्भूत होती देखी जा सकती है
सो भी इतनी उच्चकोटि की, जिनका अनुवाद अन्यान्य भाषाओं में होता चला गया और उसने लाखों की सीमा पार करके करोड़ों का मानस झकझोरा। योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाश पुँज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव तो अगले दिनों युग सृजन के रूप में देखने को मिलेगा
यही हुआ भी है। अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखने वाले ऋषि युग्म-माताजी के व्यक्तित्व को चरित्र को आदि से अन्त तक खुली पुस्तक की तरह पढ़ने के उपरान्त ही यह सम्भव हुआ कि अग्रिम पंक्ति पर चलने वाले के पीछे प्रयाण करने का साहस जुट सके। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों में जो प्राणवान ज्योति ज्वाला रहती है। वस्तुतः वह प्रस्तोताओं की प्राणाग्नि ही है
इस वसन्त पर्व से अखण्ड ज्योति परिवार के सभी परिजनों को नवसृजन के लिए नित्य कुछ समय निकालना है। यह समयदान ही वह आधार है जिनकी ईंटें मिलकर नवयुग का भव्य भवन खड़ा करेगी
जहाँ कुछ हो रहा है वहाँ उनके कार्या में सहायता तो देनी चाहिए पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि लाल फीताशाही और आरामतलबी के वातावरण में ये उतना कुछ कर पायेंगे जितना कि अभीष्ट है तो इसकी आशा कम ही करनी चाहिए। इस क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के परिजनों को अपने ढंग से प्रवेश करना चाहिए। अपने घर से आरम्भ करके उस प्रक्रिया को अपने संपर्क क्षेत्र में दूर-दूर तक पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए
बौद्धिक-नैतिक स्तर की विचारक्रान्ति के लिए अखण्ड ज्योति मिशन द्वारा युग निर्माण योजना के नाम से पहले भी बहुत कुछ कहा और किया जाता रहा है। पर आर्थिक-क्रान्ति को अभी इसी वर्ष से अपनी कार्यपद्धति में समाविष्ट किया गया है। इस निमित्त कितने ही नये कार्यक्रम हाथ में लिये गये है जिन्हें प्रत्येक समयदानी अपने क्रिया-कलापों में किसी न किसी रूप में सम्मिलित करें
अखण्ड ज्योति के प्रज्ञापुत्र इन दिनों ढाई लाख है। पिछले 50 वर्ष में वे 500 प्रतियों से आरम्भ होने वाली इस पत्रिका के सदस्य 500 गुने अधिक बढ़े हैं और वर्तमान स्थिति तक पहुँचे है। प्रगति के इस क्रम को देखते हुए सन् 88 में इनकी संख्या पाँच लाख की परिधि तक जा पहुँचना स्वाभाविक है
अखण्ड ज्योति का विचार तंत्र इस अति महत्वपूर्ण समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करता रहा है और यह सोचता रहा है कि तीर्थ संस्था को पुनर्जीवित करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? जो सम्भव हो उसे समय रहते किया जाना चाहिए
पचास वर्षों के जीवन काल में अखण्ड ज्योति इसी क्रम से एक-एक कदम आगे बढ़ती जा रही है और अपने पैर चट्टान की तरह सुदृढ़ आधार पर जमाती रही है अखण्ड ज्योति अब प्रायः ढाई लाख छपती है। 500 .... का गुना बढ़कर इस स्थान पर आ पहुंचा है। यह पत्र पत्रिकाओं के जीवन्त होने का एक अभिनव उदाहरण है
यह पुरातन है। आधुनिक यह है कि यहाँ लम्बे समय से जलती आ रही अखण्ड ज्योति की स्थापना है, नित्य लाखों की संख्या में गायत्री जप होता है। 9 कुण्ड की यज्ञशाला में प्रतिदिन दो घण्टा यज्ञ होता है। कथा कीर्तन सत्संग आदि का दैनिक क्रिया-कलाप चलता है
अखण्ड ज्योति की अपनी प्रारम्भिक वर्षों में 500 प्रतियाँ छपती थी। प्रचार विज्ञापन कमीशन आदि का कोई तारतम्य नहीं बैठ पा रहा था क्योंकि उसकी नीति कागज छपाई पोस्टेज भर जितना मूल्य रखने की रही नफे की कोई गुँजाइश नहीं रखी गई थी। नुकसान देने की सामर्थ्य न थी इसलिये ‘न नफा न नुकसान’ की नीति प्रारम्भ से ही अपनाई गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
समीपवर्ती क्षेत्र में तथा नगर के मुहल्ले मुहल्ले में यह दीप यज्ञ कार्यक्रम चलाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया। अखण्ड ज्योति पत्रिका को अधिकाधिक परिजनों तक पहुँचने की व्यापक व्यवस्था बनाई गई
अखण्ड ज्योति के लाखों ग्राहकों, पाठकों में से हजारों निश्चित रूप से ऐसे होंगे जो नौ दिन वाली या तीन महीने वाली शिक्षा में सम्मिलित होने के लिए तुरन्त उत्सुकता एवं आतुरता प्रकट करेंगे। इन सबको लम्बे समय तक रोका जा सके और थोड़े से शिक्षार्थियों को लम्बे समय तक रोक रखने पर संतोष किया जा सके तो बात दूसरी है, अन्यथा यही एक मात्र उपाय शेष रहा जाता है कि कम से कम समय शिक्षाएं चलाई जायं और उनमें अधिकाधिक लोगों को सम्मिलित करके अनेकों को कम से कम समय में आवश्यक लाभ देने की नीति अपनाई जाय। वही किया भी जा रहा है
शिवपुरी (म0प्र0) - जनता से कोई चन्दा लिए बिना दीपयज्ञ कार्यक्रम विशाल रूप से सम्पन्न होने पर स्थानीय जनता में अभूतपूर्व छाप पड़ी है। इस अवसर पर कार्यकर्ताओं द्वारा लगभग चार हजार अखण्ड ज्योति पत्रिका के नये सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया। लगभग इतने ही स्थानों पर दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने का संकल्प भी लिया गया
श्री ओम प्रकाश चौरसिया की अगुवाई में नित्य प्रति किसी न किसी मुहल्ले में यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है। कार्यक्रम में सम्मिलित परिजनों से नशा निवारण, दहेज उन्मूलन, प्रौढ़शिक्षा विस्तार तथा वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाने के साथ अखण्ड ज्योति के सदस्य बढ़ाने के संकल्प पत्र भराये जाते है
पटना - दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अभी तक यहाँ 935 अखण्ड ज्योति पत्रिकायें आती थी। नए वर्ष से यह संख्या दूनी करने के लिए परिजनों में भारी उत्साह है। टोली–बद्ध रूप से सभी कार्यकर्ता इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जुट पड़े है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
यह कार्य जिन उद्योगों से हो सकता है उनमें स्टीकर आन्दोलन सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली है। हर अखण्ड ज्योति परिजन को निजी रूप से यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपने प्रभाव और परिचय क्षेत्र में कोई घर, दुकान, दफ्तर, कमरा ऐसा न बचे जहाँ आदर्श वाक्यों वाले स्टीकर न चिपके हुए हों
अखण्ड ज्योति परिवार के समीपवर्ती सभी क्षेत्रों में आदर्श वाक्यों वाले स्टीकर चिपकाये जा सकें, इसका प्रयत्न पूरे उत्साह के साथ चलना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
बंगला अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका के रूप में नूतन बदले कलेवर में युग निर्माण योजना शाखा कलकत्ता द्वारा इन दिनों नियमित रूप से प्रकाशित हो रहीं है। जो भी परिजन बड़े महानगरों में रहते हों, जहाँ बंगला भाषी हों, उन्हें उस पत्रिका से परिचित कराएँ ग्राहक पाठक बनाएँ व प्रचुर परिमाण में प्रकाशित बंगला साहित्य भी उन्हें दें। सीधे 2-मल्लिक स्ट्रीट प्रथम तल्ला बड़ा बाज़ार कलकत्ता या शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से संपर्क किया जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
करना इतना भर है कि जितने व्यक्तियों तक महाकाल की सत्ता का संदेश श्रद्धाँजलि पर्व 1990 से लेकर 1994 की दिसंबर में संपन्न राजकोट अश्वमेध यज्ञ तक पहुँचा, उनको अनुयाज प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति-परिवार एवं समाज के अभिनव निर्माण के सूत्र हृदयंगम करा दिए जायँ। युग संजीवनी के रूप में, पूज्यवर की प्राणचेतना के रूप में, विद्यमान “अखण्ड ज्योति” पत्रिका “युगनिर्माण योजना” “युगशक्ति गायत्री” पत्रिका एवं पाक्षिक प्रज्ञाअभियान के माध्यम से व्यावहारिक कार्यक्रम देने वाली मार्गदर्शिका उन तक पहुँचा दी जाय। युगधर्म के परिपालन के निमित्त दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम कैसे संपन्न हों, इनका प्रशिक्षण लेने के लिए अधिकाधिक को प्रेरित कर उन्हें कार्यक्षेत्र में लगा दिया जाय। नवंबर 1995 से दिसंबर 1996 तक के चौदह माह के समय को इसीलिए “अनुयाज वर्ष” घोषित कर पूरे भारतवर्ष की प्रसुप्त प्रतिभा का एक बार तीव्र मंथन करने का निर्देश ऋषियुग्म की सत्ता की ओर से मिला है
काफी दिन इलाज चला। आप्रेशन का खर्चा, सवेतन छुट्टी और बच्चे की पढ़ाई, के साथ अखण्ड ज्योति कार्यालय में काम की व्यवस्था उन्होंने की
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है
धन्य हैं गुरुदेव-धन्य हैं आपकी लीला। अखण्ड ज्योति पत्रिका का वर्तमान संपादक जो तथाकथित बुद्धिजीवी भी रहा है। इन सब बातों की वैज्ञानिकता को नहीं समझता, किंतु वह स्वयं साक्षी रहा है अपने गुरु के दैवीस्वरूप का। वह क्या तो समीक्षा करे, वह क्या किसी को समझाए?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
माताजी के आने के बाद गुरुदेव के जीवनक्रम में एक नया निखार आया। अखण्ड ज्योति का प्रकाशन पहले से ही चल रहा था। पर अभी तक यह एक पत्रिका का प्रकाशन भर था। सामान्यक्रम में पत्रिका और पाठक के रिश्ते पढ़ने-पढ़ाने तक सीमित रहते हैं
पहले ओम्–प्रकाश, दया, सतीश (मृत्युँजय) और शैल, मैं और गुरुजी। फिर हुआ अखण्ड ज्योति परिवार इसमें 10-20 हजार लोग रहे होंगे। अब तो हो गया है गायत्री परिवार जिसकी संख्या लाखों को पार कर करोड़ों में पहुँच रही है
परम वंदनीय माताजी से विवाह बंधन में बँधने के बाद भी उनने स्वेच्छा से उस घर से कुछ भी न लिया। दैनिक ‘सैनिक’ आगरा समाचार पत्र के संपादन सहयोगी के रूप में जो वेतन मिलता उससे पहले आगरा में, बाद में दस रुपया मासिक राशि पर मथुरा में माता जी के साथ तीन बार घर बदलने के बाद वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान में घर बसाया गया। करीब 1945 के मध्य की बात रही होगी। जिस महिला ने कभी सूती-खादी के सामान्य कपड़े न पहने हों, वह मोटी कण्ट्रोल की धोती में गुजारा करे एवं चेहरे पर एक शिकन भी नहीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
तब सब कुछ बदला हुआ होगा। ‘अखण्ड ज्योति’ के किशोर पाठक नोट करके रख लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में लगभग हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे, अभी तो सूक्ष्म जगत में इनका बीजारोपण मात्र हो रहा है
परमपूज्य गुरुदेव ने 1966 की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ श्रृंखला क्रम में अगस्त माह की पत्रिका में ‘हमारा छँटनी कार्यक्रम और उसका प्रयोजन’ शीर्षक से अपनी भावनाओं को छूने वाली तूलिका से लिखा था कि इन दिनों विश्व में जो भावनात्मक दुर्भिक्ष फैला हुआ है, उसके निवारण हेतु एक बड़ी सृजनात्मक योजना इन दिनों बन रही है। पाँच वर्ष बाद (1971 के बाद) हमारी क्रियापद्धति सूक्ष्मजगत में आरम्भ होगी। वह हमारे जीवन का उत्तरार्द्ध है
यह लेखमाला का चौथा पुष्प है, जिसमें उनने यह अनुरोध किया है कि कार्यकर्ता अपना चिन्तन, जीवन शैली कैसी रखें। पहले मात्र विज्ञप्ति रूप में प्रकाशित यह पंक्तियाँ सर्वसाधारण के लिए हम ‘अखण्ड ज्योति’ में दे रहे हैं ताकि एक आदर्श आचार संहिता के उस पक्ष को परिजन समझ सकें जो गुरुवर की अन्तर्वेदना थी। उनने जीवन भर व्यक्ति गढ़े। यदि कहीं कोई कमी रही है तो वह हमारी ही है उनकी नहीं
इधर परमपूज्य गुरुदेव के समग्र जीवन पर बन रहा वांग्मय भी अपनी पूर्ण तैयारी पर है। इसमें सत्तर खण्ड होंगे जो प्रायः अखण्ड ज्योति आकार के पाँच सौ पृष्ठ के होंगे। इस प्रकार 35000 पृष्ठों में एक अमूल्य सामग्री जिसमें पूज्यवर की लेखनी रूपी संजीवनी वाणी रूपी अमृत तथा पत्रों-अनुभूतियों-काव्य का अद्भुत समन्वय परिजन पायेंगे। उनकी प्रथम पूर्णाहुति पर तो मात्र 45 खण्ड ही सबको दिये जा रहे हैं, इतने ही भरपूर परिश्रम के बाद तैयार हो पाये हैं, किन्तु सभी को शेष पच्चीस खण्ड इस वर्ष के अन्त तक मिल जायें, ऐसी व्यवस्था की जा रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
दूसरा संस्थान है अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा (घीयामण्डी) जहाँ उनने लेखनी रूपी अस्त्र से सन् 1984 में ‘अखण्ड ज्योति पत्रिका आरंभ की एवं 200 से आरंभ होने वाले गायत्री परिवार को सतत् मार्ग दर्शन देते हुए मनीषी चिन्तन को घर-घर पहुँचाया एवं आज प्रातः साढ़े चार लाख व्यक्ति इस पत्रिका को हिन्दी में पढ़ते तथा दस लाख लोगों को पढ़ाते हैं। इसी के अनुवाद दस भाषाओं में छपकर दस लाख और व्यक्तियों तक पहुँचते हैं। इसी स्थान पर निवास करते हुए उन्होंने हजारों व्यक्तियों से व्यक्तिगत पत्र व्यवहार करते हुए उनको अपना अभिन्न अंग बनाया, उनकी समस्याएँ सुलझाई एवं एक विशाल गायत्री परिवार का सदस्य बना लिया
यही कारण है कि हर जाति, मत, सम्प्रदाय का व्यक्ति उनसे पिता की तरह स्नेह करता एवं उनकी धर्मपत्नी वंदनीय माता भगवती देवी को अपनी माता मानते हुए बदले में अनेक गुना स्नेह ढेरों अनुदान आशीर्वाद पाता रहा। यहीं पर उनने आर्षग्रन्थों का भाष्य कर उन्हें जन सुलभ बनाया, अपने वजन से भी कई गुना साहित्य रचा एवं नियमित अपनी लेखनी चलाते हुए अपनी साधना के शक्ति स्रोत अखण्ड दीपक के प्रकाश में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका एकाकी लिखी, जो कि अपनी लम्बी यात्रा पूरी कर पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी स्वर्ण जयन्ती मना चुकी है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
दूसरी बात अखण्ड ज्योति की यह स्वर्ण जयंती है अखण्ड ज्योति की वजह से हमने संगठन किया है इतने विचार लोगों को दिये है जो पत्रिकाएँ आजकल निकलती है उनमें दो लाख से ज्यादा अखण्ड ज्योति निकलती है। एक लाख से ज्यादा गुजराती की निकलती है मराठी की पत्रिका निकलती है उड़िया की निकलती है हिन्दी का एक दूसरा पत्र निकलता है। सब मिलाकर के छः सात लाख पत्रिकाएँ निकलती है इनके द्वारा हमारे विचारों ने दुनिया में एक बड़ा संगठन खड़ा कर दिया है चौबीस लाख आदमियों का एक संगठन है यह संगठन इसी वजह से बना है कि हमारे विचारों को अखण्ड ज्योति के द्वारा हमारी वाणी को लोगों ने सुना और हमारी लेखनी को चखा
हमारे जीवन को पचहत्तर पन्ने की किताब है इसमें सारे अध्यात्म के रहस्य हमने खोल खोल के रखे है आपने कोई किताब न पढ़ी हो जीवन में तो हमारा जीवन पढ़ लीजिए कि अध्यात्म सार्थक कैसे हो सकता है? इसकी हीरक जयंती सब लोगों ने मिलकर मनायी है तो कोई हो सकता है? इसकी हीरक जयंती सब लोगों ने मिलकर मनायी है तो कोई नाराजगी नहीं हुयीं प्रसन्नता ही हुयीं हैं अखण्ड ज्योति परिवार के चौबीस लाख के करीब आदमी है पत्रिकाएँ बहुत निकलती है इन सबकी इच्छा थी कि हीरक जयंती मनायी जाये। हीरक जयंती में ही यह संकल्प किये गये थे कि एक एक लाख के पाँच बड़े यज्ञ होंगे जो आपने पढ़े ही है। जो आप कार्यान्वित कर ही रहे है
इसके सिवाय तीसरा हमने जो कार्य किया वह तीन वर्ष का सूक्ष्मीकरण अनुष्ठान किया था तीन वर्ष पूरे होते ही अधिकांश समय हमें एकांत में रहना पड़ा मौन में रहे और क्या-क्या किया? उन सब बातों को बताने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए आपको जनवरी की अखण्ड ज्योति पढ़नी चाहिए जनवरी की अखण्ड ज्योति को हम कुण्डली जागरण अंक के नाम से छाप रहे है इस सावित्री साधना का क्या विज्ञान है? किस तरीके से संभव हुयीं? ये हम अखण्ड ज्योति के जनवरी के अंक में बतायेंगे और इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी कैसे आयेगी? नया युग कैसे आयेगा? नये युग में क्या क्या बातें होगी? यह सब बातें फरवरी के अंक में होगी अखण्ड ज्योति का जो स्वर्ण जयंती वर्ष है यह भी बड़ा शानदार वर्ष है क्योंकि बहुत कम पत्रिकाएँ ऐसी है हिन्दुस्तान में जो पचास वर्ष से ज्यादा चल रहीं है इनकी संख्या उँगलियों पर गिनने लायक है कोई पत्रिका दो वर्ष निकलती है कोई एक वर्ष निकलती है तो कोई चार वर्ष निकलती है प्रायः बंद हो जाती है इतने लंबे समय तक लगातार जिसका कभी विराम न हुआ हो जिसके कभी साप्ताहिक अंक न निकले हो जिसकी कभी नागा न हुयीं हो इस तरह की पत्रिका शायद ही कही कोई हो भारत वर्ष में। इसकी भी स्वर्ण जयंती मनायी जा रही है
एक लाख से ज्यादा गुजराती की निकलती है मराठी की पत्रिका निकलती है उड़िया की निकलती है हिन्दी का एक दूसरा पत्र निकलता है। सब मिलाकर के छः सात लाख पत्रिकाएँ निकलती है इनके द्वारा हमारे विचारों ने दुनिया में एक बड़ा संगठन खड़ा कर दिया है चौबीस लाख आदमियों का एक संगठन है यह संगठन इसी वजह से बना है कि हमारे विचारों को अखण्ड ज्योति के द्वारा हमारी वाणी को लोगों ने सुना और हमारी लेखनी को चखा। लेखनी और वाणी दोनों का सम्मिश्रण है यह अखण्ड ज्योति इसका पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष प्रारंभ हुआ है तो इसकी स्वर्ण जयंती है स्वर्ण जयंती मनाने में यज्ञ और गायत्री ये ही दो तो हमारे माता पिता रहे है गायत्री का तो इसके साथ में जप होगा ही आहुतियाँ तो दी ही जायेगी गायत्री यज्ञ है ही। इससे हम अपने माता पिता को अखण्ड ज्योति को भी पूर्णाहुतियाँ के ज्योति का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाते हैं
सब मिलाकर के छः सात लाख पत्रिकाएँ निकलती है इनके द्वारा हमारे विचारों ने दुनिया में एक बड़ा संगठन खड़ा कर दिया है चौबीस लाख आदमियों का एक संगठन है यह संगठन इसी वजह से बना है कि हमारे विचारों को अखण्ड ज्योति के द्वारा हमारी वाणी को लोगों ने सुना और हमारी लेखनी को चखा। लेखनी और वाणी दोनों का सम्मिश्रण है यह अखण्ड ज्योति इसका पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष प्रारंभ हुआ है तो इसकी स्वर्ण जयंती है स्वर्ण जयंती मनाने में यज्ञ और गायत्री ये ही दो तो हमारे माता पिता रहे है गायत्री का तो इसके साथ में जप होगा ही आहुतियाँ तो दी ही जायेगी गायत्री यज्ञ है ही। इससे हम अपने माता पिता को अखण्ड ज्योति को भी पूर्णाहुतियाँ के ज्योति का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाते हैं
उन व्यक्तियों के नाम व पते- मृत्युंजय हरिद्वार जो समाचार पत्र के स्वामी हों अखण्ड ज्योति संस्थान तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत मथुरा से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हो
लेखनी और वाणी दोनों का सम्मिश्रण है यह अखण्ड ज्योति इसका पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष प्रारंभ हुआ है तो इसकी स्वर्ण जयंती है स्वर्ण जयंती मनाने में यज्ञ और गायत्री ये ही दो तो हमारे माता पिता रहे है गायत्री का तो इसके साथ में जप होगा ही आहुतियाँ तो दी ही जायेगी गायत्री यज्ञ है ही। इससे हम अपने माता पिता को अखण्ड ज्योति को भी पूर्णाहुतियाँ के ज्योति का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाते हैं
जो परिजन इन कार्यक्रमों में किसी भी तरह भाग न ले सकें आयोजन की पूर्णाहुति तक प्रतिदिन वे अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना युग शक्ति गायत्री के सदस्य बनाने का प्रयास करे। गायत्री साहित्य साहित्य घर घर जाकर लोगों को पढ़ाने का कार्य करे। अपने अपने क्षेत्रों में गायत्री उपासना के विस्तार का क्रम अपनाएँ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
एक वर्ष के लिए मैं हिमालय चला गया। कहाँ रहा, इसका थोड़ा-सा विवरण ‘सुनसान के सहचर’ नाम से आँशिक रूप में अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ था। वह बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। लोग कहते हैं जहाँ आप गये थे, कहाँ गये थे? क्या करते रहे थे? हिमालय पर तो बहुत से लोग रहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
मथुरा निवासी पं. राधेश्याम का कलियुग संबन्धी लेख अखण्ड ज्योति गत अंक में देख कर सम्पूर्ण चाव के साथ पढ़ गया
अखण्ड ज्योति पृष्ठ 32 पर लिखा है-”सूर्य की उत्तर दक्षिण गति को ही दिव्य वर्ष कहते हैं। ” जिसकी गति 360 संख्या है। अर्थात् उत्तरायण के 6 मास और दक्षिणायन के छै मास के 360 दिन रात मनुष्यों के हुए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
1.अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) और एक प्रति का =1) है। मूल्य मनीआर्डर से भेजना चाहिए। वी.पी मँगाने पर 1-)अधिक देने पड़ते है
मैनेजर - ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय मथुरा
सारा घर दुखी था। अखण्ड ज्योति जब से मँगाई, तब से घर में बहुत खुशी है। दोनों स्त्रियों का इस समय गर्भ है
4.अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिये भी ग्राहक नहीं बनायें जाते
5.अखण्ड ज्योति प्रति मास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। अपने यहाँ से दो बार जाँच कर ग्राहकों के पास भेजा जाता है। परन्तु कभी-कभी डाकखाने की गड़बड़ी से अंक पाठको को नहीं मिलते
अखण्ड ज्योति के ज्ञान प्रसार कार्य में सहयोग देना धर्म कर्तव्य समझ कर इस मास निम्न महानुभावों ने ग्राहक बढ़ाने का विशेष प्रयत्न किया है। इन सज्जनों के प्रति अखण्ड ज्योति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करती है
अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को पौने मूल्य में ही मिल सकेगा डाक व्यय पृथक। इसकी प्राप्ति के लिये सम्पादक, नाम माहात्मय, वृन्दावन, यू.पी. को लिखना चाहिये
मैनेजर - अखण्ड ज्योति, कार्यालय- मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-January
अपने इन असंख्य प्रेमी पाठकों के लिये अलग अलग पत्र भेजने के लिये हमारे पास पैसे नहीं है अतएव इन पंक्तियों द्वारा ही अपनी हार्दिक मृतलता प्रकट करते है और उनसे यही अनुरोध करते हैं कि धर्म प्रचार का यह कार्य जितना हमारा है उतना ही हर एक प्रेमी का है इसलिये इसके विचार के लिये यह आवश्यक है कि हमारा हरएक शुभचिन्तक ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठक बढ़ाने के लिये सच्चे हृदय से परिश्रम करें
अपने हर ग्राहक और प्रेमी से अखण्ड ज्योति आशा करती है कि वह अपना कर्तव्य धर्म समझ कर अखंड ज्योति के एक दो ग्राहक अवश्य बना दें
निम्न महानुभावों ने इस मास कुछ नये ग्राहक बनाकर हमारे पुनीत कार्य में हाथ बंटाया है, इसके लिए अखण्ड ज्योति विशेष रूप से कृतज्ञता प्रकट करती है
‘अखण्ड ज्योति’ का उद्देश्य मनुष्य समाज में सदाचार, धर्म निष्ठा, भ्रातृ भाव और सुख शान्ति के विचारों का प्रचार करना है। मनुष्य सम्राटों का सम्राट परमात्मा का उत्तराधिकारी-राजकुमार है। उसकी शक्ति महान है
कुँवर सज्जनसिंह भटनागर, पं॰ नारायणप्रसाद ‘उज्वल हकीम गणपतराय’ श्री॰ प्रेमरत्न मूँधड़ा, पं॰ हनुमान प्रसाद ‘कुसुम’, श्री गुरु चरण जी आदि युवक, बाबू राजनारायण जी श्रीवास्तव, स्वामी मुरलीधर जी जिज्ञासु, श्री॰ परशुराम जी शाण्डिल्य, कविराज सिद्धगोपाल जी श्रेष्ठ, श्री॰ जी॰ एन॰ सोलंकी आदि ने अनेक ग्राहक बढ़ाये हैं और आगे भी विशेष प्रयत्न करने का वचन दिया है। श्रीमान पं॰ श्रीकान्त शास्त्री, योगिराज उमेशन्द जी, पं॰ शिवनारायण जी, आचार्य भद्रसेन, वालन, सावित्री देवी तिवारी, बहिन कमला-सिंधी, बहिन गिराजा देवी, श्री॰ बी॰ डी॰ ऋषि, प्रो॰ चक्रवर्ती, पं॰ जगन्नाथप्रसाद दोसा, डॉक्टर शिवरतनलाल त्रिपाठी, मास्टर उमादत्त, पं॰ भोजराज जी शुल्क, पं॰ प्रेमनारायण शर्मा, श्री॰ धूमसिंह जी वर्मा आदि विद्वान् लेखकों ने बड़ी ही सुन्दर रचनाओं से अखण्ड ज्योति को सजाया है। हमारे पास शब्द नहीं है कि जिनसे इनके प्रति कुछ कह सकें। कई और भी महानुभाव आर्थिक सहायता करना चाहते हैं
किन्तु जिस प्रकार एक सिंह का बच्चा भेड़ों के साथ रहकर अपने को भेड़ समझने लगा था वही दशा माया के संसर्ग से मनुष्य की हुई है। अखण्ड ज्योति का मिशन है कि हर सिंह अपने वास्तविक स्वरूप को जाने और अपने अधिकारों का दावा पेश करें
नये वर्ष के उपलक्ष में अखण्ड ज्योति के असंख्य प्रेमी पाठकों के पत्र हमें प्राप्त हुए हैं, जिसमें उन्होंने उसके अमूल्य ज्ञान भण्डार, हमारे पवित्र मिशन और अब तक के किये गये कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अनेकों ने अपने निजी अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया है कि इस पत्रिका ने एक वर्ष में ही उनके जीवन को बदल कर बिलकुल दूसरे मार्ग पर लगा दिया। वे इस पत्रिका में ईश्वरीय संदेश देखते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-August
गत मास ऐसी विज्ञप्ति प्रकाशित की गई थी कि “अखण्ड ज्योति” में शिक्षाप्रद कथाएं और महापुरुषों के दिव्य वचन विशेष रूप से रहा करेंगे और आध्यात्मिक साधनाओं की शिक्षा पुस्तकों द्वारा दी जाया करेगी। ” इस परिवर्तन का कारण यह था कि सर्व साधारण की रुचि के साथ आध्यात्मिक तत्वों को मिला देने से हमारा उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा और पत्रिका का प्रचार भी पर्याप्त होगा। देखा जाता है कि जिस अंक में कथाएं अधिक रहती हैं, उसकी माँग बहुत बढ़ जाती है
इस समय तो संसार के सैकड़ों प्रसिद्ध व्यक्ति जिनमें हमारे देश के आध्यात्म ज्ञान के विख्यात ज्ञाता श्री अरविन्द घोष तक सम्मिलित हैं, शीघ्र ही युग परिवर्तन होने का समर्थन कर रहे हैं। उनके विचार जुलाई की ‘अखण्ड ज्योति’ में ही मौजूद हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
अक्सर हमारे पास पाठकों के ऐसे पत्र आते रहते हैं, जिनमें अखण्ड ज्योति के पृष्ठ बढ़ाने और अच्छा कागज लगाने की सलाह होती है। उन्हें कागज की महंगाई के सम्बन्ध में साप्ताहिक स्वराज्य के 22 अप्रैल के अंक में प्रकाशित एक विज्ञप्ति से कुछ अनुभव हो जायेगा। वह विज्ञप्ति यह है—
दादी अंधी हो गई थी, डॉक्टर ने उसके नेत्र ठीक कर दिये हैं। हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति घर में बरकत लाई है
पिछले कई वर्षों से बहुत नुकसान था, किन्तु अब स्थिति बदल गई है। पिताजी कहा करते हैं, अखण्ड ज्योति गंगाजी के समान पूजनीय है, यह ऋद्धि- सिद्धि देने वाली है वे सब घर वालों को इकट्ठा करके संध्या समय इसके कुछ पन्ने पढ़ कर सुनाया करते हैं
(इसी मास अखण्ड ज्योति कार्यालय से प्रकाशित ‘स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या’ के कुछ पृष्ठ)
मेरे एक ताऊ हैं, जिनसे कई प्रकार के प्रश्न पूछा करता हूँ और वे यथाशक्ति सब का उत्तर दे दिया करते थे, परन्तु जब से मैंने “अखण्ड ज्योति” मंगानी शुरू की-उनके उत्तरों में बड़ा भारी परिवर्तन हो गया है। अब मैं जब कभी उन से कोई प्रश्न पूछ बैठता हूँ तो वे झट कह दिया करते हैं—”अखण्ड ज्योति” के फैलाने अंक में क्यों नहीं देख लेते?” और जब मैं सचमुच उस अंक को उठाता हूँ तो मेरे सामने शान्तसाद उत्तरों का ताँता सा बँध जाता है। अब मेरे ताऊ को प्रश्नों का उत्तर देने से भी मुक्ति मिल गई है
नहीं तो इस साल जितनी आपत्तियाँ मुझ पर पड़ीं और कोई होता तो न मालूम क्या करता। मैं अखण्ड ज्योति को अपना परम गुरु मान कर वन्दना करता हूँ
मेरे पति और पाँच वर्षीय एक मात्र पुत्र को भी हैजा हुआ था पर वे अच्छे हो गये। मैं समझती हूँ कि अखण्ड ज्योति द्वारा हमारे हृदयों में जो धर्म का अंकुर उद्भव हुआ है, उसी की कृपा से हम लोगों की रक्षा हुई है
मेरा स्वभाव कुछ खिन्न सा ही रहा करता था, लेकिन जब से “अखण्ड ज्योति” पढ़ता रहा हूँ तब से मुझ में विशेष परिवर्तन हो रहा है
अखण्ड ज्योति के पठन से अथवा भगवान की दया से प्रभु में विश्वास अखण्ड हो गया है, इससे साहस की वृद्धि हुई। नहीं तो इस साल जितनी आपत्तियाँ मुझ पर पड़ीं और कोई होता तो न मालूम क्या करता। मैं अखण्ड ज्योति को अपना परम गुरु मान कर वन्दना करता हूँ
मेरे एक ताऊ हैं, जिनसे कई प्रकार के प्रश्न पूछा करता हूँ और वे यथाशक्ति सब का उत्तर दे दिया करते थे, परन्तु जब से मैंने “अखण्ड ज्योति” मंगानी शुरू की-उनके उत्तरों में बड़ा भारी परिवर्तन हो गया है। अब मैं जब कभी उन से कोई प्रश्न पूछ बैठता हूँ तो वे झट कह दिया करते हैं—”अखण्ड ज्योति” के फैलाने अंक में क्यों नहीं देख लेते?” और जब मैं सचमुच उस अंक को उठाता हूँ तो मेरे सामने शान्तसाद उत्तरों का ताँता सा बँध जाता है। अब मेरे ताऊ को प्रश्नों का उत्तर देने से भी मुक्ति मिल गई है। ”
अखण्ड ज्योति पढ़ने से बुद्धि में बड़ी सात्विकता आ गई है। मन हर घड़ी प्रसन्न रहता है। साथी पूछते रहते हैं कि आजकल तुम्हें क्या मिल गया है? मैं उत्तर देता हूँ कि मैंने एक निःस्वार्थ और सच्चा सहायक मित्र प्राप्त कर लिया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-July
‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय में निरन्तर कई-कई पत्र ऐसे आते रहते हैं, जिनमें पाठक अपने लिए कोई साधना मार्ग निर्धारित करने के सम्बन्ध में हमारी सम्मति चाहतें हैं। इनमें से अलग-अलग जिज्ञासुओं को उनकी स्थिति के अनुसार पृथक-पृथक सम्मति देनी पड़ती है, फिर भी दो साधन ऐसे हैं जो समान रूप से सब के लिए उपयोगी हैं, और बाल वृद्ध, स्त्री पुरुष सभी के लिए इनका पालन करना सरल, सरस और सुन्दर है। साथ ही फल की दृष्टि से भी यह इतने ही महत्वपूर्ण है जितने कि अन्य कठोर साधन
मैंने हिसाब लगाया तो हर पुस्तक पर कोई 45 या 50 की लागत चित्र खर्च समेत बैठती है। अखण्ड ज्योति के प्रेमियों से जोरदार प्रार्थना है कि जिन्हें ईश्वर प्रेरणा करे वे एक पुस्तक का खर्च स्वयं दे सकें तो स्वयं, अन्यथा कई मित्र मिल कर इकठ्ठा करें। और जिस महापुरुष की नीति से प्रेम है उनके अभिवचनों की एक पुस्तक प्रकाशित करा दें साथ ही प्रकाशित कराने वाले महानुभाव अपने चित्र उस पुस्तक में छपाने के लिये अपना फोटो भेज दें। ज्ञान प्रचार कार्य में यह सहयोग करना मेरी दृष्टि में एक अनूठा पुण्य है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
एक छोटे से आठ दस रुपये किराये के कमरे में रखे हुए कार्यालय में एक व्यक्ति द्वारा इतना कार्य कैसे होता है? यह ईश्वर ही जाने। भारतवर्ष के एक कौने से दूसरे कौने तक, समुद्र पार अनेक देशों में, अखण्ड ज्योति की पहुँच कैसे हुई? इसका संदेश इतनी दूर-दूर कैसे पहुँचा? ऐसे कृपालु और सहयोगियों की संख्या इतनी तेजी से कौन बढ़ा रहा हैं? लेखों को दिन-दिन इतना अधिक गंभीर ज्ञानमय कौन बनाता जा रहा है? इन प्रश्नों का हमारे पास कोई उत्तर नहीं है, क्योंकि इस नटनागर की पुण्य भूमि मथुरा नगरी में एक अदृश्य सत्ता के अतिरिक्त और कोई अपना सहायक दिखाई नहीं पड़ता। आध्यात्मिक जिज्ञासाओं से भरी हुई तीस तीस चिट्ठियों का विस्तृत और संतोषजनक उत्तर प्रतिदिन कौन लिखता है? हमें यह कहने का साहस नहीं होता कि ‘हमारे हाथ’ क्योंकि इतने अक्षर तो ये तीन दिन में भी नहीं लिख सकते थे। अखण्ड ज्योति की पाठक सामग्री, पुस्तकों का रचना कार्य, पत्र व्यवहार, यह हमारा सब कार्य एक दिन एक धुरंधर साहित्यिक ने यहाँ आकर देखा था और हिसाब लगा कर बताया था कि इतना कार्य कम से कम पाँच आदमी मिलकर ही कर सकते हैं
वर्तमान युग की यह वाणी, कर्म और ज्ञान का संदेश, मृत समाज के कानों में सुनाने के लिए यह अखण्ड ज्योति-छोटी सी अग्रदूती प्रकट हुई थी। इन दो वर्षों के इसकी सफलता पर दृष्टिपात करते हुए अब हमें पूरा पूरा विश्वास हो गया है कि हमारे अन्तःकरण की गुनगुनाहट कोई भ्रम नहीं था, वरन् निश्चित रूप से प्रभु का निर्देश था। इस थोड़े समय में, इस छोटी सी शक्ति द्वारा प्रभु ने जितना काम कराया, वह हमें तो एक चमत्कार की तरह प्रतीत होता है
इस थोड़े समय में, इस छोटी सी शक्ति द्वारा प्रभु ने जितना काम कराया, वह हमें तो एक चमत्कार की तरह प्रतीत होता है। जितनी अधिक संख्या में इसके पाठक हैं, उसे देखते हुए एक विद्वान ने कहा था कि भारत के समस्त धार्मिक पत्रों में ‘कल्याण’ के बाद ‘अखण्ड ज्योति’ का ही दूसरा नम्बर है। हमारे पास न तो प्रचार के साधन हैं, न पैसा, योग्यता, न सहायक, न कर्मचारी। एक छोटे से आठ दस रुपये किराये के कमरे में रखे हुए कार्यालय में एक व्यक्ति द्वारा इतना कार्य कैसे होता है? यह ईश्वर ही जाने
हमारी आँखों ने देखा है कि हजारों व्यक्तियों की जीवन दिशा में इस प्रयत्न से आमूल चूल परिवर्तन हो गया है और लाखों करोड़ों के हृदयों में ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रचारित कराई गई ईश्वरीय भावनाएं हाहाकारी स्पंदन कर रही हैं। अगणित ‘आत्माएं’ इन प्रश्नों की ओर आकर्षित हुई हैं कि हम क्या हैं? क्यों आये हैं? क्या कर्तव्य हैं? क्या कर रहे हैं? और क्या करना चाहिए? आने वाला सत्युग आकाश में घुमड़ रहा है, अखण्ड ज्योति उसकी एक गड़गड़ाहट मात्र है
-मैनेजर अखण्ड ज्योति
(अखण्ड ज्योति कार्यालय से प्रकाशित ‘धनवान बनने के गुप्त रहस्य’ पुस्तक के कुछ पृष्ठ)
अखण्ड ज्योति जब से हमारे घर में आई है। सब प्रकार के कलश-कलह मिट गये हैं। हमारे परिवार में कई व्यक्ति हैं
हम अपनी अयोग्यताओं को भी जानते थे। इस पर भी हटात् ‘अखण्ड ज्योति’ निकाल ही दी। तर्कें कहती थीं कि - ‘ठहरो। ’ प्रेरक कहता था कि - ‘निमित्त मात्र भव सव्यसाचिन्’ हे अर्जुन, तू तो निमित्त मात्र बन जा
आध्यात्मिक जिज्ञासाओं से भरी हुई तीस तीस चिट्ठियों का विस्तृत और संतोषजनक उत्तर प्रतिदिन कौन लिखता है? हमें यह कहने का साहस नहीं होता कि ‘हमारे हाथ’ क्योंकि इतने अक्षर तो ये तीन दिन में भी नहीं लिख सकते थे। अखण्ड ज्योति की पाठक सामग्री, पुस्तकों का रचना कार्य, पत्र व्यवहार, यह हमारा सब कार्य एक दिन एक धुरंधर साहित्यिक ने यहाँ आकर देखा था और हिसाब लगा कर बताया था कि इतना कार्य कम से कम पाँच आदमी मिलकर ही कर सकते हैं। जितना यह प्रयत्न हो रहा है, उसके परिमाण से हजारों गुनी अधिक उद्देश्य पूर्ति हो रही है। हमारी आँखों ने देखा है कि हजारों व्यक्तियों की जीवन दिशा में इस प्रयत्न से आमूल चूल परिवर्तन हो गया है और लाखों करोड़ों के हृदयों में ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रचारित कराई गई ईश्वरीय भावनाएं हाहाकारी स्पंदन कर रही हैं
जितना यह प्रयत्न हो रहा है, उसके परिमाण से हजारों गुनी अधिक उद्देश्य पूर्ति हो रही है। हमारी आँखों ने देखा है कि हजारों व्यक्तियों की जीवन दिशा में इस प्रयत्न से आमूल चूल परिवर्तन हो गया है और लाखों करोड़ों के हृदयों में ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रचारित कराई गई ईश्वरीय भावनाएं हाहाकारी स्पंदन कर रही हैं। अगणित ‘आत्माएं’ इन प्रश्नों की ओर आकर्षित हुई हैं कि हम क्या हैं? क्यों आये हैं? क्या कर्तव्य हैं? क्या कर रहे हैं? और क्या करना चाहिए? आने वाला सत्युग आकाश में घुमड़ रहा है, अखण्ड ज्योति उसकी एक गड़गड़ाहट मात्र है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
‘अखण्ड ज्योति’ के कुछ अमूल्य रत्न
अखण्ड ज्योति द्वारा ‘सद् ज्ञान ग्रंथमाला’ नामक एक पुस्तकमाला का प्रकाशन भी आरम्भ हो गया है। इस योजना के अनुसार ऐसे ग्रन्थ रत्न प्रकाशित किये जाएंगे जो मानव जीवन में एक नवीन क्रान्ति उपस्थित करते हैं। जिस अलभ्य ज्ञान के लिये जीवन का बहुत बड़ा भाग तलाश और अभ्यास में लगाना पड़ता है, उसे वैज्ञानिक ढंग से सुगम तरीकों द्वारा समझाया जाता है और पुस्तक प्रकाशन से पूर्व उस विषय को पूरी तरह से अनुभव एवं परीक्षा की कसौटी पर कस लिया जाता है
ज्योति अखण्ड जला दो॥
मैंने सितम्बर मास के अखण्ड ज्योति में ‘दीर्घायु होने के उपाय’ शीर्षक लेख में प्राणायाम की सुगम विधि बतलाने को लिखा था, अतएव आज मैं पाठकों को प्राणायाम की ऐसी सुगम क्रिया बतलाना चाहता हूँ, जिसके नियम पूर्वक करने से विशेष लाभ होगा। यह वचन माननीय है कि बिना गुरु के किसी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होती, परन्तु श्रद्धा, विश्वास तथा साहस और उत्साह से भी कभी-2 कार्य सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार एकलव्य नामक भील ने गुरु द्रोणाचार्य की मृत्तिका मूर्ति अपने सन्मुख रख कर श्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक उस मूर्ति में गुरु द्रोणाचार्य की भावना करके अर्चन वन्दन करते हुए धनुर्विद्या में सफलता प्राप्त कर ली थी, जिसके सन्मुख श्रीकृष्ण भगवान के सखा तथा भक्त अर्जुन को उसके सन्मुख नत मस्तक होना पड़ा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
(5) अखण्ड ज्योति प्रति मास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। अपने यहाँ से दो बार जाँच कर ग्राहकों के पास भेजा जाता है। परन्तु कभी-कभी डाकखाने की गड़बड़ी से अंक पाठकों को नहीं मिलते
अखण्ड ज्योति परिवार में अब तक जो ज्ञान संपादन हुआ है, उसमें से सर्व साधारण में प्रचारित योग्य जितना उपयोगी है, उसे पुस्तकाकार में प्रकाशित करने का निश्चय किया गया है। लड़ाई के कारण कागज आदि के दाम तीन गुने बढ़ गये हैं। फिर भी पुस्तकों का मूल्य जहाँ तक हो सका है, कम ही रखा गया है
अखण्ड ज्योति के ज्ञान प्रसार कार्य में सहयोग देना धर्म कर्त्तव्य समझ कर इस मास निम्न महानुभावों ने ग्राहक बढ़ाने का विशेष प्रयत्न किया है। इन सज्जनों के प्रति अखण्ड ज्योति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करती है—
मैनेजर—अखण्ड ज्योति, मथुरा
(4) अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए भी ग्राहक नहीं बनाये जाते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
’ आइए, जरा इस विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार करें। अखण्ड ज्योति के पाठक बहुत दिनों से यह सुनते आ रहे हैं, कि मनुष्य में जो कुछ भी चेतना शक्ति है, वह आत्मा के द्वारा ही प्राप्त होती है। यह समस्त सत्ताओं का केन्द्र है। हमारी भौतिक योग्यताएं भी उस आध्यात्मिक केन्द्र से आविर्भूत होती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
जहाँ अभी तक व्यवस्था नहीं है। वहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका पहुंचाने की व्यवस्था कर ली जानी चाहिये। ‘अखण्ड-ज्योति’ का नये वर्ष का चंदा भेजते समय साथ ही ‘युग-निर्माण’का चन्दा भेजने की बात का भी स्मरण रक्खा जाना चाहिए। पत्रिका के नये ग्राहक बढ़ाते समय युग-निर्माण की भी पाठक संख्या बढ़ती रहे, ऐसी चेष्टा करते रहना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
—रजत जयन्ती के हर्षोत्सव को युग-निर्माण प्रेरणा का पुण्य पर्व मानकर भावना एवं श्रद्धापूर्वक मनाने वाले अपने परिजनों के प्रति “अखण्ड ज्योति” अपना आन्तरिक आभार प्रकट करती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
त्रिविधि प्रशिक्षण योजना के समाचार से अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य में प्रसन्नता और उत्साह की लहर दौड़ गई है। इस मास जितने पत्र आये हैं, उनसे यही स्पष्ट हुआ है कि अधिकाँश परिजनों ने अपने लिए इसे सौभाग्य ही माना है और उपलब्ध सुअवसर से सम्भवतः लाभ प्राप्त करने का निश्चय किया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
शिक्षा प्रसार राष्ट्र - निर्माण का आवश्यक अंग है। उसे बढ़ाने के लिए अखण्ड ज्योति परिवारों ने मिलजुल कर अपने - अपने ढंग से कार्य आरम्भ किए हैं। गुरु पूर्णिमा से इन प्रयासों में दूनी तेजी आई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
एक मास की जीवन निर्माण शिक्षा में सम्मिलित होने के लिए एक खुला निमन्त्रण इन पंक्तियों द्वारा अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों के सम्मुख उपस्थित है, जिन्हें सुविधा हो वे इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर सकते हैं
अखण्ड ज्योति विचार पत्रिका है। उसके द्वारा स्वाध्याय और सत्संग की महान आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। इतना बड़ा कार्य वह करती है कि दूसरे अन्य प्रयोजनों की आशा उससे नहीं की जा सकती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
अखण्ड-ज्योति परिवार को यदि ठीक ढंग से संगठित कर लिया जाय तो प्रबुद्ध वर्ग का यह विशाल जन-समुदाय राष्ट्र की एक महती रचनात्मक शक्ति बन सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस अखण्ड ज्योति सदस्यों के संगठन को एक शाखा और उसके प्रमुख कार्यकर्ता को शाखा संचालक माने जाने की पद्धति बना दी गई है। इस प्रक्रिया के अनुसार आधे से अधिक सदस्य संगठित हो चुके हैं। जो शेष हैं उन्हें अपना संगठन-प्रयोजन पूरा कर लेना चाहिये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
किया यह जाना चाहिए कि जहाँ जितने अखण्ड ज्योति के सदस्य हैं, वे दस-दस के छोटे संगठनों से संगठित हो जायं। इनका एक शाखा संचालक हो। प्रत्येक शाखा संचालक अपने संबंधित दसों अखण्ड-ज्योति सदस्यों के घर आने-जाने का क्रम बनाये रखें और यह देखें कि उस परिवार के सब सदस्यों को पत्रिका के पढ़ने सुनने का लाभ मिलता है या नहीं
अभीष्ट लक्ष की पूर्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि वर्तमान अखण्ड ज्योति के पाठक पत्रिका को श्रद्धापूर्वक आद्यापान्त पढ़ें उस पर मनन चिन्तन करें और घर के प्रत्येक सदस्य को उस विचारधारा के संपर्क में लावें। यह प्रक्रिया ठीक प्रकार चलती है या नहीं, इसके लिए भी सक्रिय कार्यकर्ताओं को, शाखा संचालकों को, अपने कंधे पर ही उत्तरदायित्व वहन करना पड़ेगा। प्रगति के लिए इस विधि-व्यवस्था को कार्यान्वित किये बिना और किसी प्रकार काम न चलेगा
तभी तो उसके सत्परिणामों को प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकेगा। अब अखण्ड ज्योति परिवार के सामने वही स्थिति आ उपस्थित हुई है कि जो कुछ पच्चीस वर्ष में सीखा गया है उसे कार्य रूप में परिणत किया जाय
अखण्ड ज्योति के माध्यम से, पुस्तकों से, पत्र व्यवहार से तथा वाणी से पिछले पच्चीस वर्षों से धर्म, ज्ञान, नीति सदाचार का यथासंभव प्रचार किया जा रहा है। संस्कारवान व्यक्तियों पर उसका प्रभाव ही पड़ा है और एक सीमा तक सन्तोषप्रद सफलता भी मिली है। लाखों व्यक्तियों की जीवन दिशा बदली है और वे कुछ से कुछ बने हैं
जातीय संगठनों की रूपरेखा गत अंक में बताई जा चुकी है। विवरण और परिचय फार्म के आधार पर जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनके अनुसार अखण्ड ज्योति परिवार के सभी सदस्यों को चार वर्णों में विभाजित करके उनके स्वतंत्र संगठन बना इनका प्रबंध कर रहा है। इन संगठनों का कार्य अपने-अपने वर्णों में कर्त्तव्य भावना उत्पन्न करके सर्वांगीण श्रेष्ठता उत्पन्न करना होगा। यह संगठन स्वतंत्र रूप में विकसित होंगे और अपने वर्ण के धर्म कर्त्तव्यों को हृदयंगम कराने एवं व्यवहार में प्रचलित करने के लिये पूरी तत्परता के साथ प्रयत्न करेंगे
अखण्ड ज्योति के गत अंक में इस प्रकार के वानप्रस्थों का आह्वान किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि जागृत आत्माएं अपने शेष जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग इस आह्वान को मान कर इस प्रशिक्षण की तैयारी कर रहे हैं उनके पत्र आ रहे हैं। चुने हुये लोगों का शिक्षाक्रम जेष्ठ सुदी 15 से आरंभ किया जाना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
ता. 13 से 19 तक के रजत-जयन्ती सप्ताह में प्रायः सभी परिजनों ने कम से कम एक घण्टा और अधिक से अधिक पाँच घण्टा समय नित्य लगाकर ‘अखण्ड ज्योति’ का मिशन सफल होने के लिये ईश्वर उपासना की। लगभग आधे व्यक्ति ऐसे रहे जिनने गायत्री जप अनुष्ठान किये और अपने परिवार तथा परिचय के लोगों से कराये। शेष आधे लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप उपासना इसी उद्देश्य के लिए की
रजत-जयन्ती को साधारण धर्मोत्सव का रूप न देकर उसे युग निर्माण आन्दोलन की नव जीवन संचार की पुण्य प्रक्रिया का रूप दिया गया यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। हर्षोत्सव आये दिन मनाये जाते रहते है पर उनका मूल्य तात्कालिक मनोरंजन एवं प्रसन्नता की अभिव्यक्ति मात्र होती हुई ‘अखण्ड ज्योति’ की रजत-जयन्ती का स्वरूप बिखरा हुआ रहा, किसी एक स्थान पर बहुत बड़ा सम्मेलन समारोह नहीं हुआ, फिर भी उसके माध्यम से जो ठोस कार्य बन पड़ा वह भारी से भारी उत्सव द्वारा भी संभव न था। इस दृष्टि से इस आयोजन को पूर्ण सफल माना जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-March
पता ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
नित्य कर्म की भाँति होने वाले होम, अमावस्या, पूर्णिमा को होने वाली इष्टियाँ, विशेष अवसरों पर होने वाले विशिष्ट यज्ञों का क्या महत्व है? इसका वर्णन पाठक ‘अखण्ड ज्योति’ के पिछले अंक में पढ़ चुके हैं। अपनी स्थिति एवं भावना के अनुसार उनको करने के लिए हमें व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से प्रयत्न करते रहना चाहिए ताकि विश्व का सूक्ष्म वातावरण शुद्ध हो। वायु शुद्धि तो यज्ञों द्वारा आहुतियों एवं सामग्रियों के अनुपालन से एक सीमित मात्रा में ही होती है पर वेदमंत्रों के उच्चारण एवं यज्ञ की अत्यन्त रहस्यमयी प्रक्रियाओं द्वारा संसार का वह सूक्ष्म वातावरण जिसमें विचारों एवं भावनाओं का निवास है- शुद्ध होता है और उस शुद्धि के अनुसार सर्वत्र फैले हुए वासना, लोभ, स्वार्थ, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, छल, अनीति आदि के कुविचारों का समाधान होकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है जिनमें जन साधारण के मस्तिष्क शाँत, स्वस्थ एवं सतोगुणी रहें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-April
पता- ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस मथुरा
बाहर से आने वाले सज्जनों को ता0 15 की शाम को ही आ जाना चाहिए ताकि ता0 16 को प्रातः काल यज्ञ में सम्मिलित हो सकें। अखण्ड ज्योति प्रेस, घीयामंडी रोड़ पर है। गायत्री तपोभूमि मथुरा से वृन्दावन जाने वाली सड़क पर मथुरा से 1 मील दूर है रेलवे स्टेशन से सीधा तपोभूमि ही पहुंचना चाहिये। ठहरने की व्यवस्था प्रायः सभी की वहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
अखण्ड ज्योति का यह अंक जिन दिनों पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, उन्हीं दिनों साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ का वह प्रथम सत्र का लगभग 60 छात्रों की शिक्षा आयोजन के साथ आरम्भ हो रहा होगा। देखने में यह कार्य छोटा सा है पर राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण बीजाँकुर उसमें छिपे हैं। आज कौन जानता है कि माता इस छोटे से माध्यम द्वारा कितना बड़ा कार्य सम्पादन करने का आयोजन कर रही है
उसकी पूर्ति करना हम सब का परम पवित्र उत्तरदायित्व है। अपने परिचितों एवं मित्रों को अखण्ड ज्योति का सदस्य बनाकर गायत्री साहित्य पड़ने के लिये प्रोत्साहन देकर हमें उस कर्त्तव्य की पूर्ति में हमें योग देना और गायत्री का प्रचार भी आवश्यक धार्मिक कृत्य है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
अब नये युग का सूत्रपात करने के लिये आत्म-त्यागी, आत्म-बलिदानी सच्चे साधु कर्मवीरों की आवश्यकता है। पिछले दो तीन अंकों में अखण्ड ज्योति द्वारा इस संस्था की यही पुकार उद्घोषित की जा रही है। नरमेध का अर्थ ऐसे ही पुनीत कार्यों के लिये अपने जीवन को समर्पण करना है। इस कसौटी पर अपने आपको कसवाने में लोगों को झिझक लगती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
जुलाई की ‘अखण्ड ज्योति’ में तत्वदर्शियों, समाज-शास्त्रियों और सूक्ष्म दृष्टाओं की महत्वपूर्ण अनुभूतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। उन्हें किसी साधारण ज्योतिषी की अटकल या भविष्यवाणी नहीं समझा जाना चाहिए। वे अगले दिनों घटित होने वाली सुनिश्चित सम्भावनाएं हैं, जिन्हें हम एक-एक करके मूर्तिमान होते हुए यथा समय देखते चले जायेंगे
समाज की एक महती सेवा के लिये- अखण्ड ज्योति परिजनों को- ‘झोला पुस्तकालय’ चलाने के लिये अनुरोध किया गया है। इस युग का यह सबसे बड़ा परमार्थ है। विचारों में उत्कृष्टता उत्पन्न करना मानव प्राणी की सबसे बड़ी सेवा है
युग-परिवर्तन, व्यक्ति-परिवर्तन से आरम्भ होता है। ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रबुद्ध परिजनों में से प्रत्येक को हर दिन, हर घड़ी यह प्रश्न करना चाहिये कि क्या इस प्रकार का प्रकाश और उत्साह अपने भीतर उत्पन्न होने लगा है। यदि हाँ तो समझना चाहिए कि अपनी गणना महाकाल के देव पार्षदों में होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। तब हम अपना ही नहीं इस विश्व वसुन्धरा की सुरक्षा और सुन्दरता बढ़ाने का शाश्वत श्रेय प्राप्त करेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
पता-युग-निर्माण योजना (अखण्ड ज्योति संस्थान)
यह रुचि पैदा करना अपना काम है। चाय और बीड़ी के प्रचारकों के अपने प्रबल प्रयत्नों ने इन गन्दी चीजों को जन-जीवन का अंग बना दिया तो क्या हम ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रबुद्ध परिजन ऐसी जन-रुचि उत्पन्न नहीं कर सकते जिसे आधार पर सर्वसाधारण के मस्तिष्क एवं अन्तःकरण उलट-पुलट कर रखे जा सकें? यह संभव है और सर्वथा सरल है। युग की माँग यही है। आवश्यकता केवल हमारे थोड़े से त्याग और थोड़े से साहस की है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-July
अब इस शताब्दी का चतुर्थ चरण समीप आ चला है, तो हमारा विश्वास है कि अन्तिम संघर्ष होकर नवयुग का कार्य प्रत्यक्ष रूप से आरम्भ हो आयेगा। इस दृष्टि से ‘अखण्ड ज्योति’ का युग निर्माण आन्दोलन भी विशेष महत्व रखता है। यह भारतीय जनता को नवयुग आगमन तथा उसके उपयुक्त बनने की प्रेरणा दे रहा है। क्योंकि अगर नवयुग आ गया और हम पुराने दोषों, समय के विपरीत मान्यताओं में ही ग्रस्त रहे तो उससे कुछ भी लाभ उठा सकेंगे
‘अखण्ड ज्योति के इस भविष्यवाणी अंक में निकट भविष्य में घटित होने वाले घटना क्रम का जो उल्लेख किया गया है। उसे किसी साधारण ज्योतिषी या भविष्य-वक्ता की कल्पना नहीं समझा जाना चाहिये। इसके पीछे कुछ ठोस आधार हैं और वे समयानुसार सामने आते चले जायेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू इन छः भाषाओं को प्रथम हाथ में लिया है। जिन्हें इनका अच्छा ज्ञान हो वे कोई भी अखण्ड ज्योति का एक लेख अनुवाद करके भेज दें। उसी को देख कर उन्हें आगे शुरू करने के लिये अनुरोध किया जायेगा
समझना, समझाना विवेकशील लोगों के लिये ही संभव होता है। सो अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमने 28 वर्ष के परिश्रम के बाद इसी दृष्टि से किया है कि प्रबुद्ध आत्माएं बदलते युग के अनुरूप अपने कर्त्तव्य धर्म को पहचाने और भी महत्वपूर्ण घड़ियों का विवेकशील लोग जिस तरह उपयोग किया करते हैं वैसे ही वे भी करें
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
सृष्टि के आदि से लेकर अब तक समय-समय पर ऋषियों ने इस त्रिविधि साधना का-विभिन्न विधि विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि और समाज की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, मार्ग-दर्शन किया है। आज की स्थिति के अनुरूप-अखण्ड ज्योति परिवार के -आज के साधक वर्ग के लिये -उपयोगी क्रिया विधान प्रस्तुत है
गत मास अखण्ड ज्योति परिजनों की जन्म तिथि पूछी गई थी। उसका उद्देश्य जन्म दिन प्रथा का प्रचलन करना ही था-कोई ज्योतिष जन्मपत्री वर्षफल आदि जैसी बात उसमें नहीं थी। जन्म-दिन मनुष्य जीवन की महत्ता एवं दिशा के समझने समझाने का सबसे महत्वपूर्ण दिन है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-October
आगामी कुछ ही वर्षों में संसार में एक भयानक उथल-पुथल होने जा रही है। इसकी एक हल्की झाँकी जैसी चर्चा जुलाई की अखण्ड ज्योति में की जा चुकी है। इस उथल-पुथल में भौतिक दृष्टि से कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होने की सम्भावना है जिनमें मनुष्य जाति के कष्टों में अभिवृद्धि हो और उस प्रताड़ना से प्रभावित मनुष्य यह विचारने को विवश हो कि उस राह पर नहीं चला गया, जिस पर चलना चाहिए था। अनीति अन्ततः हानिकारक होती है, इतनी छोटी सी शिक्षा यदि लोग स्मरण रख सके और अपना सके होते तो प्रकृति को कुपित होकर अपना रुद्र रूप न धारण करना पड़ता और असंख्यों को जो अगणित कष्ट भोगने के लिए बाध्य होना होता है उसकी आवश्यकता न पड़ती
इसी औचित्य का उद्बोधन इस रहस्योद्घाटन का लक्ष्य है। अगला समय कैसा आयेगा उससे बदली हुई रीति-नीति किस प्रकार की होगी, इसकी चर्चा अगले अंक में- नवम्बर की अखण्ड ज्योति में परिजन देख सकेंगे। अच्छा हो कि हम अपने को और दूसरों को उसी दिशा में झुकाने की और महाकाल की क्रिया पद्धति में अनुकूलता उत्पन्न करने की चेष्टा करें
जो अवश्यम्भावी है, जो उचित है उसके अनुकूल चलना ही ठीक है। ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार में यही रीति-नीति अपनाने का अभ्यास डालने के लिये शत सूत्री युग निर्माण योजना का आविर्भाव हुआ है। उस आचार संहिता को अपना कर अपने भावना स्तर और क्रिया कलाप को उस प्रकार का छोर दिया जा सकता है जो नव युग में हर किसी को शिरोधार्य-स्वीकार करना पड़ेगा। परमार्थ में रुचि बढ़े, लोक मंगल में कुछ श्रम, समय लगे तो धीरे-धीरे उस प्रकार का अभ्यास हो जायगा, जो नव युग के अनुरूप, अनुकूल है
यहाँ यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिये कि इस परिवर्तन प्रक्रिया की अभीष्ट पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गई है। उनमें से बहुत कुछ को अखण्ड ज्योति परिवार के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो बाहर हैं वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। यों देखने में हम लोग एक साधारण स्तर का जीवन जीते हैं और बाहर से कोई विशेषता अपने अन्दर दिखाई नहीं पड़ती, फिर भी “परमार्थ प्रयोजनों के लिये बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा” एक ऐसा तत्व है जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं
जून की ‘अखण्ड ज्योति’ के “महाकाल और उसका प्रत्यावर्तन” लेख में ऐसी ही कतिपय उदाहरणों की चर्चा की जा चुकी है। राम की महिमा का श्रेय सीता और कौशल्या को कम नहीं है। कौशल्या के प्रशिक्षण तथा सीता के सहयोग को यदि हटा दिया जाय तो राम का वर्चस्व फिर कहाँ रह जायगा? सीता के बिना राम का चरित्र ही क्या रह जाता हैं
अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों में ऐसी अनेक उच्चस्तरीय आत्मायें विद्यमान हैं। वे जब कभी अपने बारे में विचार करती हैं तो उन्हें स्पष्ट विदित होता है कि वे साधारण नहीं असाधारण हैं। इन दिनों उनकी आत्मा जोरों से कोंच रही हैं और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कोई साहसपूर्ण कदम बढ़ाने के लिये जोरदार धक्के देकर विवश कर रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
स्पष्टतः युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया का श्रीगणेश शुभारम्भ करने की स्वर्ण युग के बीजारोपण की महान जिम्मेदारी अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों पर आई है। उसे महाकाल ने विचार-पूर्वक सौंपा है। अस्तु यह आवश्यक समझा गया है कि अन्तिम उद्बोधन के रूप में एक बार फिर उन सबको झकझोर कर निर्धारित दिशा में चलने के लिये तत्पर किया जाय
अखण्ड ज्योति परिवार में बड़े प्रयत्नपूर्वक लम्बी खोजबीन के उपरान्त आत्मिक पूँजी से सुसम्पन्न पूर्व जन्मों की संस्कारवान आत्माओं को एकत्रित किया गया है। वे हमारे साथ व्यक्तिगत रूप से भी चिरकाल से घनिष्ठतापूर्वक संबद्ध हैं। इनका अवतरण इस महत्वपूर्ण अवसर पर महाकाल का कुछ विशेष प्रयोजन पूर्ण करने के लिये हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
विगत गीता जयन्ती से अखण्ड ज्योति परिजनों में जिस ब्रह्म विद्यालय का शुभारंभ हुआ है, युग-परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, भले ही वह आज छोटा क्यों न दृष्टिगोचर हो। बीज छोटा होता है पर जब वह अंकुरित होकर पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है तब उसको समृद्धि का वास्तविक परिचय मिलता है। आज 4 हजार साथी सहचरों को सहायक अध्यापक बना कर प्रत्येक के द्वारा दस-दस व्यक्तियों तक नव-निमार्ण विचारधारा का प्रकाश पहुँचाने का प्रयत्न आरंभ किया गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
कोई बात समझ में न आवे तो जवाबी पत्र भेजकर पूछा जा सकता है। चार मास का सम्पूर्ण शिक्षा कोर्स पूरा कर लेने वालों के ज्ञान की परीक्षा अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा प्रश्न पत्र भेज कर ली जाती है और उत्तीर्ण छात्रों को सुन्दर चित्ताकर्षक प्रमाण पत्र दिया जाता है। वह उत्तीर्ण सज्जन अखंड ज्योति के अन्तरंग सदस्य समझे जाते हैं और उनकी सम्मति से इस संस्था का कार्य संचालन किया जाता है
कितने ही आध्यात्म प्रेमी सज्जन योग की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं पर कोई क्रमबद्ध निश्चित पाठ्यक्रम या शिक्षा व्यवस्था न मिलने से वे मन मार कर चुप बैठ जाते हैं और इस विज्ञान के महान लाभों से वंचित रह जाते हैं। इस कठिनाई को ध्यान में रख कर, सर्वसाधारण की सुविधा के लिए अखण्ड ज्योति कार्यालय ने कुछ पुस्तकें प्रकाशित की हैं, जिनका विवरण नीचे दिया जाता है। यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। वरन् जिन्होंने दीर्घकाल तक स्वयं साधनाएं की हैं, भारत वर्ष का कोना कोना जिन्होंने योगियों की तलाश में छाना है, संसार के विविध देशों और भाषाओं के अध्यात्म शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया है, उनके अनुभवों का निचोड़ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-December
सर्वोपयोगी विषयों पर सबका शिक्षण साथ-साथ होता था और व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान का शिक्षण पृथक-पृथक होता था। अखण्ड ज्योति संपादक द्वारा ही इस विद्यालय के छात्रों की शिक्षा होती थी
गत अंक में, ‘ब्रह्मणत्व और साधुता का जागरण’ तथा ‘इन प्रस्तावों पर विचार कीजिये’ शीर्षक दो लेखों में कुछ कार्यक्रम उपस्थिति किया गया था। अखण्ड ज्योति परिवार के कितनी ही उच्च आत्माओं ने उस कार्यक्रम को क्रिया रूप में सामने लाने की आवश्यकता का बड़े जोरदार शब्दों में प्रतिपादन किया है और हमें प्रेरणा है कि मथुरा में एक शिक्षण संस्था फिर चलाई जाये। हम स्वयं भी इसको अत्यन्त महत्वपूर्ण समझते हैं, तदनुसार अखण्ड ज्योति अगले वर्ष से अपने यहाँ एक शिक्षा संस्थान पुनः आरंभ करने जा रही है। इसमें निम्न कार्यक्रम होगा
अखण्ड ज्योति परिवार के कितनी ही उच्च आत्माओं ने उस कार्यक्रम को क्रिया रूप में सामने लाने की आवश्यकता का बड़े जोरदार शब्दों में प्रतिपादन किया है और हमें प्रेरणा है कि मथुरा में एक शिक्षण संस्था फिर चलाई जाये। हम स्वयं भी इसको अत्यन्त महत्वपूर्ण समझते हैं, तदनुसार अखण्ड ज्योति अगले वर्ष से अपने यहाँ एक शिक्षा संस्थान पुनः आरंभ करने जा रही है। इसमें निम्न कार्यक्रम होगा
कुछ दिन पूर्व तक अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक ‘कर्मयोगी विद्यालय’ था, जिसमें सभी श्रेणी के लोग अपने व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक, मानसिक और साँसारिक दृष्टि से सुख शान्तिमय बनाने की शिक्षा प्राप्त करने आते थे। कोई एक शिक्षा कोर्स इन सबके लिये नहीं था। छात्रों की इच्छा, आकाँक्षा और आवश्यकता के अनुरूप उनका पाठ्यक्रम एवं कार्यक्रम निश्चित किया जाता था
इससे (1) ग्राहकों को आत्म कल्याण का सुख शान्ति का मार्ग मिलता है (2) अखंड ज्योति की शक्ति बढ़ाने से वह लोक सेवा के कार्यों को अधिक मात्रा में, अधिक शीघ्रता से, अधिक सफलता के साथ पूरा करती है। इस प्रकार अखण्ड ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक स्वल्प श्रम का महान पुण्य कार्य है। इस दिशा में शक्तिभर प्रयत्न करने के लिए हम अपने पाठकों से अनुरोध करते हैं
अखण्ड ज्योति के पाठकों को कुछ आवश्यक सूचनाएं
-व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा
व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा
साथ ही जन रुचि के निर्माण के लिए समस्त ब्रह्मतत्त्वों को अखण्ड ज्योति आमंत्रित करती है। यह क्षेत्र सरकारी क्षेत्रों से भी अधिक आवश्यक, स्थायी एवं सुदृढ़ परिणाम उपस्थित करने वाला है। ब्रह्म परायण आत्माओं आओ! अपने महान धार्मिक आदर्शों को जन-जन के अन्तःकरण तक पहुँचावें और हर एक नागरिक को ऐसा सुरुचि सम्पन्न बनावें कि वह राष्ट्र की सुरक्षा में सुदृढ़ चट्टान की तरह अटूट बने और पुनर्निर्माण में उस बीज का अनुकरण करे जो अपने को जला कर एक महान वृक्ष उत्पन्न करता है
विद्यालय के नियम वही थे जो अपने घर में, घर वालों के लिये होते हैं। अखण्ड ज्योति अपने पाठकों को अपना स्वजन, कुटुम्बी मानती है, उनके लिये क्या नियम बनाये? जो नियम अखण्ड ज्योति संपादक के भाई, भतीजे, बुजुर्ग या रिश्तेदारों पर लागू होते हैं वही इन छात्रों पर भी लागू थे
अखण्ड ज्योति ऐसे अश्वमेधों के स्वर्गीय दृश्य देखने के लिये आँखें पसार-पसार कर चारों ओर देखती है और परमात्मा से प्रार्थना करती है कि प्रभु-भारतभूमि को ऐसा निर्जीव मत बनने दो कि ऋषियों की यह प्राचीन अश्वमेध परंपरा ही टूट जाय
अखण्ड ज्योति जनवरी मास में एक छोटा सा विशेषाँक या विषयाँक कई वर्षों से निकालती आ रही है। पर इस वर्ष स्थिति असाधारण है। कागज की कठिनाई ऐसी विचित्र है कि दो-दो महीने तक एक रिम नहीं मिलती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-August
कोई बात समझ में न आवे तो जवाबी पत्र भेजकर पूछा जा सकता है। चार मास का सम्पूर्ण शिक्षा कोर्स पूरा कर लेने वालों के ज्ञान की परीक्षा अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा प्रश्न पत्र भेज कर ली जाती है और उत्तीर्ण छात्रों को सुन्दर चित्ताकर्षक प्रमाण पत्र दिया जाता है। वह उत्तीर्ण सज्जन अखंड ज्योति के अन्तरंग सदस्य समझे जाते हैं और उनकी सम्मति से इस संस्था का कार्य संचालन किया जाता है
कितने ही आध्यात्म प्रेमी सज्जन योग की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं पर कोई क्रमबद्ध निश्चित पाठ्यक्रम या शिक्षा व्यवस्था न मिलने से वे मन मार कर चुप बैठ जाते हैं और इस विज्ञान के महान लाभों से वंचित रह जाते हैं। इस कठिनाई को ध्यान में रख कर, सर्वसाधारण की सुविधा के लिए अखण्ड ज्योति कार्यालय ने कुछ पुस्तकें प्रकाशित की हैं, जिनका विवरण नीचे दिया जाता है। यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। वरन् जिन्होंने दीर्घकाल तक स्वयं साधनाएं की हैं, भारत वर्ष का कोना कोना जिन्होंने योगियों की तलाश में छाना है, संसार के विविध देशों और भाषाओं के अध्यात्म शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया है, उनके अनुभवों का निचोड़ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
पता - अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
आध्यात्मवाद वह महा विज्ञान है जिसकी जानकारी के बिना भूतल के समस्त वैभव निरर्थक हैं और जिसके थोड़ा सा भी प्राप्त होने पर जीवन आनन्द से ओत प्रोत हो जाता है। संसार में सीखने योग्य, जानने योग्य अनेकों वस्तुएं हैं पर अखण्ड ज्योति के पाठको! स्मरण रखो सबसे पहले जिसे सीखने और हृदयंगम करने की आवश्यकता है वह—वैज्ञानिक आध्यात्मवाद ही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-November
इसकी तुलना में अन्न, वस्त्र, गौ आदि के भौतिक दान बहुत हलके हैं,। हिन्दू दर्शन का ज्ञान, मनुष्य के लिए एक आध्यात्मिक अखण्ड ज्योति है। जिसके द्वारा पाप, ताप और अज्ञान के चंगुल में फंसा हुआ प्राणी, सत्य की ओर प्रकाश की ओर उन्मुख होता है। और भ्रम एवं अधर्म जन्य दारुण दुखों से बचकर स्वर्गीय शान्ति का लाभ करता है इस ज्ञान रूपी अमृत का अधिक से अधिक विस्तार करना, इसकी छाया में अधिक से अधिक लोगों को आश्रय दिलाना ऊंचे दर्जे का पुण्य परमार्थ है
उसी दिन से इन संगठन के द्वारा सद्ज्ञान प्रसार का कार्य एक व्यवस्थित योजना के अनुसार आरंभ किया गया था। अखण्ड ज्योति पत्रिका उसके कुछ समय बाद निकाली गई थी। पर कार्यारंभ पहले हो गया था। उस स्थापना को इस दीपावली पर पूरे दस वर्ष हो जायेंगे
पानी की बूँदों का छोटा समूह गड्ढा, उससे बड़ा तालाब, उससे बड़ा सरोवर, उससे बड़ा समुद्र कहलाता है, इनकी उत्तरोत्तर शक्ति अधिक होती जाती है। आज अखण्ड ज्योति परिवार जितना बड़ा है -यह भविष्य में उससे बड़ा हो जाय तो निश्चित रूप से शक्ति उसी अनुपात से बढ़ेगी और वर्तमान काल में तामसी तत्वों की जो लोकव्यापी बाढ़ आई हुई है उस पर नियंत्रण करना सुगम होगा। असुरता के आक्रमण से आज जो हृदय विदारक दृश्य उपस्थित हुए हैं तथा भविष्य में होने की संभावना है, उनको रोकने का एक ही तरीका है कि हैवानियत और शैतानियत पर काबू पाने वाली इंसानियत को मजबूत बनावें, आगे बढ़ावें। यह कार्य सतोगुणी शक्तियों को बढ़ाने से हो सकता है
यह कार्य सतोगुणी शक्तियों को बढ़ाने से हो सकता है। इसके अनेक तरीके हैं उनमें से एक अखण्ड ज्योति परिवार का सुदृढ़ एवं सुविस्तृत बनाना भी है
अन्यथा सामूहिक विकृति उत्पन्न होने पर हमारा व्यक्तिगत व्यवस्था क्रम भी नष्ट भ्रष्ट हुए बिना न रहेगा। इस प्रकार पर हमने अखण्ड ज्योति के पाठकों का ध्यान उपरोक्त तथ्य की ओर भी आकर्षित किया है। पाठकों के विचार हमने पूछे हैं और उनसे सामाजिक कर्त्तव्यों का निश्चय करने में सहायता ली है और इस विचार विनिमय के पश्चात् जिस निष्कर्ष पर हम पहुँचे हैं उसे पाठकों के सामने रखा है। हम लोगों को विशेष तत्परता के साथ हिन्दुत्व को दृढ़ बनाने के लिए इस समय जुटना है, ताकि क्षितिज पर दिखाई पड़ने वाली काली घटाओं के खतरे से बचा जा सके और जिन बुरी परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ा है उनसे आगे न गुजरना पड़े
इस प्रयोगशाला द्वारा अपने परिवार का हर सदस्य यथोचित लाभ उठावे इसके लिए उनसे व्यक्ति गत संबंध भी स्थापित किये गये हैं। अपनी दशाब्दी के अवसर सम्मेलन बुलाने की अभिलाषा अखण्ड ज्योति पूर्ण न कर सकी, पर इन तीन मार्गों से आगे तीन उद्देश्यों को किसी हद तक पूरा करने का प्रयत्न किया है। इस शुभ अवसर पर वह, मानव जाति की सच्ची सेवा, धर्म भावना की दिशा में और भी अधिक तपश्चर्या एवं तेजी के साथ कार्य करने की प्रतिज्ञा करती है। साथ ही वह पाठकों से भी यह आशा करती है कि अपनी आत्मिक तथा भौतिक शक्तियों से इस पुनीत मार्ग में हमारा सहयोग करे
इस प्रकार उन्हें प्रोत्साहन और पथ-प्रदर्शन प्राप्त हो तो बड़े पैमाने पर यह प्रगति देश भर में हो सकती है। अखण्ड ज्योति केवल विचार द्वारा ही नहीं कार्यों द्वारा भी निकट प्रदेशों में नहीं सुदूर प्रान्तों में भी यह प्रयत्न विस्तरित करेगी। आइए आप भी इन प्रयत्नों में हाथ बंटाइए
जरूरत सेना बनाने की नहीं, बनी हुई सेना को जगाने की है। यह जागरण कार्य कठिन है पर अखण्ड ज्योति अपने को इस सेवा के लिए स्वयं समर्पित करती है। हम लोग देश भर में भ्रमण करके साधु संस्थाओं से, मठाधीशों से, महन्तों से, जमातों और अखाड़ों के गद्दीधारी गुरुओं से तीर्थ पुरोहितों से पंडित मंडलियों से संत महात्माओं से, आश्रम संचालकों से, संस्कृत पाठशालाओं के अध्यापकों से व्यक्तिगत, रूप से सामूहिक रूप से मिलेंगे और उन्हें लेखनी एवं वाणी से इसके लिए प्रेरित करेंगे कि जातीय जीवन की जागरण बेला में वे रचनात्मक कार्य करें। हिन्दुत्व को पुनः प्राचीन पद तक पहुँचाने के लिए वे समस्त शक्ति के साथ जुट जावें
यह सर्वविदित है कि अखण्ड ज्योति कागज छापकर बेचने वाली कम्पनी नहीं है। यह एक धार्मिक संस्थान है, जहाँ मनुष्यों की मनोभूमि को सात्विकता के ढांचे में ढाला जाता है कारखानों में सड़े गले लोहे को भी तपा, गला कर ठोक पीट कर, रेत-रगड़कर एक उपयोगी औजार बनाया जाता है, अखण्ड ज्योति के अध्यात्मिक कारखाने में सड़े-गले, टूटे-फूटे, काई और जंग लगे हुए हृदय एवं मस्तिष्कों को इस प्रकार सुधारा, बनाया एवं बदला जाता है कि वे कुछ से कुछ हो जायं, दुख दारिद्र की कालिमा छोड़ कर सुख सौभाग्य के प्रकाश से चमकें। इस प्रयोगशाला द्वारा अपने परिवार का हर सदस्य यथोचित लाभ उठावे इसके लिए उनसे व्यक्ति गत संबंध भी स्थापित किये गये हैं। अपनी दशाब्दी के अवसर सम्मेलन बुलाने की अभिलाषा अखण्ड ज्योति पूर्ण न कर सकी, पर इन तीन मार्गों से आगे तीन उद्देश्यों को किसी हद तक पूरा करने का प्रयत्न किया है
संवत् 1964 वि. की दीपावली के दिन अखण्ड ज्योति की स्थापना हुई थी। उसी दिन से इन संगठन के द्वारा सद्ज्ञान प्रसार का कार्य एक व्यवस्थित योजना के अनुसार आरंभ किया गया था। अखण्ड ज्योति पत्रिका उसके कुछ समय बाद निकाली गई थी
अखण्ड ज्योति हिन्दू धर्म महानताओं, विशेषताओं, प्रथाओं, परम्पराओं, व्रतों, उत्सवों, त्यौहारों, संस्कारों के संबंध में सुविस्तृत ज्ञान कराने वाले लेख आगामी जनवरी से देना आरंभ करेगी। छोटे-छोटे ट्रैक्टों द्वारा भी उन महान रहस्यों को घर-घर पहुँचाने की एक विशाल योजना के साथ प्रयत्न किया जायगा
ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि साधारण श्रेणी के लोगों ने थोड़े प्रयत्न से पचास-पचास सौ-सौ नये पाठक बना दिये। सत् मार्ग की प्रेरणा प्रदान करने वाले, सम कोटि के पत्रों में सबसे सस्ती अखण्ड ज्योति को एक वर्ष तक प्राप्त करने के लिए ढाई रुपया खर्च कर देने को अपने दस पाँच मित्र रजामंद कर लेना जरा भी कठिन नहीं है। कठिन केवल एक ही वस्तु है, वह है अपने अन्दर धर्म कार्य के लिए थोड़ा उत्साह होना। जिसके मन में थोड़ा भी उत्साह इस दिशा में होगा यह दस-पाँच नये सदस्य बड़ी ही आसानी से बढ़ा सकता है
स्वर्ग या मुक्ति की प्राप्ति में यदि एक जन्म की देरी हो जावे तो यह थोड़ी देर सबेर अनन्त जीवन में कुछ विशेष महत्व नहीं रखती। पर यह जन्म तो लोक जागरण के लिए लगना चाहिए अखण्ड ज्योति ने देश के धर्म क्षेत्र और अध्यात्म क्षेत्र में जितना प्रवेश पा लिया है उसका दृढ़ता और विस्तृतता के आधार पर पाठक यह आशा कर सकते हैं कि आगामी एक वर्ष में समस्त भिक्षा संस्था का सौवाँ भाग-साठ हजार का एक समूह देशोत्थान के कार्य में अवश्यमेव प्रवृत्त होगा। इस समुदाय के सामने प्रधान उद्देश्य मनुष्य मात्र के हृदय में हिन्दू संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम विश्वास और तदनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करना होगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संगठन, गोष्ठियाँ, पंचायतें, व्यायामशालाएं, पाठशालाएं एवं ज्ञान मन्दिर स्थापित करने की जहाँ जैसी आवश्यकता अनुभव होगी वहाँ वैसा करेगा
भौतिक सहायता से हम किसी को उतना सुख नहीं पहुँचा सकते जितना कि उसकी आत्मोन्नति के सहायक बनकर उसके लिए अनन्त सुखों का द्वार खोलते हैं। अपने मित्रों की सच्ची सेवा की दृष्टि से उन्हें अखण्ड ज्योति का पाठक बनाना किसी भी बड़े से बड़े महत्व पूर्ण सहयोग या उपकार से कम नहीं हैं। परमार्थ भावना को चरितार्थ करने का भी प्रयत्न होना चाहिए। स्वयं जिसे लाभदायक समझते हैं उसे दूसरों के सामने भी प्रस्तुत क्यों न करें
एक विचार एक आदर्श, एक हृदय के थोड़े से व्यक्ति भी यदि कभी मिल जाते हैं तो उनकी सम्मिलित शक्ति बहुत ही प्रभावशाली हो जाती है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रायः सभी सदस्य एक आदर्श और एक विचार के हैं। हम सभी व्यक्ति गत और सामूहिक जीवन में सत्य, प्रेम, तथा न्याय की स्थापना तथा वृद्धि चाहते हैं। विविध कार्यों द्वारा इस एक ही लक्ष की ओर अग्रसर होने का हम सब प्रयास करते हैं
अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों ने हमारे प्रश्नों का उत्तर देते हुए अनेक समस्याओं के संबंध में बड़े मूल्यवान विचार भेजे हैं। यह बौद्धिक दृष्टि से एक अमूल्य संपत्ति है। इन विचारों का महत्वपूर्ण अंश निचोड़ कर हम पाठकों के सामने अपनी भाषा में उपस्थित करते रहेंगे
सात्विकता का प्रकाश अपने आस-पास अधिक क्षेत्र में फैलाने के लिए हाथ में मशाल लेकर आगे बढ़ो। अखण्ड ज्योति अपने जीवन के दस वर्ष व्यतीत करके ग्यारहवें में प्रवेश कर रही है। इस शुभ अवसर पर उसकी शक्ति को दस गुनी बनाने का प्रयत्न करो, दस मित्रों को इस परिवार में प्रविष्ट कराने को प्रयत्न करो। विश्वास रखो, सत्य से परिपूर्ण प्रयत्न भगवान सत्य नारायण की कृपा से अवश्य पूरे होते हैं
इस अवसर पर अखण्ड ज्योति अपने परिवार के समस्त सदस्यों का एक विशाल सम्मेलन बुलाने की आयोजन कर रही थी, ताकि अब तक के कार्यों की आलोचना, आगामी योजनाओं का निर्माण, वर्तमानकाल की सामाजिक समस्याओं पर विचार वर्तमान काल की सामयिक समस्याओं पर विचार विनिमय, सैद्धान्तिक मतभेदों का सुलझाव, एवं व्यक्तिगत प्रेम-परामर्श का सुअवसर मिले। पर आज तो स्थिति ही दूसरी है। पंजाब की सीमा से मथुरा जिले की सीमाएं लगी हुई हैं
स्वयं जिसे लाभदायक समझते हैं उसे दूसरों के सामने भी प्रस्तुत क्यों न करें। अखण्ड ज्योति की सदस्यता यदि आत्मोन्नति में सहायक होती हैं तो दूसरी को भी उसके लिए प्रेरणा देकर उसके साथ में सच्चा उपकार क्यों न किया जाय? पाठको! अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों! अपने परिवार को पुष्ट करो, इसे बढ़ाओं, और बलवान बनाओ। सात्विकता का प्रकाश अपने आस-पास अधिक क्षेत्र में फैलाने के लिए हाथ में मशाल लेकर आगे बढ़ो। अखण्ड ज्योति अपने जीवन के दस वर्ष व्यतीत करके ग्यारहवें में प्रवेश कर रही है
हम लोगों को विशेष तत्परता के साथ हिन्दुत्व को दृढ़ बनाने के लिए इस समय जुटना है, ताकि क्षितिज पर दिखाई पड़ने वाली काली घटाओं के खतरे से बचा जा सके और जिन बुरी परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ा है उनसे आगे न गुजरना पड़े। यह सर्वविदित है कि अखण्ड ज्योति कागज छापकर बेचने वाली कम्पनी नहीं है। यह एक धार्मिक संस्थान है, जहाँ मनुष्यों की मनोभूमि को सात्विकता के ढांचे में ढाला जाता है कारखानों में सड़े गले लोहे को भी तपा, गला कर ठोक पीट कर, रेत-रगड़कर एक उपयोगी औजार बनाया जाता है, अखण्ड ज्योति के अध्यात्मिक कारखाने में सड़े-गले, टूटे-फूटे, काई और जंग लगे हुए हृदय एवं मस्तिष्कों को इस प्रकार सुधारा, बनाया एवं बदला जाता है कि वे कुछ से कुछ हो जायं, दुख दारिद्र की कालिमा छोड़ कर सुख सौभाग्य के प्रकाश से चमकें। इस प्रयोगशाला द्वारा अपने परिवार का हर सदस्य यथोचित लाभ उठावे इसके लिए उनसे व्यक्ति गत संबंध भी स्थापित किये गये हैं
अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य यदि सच्चे हृदय से इसे करें तो कोई कारण नहीं कि दस-दस, बीस-बीस नये पाठक न बना सकें। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि साधारण श्रेणी के लोगों ने थोड़े प्रयत्न से पचास-पचास सौ-सौ नये पाठक बना दिये। सत् मार्ग की प्रेरणा प्रदान करने वाले, सम कोटि के पत्रों में सबसे सस्ती अखण्ड ज्योति को एक वर्ष तक प्राप्त करने के लिए ढाई रुपया खर्च कर देने को अपने दस पाँच मित्र रजामंद कर लेना जरा भी कठिन नहीं है
हमारे परिवार के सदस्य अनेक शुभ कर्मों के लिए प्रयत्न करते हैं, समय देते हैं, दूसरों को उत्साहित करते हैं। हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि अखण्ड ज्योति परिवार की वृद्धि करना किसी उत्तम शुभ कर्म से कम नहीं हैं। संसार में सत गुण को बढ़ाना, लोगों को सतोगुणी बनाना, अनेकों शुभ कर्मों के वृक्ष लगाना है। इसका वृक्षादान का पुण्य फल अक्षय है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
फलों के शाक-भाजियों के, अन्नों के छिलके सूर्य की किरणों के सीधे संपर्क में आते हैं इसलिए भीतरी भाग की अपेक्षा उनके छिलकों में पोषक तत्व ‘विटामिन’ अधिक पाये जाते हैं। सूर्य स्नान, सूर्य किरण चिकित्सा, सूर्य नमस्कार, सूर्य सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य महात्म्य आदि के संबंध में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर पिछले वर्षों में अनेक बार चर्चा हो चुकी हैं। सूर्य शक्ति को जीवन में अधिक से अधिक व्यवहार करना यही सूर्य पूजा है, इससे आरोग्य वृद्धि होती है
इन समस्याओं के संबंध में हम सबको गंभीरतापूर्वक विचार करने की और समुचित हल निकाल कर सुदृढ़ मार्ग अपनाने की आवश्यकता है। अखण्ड ज्योति अपने परिवार से विचार विनिमय कर के सामूहिक विचारों का निचोड़ आगामी अंक में उपस्थित करेगी। पाठक प्रतीक्षा करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
अगणित व्यक्ति श्री सिन्हा जी की श्रेणी में आते हैं, जिनके प्रथम विश्वास को बल ही किसी चमत्कार से मिला। कई व्यक्ति ऐसे हो सकते हैं जो अखण्ड ज्योति पाठकों में हो व कहें कि हमारे साथ भी ऐसा घटा तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। यह तो उस हिमखण्ड के बहिरंग पक्ष के कुछ हिस्से पर ही रोशनी डालने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जलराशि के भीतर रहा व अभी भी अपनी शक्ति से अगणित चमत्कार नित्य दिखा रहा है। (अगले अंक में जारी)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
लीला प्रसंग प्रकरण के अंतर्गत परम पूज्य गुरुदेव से जुड़े “ऑकल्ट” विवरणों को उनकी सिद्धि के घटना क्रमों को पढ़कर किसी बुद्धिजीवी वर्ग के पाठक को लगे कि “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के प्रतिपाद्य विषय से कुछ हटकर यह विवेचना किस कारण प्रस्तुत की जा रही है तो उन्हें हम बताना चाहेंगे कि वस्तुतः यह स्तंभ भी पूरी तरह “अखण्ड ज्योति” के संकल्पों की परिधि के भीतर ही है। 1938 में हाथ से लिखा प्रथम अंक वसंत पंचमी पर निकलने वाले तथा 1940 की वसंतपंचमी से उसका अधिकृत छपा हुआ प्रथम संस्करण प्रकाशित करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ही विषय को बहुविध रूप में संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया। वह यह कि मानव में अनन्त संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं व उन्हें विकसित कर वह देवमानव सिद्धि पुरुष-देवदूत स्तर तक पहुँच सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
उन्होंने लिखा है कि यह पत्रिका आपकी अपनी ही है एवं अपनी की तो हर कोई तारीफ करता है ही। अखण्ड ज्योति पत्रिका को पत्रों के आइने से पढ़ने पर जो भी कुछ समझ में आता है, उसे अनुभव करने के लिए भावनात्मक गहराई चाहिए। यह बुद्धि के स्तर की चीज नहीं है
नासमझी के आधार पर धूर्त मूर्खों को ठगते देखे जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को एक सुव्यवस्थित मार्गदर्शन देते हुए साधना के सभी सोपानों को यथासमय अखण्ड ज्योति पत्रिका में भी दिया एवं पत्रों द्वारा भी उनका मार्गदर्शन किया
यहाँ प्रसंग ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का चल रहा है, जिसके प्रतिपादनों ने न केवल अगणित व्यक्तियों के मनोबल को जगाया है, उन्हें मूर्च्छना से उठाया है, उन्हें हस्तामलकवत भविष्य संबंधी मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष गुरु की भूमिका निभाई। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी जिन्होंने अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पूर्व में 1937 की वसंत पंचमी से आरंभ की, इसे प्रकाशन के रूप में 1940 की वसंत पंचमी से आरंभ की इसे दैवीचेतना का संदेश ही मानते थे। अनेकानेक व्यक्ति इस पारस के संपर्क में आकर अनगढ़ लौहखंड से स्वर्ण बनते चले गए
उनके भावना संपन्न अंतस्तल को सृजनात्मक मोड़ हमारे गुरुदेव ने दे दिया-पत्रलेखन भी एक माध्यम बना व पास बिठाकर दिया गया मार्गदर्शन भी। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनके काव्य को स्थान मिला। इसी पत्र में आगे पूज्यवर लिखते हैं-
“तुम्हारे शरीर और मस्तिष्क का-आत्मा का प्रयोजन-लक्ष्य क्या है, यह अक्टूबर अंक (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1967) में स्पष्ट है। जो बीत गया सो गया-अब शेष समय किसी महान आदर्श के लिए ही व्यतीत होना चाहिए। ”
एक पत्र और यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। यह पत्र 10-9-64 को टीकमगढ़ के श्री बैजनाथ शौनकिया जी को लिखा गया था श्री बैजनाथ जी अखण्ड ज्योति के 108 सदस्य बनाने के लिए संकल्प किया था। इस संबंध में ‘युग निर्माण योजना’ में विवरण छपता था ताकि औरों को भी प्रेरणा मिले। इसी संबंध में पूज्यवर लिखते हैं-”आपने 108 सदस्य बनाने के लिए संकल्प क्यों संकल्प किया ? इसमें आपने जनता का क्या हित समझा ? इस संबंध में एक छोटा लेख लिख दें और अपने आधे शरीर का साफ-सा फोटो खिंचवाकर भेज दें
विचार जन-जन तक पहुँचे, इसके लिए ही उनका पुरुषार्थ जीवनभर चलता रहा। ‘अखण्ड ज्योति’ ऐसी ही आध्यात्मिक आभा-ऊर्जा संपन्न प्राणचेतना की संवाहक है। आज प्रत्यक्षतः उंगलियाँ किसी की भी चलती हों, मूल प्रेरणा स्रोत सूत्र-संचालक का दिव्य प्राण ही है
यहाँ प्रसंग ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का चल रहा है, जिसके प्रतिपादनों ने न केवल अगणित व्यक्तियों के मनोबल को जगाया है, उन्हें मूर्च्छना से उठाया है, उन्हें हस्तामलकवत भविष्य संबंधी मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष गुरु की भूमिका निभाई। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी जिन्होंने अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पूर्व में 1937 की वसंत पंचमी से आरंभ की, इसे प्रकाशन के रूप में 1940 की वसंत पंचमी से आरंभ की इसे दैवीचेतना का संदेश ही मानते थे। अनेकानेक व्यक्ति इस पारस के संपर्क में आकर अनगढ़ लौहखंड से स्वर्ण बनते चले गए। जीवन जीने की दिशा मिली, प्रेरक मार्गदर्शन मिला मानों कोई उँगली पकड़कर चलना सिखा रहा हो
परमपूज्य गुरुदेव का समस्त लेखन गद्य-पद्य-पत्र-अपनत्व भरा मार्गदर्शन सभी मिशन को समर्पित था एवं यही अपेक्षा वे अपने अनुयायियों विशेषतः विभूतिवान् समीपवर्तियों से रखते थे। अखण्ड ज्योति पत्रिका का लेखन विशुद्धतः लोकमंगल के लिए हुआ, मनोरंजन के लिए नहीं। यही कारण है कि आज वह लाखों-करोड़ों की मार्गदर्शक बनी हुई है। इस तथ्य को स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने जनवरी 1977 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में इस तरह लिखा है, “यह पत्रिका मात्र नहीं है
यही कारण है कि आज वह लाखों-करोड़ों की मार्गदर्शक बनी हुई है। इस तथ्य को स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने जनवरी 1977 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में इस तरह लिखा है, “यह पत्रिका मात्र नहीं है। उसमें लेखक का -सूत्र-संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अंत तक घुला हैं, अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी ने इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक, सहयोगी, अनुयायी ही मिल हैं। ” “इसे (अखण्ड ज्योति को) एक शब्द में इतना ही समझाया जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र-संचालन है
” “इसे (अखण्ड ज्योति को) एक शब्द में इतना ही समझाया जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र-संचालन है। ” (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 26-27, जनवरी 1977)
सो पढ़ी। कुँजडी अपने बेरों को खट्टे क्यों बताएगी? अखण्ड ज्योति के प्रति तुम्हारी जो आत्मीयता है, उसके कारण वह वस्तुतः तुम्हारी अपनी वस्तु हो गई है। जब अखण्ड ज्योति तुम्हारी अपनी वस्तु है, तो स्वाभाविक है कि तुक इसकी प्रशंसा करो। इसके लिए मैं तुम्हें धन्यवाद क्यों दूँ ?”
“अखण्ड ज्योति के सदस्य एवं नवनिर्माण साहित्य प्रसार की योजना सब प्रकार उपयुक्त हैं। अपने पुरुषार्थ से जितना बन सके, करते रहें। हम आपकी पीठ पर हैं, भगवान आगे, फिर चिंता किस बात की
कुँजडी अपने बेरों को खट्टे क्यों बताएगी? अखण्ड ज्योति के प्रति तुम्हारी जो आत्मीयता है, उसके कारण वह वस्तुतः तुम्हारी अपनी वस्तु हो गई है। जब अखण्ड ज्योति तुम्हारी अपनी वस्तु है, तो स्वाभाविक है कि तुक इसकी प्रशंसा करो। इसके लिए मैं तुम्हें धन्यवाद क्यों दूँ ?”
पूरा आश्वासन है ज्ञानयज्ञ के निमित्त लग जाने को युगऋषि का-”निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” के रूप में वस्तुतः अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना पत्रिका का प्रचार-प्रसार-पूज्यवर के क्राँतिधर्मी चिंतन का प्रसार-विस्तार ही अबका युगधर्म है। पत्र की भाषा से इसकी स्पष्ट झलक मिलती है। एक पत्र और यहाँ उद्धृत कर रहे हैं
तेलगू में प्रकाशित हुई युगशक्ति गायत्री के साथ-साथ यह उस भाषा में तथा दक्षिण की शेष तीन तमिल-मलयालम-कन्नड़ भाषाओं में भी इस वर्ष के अंत तक उपलब्ध होने जा रहा है। इस वर्ष के अंत में होने जा रहे सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के साथ ही अंगरेजी में संभावित अखण्ड ज्योति के उच्चस्तरीय अनुवाद के प्रकाशन के साथ ही विश्वभर की न्यूनतम पाँच जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, जापानी व चीनी भाषा में भी इन बीस+पाँच पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित हों, यह प्रयास किया जा रहा है। प्रतिभाओं को इस निमित्त अपना पुरुषार्थ जुटाना होगा
अखण्ड ज्योति की आपने जो समालोचना लिखी है। सो पढ़ी। कुँजडी अपने बेरों को खट्टे क्यों बताएगी? अखण्ड ज्योति के प्रति तुम्हारी जो आत्मीयता है, उसके कारण वह वस्तुतः तुम्हारी अपनी वस्तु हो गई है
उसमें लेखक का -सूत्र-संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अंत तक घुला हैं, अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी ने इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक, सहयोगी, अनुयायी ही मिल हैं। ” “इसे (अखण्ड ज्योति को) एक शब्द में इतना ही समझाया जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र-संचालन है। ” (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 26-27, जनवरी 1977)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना
लोकसेवा की जब भी बात आती है-चरित्रनिष्ठा सर्वोपरि मानी जाती है। परमपूज्य गुरुदेव -अखण्ड ज्योति’ दिसंबर 1988 में लिखते हैं- “लोकसेवियों की जिस जमाने में कमी पड़ती है, उन दिनों विकास का स्तर घट जाता है। जनसाधारण का भावनात्मक परिष्कार व दृष्टिकोण का उदात्तीकरण निताँत आवश्यक है। इस कार्य को विलासी स्वार्थी एवं घटिया स्तर के लोग नहीं कर सकते, भले ही वे क्रियाकौशल में पारंगत अथवा ऊँचे पदाधिकारी ही क्यों न हों
श्रीमद्भगवद्गीता की युगानुकूल विवेचना विगत 9 माह से परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के क्राँतिकारी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में निरंतर प्रकाशित हो रही है। अठारह अध्यायों के विभिन्न श्लोकों में वर्णित विषयों पर यह शृंखला अनवरत प्रकाश डालती रहेगी। विगत अंक में पाठक-परिजन ‘ स्थितप्रज्ञ ‘ की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में आसक्ति से निवृत्ति होकर कैसे परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले स्थितप्रज्ञ पुरुष की उच्चतम आध्यात्मिक प्रगति होती है, यह पढ़ चुके हैं
परमपूज्य गुरुदेव ने तप साधना की पृष्ठभूमि पर गायत्री परिवार को खड़ा किया है। ’अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के 1937 से आरंभ होते समय भी उनका अनुष्ठान चल रहा था एवं जब 1942 में राजनीतिक क्षितिज पर ‘भारत छोड़ो’ आँदोलन की घूम मची थी, तब विक्रम संवत् की 2000 आरंभ होते ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि आज से 55 से 65 वर्ष का समय भारत के उत्कर्ष का -अभ्युदय का समय होगा। भारतभूमि तपस्वियों की भूमि रही है। यहाँ गायत्री साधना का बीज कण-कण में बसा हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
अखण्ड ज्योति परमपूज्य गुरुदेव की वाणी एवं मिशन की जन्मदात्री है। समग्र वाङ्मय उनका मूर्तिमान स्वरूप है। उनके सभी शिष्य-मानवपुत्र इनका पठन-पाठन करते एवं अपने जीवन में उतारते हैं
सहस्रांशु ब्रह्मयज्ञ के युगपरिवर्तनकारी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने नवंबर 1951 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 23 में लिखा, “यह बार भली प्रकार समझ लेने की है कि यह महायज्ञ अत्यंत गंभीर सत्परिणाम उत्पन्न कराने वाला है। इसमें युगपरिवर्तन के बीज छिपे हुए हैं। जैसे नवप्रभात की पुण्य संध्या में ब्राह्मी साधना आवश्यक होती है, इसी प्रकार नानाविधि पापों−तापों से त्रास देने वाली इस घनघोर अंधकारमयी नियति का परिवर्तन करके शाँतिदायी सतोगुणी ऊषा के स्वागत में यह महायज्ञ किया जा रहा है
पहली प्रति जनवरी 1939 में ढाई सौ छपी। कुछ दिन प्रवाह अवरुद्ध रहा, किंतु फिर फ्रीगंज आगरा से जनवरी 1940 में अखण्ड ज्योति पत्रिका छपनी आरंभ हुई एवं देखते-देखते मत्स्यावतार की तरह गति पकड़ती चली गई
पुनः मुलाकात हुई। अखण्ड ज्योति की प्रगति यात्रा से ब्रह्मलीन श्री विट्ठलदास जी मोदी अति प्रसन्न थे व अंदर से अभिभूत थी
श्री हनुमान प्रसाद पोदार जी से मिलने परमपूज्य गुरुदेव गोरखुपर पहुँचे, तो सहज ही विट्ठलदास जी मोदी (जिनका महाप्रयाण अभी विगत मार्च 2000 की 23 तारीख को हुआ है) से मुलाकात हुई दो संत- ब्राह्मण मिले, सहज अपनत्व बढ़ता चला गया। दो-तीन मुलाकातों के बाद मोदी जी अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी आए। परमपूज्य गुरुदेव ने कहा, ब्राह्मणत्व कहता है कि मैं बिना विज्ञापन के पत्रिका निकालूँ, इसलिए आपसे राय ले रहा हूं। वैसे इस अंक से मैं विज्ञापन बंद कर रहा हूँ
मथुरा आकर सारी गतिविधियाँ व योजना विस्तार से समझी थीं। अखण्ड ज्योति पत्रिका जिस स्थिति में प्रकाशित की गई थी, पूँजी के अभाव में लगता नहीं था कि यह चल पाएगी। जो भी कुछ था अपना वह सारा आँवलखेड़ा ग्राम के स्कूल के निर्माण हेतु दे दिया था और कोई पूँजी थी नहीं। थे मात्र जमींदारी के बाँड एवं माताजी के जेवर आदि
जो लोग अखण्ड ज्योति संस्थान के घीयामंडी या गायत्री तपोभूमि वृंदावन रोड मथुरा गए हैं, उन्होंने एक जीते-जागते तपस्वी ब्राह्मण के, आचार्य श्री के अंतर्दर्शन किए हैं इसी एक सिद्धि ने उन्हें सब कुछ दे दिया। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमारे देश की संस्कृति त्याग करने वालों की पूजा करती है। यह बुद्ध व महावीर का, पटेल व गाँधी का देश है हमने उसे ही आधार माना है एवं हमारी यही पूँजी है आज पाँचों संस्थान सहित प्रायः साढ़े पाँच हजार प्रज्ञासंस्थानों के अधिपति परमपूज्य गुरुदेव-परमवंदनीया माताजी के रूप में अरबों की संपत्ति के प्रमुख के रूप में हम उन्हें पाते हैं, तो उसके मूल में उनका ब्राह्मणत्व ही है, जो उन्होंने अंत तक निभाया
अखण्ड ज्योति जून 1953 के पृष्ठ 29 में अपने भावी लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री तत्वज्ञान की आवश्यकता को बताते हुए लिखा, “संतप्त मनुष्यता का परित्राण, आध्यात्मिक निष्ठा एवं धर्मधारणा की प्रतिष्ठा, मातृजाति की महानता का प्रकाश-भारतीय संस्कृति का, पुनरुद्धार हमारा लक्ष है। सदाचार, प्रेम, कर्त्तव्य-परायणता, सद्भाव, पवित्रता, संयम, सद्बुद्धि, आस्तिकता एवं मानवोचित जीवन की विधिव्यवस्था हमारा कार्यक्रम है। गायत्री उपासना इन्हीं देव संपत्तियों का केंद्र बिंदु है
इसी सत्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने अगस्त 1953 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 19 में लिखा, “राष्ट्रनिर्माण की सच्ची आधारशिला यह है कि नैतिक एवं धार्मिक वातावरण उत्पन्न किया जाए। यह कार्य सरकारें नहीं कर सकती। यह तो संतों और तपस्वियों द्वारा होता है
गायत्री महाविद्या एवं इसके तत्त्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए। चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णता की वेला में अगस्त 1951 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने अपने अनुभवों को बताते हुए लिखा, “हमारे जीवन का अधिकाँश भाग गायत्री माता की गोदी में व्यतीत हुआ है। इस महामंत्र के संबंध में हजारों आर्षग्रंथों का अनुसंधान करके हमने यह पाया है कि आध्यात्मिक साधनाओं में गायत्री साधना से बड़ी दूसरी कोई साधना नहीं है। ”
अखण्ड ज्योति पत्रिका 250 से आरंभ होकर आज लगभग छह लाख की संख्या में छपती है। पाँच गुने पाठक उसे हिंदी में पढ़ते हैं इसी के अनुवाद प्रायः इतनी ही बड़ी संख्या में छपते हैं। बिना विज्ञापन के, बिना किसी लाभ के कोई प्रयोग इतने दिन चल सकता है? 63 वें वर्ष में चल रही पत्रिका अखण्ड ज्योति प्रत्येक के लिए अचरज का विषय नहीं, अपितु ब्राह्मणत्व के चमत्कार एक नमूना है
ऐसे ही सद्गुरु का मार्गदर्शन जब-जब भी गायत्री साधकों को मिला है, उनका उच्चस्तरीय विकास होता ही चला गया है। परमपूज्य गुरुदेव न केवल ‘गायत्री चर्चा’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय के माध्यम से अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा अपने साधक शिष्यों का मार्गदर्शन करते थे, बल्कि पत्रों द्वारा वे समय-समय पर उचित परामर्श भी अपने अनुभवों के आधार दिया करते थे। उनके ऐसे प्राण संचार करने वाले पत्रों में से एक यहाँ उद्धृत करने से हम स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं। यह पत्र 27/10!1949 को श्री शिवशंकर गुप्ता को लिखा गया था
पाँच गुने पाठक उसे हिंदी में पढ़ते हैं इसी के अनुवाद प्रायः इतनी ही बड़ी संख्या में छपते हैं। बिना विज्ञापन के, बिना किसी लाभ के कोई प्रयोग इतने दिन चल सकता है? 63 वें वर्ष में चल रही पत्रिका अखण्ड ज्योति प्रत्येक के लिए अचरज का विषय नहीं, अपितु ब्राह्मणत्व के चमत्कार एक नमूना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
अपने लिए हमने कुछ नहीं बनाया। जब रो हम अखण्ड ज्योति में रहें, हम अपने परिवार में पाँच आदमियों का हमारा खर्च दो सौ रुपये मात्र रहा है। भारत के नागरिकों को बड़े ही किफायत से धन खर्च चाहिए। गाँधी जी ने बहुत कम धन में गुजारा किया
जबर्दस्ती शोषण-भोग करने की नीति से मुक्ति तब मिलेगी, जब ऐसा मानव समुदाय प्रकृति प्रकोपों से दंडित होगा। नवंबर 1988 की अखण्ड ज्योति, जिसमें युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की गई थी, में पूज्यवर लिखते हैं कि “नवयुग की, इक्कीसवीं सदी की संपूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धाँतों पर निर्धारित होगी, हर क्षेत्र में हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। ” - “वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श अब समाजवाद-समूहवाद-संगठन-एकीकरण का विधान बनकर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। ”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
उसका छप्पनवाँ वर्ष समाप्त होकर अब हम अगली पाँच अप्रैल, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को संवत् 2057 में प्रवेश करेंगे। जब यह सदी आरंभ हुई थी, तब ईसवी सन् 1940 का भार छोड़ो आँदोलन चल रहा था एवं हमारी गुरुसत्ता ने अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में, जो अभी शैशवावस्था में थी, संवत् 2000 के आगमन के साथ इक्कीसवीं सदी के शुभ आगमन की व नवयुग के शीघ्र ही 60 वर्षों की संघर्ष भरी अवधि के बाद आने की घोषणा लगातार जनवरी से मई 1942 तक के अंकों में की। उनके अनुसार इक्कीसवीं सदी-विक्रम संवत्सर के अनुसार प्रौढ़ता की स्थिति में 50 वर्षों में पहुँचने की शेष आठ-दस वर्ष की अवधि संधिकाल की बताई गई
इसके पश्चात सभी वाहन अपने-अपने कलश-साथ में जुड़े पवित्र चिन्हों प्रतीकों प्रदर्शनियों के साथ वापसी यात्रा शाँतिकुँज हरिद्वार की आरंभ करेंगे। मार्ग में ये गुरुग्राम जन्मभूमि आँवलखेड़ा तथा गुरुसत्ता की कर्मभूमि गायत्री तपोभूमि, मथुरा एवं अखण्ड ज्योति संस्थान होली पूजन संपन्न करवाती 16 जून, ज्येष्ठ पूर्णिमा को हरिद्वार में एकत्र होगी। सभी कलश यहीं रख लिए जाएँगे। अखण्ड दीपक की साक्षी में रखे राष्ट्र भर में घूमकर आए, इन कलशों को विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ (नई दिल्ली-13 अक्टूबर 2000 जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम) में तथा 6 से 11 नवंबर 2000 को शाँतिकुँज केंद्र में होने वाले 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के महापूर्णाहुति वर्ष के सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में मंच पर राष्ट्रीय एकता सद्भाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाएगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
ज्न 1967 ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में आठ पृष्ठ का लख प्रकाशित हुआ- ‘महाकाल और उसका युग प्रत्यावर्तन। ’ लगभग पाँच वर्ष पूर्व घोषित ‘युगनिर्माण सत्संकल्प’ के बाद पुनः यह एक क्राँतिकारी घोषणा थी। ‘महाकाली’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा कि “बोलचाल की भाषा में इसे ‘महाक्राँति’ भी कह सकते हैं
स्थूलशरीर से उनके न रहने पर भी यह आँदोलन कई गुना बढ़ा हैं, क्योंकि यह परोक्षजगत से संचालित हैं, देवी आकाँक्षा के अनुरूप इसका जन्म हुआ हैं। स्वयं पूज्य गुरुदेव जनवरी 1962 की ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखते हैं- ‘‘युगनिर्माण की इतनी विशाल योजना, जिसमें जनमानस को उलट-पुलटकर रख देने का हमारा संकल्प हैं, वह आज असंभव जैसी लग सकती हैं, पर हमारा अंतरात्मा बोलता है कि यह सब होने ही वाला हैं। ”
बौद्धिक क्राँति द्वारा चिंतन का, नैतिक क्राँति द्वारा चरित्र का एवं सामाजिक क्राँति द्वारा व्यवहार का परिष्कार उन्हीं का दिया सबसे व्यावहारिक जीवनदर्शन हैं। इन पुस्तकों के विचारों एवं ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित प्रतिमाह संप्रेषित उनकी चिंतनचेतना ने लाखों-करोड़ों को झकझोर कर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया हैं, जहां परिवर्तन सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा हैं। ऐसा ही युगद्रष्टा अपनी ऐतिहासिक क्राँतिधर्मी रचना ‘सतयुग की वापसी’ 1989 में हमें कहता है। ‘‘इक्कीसवीं सदी उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान् माली की भूमिका निभानी चाहिए
रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना चाहिए। (अखण्ड ज्योति वर्ष 30-1969, अगस्त पृष्ठ 41)
‘सुनसान के सहचर’ एवं हमारी वसीयत और विरासी सहित क्राँतिकारी साहित्य जहां उनकी लेखनी के कायल हो जाने हेतु विवश कर देता है तो ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ रूपी दर्शन की धुरी पर सभी के लिए इक्कीसवीं सदी में एक मानवधर्म का पालन करने की प्रेरणा भी देता है। शाँतिकुँज-ब्रह्मवर्चस्-गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान, युगतीर्थ आँवलखेड़ा सहित प्रायः साढ़े पाँच हजार से भी अधिक जनजाग्रति केंद्रों का निर्माण एक ऐसा पुरुषार्थ हैं, जिसका कोई मुकाबला नहीं। देश ही नहीं विदेश के गाँव-गाँव में गायत्री यज्ञ संस्कार की त्रिवेणी पहुँचाना, छोटे-छोटे दीपयज्ञों से लेकर एक पाँच कुँडी गायत्री-यज्ञों, शतकुँडी, सहस्र-कुँडी महायज्ञों, संस्कार महोत्सवों से लेकर आश्वमेधिक धर्मानुष्ठानों द्वारा धर्मधारणा का विस्तार एक युगनायक को आदर्शों के हिमालय पर पहुँचा देता है। 3200 छोटी-बड़ी किताबों का लेखन कर की दिशा में अग्रगामी बनाना हिंदी जगत् व प्रादेशिक स्तर की सभी भाषाओं के स्तर पर एक अकल्पनीय पराक्रम हैं
उनकी उत्कट तप−साधना से अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया। अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया महर्षि रमण भी इसी महत् उद्देश्य के लिए तिरुवन्नामलाई में अरुणाचलम् पर्वत की गुफा में तपोलीन थे। महायोगियों की इस तप−साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई। अपनी इस गहन एकाँत तप−साधना के दिनों में सन् 1926 के कुछ समय बाद ही उन्होंने भारत के शीघ्र स्वतंत्र होने की बात कहीं
स्वामी विवेकानंद के इन स्वरों में राष्ट्र के आँगन में अखण्ड ज्योति प्रज्वलित हो उठी। यह स्वाधीनता की संघर्ष ज्योति थी। जिसे अखंड रूप से प्रज्वलित बनाए रखने के लिए बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, मोहनदास करमचंद गाँधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि और महातपस्वी अपना सर्वस्व अर्पित करने उठ खड़े हुए
शाँतिकुँज को युगऋषि ने इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री नवयुग का सृजनकेंद्र, महाकाल का घोंसला कहा हैं। 1923 से प्रज्वलित अखण्ड घृतदीप यों पहले आँवलखेड़ा, बाद में आगरा (फ्रीगंज) फिर अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा रहा एवं फिर 20 जून 1971 से यह शाँतिकुँज में प्रज्वलित हैं। इस अखण्ड दीप के साथ मिशन की कीर्तिमान स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ जुड़ी हैं। इसी के संरक्षण में अभिनव संकल्प लिए गए, जो पूरे होते पड़े गए
यह सब महाकाल का युग प्रत्यावर्तन जैसी ही अद्भुत घटना होगी। ” (पृष्ठ 38 अक्टूबर 1937 अखण्ड ज्योति)
तपोलीन आचार्य जी ने अपनी दिव्यदृष्टि से अपनी तप−साधना प्रारंभ करने के कुछ वर्षों के बाद ही न केवल भारतवर्ष की स्वतंत्रता को देख लिया था, बल्कि यह भी समझ लिया था कि स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्र के सामने कौन-सी मौलिक समस्याएँ उभरकर आएँगी। इसके सार्थक समाधान की खोज में जुटें तपोनिष्ठ आचार्य जी ने अपने साधनाकाल में ही ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका (1937 ई. से) का प्रकाशन-प्रवर्तन किया। उनका यह कार्य मात्र साहित्य साधना तक सीमित न था। यह तो उनके नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति रूप त्रिविध संकल्प की अभिव्यक्ति थी, विचारक्राँति के महाचक्र का प्रवर्तन था, युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत थी
एक निष्पक्ष विचारक के रूप में जब भी कोई इस मिशन की, जिसे युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार, युगाँतरकारी चेतना, प्रज्ञा अभियान, अखण्ड ज्योति परिवार जैसे नाम दिए गए हैं, समीक्षा करेगा वह निश्चित ही युगऋषि के विचारों के आलोक में युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को साकार होता पाएगा। जहां अनेक आँदोलन आँधी-तूफान की तरह उठते और पानी के बबूल की तरह नष्ट होते देखे जाते हैं, वहीं युगनिर्माण का आँदोलन नित-निरंतर गति पकड़ता ही चला जा रहा हैं। स्थूलशरीर से उनके न रहने पर भी यह आँदोलन कई गुना बढ़ा हैं, क्योंकि यह परोक्षजगत से संचालित हैं, देवी आकाँक्षा के अनुरूप इसका जन्म हुआ हैं
इसने संगठन के आधार को खड़ा कर दिया। इसी अखण्ड दीपक ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को 1937 से आरंभ होकर ज्ञानयज्ञ का प्रकाश लाखों लोगों तक पहुँचाते देखा हैं। गायत्री महाविज्ञान की रचना, आर्षग्रंथों का भाष्य एवं युगनिर्माण योजना के सूत्रपात का उद्घोष इस अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन की वासंती वेला में ही हुआ हैं। महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया से लेकर मथुरा से विदाई की घोषणा, हिमालय यात्रा के बाद ऋषि परंपराओं की स्थापना का संकल्प, शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ के रूप में एक कल्पवृक्ष के निर्माण से लेकर इसकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में चौबीस सौ शक्तिपीठों के निर्माण के संकल्प भी इसी दीप प्रज्ज्वलन के दिन वसंत पंचमी की उल्लास के समन्वय को संकल्पित ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना से लेकर बीस वर्षीय युगसंधि के विशिष्ट साधना अभियान की शुरुआत एवं प्रज्ञापुराण रूपों अद्वितीय 19वाँ पुराण भी इसी वेला में लिखा गया
हिमालय तप हेतु प्रस्थान करने वाले थे। उन्होंने फरवरी 1971 की अखण्ड ज्योति में लिखा-”अखण्ड ज्योति दीपक चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद प्राणों से प्रिय बन गया। इसे आजीवन चाल रखा जाएगा। अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का ही स्वरूप हैं
सन् 1926 ई. की वसंतपंचमी को अखण्ड ज्योति प्रज्वलित हुई। भारतवर्ष के बेकलभावन ताजमहल के लौकिक सौंदर्य के पास ही यह अलौकिक एवं आध्यात्मिक सौंदर्य प्रदीप्त हुआ। आगरा जिले के आंवलखेड़ा गाँव की एक छोटी-सी कोठरी में जलाए गए एक अखण्ड दीपक के माध्यम से हिमालय की ऋषिसत्ता ने सूक्ष्मशरीर से आकर एक नवीन शुभारंभ किया
यह योग धार्मिकता, आस्तिकता विस्तार व मानवता का संदेश लेकर आया हैं। ” (अखण्ड ज्योति मार्च 1962 पृष्ठ 37) उसी समय युगनिर्माण सत्संकल्प के रूप में नवयुग के संविधान की घोषणा की गई। चीन युद्ध से जूझ रहे राष्ट्र को युगधर्म का आभास कराते हुए उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों के माध्यम से जन-जन के मन में उज्ज्वल भविष्य के प्रति उल्लास का संचार किया। विचारों की शक्ति से सामाजिक स्तर पर एक बहुत बड़ी क्राँति आरंभ कर ‘ज्ञानयज्ञ’ नाम देते हुए पूरे समाज राष्ट्र को उसका याजक बना देना एक ऐसा कार्य हैं, जिसका आकलन संभवत नई सहस्राब्दी में मनीषी ही करेंगे
स्वागत के लिए सफाई अनिवार्य हैं। ” (अखण्ड ज्योति जनवरी 19’42, पृष्ठ 6)
उसके बाद 10 दिन माता जी व्यवस्था शाँतिकुँज में बनाकर अपने गंतव्य स्थान को प्रयास कर देंगे। ” (फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, 1971 ‘अपनों से अपनी बात’ अखण्ड ज्योति)
जिस स्थान पर यह शाँतिकुँज बना हुआ हैं, यहाँ सात ऋषियों ने तपस्या की हैं। उससे पहले गुरु जी ने क्या किया था? उसे पहले अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का संकल्प अखण्ड ज्योति में किया था। जब संकल्प होता है, तो साधन का फल करा रहा हैं। गायत्री तपोभूमि इसी का फल हैं
यह वर्ष था भारत छोड़ो आन्दोलन का, जिसकी घोषणा 8 अगस्त को कि गई एवं इसी वर्ष हमारी आराध्यसत्ता परमपूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा इसे 21वीं सदी (वि.सं. 2000) के आगमन की वेला में सतयुग के नवयुग के आगमन का आगमन कहा गया। जहां जनवरी 1943 का अखण्ड ज्योति अंके ‘सतयुग अंक’ के रूप में प्रकाशित हुआ। वहाँ जनवरी 1943 का अंक संवत् 2000 अंक के रूप में छपा। “संदेश नहीं मैं स्वर्गलोक का लाई इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई” का उद्घोष करने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका ने अब खुलकर नवयुग के समग्र धरित्री के लिये उज्ज्वल भविष्य के आवागमन का प्रतिपादन प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया, जो आने वाले चौबीस वर्षों गति पकड़ते-पकड़ते ‘महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ के रूप में परिवर्तित होता चला गया
नियति हमें-प्रबुद्धतासंपन्न अंतःकरण वालों को इसी दिशा में नियोजित कर रही हैं, करके रहेगी। ” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969, पृष्ठ 17)
इस तरह अखण्ड हवन की स्वसंचित प्रक्रिया बन जाती हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ नाम इसी पर रखा गया। यही अखण्ड दीपक अब आगे माता जी सुरक्षित रखेंगी। हम 20 जून को मथुरा छोड़ देंगे
पहले ही तीन संक्राँतियों में जो प्रक्रिया चली आ रही थी, उस में बौद्धिक गुलामी राजनीतिक परतंत्रता के चलते क्राँतिकारी गतिविधियाँ समष्टिगत स्तर पर न होकर छुटपुट प्रयासों के रूप में होती रही, लेकिन उन्होंने वातावरण विनिर्मित किया। उस समय जो जन-जन के कष्ट झेला, उससे कहीं अधिक 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध के साठ वर्षों में झेलना पड़ा हैं, तभी तो “अखण्ड ज्योति” के माध्यम से महाकाल का संदेशवाहक कहता हैं-”भगवान् भूतनाथ अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर नए युग के स्वागत की तैयारी में जुटे हैं। गौरीबल्लभ ने आनंद से विभोर होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया हैं और कल्प–कल्पाँतरों से भरे हुए कालकूट की कुछ बूँद नीलकंठ से निकलकर इस पाप−पंक के ऊपर छिड़क दी हैं, ताकि बढ़े हुए झाड़–झंखाड़ जल भुन जाएँ-कँटीली भूमि साफ हो जाए। कितने ही वीरभद्र अपने आकाश चुँबी फावड़े लेकर जुटे हैं ताकि सफाई हो जाए, क्योंकि अवतार आ रहा हैं
चौथे दशक में जहां विश्वयुद्ध चर्चा का विश्व था। तो ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के शुभारंभ ने-अखण्ड घृतदीप की साक्षी में रहे एक प्रचंड तप ने अध्यात्म जगत् में परोक्ष स्तर पर एक विलक्षण भूमिका संपन्न करना आरंभ कर दी। इससे कोई ओर देख भले ही न पाया हो, किंतु तत्ववेत्ता परोक्ष का अध्ययन करने वाले मनीषी श्री अरविन्द रमण महर्षि न केवल देख रहे थे, वरन् ऋषि चेतना द्वारा संचालित इस कार्य में भागीदार भी थे
क्राँति का यही आयाम विचारक्राँति है। ” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 92, पृष्ठ 43)
एक संदेश था कि “इस वेला में हम आत्मशोधन करें-अपनी दुर्भावनाओं को बारीकी से खोजें, निकाल बाहर करें। अपना जीवन यज्ञमय बना लें, श्रेष्ठ साधक बना लें, जिससे सदैव धर्ममय विचार प्रसारित हों एक से दस तक पहुँचकर यह विचार क्राँति कि आग जन-जन तक फैला दे” (अखण्ड ज्योति जनवरी 1943) एक गौर करने की बात हैं। आजादी की पूर्णवेला में जब चारों और उथल-पुथल मची थी। द्वितीय विश्वयुद्ध पराकाष्ठा पर था, साधनों का जो दैनंदिन जीवन में प्रयोग आते हैं अकाल सा होता जा रहा था, एक परोक्ष जगत् आध्यात्मिक क्राँति का सूत्रपात होने जा रहा था
1936 की अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं “लेखन और प्रवचन हमारा व्यवसाय नहीं, अंतःकरण की इठन है जो निरंतर इसलिए होती रहती हैं कि हमारी अनुभूतियों और उपलब्धियों का लाभ हमारे सहचरों को भी मिलना चाहिए। उपर्युक्त दोनों ही क्रिया–कलाप हम अपनी आँतरिक संपदा दूसरों को हस्ताँतरित करने के उद्देश्य से चलाते रहे हैं। वर्ष 30, अंक 11 पृष्ठ 62 जो विचार इस ऋषिसत्ता के अंतःकरण के माध्यम से जन-जन तक फैल, उन्होंने ही एक प्रचंड क्राँतिकारी प्रवाह गायत्री परिवार के रूप खड़ा किया है
हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं। इसीलिए वह प्रचंड प्राणप्रवाह वाली लेखनी बनकर कभी लाखों अखण्ड ज्योति पाठकों के मनों को मथती हैं, उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर करती हैं, एक रचनात्मक घटक बनने को प्रेरित करती हैं। कभी वह उनकी ओजस्वी वाणी के प्रवाह से निस्सृत हो दृश्यजीवन में प्रखर तप व गहन ममत्व से भरी प्राण फूँक देने वाली अपनी इस विधा से अनेकों के जीवन की दिशाधारा बदले देती हैं। आध्यात्म मंच से समाज व राष्ट्र के अभिनव निर्माण के रचनात्मक क्रिया–कलाप जब उस साधक-संगठन के माध्यम से चलते हैं, तो गायत्री परिवार को सरकार के समानाँतर एक विराटतम आदर्श स्वयंसेवी संगठन के रूप में स्थापित कर देते हैं
इसी वर्ष को उनने भागवत चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था। उनकी उत्कट तप−साधना से अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया। अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया महर्षि रमण भी इसी महत् उद्देश्य के लिए तिरुवन्नामलाई में अरुणाचलम् पर्वत की गुफा में तपोलीन थे। महायोगियों की इस तप−साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई
यह अखण्ड दीपक पहले आँवलखेड़ा (आगरा) में जला, फिर अखण्ड ज्योति-संस्थान, घीयामंडी, मथुरा में एवं अब यह शाँतिकुँज हरिद्वार में विगत 29 वर्षों से सतत् प्रज्ज्वलित हैं। 24 लक्ष के 24 महापुरुष इसकी ही साक्षी में संपन्न हुए। परमवंदनीया माता जी भी इसे सँवारने,प्रखर बनाने, रक्षा करने हेतु तत्पर हो 1943 में मथुरा पूज्यवर के साथ आ जुटी
1967-68 में ही विश्वामित्र ऋषि की तपःस्थली का सप्तसरोवर क्षेत्र में भविष्य के शाँतिकुँज के रूप में चयन हो चुका था। द्रष्टा स्तर की गुरुसत्ता ने मार्च 1962 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में पहले ही लिख दिया कि भावी सवा नौ वर्षों का कार्यक्रम क्या होगा। आयुष्य के 60 वर्ष पूरा होते ही मथुरा से सदा के लिए प्रयाण कर हिमालय की गोद में जा बैठने का निर्धारण वे तभी कर चुके थे जब सप्तर्षि आश्रम के नजदीक शाँतिकुँज के लिए भूमि का चयन हो रहा था, उन दिनों पूज्य गुरुदेव अपनी नित्य की साधना, हजारों से मिलना, समस्याओं का समाधान करना, देशभर में दौरे लगाने के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण चिंतन में निमग्न थे। वह था 1967 में घोषित महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया, इसके लिए महामानवों की तलाश एवं देव-परिवार बसाने के लिए एक टकसाल विनिर्मित करने के लिए एक सिद्धपीठ का निर्माण
एक अभिनव स्तर के प्रत्यक्षवाद के स्तर पर प्रमाणित करने वाली प्रयोगशाला की स्थापना, मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य हेतु योगसाधनाओं, मंत्रविज्ञान, वनौषधि विज्ञान की प्रामाणिकता ठहराने का प्रयास उनको एक उच्चस्तरीय वैज्ञानिक घोषित करता है, तो प्रज्ञापुराण ग्रंथ उनके एक द्रष्टा स्तर के मनीषी होने का द्योतक बन जाता है। उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता आचार्य श्री अपने जीवन के प्रारंभ काल से ही 1942, जब उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मात्र पाँच वर्ष की आयु की थी, सतयुग की वापसी की घोषणा करते हैं-वैसे समाज का निर्माण ही नहीं करते, अपितु अपने अथक् पुरुषार्थ से अपने पाँच करोड़ से अधिक की जनमेदिनी भी आदर्शों के मोरचे पर खड़ी कर देते हैं। इस लाख से अधिक समय-साधन समाज के निमित्त देने वाले युगसैनिकों का निर्माण एवं उनके माध्यम से दो करोड़ प्रतिभाओं का परिष्कार कर उन्हें नवसृजन में झोंक देना किसी को एक कागजी योजना लग सकता है, जब यह समष्टि स्तर पर गतिशील हो, तो लगता है, पर जब सहस्राब्दी के युगनायक द्वारा वस्तुतः एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ संपन्न हुआ हैं
जिसे अखंड रूप से प्रज्वलित बनाए रखने के लिए बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, मोहनदास करमचंद गाँधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि और महातपस्वी अपना सर्वस्व अर्पित करने उठ खड़े हुए। देवात्मा हिमालय की ऋषिसत्ताएँ भी इन्हीं दिनों उत्तर भारत के छोटे-से गाँव में इस महाअभियान को ऊर्जा देने वाली अखण्ड ज्योति प्रज्वलित कर रही थीं। राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य जन्म ले रहा था
हमारा उज्ज्वल भविष्य भी ऐसा होने जा रहा हैं, जिसमें हम प्रत्येक क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व, मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ हो सके। ” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969 पृष्ठ 17)। बड़ा ही आशावादी-युगप्रवर्तक स्तर का चिंतन हमारी आराध्यसत्ता का रहा हैं एवं उसी ने इस निराशा के कुहासे से उबारकर सतयुगी संकल्प के साथ जोड़ा हैं। इस संकल्प की धुरी दो हैं- मनुष्य में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण
वे पूरी दृढ़ता के साथ जून 1967 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं-”त्रिपुरारी महाकाल ने अतीत में भी त्रिविध गाया मरीचिका को शिक्षण का सहारा व निर्माण के त्रिशूल से तोड़-फोड़कर विदीर्ण किया था। अब वे फिर इसी की महापूर्णाहुति करने वाले हैं। धर्म जीतने वाला है, अधर्म हारने वाला है
महाकाल और महाकाली उसे किसी विशेष अवसर पर अपना वाहन बनाते हैं और देहधारी के माध्यम से वे सूक्ष्मसत्ताएँ अपना काम करती हैं। ” (पृष्ठ 23, अखण्ड ज्योति जून 1967) इस अंक के 4 महा बाद अक्टूबर 67 में एक विशेषाँक प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया पर केंद्रित था। भावी विभीषिकाएँ और उनका प्रयोजन महाकाल और उनका रौद्ररूप, त्रिपुरारी महाकाल शिव का तृतीय नेत्रोन्मीलन, दशमावतार जैसे शीर्षकों से सज्जित इस अंक को एक विशिष्ट सामग्री के साथ संपादित कर एक पुस्तक में एक लख हैं-’अपना परिवार उच्च आत्माओं का भाँडागार। ’ इसी में उन्होंने मध्यावतार व अंशावतार की व्याख्या की थी वह कहा कि हमें इन उच्चस्तरीय आत्माओं के माध्यम से युगपरिवर्तन के विराट् प्रयोजन को पूरा कराना हैं
वहाँ जनवरी 1943 का अंक संवत् 2000 अंक के रूप में छपा। “संदेश नहीं मैं स्वर्गलोक का लाई इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई” का उद्घोष करने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका ने अब खुलकर नवयुग के समग्र धरित्री के लिये उज्ज्वल भविष्य के आवागमन का प्रतिपादन प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया, जो आने वाले चौबीस वर्षों गति पकड़ते-पकड़ते ‘महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ के रूप में परिवर्तित होता चला गया
स्वतंत्रता संग्राम में बिना नाम की कामना के जुटे एक स्वयंसेवी सैनिक के माध्यम से जब कठोर तपश्चर्या भी की जाती हैं- अपनी गुरुसत्ता के निर्देश पर एक अखण्ड घृतदीप जब चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण किए जाते हैं, एक क्राँति की आग लगाने वाली आत्मशोधन व आत्मोत्थान से समाज व राष्ट्रनिर्माण की बात कहने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका आरंभ की जाती हैं, सारा सुख−वैभव एक कोने पर रखकर मात्र समाज के उद्धार हेतु एवं जन-जन में सतयुगी उल्लास बिखेरने का संदेश पहुँचता दिखाई देता है, तो विश्वास सुदृढ़ होने लगता है। आचार्य शकर ही विद्वता, महात्मा बुद्ध की करुणा, कबीर-सा फक्कड़पन, ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस-सी विद्या–विस्तार की योजना एवं विवेकानंद-सा योद्धा संन्यासी हमें समन्वित रूप से आचार्य श्री में देखने को मिलता है
दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की गंगातट पर बनी काली–कमली वाले बाबा की छोटी कुटिया हो अथवा सप्तर्षि आश्रम परिसर में बनी छोटी अंतर्मुखी बना देने वाली साधना कुटीर हो, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि का उनका साधनाकक्ष हो अथवा शाँतिकुँज स्थित मुख्य भवन में ऊपर की मंजिल की उनकी साधनास्थली-हर स्थान पर उस साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं
“धर्म ने ही मनुष्य को असुरता की परतों से उबारकर उस स्तर तक पहुँचता है, जिसमें बढ़ी-चढ़ी संपत्ति के आधार पर ही नहीं, सुविकसित सभ्यता के आधार पर भी गर्व करने का अधिकारी हैं। ” (अखण्ड ज्योति मार्च 1967, पृष्ठ 50)। इस धार्मिक क्राँति के बाद मानवी सभ्यता के विकासक्रम में दार्शनिक क्राँति ने जन्म लिया। मनीषी नए समय के लिए नए समाधान खोजने लगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
-अखण्ड ज्योति मार्च 1163, पृष्ठ 41
“युग निर्माण योजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए हम ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ को उसी तरह प्रयुक्त करेंगे, जैसे एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में तन्मय हो जाता है या एक माली अपने बगीचे में अपने आप को खो देता है। बगीचे का हर खिलता हुआ फूल माली की अंतरात्मा में प्रसन्नता की लहरें उद्वेलित करता है। हमारी प्रसन्नता का स्त्रोत भी अब अखण्ड ज्योति परिवार से संबद्ध स्वजनों के खिलते और निखरते जीवन के साथ संबद्ध रहेगा
-अखण्ड ज्योति मार्च 1167, पृष्ठ 2
” (पृष्ठ 52 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399) “पूर्वार्ध और पाश्चात्य दिव्यदर्शियों ने ऐसी भविष्य वाणियाँ की है, जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अंत आते-आते कहर बरपेगा, किंतु इसके बाद ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जाएगी। ” (अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 51) “सूक्ष्म जगत् के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने (हेतु एक दिव्य उपासना है यह बारह वर्षीय महापुरश्चरण। इसका उद्देश्य है, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। इसे नाम दिया गया है युगसंधि महापुरश्चरण
महापूर्णाहुति में आने वाले परिजन अपने पीछे पोस्ट ऑफिस से अखण्ड ज्योति प्राप्त करने की व्यवस्था करके आएं। किन्हीं को अधिकार-पत्र देना हो, तो अधिकार-पत्र दे दे, अथवा डाकघर में उतने दिन डाक रोकने के निर्देश दे दें, अन्यथा उनकी अनुपस्थिति में डाकघर अखण्ड ज्योति वापस कर देगा। सदस्यों एवं संस्था दोनों की ही कठिनाई बढ़ेगी
“अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमारे विशेष प्रयत्नों का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूंढ़-ढूंढ़कर हमने देशभर से संस्कारवान् जागृतात्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्र किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम
इसमें एक ओर महाविनाशी प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नव निर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। ” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399, पृष्ठ 42) “युग परिवर्तन की, नवसृजन की, नवसृजन की संभावना तो पूरी होने ही वाली है, क्योंकि उसके न बन पड़ने पर ‘महाप्रलय’ ही होश रह जाती है, जो कि स्पष्ट को अभी स्वीकार नहीं। ” (पृष्ठ 51 अखण्ड ज्योति की अक्टूबर 1399) “सामूहिक जीवन मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता
-अखण्ड ज्योति सितंबर 1162, पृष्ठ 51
यदि आगे उसे कुछ और सेवाकार्य करने का श्रेय मिलना होगा, तो वह ईश्वरीय शक्ति की सहायता से ही संभव होगा। अखण्ड ज्योति परिवार में सभी सदस्यों को भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें ऐसा आत्मबल दें, जिसके सहारे आदर्श का उत्कृष्ट जीवन बिताने और देश, धर्म, जाति और संस्कृति की सेवा कर सकने का अवसर मिले। ”
” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399, पृष्ठ 42) “युग परिवर्तन की, नवसृजन की, नवसृजन की संभावना तो पूरी होने ही वाली है, क्योंकि उसके न बन पड़ने पर ‘महाप्रलय’ ही होश रह जाती है, जो कि स्पष्ट को अभी स्वीकार नहीं। ” (पृष्ठ 51 अखण्ड ज्योति की अक्टूबर 1399) “सामूहिक जीवन मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता
“अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में युग परिवर्तन के लिए किया गया छोटा-सा शुभारंभ वट-वृक्ष की तरह पल्लवित हो, ऐसी आशा और प्रार्थना हम सबको करनी चाहिए। ”
-अखण्ड ज्योति दिसंबर 1163, पृष्ठ 50
गुरुदेव ने लेख पढ़ा, पढ़कर मुस्कराए और कहा, यह किसी के विरुद्ध नहीं है, बल्कि एक वैचारिक बहस का आमंत्रण है। अखण्ड ज्योति में भी इस विषय पर कुछ छपना चाहिए। नास्तिकता, ईष्वरवीयश्वास के दुरुपयोग और प्रच्छन्न वास्तविकता आदि विषयों पर गुरुदेव ने स्वयं तीन-चार लेख हैं। किसी भी अभिभावक, आचार्य अथवा गुरु में है इस तरह का साहस और खुलापन?
-अखण्ड ज्योति जुलाई 1175, पृष्ठ 61
-अखण्ड ज्योति दिसंबर 1165, पृष्ठ 43
इस अति महत्वपूर्ण तीसरे अध्याय के हर श्लोक में बड़ा गूढ़ शिक्षण छिपा पड़ा है। अगस्त 2000 की अखण्ड ज्योति में श्लोक क्रमाँक 16 से 20 तक की व्याख्या विस्तार से प्रस्तुत की गई थी। इसमें भगवान् श्री कृष्ण राजा जनक का उदाहरण देते हुए, आसक्ति रहित कर्म कैसे किए जाने चाहिए, यह अर्जुन को समझाते हैं। भगवान् कहते हैं कि लोकशिक्षण-मार्गदर्शन (लोकसंग्रह) को देखते हुए भी (ध्यान में रखकर भी) तुझे कर्म करना चाहिए
“अखण्ड ज्योति ने अपने प्रयासों के उस उद्गम पर केंद्रित किया है, जहाँ से विकास और विनाश के दोनों ही झरने फूटते हैं। विकृत चिंतन का निवारण व जनमानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन, यही है हमारा विचारक्राँति अभियान। यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान ज्ञानयज्ञ
बगीचे का हर खिलता हुआ फूल माली की अंतरात्मा में प्रसन्नता की लहरें उद्वेलित करता है। हमारी प्रसन्नता का स्त्रोत भी अब अखण्ड ज्योति परिवार से संबद्ध स्वजनों के खिलते और निखरते जीवन के साथ संबद्ध रहेगा। ”
इसे साकार होना ही है। इसको आरंभ करने का श्रेय अखण्ड ज्योति परिवार को मिल रहा है, तो इस सौभाग्य के लिए हम में से प्रत्येक को प्रसन्न होना चाहिए और गर्व अनुभव करना चाहिए। ”
-अखण्ड ज्योति मार्च 1174, पृष्ठ 52
“गायत्री उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम अखण्ड ज्योति परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्तिगत रूप से अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय है और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। ”
पुरुषमेध का अर्थ यह नहीं कि किसी की बलि दी जाती हो अथवा वध किया जाता हो। अश्वमेध संपन्न करने वाले हमारे पाठक-परिजन 1332 के नवंबर माह की अखण्ड ज्योति विशेषांक में मेध शब्द की व्याख्या से पूर्णतः परिचित हैं। यहाँ मेध शब्द का अर्थ है परस्पर मिलना, संगति करना, जोड़ता, परस्पर प्रेमभाव बढ़ाना। पुरुष शब्द का अर्थ स्त्री-पुरुष, मानव जाति है
-अखण्ड ज्योति नवंबर 1168, पृष्ठ 63
-अखण्ड ज्योति जून 1163, पृष्ठ 11
अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि गूलर के एक फल को आँच आने पर उसके भीतर रहने वाले सभी भुनगे अपनी जान गँवा बैठते हैं। ” (पृष्ठ 52 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399) “पूर्वार्ध और पाश्चात्य दिव्यदर्शियों ने ऐसी भविष्य वाणियाँ की है, जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अंत आते-आते कहर बरपेगा, किंतु इसके बाद ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जाएगी। ” (अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 51) “सूक्ष्म जगत् के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने (हेतु एक दिव्य उपासना है यह बारह वर्षीय महापुरश्चरण। इसका उद्देश्य है, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन
इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी महापूर्णाहुति होगी। ” अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 61 बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी 133 की अखण्ड ज्योति में सभी को संबोधित करते हुए कहा, “एक ही व्रष्सेजप के लिए, एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है, तो उससे बिखराव वाली अस्तव्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण को उसी स्तर का, जिसमें देवताओं की बिखरी शक्ति से प्रजापति द्वारा महाकाली का सृजन किया गया था, एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है। ” (पृष्ठ 25)
-अखण्ड ज्योति जून 1163, पृष्ठ 15
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
वे अपने विषय में वास्तविकता उजागर करते हुए लिखते है, “कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर फूट-फूटकर रोए हैं इसे कोई जानता है ? लोग हमें संत, सिद्ध ज्ञानी मानते हैं कोई लेखक, विद्वान वक्ता, नेता समझते हैं पर किसने हमारा अंतःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है ? कोई उसे देख सका होता, तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों के करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इन हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती है। ” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1991) विश्व मानव की तड़पन जब अपनी तड़पन बन जाए, जब जन-जन की व्यथा-वेदना को समाने खड़ा देख अपनी निज की पीड़ा से अधिक कष्ट अनुभव होने लगे तो यही अभिव्यक्ति होती है, “ दर्द और जलन ने हमें क्षणभर चैन से न बैठने दिया तो हम करते भी क्या ? जो दर्द से इठा जा रहा हो, वह हाथ-पैर न पटके, तो क्या करें ? “ (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1971)
आज गायत्री परिवार और अधिक बड़ा होकर विश्वव्यापी हो रहा है लेकिन इसके मूल में वही भावनाएँ है जो गुरुदेव ने अपने गृहस्थ जीवन में सँजोई थी। उनके गृहस्थ जीवन के अगणित प्रसंग आज उनकी संतानों के लिए भारतीय संस्कृति में निष्ठा रखने वालों के लिए भी अनमोल प्रेरणाएँ है बात अखण्ड ज्योति संस्थान, गायत्री तपोभूमि मथुरा की हो या फिर शाँतिकुँज की परम स्नेही पिता के रूप में परमपूज्य गुरुदेव एवं वात्सल्यमयी माँ के रूप में वंदनीया माताजी हर कहीं अपना आदर्श प्रस्तुत कर शिक्षा एवं संस्कार देते दिखाई पड़ते है
विभिन्न अवरोधों एवं अविषय व्यस्तता के बावजूद उनका यह युगाँतरकारी कार्य चलता रहा, लेकिन इसका यथार्थ विकास उनकी सन् 1971 की हिमालय यात्रा के समय हुआ। हम हिमालय प्रवास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने मार्च 1989 की अखण्ड ज्योति में लिखा, “हिमालय, गंगातट, एकाँत, जनसंपर्क पर प्रतिबंध जैसी कष्टसाध्य गतिविधियाँ अपनाने के पीछे एक रहस्य यह भी है कि वह प्रदेश एवं वह वातावरण ही उच्च आध्यात्मिक स्तर की शोधों के लिए उपयुक्त हो सकता है। स्थान की दृष्टि से वह स्थान अध्यात्म शक्ति तत्त्वों का ध्रुवकेंद्र या हृदय ही कहा जा सकता है, जहाँ हमें अगले दिनों जाना है। वहाँ ऐसी विभूतियाँ अभी जीवित है, जो इस महान् कार्य में हमारा मार्गदर्शन कर सकें
(1) योग (2) तंत्र। योगमार्ग में उच्चस्तरीय साधना पंचकोशों के अनावरण की है जिसकी थोड़ी-सा शिक्षण अखण्ड ज्योति के माध्यम से कर चुके हैं अभी इस विद्या को साँगोपाँग बताया जाना शेष है। उसी प्रकार तंत्रमार्ग की गायत्री कुँडलिनी कहलाती है। उसकी छिटपुट चर्चा इन दिनों हम कर रहे हैं
ज्योतिष, योग और गुह्य विद्याओं की अन्य धाराओं में क्रिया, विधि और व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है। गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति के पन्नों पर आरंभ से ही इन तथ्यों का उद्घाटन किया। बाद में तो पत्रिका और गुरुदेव का इतर साहित्य साधना के गूढ रहस्यों के उद्घाटन पर ही केंद्रित हो गया। गुरुदेव ने मथुरा से प्रयाण करने से पूर्व अपने भावी कार्यक्रमों के बारे में लिखा था
परमपूज्य गुरुदेव ने जून 1936 की अखण्ड ज्योति में लिखा है “नये विश्व का निर्माण एकता, समता, ममता, शुचिता की चार आधारशिलाओं पर निर्भर है। इन चारों को संसार के कोने-कोने में विभिन्न देशों और विचारों के व्यक्तियों में अलग-अलग ढंग से प्रतिष्ठापित परिपुष्ट एवं फलित किया जा रहा है। भारत में शतसूत्री युग निर्माण योजना उसी आधार पर यहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप गतिशील की गई है
मथुरा में विदाई सम्मेलन से पूर्व दिया गया यह आश्वासन अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही पूरा नहीं हुआ, शाँतिकुँज में चले साधना सत्रों में भी चरितार्थ हुआ। प्राण प्रत्यावर्तन शक्पात, जीवन साधना कुंडलिनी योग और योगमार्ग का व्यावहारिक अभ्यास सिखाने वाले सत्र परिजनों को आज भी याद हैं। उनमें गुरुदेव स्वयं निर्देश देते थे और अंतर्यात्रा में एक-एक पल के साक्षी बनकर साधकों को गहराई तक ले जाते थे
इसलिए सन् 2001 की जनवरी से अखण्ड ज्योति का चंदा बढ़ाकर साठ से बहत्तर रुपये वार्षिक किया जा रहा है। विगत पाँच वर्षों से यह कीमत बढ़ाई नहीं गई थी, कलेवर बढ़ गया व रंगीन चित्र भी आने लगे। अब यह बढ़ी कीमत पर और भी आकर्षक रूप से प्रकाशित हो, ऐसी योजनाएँ बनाई जा रही है
सब तरफ से मन हार-थककर निराश हो गया। तभी कहीं से पता चला कि मथुरा में एक आचार्य जी रहते है जो बड़े सिद्ध-समर्थ है मेरी पत्नी मुझे लेकर जैसे-तैसे घीयामंडी अखण्ड ज्योति संस्थान पहुँची। द्वार पर ही धोती कुरता पहने एक सज्जन खड़े थे उनके मुख पर दैवी प्रेम की आभा थी। उन्होंने बड़े प्यार से मेरा नाम लेकर पुकारा रूपनारायण
उनके द्वारा विनिर्मित गृहस्थ का तपोवन इसी व्यापक दायरे में फैला था। इस अखण्ड ज्योति परिवार में बात शिक्षा एवं संस्कार तक ही सीमित न थी। प्यार-दुलार, अपनत्व, ममता, झिड़की, फटकार, मनुहार सभी कुछ इसमें शामिल था। बच्चों पर माँ-बाप का अधिकार होता है
साँस्कृतिक क्राँति के अग्रदूत के रूप में परमपूज्य गुरुदेव ने इसी कार्य का अभिनव शुभारंभ किया। 40 के दशक में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति सतत् इसी का ताना-बाना बुन रही है। गायत्री तपोभूमि पूज्यवर की प्रथम कर्मस्थली रही। यहाँ पर एक प्रतिष्ठित संस्कृत प्रेमी सज्जन एक बार आए, तो वे गुरुदेव की हर बात को अनसुना करते हुए एक ही बात की रट लगाए रहे कि यहाँ सब कुछ संस्कृत में क्यों नहीं पढ़ाया जाता ? यहाँ सारा जोर संस्कृत पर ही क्यों नहीं दिया जाता
उसकी छिटपुट चर्चा इन दिनों हम कर रहे हैं। अगले दिनों नैष्ठिक साधकों को योगमार्ग की पंचकोशों के अनावरण की साधना और तंत्रमार्ग की कुँडलिनी जागरण की शिक्षा अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया गया यह शिक्षण सर्वथा होगा और उससे अनेक निष्ठावान् भारी लाभ उठा सकेंगे
“अपने-अपने वैयक्तिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र के ही उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर देना ही पुरुषमेध यज्ञ है। ” यह जनवरी 1958 में अखण्ड ज्योति पत्रिका में स्वामी श्री अभयदेव जी द्वारा उद्धृत है। व्यष्टि पुरुष, राष्ट्र पुरुष, विराट् पुरुष की समग्र साधना एवं इनके द्वारा सर्वस्व की प्राप्ति के लिए किया गया उपक्रम ही पुरुषमेध है
हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सकें, हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए जो आँखों के आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके। ” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1971)
गुरुदेव ने मथुरा से प्रयाण करने से पूर्व अपने भावी कार्यक्रमों के बारे में लिखा था। परिजनों से संवाद के रूप में अखण्ड ज्योति के स्तंभ “अपनों से अपनी बात” में उन्होंने लिखा, “गायत्री उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत कई वर्षों से सिखाते-समझाते चले आ रहे हैं। इस विद्या की उच्चस्तरीय साधना के दो पक्ष है। (1) योग (2) तंत्र
वे लिखते थे, “ हमारी उपासना पद्धति के अंतराल में सन्निहित यह प्रेम-साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी। ” (अखण्ड ज्योति अप्रैल 1969)। वे इसी लेखमाला में लिखते है “ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरुभक्ति की प्रयोगशाला में, व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभु-प्रेम के दंगल में जा पहुँचे
बाद में उन्होंने ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की संस्थापना की। इस बारे में उन्होंने नवंबर 1976 की अखण्ड ज्योति में लिखा, “अखण्ड ज्योति परिजनों को यह जानकर हर्ष और गर्व होगा कि अध्यात्म और विज्ञान को जोड़ने वाले जो प्रतिपादन अब तक पत्रिका के पृष्ठों पर किए जाते रहे है, अब उन्हें प्रत्यक्ष प्रमाणित करने के लिए सुसंपन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है। अध्यात्म सिद्धाँत विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते है। उसमें अनेकानेक पक्षों को प्रयोगशाला में सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाएगा
यह अपनी लंबी यात्रा अनेकानेक व्यवधानों के बावजूद पूरी करती रही है, क्योंकि इसके पीछे इसके प्रति परिजनों का श्रद्धाभाव जुड़ा है। युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा कठोर तप के नवनीत द्वारा आत्ममंथन के माध्यम से जो भी कुछ सार निकला, ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के रूप में जनाजन के सम्मुख आया। चूँकि परोक्षजगत से संचालित प्राणीशक्ति का पुँज है यह , परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण (1990), परमपूज्यनीया माताजी के भी उन्हीं में लय होने (1994) के बाद भी इसके पाठकों में अनवरत वृद्धि होती रही है एवं विगत दस वर्षों में इनकी संख्या ढाई गुना बढ़ी है
छोटी शुरुआत धीरे-धीरे बड़ी हुई। अखण्ड ज्योति परिवार और अधिक बड़ा होकर गायत्री परिवार बना। गुरुदेव मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए। इसे अन्य शब्दों में कहें तो गुरुदेव का गृहस्थ जीवन और व्यापक हुआ
उदाहरणार्थ उनने साँस्कृतिक जागरण का काम आगरा शहर से आरंभ किया। पहली अखण्ड ज्योति की प्रति 1937-36 में यही से प्रकाशित हुई थी किन्तु फिर कुछ समय बाद ही वे मथुरा (1941-42) आ गए। इतिहास की दृष्टि से आगरा की थाती ज्यादा बड़ी हो सकती है। ताजमहल, लाल किला आदि ने उसे एक पहचान दी है
जुलाई 1969 की अखण्ड ज्योति में पूज्यवर लिखते हैं “अपनों से अपनी बात कहते हुए हमें इन पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट कर देना है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। प्राचीनकाल की महान् परंपराओं की पुनः प्रतिष्ठा होनी है
लोग हमें भूल सकते है, पर हम अपने किसी स्नेही को भूलेंगे नहीं। ” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1979)
गुरुदेव के लेखन से तो अब भारत के जन-जन ही नहीं, विदेशों के बहुसंख्यक जन भी सुपरिचित हो चुके हैं अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री आदि मासिक पत्रिकाएँ उन्हीं की लेखनी की अभिव्यक्ति हैं संपूर्ण वाङ्मय के शताधिक खंडों में शाँतिकुँज गायत्री, तपोभूमि से प्रकाशित तीन हजार से भी अधिक पुस्तकों में उन्हीं की लेखनी का वैभव विस्तार है और यह उनके धर्म-तंत्र से लोक-शिक्षण को ही प्रकाशित-परिभाषित करता है किंतु इसके अतिरिक्त उनके प्रवचन है जो उन्होंने गायत्री तपोभूमि में शाँतिकुँज में तथा क्षेत्रों के विविध कार्यक्रमों में दिए। ये प्रवचन इधर कुछ वर्षों से अखण्ड ज्योति मासिक में “अमृतवाणी” के रूप में प्रकाशित भी हो रहे है इसके अतिरिक्त इनके आडियो कैसेट्स भी उपलब्ध हैं। इन सबको आज भी क्रमशः पढ़ा और सुना जा सकता है
विलासिता की सामग्री जहर-सी लगती हैं विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई, तो आत्मग्लानि से उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी एक गिलास को अपने पैर धोने की विडंबना में बिखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़पकर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर कैसे अपना भरा पेट और भरे? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़कर पिता कैसे शतरंज का साज सजाए ?” (अखण्ड ज्योति मार्च, 1971)
इनसे निताँत भिन्न है। ‘अखण्ड ज्योति’। जिसने जन-जन की सुयचित को बढ़ाया है एवं एक विधेयात्मक स्वाध्याय की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। विज्ञापन उपर्युक्त सभी पत्रिकाएं लेती है व अपनी अधिकाँश आय उन्हीं से इस उपभोक्ता प्रधान जगत् में लेती है
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका 86 वर्षों से सतत् प्रकाशित होती रही है। यह परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना की संवाहिका है। हाथ से बने कागज पर , हाथ से चलने वाली मशीन की श्रम-साध्य प्रक्रिया से इसकी छपाई गई थी
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे इस अंक के महानायक संस्कृति पुरुष की मथुरा से विदाई लेने की घड़ी में लिखी गई थी परिजनों से प्यार, अनंत परिणाम में स्नेह यह एक संगठक, अभिभावक, परिवार के मुखिया की एक ऐसी विशिष्टता जिस पर उस संगठन, उस समुदाय, राष्ट्र का साँस्कृतिक उत्कर्ष टिका माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के संपादक के रूप में दो लेख अप्रैल व मई 1939 की पत्रिकाओं में लिखे, हमारी प्रेम-साधना और उसकी परिणति-खंड 1 व 2’। उनमें उन्होंने लिखा है कि उनकी साधना की जो मूल धुरी रही है वह है अंतः करण में प्रेमतत्व का अभिवर्द्धन। यह प्रेम उन्होंने परमात्मा से किया गुरुसत्ता से किया तथा उसकी तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित की
आंखें बरसती रहती है और सिरहाने रखे वस्त्र गीले होते रहते हैं। ’ (अखण्ड ज्योति जनवरी, 1971)
आत्मकल्याण की साधना और लोक-मंगली की प्रवृत्ति के युग्म द्वारा समग्र उत्थान की बात जन-जन सोचने लगे। अंदर की इसी आग को सँजोए परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति पत्रिका का अगस्त 1969 का अंक ‘विचारक्राँति अंक’ के रूप में लिखा। इस अंक में संस्कृति पुरुष के व्यक्तित्व के दो महत्त्वपूर्ण पहलू दृष्टिगोचर होते हैं पहला विचारक्राँति के माध्यम से युगनिर्माण योजना की संघर्षात्मक-रचनात्मक गतिविधियों को जन्म देने वाले संगठन का, तो दूसरा एक ऐसे अभिभावक का, जो अपने परिजनों से बिछुड़ने की बात मन में सोचते ही द्रवित हो उठता है उसकी व्यथा-वेदना ऐसे प्रकट होती है, “अखण्ड ज्योति परिवार में हमने गिन-गिनकर चुन-चुनकर परख-परखकर मणिमुक्तक खोजे हैं और उन्हें एक शृंखला-सूत्र में आबद्ध किया है। वे हमें भले ही भूल गए हों, पर हमें उन्हें भूले नहीं है
” तभी तो दहेज के कारण जलने वाली बहुओं का वृत्ताँत पढ़ते ही उनका गला रुँध जाता है एवं वे लिखने लगते हैं, ‘6 विवाहोन्माद के महिषासुर का विचारक्राँति की देवी के तीखे त्रिशूलों से वध होकर ही रहेगा। ” (अखण्ड ज्योति नवम्बर 1971)
गुरुदेव माताजी का अपना सबसे छोटा परिवार अखण्ड ज्योति परिवार था। सही मायने में इसे ही उनके गृहस्थ जीवन की शुरुआत कहें तो उचित होगा, क्योंकि अखण्ड ज्योति पत्रिका और अपने हस्तलिखित पत्रों के माध्यम से वे अपने बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने में ही तो लगे थे। उनके द्वारा विनिर्मित गृहस्थ का तपोवन इसी व्यापक दायरे में फैला था। इस अखण्ड ज्योति परिवार में बात शिक्षा एवं संस्कार तक ही सीमित न थी
अंदर की इसी आग को सँजोए परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति पत्रिका का अगस्त 1969 का अंक ‘विचारक्राँति अंक’ के रूप में लिखा। इस अंक में संस्कृति पुरुष के व्यक्तित्व के दो महत्त्वपूर्ण पहलू दृष्टिगोचर होते हैं पहला विचारक्राँति के माध्यम से युगनिर्माण योजना की संघर्षात्मक-रचनात्मक गतिविधियों को जन्म देने वाले संगठन का, तो दूसरा एक ऐसे अभिभावक का, जो अपने परिजनों से बिछुड़ने की बात मन में सोचते ही द्रवित हो उठता है उसकी व्यथा-वेदना ऐसे प्रकट होती है, “अखण्ड ज्योति परिवार में हमने गिन-गिनकर चुन-चुनकर परख-परखकर मणिमुक्तक खोजे हैं और उन्हें एक शृंखला-सूत्र में आबद्ध किया है। वे हमें भले ही भूल गए हों, पर हमें उन्हें भूले नहीं है। हम उन सभी के पूर्व चित्र और चरित्रों को भी जानते हैं जिनके साथ हमारा अति घनिष्ठ संबंध लगातार कई जन्मों से रहा है
कहने-सुनने में यह सब मामूली शब्द लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है। पर वस्तुतः उस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्मसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है (अखण्ड ज्योति फरवरी 1971)
गुरुदेव माताजी का अपना सबसे छोटा परिवार अखण्ड ज्योति परिवार था। सही मायने में इसे ही उनके गृहस्थ जीवन की शुरुआत कहें तो उचित होगा, क्योंकि अखण्ड ज्योति पत्रिका और अपने हस्तलिखित पत्रों के माध्यम से वे अपने बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने में ही तो लगे थे। उनके द्वारा विनिर्मित गृहस्थ का तपोवन इसी व्यापक दायरे में फैला था
यही कारण था कि वे अपने विराट् परिवार से अंतिम समय तक भी अतिशय प्रेम करते रहे। जनवरी 1969 की अखण्ड ज्योति में जब वे मथुरा से हिमालय तप-प्रवाह हेतु विदाई की घड़ियां और हमारी व्यथा वेदना। वे लिखते हैं, कोई अपनी चमड़ी उघाड़कर भीतर का अंतरंग परखने लगे, तो उसे माँस और हड्डियों में एक तत्त्व उफनता दिखाई देगा, वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही उपार्जन किया है, प्रेम
अपनी नीति शुरू से ही संस्थापक, आराध्य सता के निर्देशानुसार वैसी ही चलती रही हैं, चलती रहेगी। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मूलतः परिजनों के अंशदान से चलती है, ज्योति प्रज्वलित बनी रही है इसी में इसकी शुचिता भी है, गरिमा भी
इस नई दिशा की विनिर्मिति पहले-पहले अखण्ड ज्योति के लेखों के माध्यम से हुई। बाद में उन्होंने ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की संस्थापना की। इस बारे में उन्होंने नवंबर 1976 की अखण्ड ज्योति में लिखा, “अखण्ड ज्योति परिजनों को यह जानकर हर्ष और गर्व होगा कि अध्यात्म और विज्ञान को जोड़ने वाले जो प्रतिपादन अब तक पत्रिका के पृष्ठों पर किए जाते रहे है, अब उन्हें प्रत्यक्ष प्रमाणित करने के लिए सुसंपन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है
अपनी मार्गदर्शक सत्ता से द्वितीय साक्षात्कार के समय ही उनके कंधों पर आर्ष साहित्य के उद्धार का गुरुतर भार आ गया था। आगरा में अखण्ड ज्योति का प्रकाशन आरंभ करते वक्त 1939-97 में गुरुदेव ने इस विषय की सामग्री जुटानी शुरू कर दी थी
जब गुरुदेव अखण्ड ज्योति संस्थान में रहा करते थे, उस समय से जुड़े एक परिजन बताते हैं कि वह एक बार गायत्री तपोभूमि मथुरा गए। उस दिन गायत्री जयंती थीं सब ओर उल्लास-उत्सव का माहौल था। गुरुदेव एक ओर कुरसी पर बैठे थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 63
जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनतापूर्वक गुँथ गए उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति क्या है वसंत पर्व की एक स्फुरणा। प्रकाराँतर में हम लोगों के निताँत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है, जो वसंतपर्व के उपहार के स्वरूप उमगी और जिसके बंधनों में बँधकर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान् लक्ष्य की ओर कंधे-से-कंधा मिलाकर चल पड़े
अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 62
‘अखण्ड ज्योति’ का प्रकाशन ठीक वसंतपर्व के दिन से ही हुआ था। यों दिखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है, पर जिन्होंने उसे निकट से देखा है, वे जानते हैं कि यह प्रकाशपुँज है, जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। आत्मा को, अखण्ड ज्योति का दिव्यदर्शन, प्रत्याहार, ध्यान-धारणा, समाधि के क्षेत्र के आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है
अखण्ड ज्योति दिसंबर 75, पृष्ठ 62
अपना आध्यात्मिक परिवार ही अखण्ड ज्योति के सदस्यों के रूप में बिखरा पड़ा है। कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक-दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनतापूर्वक गुँथ गए उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका कहा जा सकता है
‘अखण्ड ज्योति’ लगती भर पत्रिका है, वस्तुतः यह एक मिशन है, जो किसी वर्ग, क्षेत्र, धर्म की समिति परिधि में नहीं बँधता और न छुटपुट सामयिक हलचलों तक सीमित होता है। फुँसियों पर मरहम-पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्तशोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड ज्योति कहा जा सकता है
यों दिखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है, पर जिन्होंने उसे निकट से देखा है, वे जानते हैं कि यह प्रकाशपुँज है, जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। आत्मा को, अखण्ड ज्योति का दिव्यदर्शन, प्रत्याहार, ध्यान-धारणा, समाधि के क्षेत्र के आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा, यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य ‘अखण्ड ज्योति’ का इतिहास। युगाँतरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है, उसका सेवा-साधना क्षेत्र युगनिर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है
फुँसियों पर मरहम-पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्तशोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड ज्योति कहा जा सकता है। आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है, पर वस्तुतः है वह अत्यंत गरिमायुक्त एवं बहुमूल्य
कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक-दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनतापूर्वक गुँथ गए उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति क्या है वसंत पर्व की एक स्फुरणा। प्रकाराँतर में हम लोगों के निताँत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है, जो वसंतपर्व के उपहार के स्वरूप उमगी और जिसके बंधनों में बँधकर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान् लक्ष्य की ओर कंधे-से-कंधा मिलाकर चल पड़े
आत्मा को, अखण्ड ज्योति का दिव्यदर्शन, प्रत्याहार, ध्यान-धारणा, समाधि के क्षेत्र के आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा, यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य ‘अखण्ड ज्योति’ का इतिहास। युगाँतरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है, उसका सेवा-साधना क्षेत्र युगनिर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है
यह मणिमुक्तक वितरण करने जैसी प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही वह प्रयत्न है, जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले पचास वर्षों से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है
असुरता की परंपरा है, अनीति को भड़काना वह अनौचित्य का माहौल बनाना। परमपूज्य गुरुदेव मई 1989 की अखण्ड ज्योति, पृष्ठ 2 में लिखते हैं, “वृत्रासुर, भस्मासुर, महिषासुर, हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, दुर्योधन आदि नाम तो हैं ही, उनका अपना समुदाय भी रहा है, जिसमें अनेकों ने उन्हीं के स्तर की अवाँछनीयता को उग्र-उद्धत बनाने में योगदान दिया, किंतु आतंक की चरम सीमा तक पहुँचते-पहुँचते ऐसी व्यवस्था बनी कि अनाचार का शमन करने वाले साधन उभरे, तनकर उठ खड़े हुए और जो आतंक प्रलयंकर दीखता था, वह अपनी मौत मर गया। ”
अखण्ड ज्योति मनोरंजन के लिए चित्र-विचित्र लेखों का गुलदस्ता बनाकर पाठकों का मन बहलाने वाली पत्रिका नहीं है। इसके पीछे एक उच्चस्तरीय लक्ष्य है। वह है-लोकचिंतन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिंतन-चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश
अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान् ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष है। इसकी उपयोगिता एवं क्षमा को हर पारखी ने भूरि-भूरि सराहा है। उसे पारस की उपमा देने वाले कहते हैं, जो भी इसे छूते हैं, वे अपने कल्मष-कषाय धो डालते हैं और ऐसा व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिसे कायाकल्प की उपमा दी जा सके
“अखण्ड ज्योति का प्रधान लक्ष्य है, ऋषि परंपराओं का पुनर्जीवन। इसी को आधुनिक परिवेश में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय भी कह सकते हैं। ”
अखण्ड ज्योति नवंबर 87, पृष्ठ 63
अखण्ड ज्योति दिसंबर 77, पृष्ठ 54
अखण्ड ज्योति जनवरी 88, पृष्ठ 55
परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य श्री एक युगऋषि के स्तर की सत्ता के रूप में अवतरित हुए हम सबके कल्याण के लिए, इसके लिए उनकी लेखनी से प्राप्त लोकशिक्षण को हम प्रमाण रूप में देख सकते हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका उनकी प्राणचेतना की संवाहक के रूप में जन-जन का मार्गदर्शन करती आज 63 वें वर्ष की अपनी यात्रा पूरी कर रही है, तो साथ ही भावप्रवण भाषा में उनके हाथ से लिखे पत्र भी आज हमारा उतना ही शिक्षण करते हैं। इस पत्रिका में समय-समय पर पाठकों को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने शिष्यों को दिए गए मार्गदर्शन की झलक हम पत्रों के माध्यम से देते रहे हैं। इस अंक में भी कुछ ऐसी ही भव संवेदना को लेखनी में उड़ेलकर लिखी गई चुनी हुई कुछ पत्तियां प्रस्तुत की जा रही हैं, जो किसी भी साधक-लोकसेवी का उतना ही हित करेंगी, जितना की तत्कालीन समय पर किसी साधक विशेष का उनके द्वारा संपादित हुआ था
अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण प्रवाह भी बहता है। ऐसा प्रवाह जो सोतों को जगाता है, जागों को खड़ा करता है, खड़ों को चलाता है और चलतों को उछाल देता है। उसकी दिव्य क्षमता में कहीं कोई संदेह की गुँजाइश है नहीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
क्षेत्रस्तर के हमारे कार्यकर्ताओं से यज्ञ संस्कार कराते थे व कहते थे कि अखण्ड ज्योति के पाठक बढ़ाना ही सबसे बड़ा पुण्य है। साथ में उसी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में ज्ञान-ध्यान की बातें भी बताते थे। एक लेख कर्म पर होता था, तो दूसरा समाधि पर। कहीं वैराग्य की बात है, तो कहीं सेवासाधना में ही - कर्म में ही भगवत्पूजा की
विस्तार से जानने के लिए 1 अप्रैल का पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ सभी पढ़ लें। जैसाकि बताया गया था 19 जून को अंतिम आयोजन के बाद सभी यात्राएँ जन्मभूमि आंवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा होती हुई शांतिकुंज हरिद्वार 16 जून ज्येष्ठ पूर्णिमा की पहुँचेगी व अपने-अपने कलश अखण्ड दीपक की साक्षी में स्थापित करेंगी। इस समय गुजरात में पाँच, म0प्र0 में दो, राजस्थान में एक हरियाणा, हिमाचल, जम्मू, पंजाब में एक उड़ीसा बंगाल में एक उत्तरप्रदेश में दो महाराष्ट्र में एक तथा दक्षिण भारत में एक इस प्रकार कुल 14 यात्राएँ विभिन्न जोन में होती हुई निकल रही हैं। सघन मंथन भी चल रहा है एवं गायत्री परिवार के विषय में जनचेतना तेजी से जाग रही है
उपर्युक्त स्िल्प टाइप करके अथवा छपवाकर पुरानी अखण्ड ज्योति, युग शक्ति गायत्री पत्रिकाओं तथा क्राँतिधर्मी साहित्य, युगनिर्माण योजना द्वारा प्रकाशित गायत्री विधा संबंधी पुस्तकों के साथ लगातार परिचितों को देकर परिजन अपने पास आने वाली पत्रिकाओं की पाठक संख्या में कई गुना विस्तार कर सकते हैं। विगत एक वर्ष से ‘युग निर्माण योजना’ मासिक के माध्यम से इस प्रकार का प्रयोग आरंभ किया गया है, जो बड़ा सफल रहा है। ऐसी स्लिपें क्षेत्रों में भी उपलब्ध हैं- कई शक्तिपीठों ने छपवाई भी हैं
जिस कर्म की बात परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे, इसमें वे किसी से लेखनी चलवाते थे, किसी से प्रवचन कराते थे, किसी से झाडू लगवाते थे, तो किसी से बिल्डिंग निर्माण की बात कहते थे। क्षेत्रस्तर के हमारे कार्यकर्ताओं से यज्ञ संस्कार कराते थे व कहते थे कि अखण्ड ज्योति के पाठक बढ़ाना ही सबसे बड़ा पुण्य है। साथ में उसी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में ज्ञान-ध्यान की बातें भी बताते थे। एक लेख कर्म पर होता था, तो दूसरा समाधि पर
फरवरी 1957 की ‘अखण्ड ज्योति’ में परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-”नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि इक्कीसवीं सदी है। महाकाल की असीम अवधि में युग की-इतिहास की दृष्टि से सैकड़ों क्या हजारों वर्षों का भी कोई महत्व नहीं होता। सतयुग की भविष्यवाणी जो हमने की है, उसका पहला आधार है- अदृश्य जगत् का सूक्ष्मप्रवाह, जो कुछ नई उथल-पुथल करने के लिए अपने उद्गम से चल पड़ा है और अपने उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
अब तक तो मैं इसे यहीं तक सीमित रखता था। लेकिन जब मैंने ‘अखण्ड ज्योति’ में किन्हीं महानुभाव का गायत्री का चमत्कार लेख पढ़ा जो मनुष्य के भौतिक दुःखों पर भी प्रयोग करने पर तत्काल फलदायी होता है। तब लगा डूबकर गोता पर गोता लगाने और जिन जिन चीजों की प्राप्ति हुई और हो रही है उसको पाकर उसी में डूबा ही रह जाना चाहता हूँ। इस गायत्री की प्राप्ति के लिये मेरे शरीर का रोम-रोम जीवन भर ऋषि दयानन्द सरस्वती और आचार्य श्रीराम शर्मा का आभारी रहेगा
एक बार नहीं अनेक बार मैं अपने पुत्र के इधर उधर फिरने और कुछ कार्य न करने से अति दुखित थी तब भी मैंने प्यारे पिता को स्मरण करके गायत्री माता की शरण ली और विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान किया। (जिसकी विधि अखण्ड ज्योति में लिखी है) उसका चमत्कार आश्चर्यजनक हुआ जिस दिन प्रातःकाल मैं यज्ञ करने वाली थी रात्री भर यही विचार रहा कि यज्ञ में सम्मिलित होना उसका अति आवश्यक था और आत्मा से आवाज आ रही थी कि प्रातः वह कहीं से आ जावेगा प्रातः यज्ञ की तैयारी में मैं लग रही थी और उसके आने की ऐसी प्रतीक्षा लग रही जैसी सूचना आने पर लगी रहती है यज्ञ आरम्भ होने वाला था, वश देखती हूँ कि मेरा पुत्र सतीशचन्द्र आँगन में मेरे सन्मुख खड़ा है। इस प्रकार के चमत्कारिक अनुभव मुझे अनेकों बार हुए है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
द्वारा “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-April
मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अखण्ड ज्योति का अगला अंक गायत्री अंक होगा। उसमें वेद माता गायत्री के ऐसे रहस्यों का प्रकटीकरण किया जाएगा जो अब तक बहुत कम लोगों को विदित है। पृष्ठ संख्या साधारण अंक से ड्योढ़ी रहेगी पर इतने ही पृष्ठों में जो अमूल्य ज्ञान रहेगा उसकी तुलना ऊँट पर लदने लायक पोथों से भी नहीं की जा सकती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
इस महामन्त्र की विशद, वैज्ञानिक, तर्क, प्रमाण और कारणों समेत ऐसी सविस्तार व्याख्या अब तक कहीं से भी प्रकाशित नहीं हुई जिसके आधार पर धार्मिक जनता अपने इस ‘बिंदु में सिन्धु’ के समान भरे हुए प्रथा, ज्ञान का अवगाहन कर सके। इस कमी की पूर्ति के लिए अखण्ड ज्योति 1 मई को अपना ‘गायत्री अंक’ प्रकाशित कर रही है
अखण्ड ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य महात्मा गाँधी की प्रवृत्तियों के समर्थक रहे हैं। कई बातों में मतभेद रहते हुए भी उनके मूलभूत सिद्धान्तों में इस परिवार की अगाध श्रद्धा रही है। तदनुसार हमारे पास जो समाचार इस मास आये हैं उनसे पता चलता है कि हजारों पाठकों ने व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से इस महाप्रयाण के उपलक्ष में धार्मिक व्रत अनुष्ठान किए
इसे रक्त तर्पण का लोम हर्षक समाचार सुन कर ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय में क्षुब्धता आ गई। आचार्यजी ने पूरे तेरह दिन उपवास रखा और इन दिनों साधारण काम-काज बन्द रखकर विविध प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान होते रहे। अन्तिम दिन बापू की भस्मी मथुरा में श्रीयमुना जी में विसर्जित होने पर साधारण कार्य चालू किये गए
‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-October
इस महाशक्ति की विस्तृत जानकारी कराने के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया होता, जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दस वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्व साधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है
नीचे गायत्री संबंधी पाँच नये ग्रन्थों का परिचय कराया जा रहा है। जो इसी मास “अखण्ड ज्योति” द्वारा प्रकाशित किये गये हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-November
इस आरोग्य संपदा से पाठकों को सम्पन्न बनाने के लिए, बीमारियों के बन्धन से छुड़ाने के लिए, स्वास्थ्य को सुदृढ़ और चिरस्थायी बनाने के लिए “अखण्ड ज्योति” ने एक महत्वपूर्ण प्रयास करने का निश्चय किया है। वह निश्चय है- इसी जनवरी में स्वास्थ्य अंक का प्रकाशन। इस अंक के सम्पादक होंगे स्वास्थ्य विद्या के आचार्य प्रो0 रामचरण महेन्द्र, एम0ए0,डीलिट, पी0एच0डी0
व्यवस्थापक ‘अखण्ड ज्योति’ मथुरा
- ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
गत मास की अखण्ड ज्योति छपी सूचना के अनुसार मैंने आपके यहाँ से गायत्री संबंधी पाँचों पुस्तकें मंगाई थीं। गायत्री मंत्र के संबन्ध में भारतवर्ष में किसी ने भी इतनी श्रम साध्य खोज नहीं की यह दावे के साथ कहा जा सकता। इन पाँचों पुस्तकों का एक सैट मेरे नाम वी0पी0 से भेज दें, स्थानीय पुस्तकालय को दान दूँगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
‘अखण्ड ज्योति’ संस्थान को एक आध्यात्मिक अस्पताल कहा जा सकता है। अस्पतालों में अगणित प्रकार के रोगी आते हैं, इनमें से कुछ तो साधारण बीमारियों से पीड़ित होते हैं और अनेक ऐसे आते हैं जो भयंकर जीव-संकट में ग्रस्त हैं। जहर खाये हुए, साँप के काटे हुए, घायल, दुर्घटना ग्रस्त ऐसे रोगी आते हैं जिनका जीवन डॉक्टर की योग्यता और सतर्कता पर ही निर्भर रहता है
इन सात वर्षों में अत्यन्त बारीकी और सावधानी के साथ ‘अखण्ड ज्योति’ की क्रिया प्रणाली की परीक्षा करता रहा हूँ इस परीक्षण के आधार पर विश्वास पूर्वक यह कहा जा सकता है कि यह संस्थान मानव जाति के वास्तविक उत्कर्ष के लिए असाधारण कार्य कर रहा है
अस्पतालों में कुशल डाक्टरों द्वारा निस्संदेह अनेक रोगियों की भयंकर विपत्तियों को दूर किया जाता है। ‘अखण्ड ज्योति’ आध्यात्मिक अस्पताल है। यहाँ नाना प्रकार के मनोविकारों से ग्रस्त व्यक्ति अपने कष्टों से छुटकारा पाते हैं। शोक से संतप्त, चिन्ता से व्याकुल, क्रोध से झुलसते हुए, निराशा से खिन्न, कठिनाइयों में भयभीत, अज्ञान से अन्धे, लोभ से कातर, विषय वासनाओं से जकड़े हुए, भ्रम में उलझे हुए व्यसनों के दास अगणित व्यक्ति इस अस्पताल में प्रविष्ट होते हैं
आचार्यजी यही करते हैं और यह होता है कि आते समय जो अपने को दुख दारिद्र से ग्रस्त समझते थे वे जाते समय सुख सौभाग्य से अपने को पूर्णतया सम्पन्न अनुभव करते हैं। इतना बड़ा दान कौन कर सकता है? याचकों को अयाचक बना देने की क्षमता आज किस दानी में है? पर मैंने अपनी आँखों देखा है कि ऐसा दान ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा वितरित होता है, यहाँ से असंख्यों दरिद्र अपनी खाली झोली लेकर दीनता पूर्वक कुछ माँगने आते हैं और लौटते समय आत्मज्ञान की महती सम्पत्ति पाकर अपने आपको कुबेर साधनी और इन्द्र सा सम्पन्न अनुभव करते हुए लौटते हैं मानसिक पीड़ाओं से झुलसने हुए व्यक्ति शान्ति के पालने में झूलते हुए वापिस लौटते हैं
इसी प्रकार जो उचित है, उपयोगी है, कल्याणकारी है, आवश्यक है, उसके समर्थन और पोषण के लिए हमारी कोई क्रिया न हो तो वह श्रद्धा एवं सद्भाव नपुँसक हैं, ऐसी उदासीनता एवं उपेक्षा हमारी कर्तव्य बुद्धि को कलंकित करती है। ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा बहुत कुछ हो रहा है, जो हो रहा है वह महान है इतना कह देने मात्र से हमारा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता। जो अच्छा है उसका सहयोग करना हमारा धर्म एवं कर्तव्य हैं
आचार्यजी का आकर्षक व्यक्तित्व, उज्ज्वल चरित्र, बालकों सा मृदुल स्वभाव, अगाध ज्ञान, ब्राह्मणोचित तप, तथा बुद्धि कौशल इतना सर्वांग पूर्ण है कि उस की छाया में आने के पश्चात् संभव नहीं कि कोई दुख संतत मनुष्य दुखी रह सकें। मैंने स्वयं अपनी आँखों ऐसे सैकड़ों व्यक्तियों को ‘अखण्ड ज्योति’ संस्थान में देखा जो विपरीत परिस्थितियों या प्रभावों के कारण अपने आपको बड़ा दीन, दुखी, अभाग, नीच, पतित समझते थे और तात्कालिक किसी घटना के आवेश के कारण आत्म हत्या तक की तैयारी कर रहे थे पर जैसे ही आचार्य जी की छाया उन पर पड़ी कि उनकी विचार धारा कुछ से कुछ हो गई
विगत सात वर्षों से मैं ‘अखण्ड ज्योति’ के संपर्क में हूँ। इस बीच में कई बार मथुरा जाने का और ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय में निवास करने का अवसर मिला है। कुल मिलाकर चार मास से अधिक समय तक मैं वहाँ रह चुका हूँ
मेरी ही तरह अखंडज्योति के अन्य पाठक भी यही अनुभव करते हैं कि ‘अखण्ड ज्योति’ संस्था, ज्ञान यज्ञ की पवित्र वेदी है। इसका प्रज्वलित रखना आवश्यक है। यदि आवश्यक है तो उसके लिए समिधा और सामग्री जुटाने का कार्य भी हमें करना होगा ताकि इस यज्ञ की आहुतियाँ यथावत् चालू रहें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-July
अपना क्षेत्र जितना विस्तृत होगा सफलता की संभावना भी उतनी ही बढ़ेगी। जिनके पास 'अखण्ड ज्योति' पहुँचती है, उन्हें उसे एक बार नहीं, दो-तीन बार पढ़ना चाहिए। जितनी बार पढ़ेंगे, उसमें कुछ नई बात और नई प्रेरणा मिलेगी। जिन्हें हम अपना समझते हैं, जिनके उत्थान में हमारी दिलचस्पी है, उन सबको इसके पढ़ने के लिए बाध्य करना चाहिए और जो बिना पढ़े हैं, उन्हें पढ़कर सुनाना चाहिए
ऐसी दशा में 'युगनिर्माण कार्य' को आगे बढ़ाने के लिए परिवार का हम पुनर्गठन कर रहे हैं, इसमें केवल भावनाशील और निष्ठावान व्यक्ति ही सम्मिलित किए जा रहे हैं। प्रारंभिक शर्त के रूप में 'अखण्ड ज्योति' का पाठक होना, परिजन की प्रारंभिक परीक्षा रखी गई है। सत्कार्यों का मूल सद्विचार है, सद्विचारों को सुनने-समझने और उनके प्रति निष्ठा रखने में जिन्हें विश्वास नहीं, जो इतने उच्चकोटि के विचारों के लिए चार आना मासिक खरच नहीं करना चाहते, उनसे मानवता की पुकार के लिए 'युगनिर्माण कार्य' के लिए कोई कदम उठा सकना कैसे संभव हो सकता है?
हममें से किसी के स्वजन, संबंधी, मित्र, पड़ोसी ऐसे न रहें, जो 'अखण्ड ज्योति' न पढ़ते हों। बहिनें और बेटियाँ ससुराल में चली जाती हैं, बहनोई और दामाद दूर रहते हैं, उन्हें जिस प्रकार अन्य उपहार दिए जाते हैं, उसी प्रकार अपने पास से उनका चंदा जमा करके पत्रिका चालू कराई जा सकती है। अन्य मित्रों और संबंधियों की हितकामना से भी ऐसे उपहार देना, उनकी सच्ची सहायता का आयोजन करना है
संगठन का अब अपना प्रारंभिक आधार यही है। इसलिए 'गुरु पूर्णिमा' के पावन पर्व पर हममें से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि जो लोग पहले हमसे या गायत्री परिवार से किसी प्रकार संबंधित रहे हैं, वे यदि उस संबंध को आगे भी बनाए रखना चाहते हों तो 'अखण्ड ज्योति' की सदस्यता स्वीकार करें। पूर्व परिचय के क्षेत्र तक ही सीमित न रहकर अब आगे कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। अपने इस वर्ष के सब अंक यदि पाठक किन्हीं भावनाशील व्यक्तियों को पढ़ने के लिए देंगे तो उन्हें नापसंद न किया जा सकेगा
खेद की बात है कि 'गायत्री परिवार' का एक विशाल संगठन बना था, पर उसके सदस्यों को 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते रहने का महत्त्व हम न समझा सके, फलस्वरूप उनमें से अधिकांश लोग उस दिशा में चल सकने की स्थिति में न आ सके, जो हमारा लक्ष्य था। अब यह निश्चित रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि उन्हीं को अपने परिवार का परिजन माना जा सकता है और उन्हीं से कुछ आशा रखी जा सकती है जो 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते हैं। जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते, उन्हें परिजन कहना हमारा एक भ्रममात्र था, जो अब पूरी तरह दूर कर लिया गया है
सभ्य समाज की रचना के लिए एक सशक्त, प्रबुद्ध एवं सुविस्तृत संगठन की अनिवार्य आवश्यकता है। यह संगठन 'अखण्ड ज्योति' के सदस्यों का ही हो सकता है। इस सदस्यता के लिए विशाल जनसमुदाय को तैयार करने से ही 'युगनिर्माण योजना' को सफल बनाया जा सकना संभव है। हममें से प्रत्येक को इसके लिए प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए
खेद की बात है कि 'गायत्री परिवार' का एक विशाल संगठन बना था, पर उसके सदस्यों को 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते रहने का महत्त्व हम न समझा सके, फलस्वरूप उनमें से अधिकांश लोग उस दिशा में चल सकने की स्थिति में न आ सके, जो हमारा लक्ष्य था। अब यह निश्चित रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि उन्हीं को अपने परिवार का परिजन माना जा सकता है और उन्हीं से कुछ आशा रखी जा सकती है जो 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते हैं। जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते, उन्हें परिजन कहना हमारा एक भ्रममात्र था, जो अब पूरी तरह दूर कर लिया गया है। अपने परिचित लोगों की भारी भीड़ में से हम युग−निर्माण जैसे महान कार्य में कुछ सहयोग की आशा उन्हीं से करते हैं, जो कम-से-कम हमारे विचारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उन्हें पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करते हैं
वे भी इस पर्व को खाली नहीं जाने देते। इस बार उनके लिए एक विशेष कर्त्तव्य यह हो सकता है कि 'युगनिर्माण योजना' को सफल बनाने के लिए 'अखण्ड ज्योति' के नए सदस्य बनाने का प्रयत्न करें। यह अंक पहुँचने के बाद 'गुरु पूर्णिमा' के लगभग 15 दिन शेष रहेंगे। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के ग्राहक हैं, वे इकट्ठे होकर एक डेपूटेशन के रूप में धर्मफेरी लगाते रहें या अकेले-अकेले इसके लिए प्रयत्न करें तो आशाजनक कार्य हो सकता है
कार्य की महानता और क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए अभी 'अखण्ड ज्योति परिवार' संख्या की दृष्टि से बहुत छोटा है, इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। पिछले अंकों में वर्त्तमान स्वजनों से हम यह प्रार्थना करते रहे हैं कि 'अखण्ड ज्योति परिवार' को बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया जाए। अपना क्षेत्र जितना विस्तृत होगा सफलता की संभावना भी उतनी ही बढ़ेगी। जिनके पास 'अखण्ड ज्योति' पहुँचती है, उन्हें उसे एक बार नहीं, दो-तीन बार पढ़ना चाहिए
धर्म और संस्कृति के प्रेमी अपने−अपने ढंग से वह श्रद्धांजलि अर्पित करते भी हैं। 'अखण्ड ज्योति' के पाठक भी उसके अपवाद नहीं। वे भी इस पर्व को खाली नहीं जाने देते। इस बार उनके लिए एक विशेष कर्त्तव्य यह हो सकता है कि 'युगनिर्माण योजना' को सफल बनाने के लिए 'अखण्ड ज्योति' के नए सदस्य बनाने का प्रयत्न करें
इसी के द्वारा गत बीस वर्षों से लाखों मनुष्यों के जीवन में ऐसे हेर−फेर संभव हुए, जिनसे राष्ट्रीय प्रगति में भारी योगदान मिला है। 'अखण्ड ज्योति' केवल सन्मार्ग का शिक्षण ही नहीं देती, वरन उसके साथ एक प्रेरणा भी सन्निहित रहती है, जिसके कारण पाठक केवल उन विचारों को पढ़कर ही संतुष्ट नहीं हो जाता, वरन कुछ उस दिशा में कदम भी बढ़ाने पड़ते हैं। इन विचारों के साथ घुली हुई प्रेरणा जिसके पास तक पहुँचेगी, वह निश्चेष्ट दर्शकमात्र नहीं रह सकता, उसे सत्पथ पर अग्रसर होना ही होता है, उसके बिना उसे चैन भी नहीं मिल सकता। प्रकाश की जो किरणें 'अखण्ड ज्योति' अपने पाठकों के मन में उत्पन्न करती है, उनसे उनका जीवन भी ज्योतिर्मय होने लगता है
देश-काल, पात्र की स्थिति देखते हुए कार्यक्रमों में हेर−फेर होते रह सकते हैं, पर आवश्यकता उन व्यक्तियों की है जो 'युग−निर्माण' की विचारधारा को अपने तथा दूसरों के जीवन में साकार रूप दे सकें। ऐसे व्यक्ति 'अखण्ड ज्योति' के पाठकों में से निकल सकेंगे। इसका हमें पूरा और पक्का विश्वास है। कार्य की महानता और क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए अभी 'अखण्ड ज्योति परिवार' संख्या की दृष्टि से बहुत छोटा है, इसे बढ़ाने की आवश्यकता है
यह अंक पहुँचने के बाद 'गुरु पूर्णिमा' के लगभग 15 दिन शेष रहेंगे। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के ग्राहक हैं, वे इकट्ठे होकर एक डेपूटेशन के रूप में धर्मफेरी लगाते रहें या अकेले-अकेले इसके लिए प्रयत्न करें तो आशाजनक कार्य हो सकता है। कितने ही नए ग्राहक बन सकते हैं। यह छोटा प्रयत्न शारीरिक श्रमदानमात्र है, पर इसका परिणाम 'युग−निर्माण' के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है
स्वास्थ्य शिविर में जो लोग नहीं आ सके, उनकी जानकारी के लिए प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षण के लिए अगस्त की अखण्ड ज्योति, ‘प्राकृतिक चिकित्सा अंक’ के रूप में रहेगी। शिविर में हुए शिक्षण का सारांश उसमें रहेगा। सितंबर का अंक 'युग−निर्माण अंक' होगा, जिसमें योजना के सत्संकल्प में सन्निहित भावनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा और किस प्रकार आत्मनिर्माण एवं राष्ट्रनिर्माण की गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाए, इस पर प्रकाश डाला जाएगा
'अखण्ड ज्योति परिवार' को हमने सदा से एक सजीव, सक्रिय एवं सत्प्रवृत्तियों में संलग्न सेना माना है। इसी के द्वारा गत बीस वर्षों से लाखों मनुष्यों के जीवन में ऐसे हेर−फेर संभव हुए, जिनसे राष्ट्रीय प्रगति में भारी योगदान मिला है। 'अखण्ड ज्योति' केवल सन्मार्ग का शिक्षण ही नहीं देती, वरन उसके साथ एक प्रेरणा भी सन्निहित रहती है, जिसके कारण पाठक केवल उन विचारों को पढ़कर ही संतुष्ट नहीं हो जाता, वरन कुछ उस दिशा में कदम भी बढ़ाने पड़ते हैं
जो ग्राहक बनाए जाएँ, उनके पते इन कूपनों में भरकर भेजे जा सकते हैं और चंदा मनीऑर्डर से। इस संदर्भ में हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से 'अखण्ड ज्योति' इन दिनों घाटे में चल रही है। पृष्ठ संख्या लगभग ड्यौढ़ी कर देने के कारण अब उसकी लागत 3) न रहकर 4) के करीब पहुँच रही है। इस घाटे की पूर्ति पुस्तकों के लाभांश से या किसी अन्य प्रकार से करनी पड़ती है
इसका हमें पूरा और पक्का विश्वास है। कार्य की महानता और क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए अभी 'अखण्ड ज्योति परिवार' संख्या की दृष्टि से बहुत छोटा है, इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। पिछले अंकों में वर्त्तमान स्वजनों से हम यह प्रार्थना करते रहे हैं कि 'अखण्ड ज्योति परिवार' को बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया जाए। अपना क्षेत्र जितना विस्तृत होगा सफलता की संभावना भी उतनी ही बढ़ेगी
कितने ही तो हमें गुरु कहने और पैर छूने में भी बहुत उत्साह दिखाते रहे। अब उस भीड़ में से अपने-पराए की कसौटी के रूप में हमने 'अखण्ड ज्योति' की सदस्यता को एक शर्त बना दिया है। जो इससे कतराते हैं, उनकी चतुरता इस कसौटी पर स्पष्ट हो जाएगी। और असली नकली की छाँट का अवसर आसानी से मिल जाएगा
इन विचारों के साथ घुली हुई प्रेरणा जिसके पास तक पहुँचेगी, वह निश्चेष्ट दर्शकमात्र नहीं रह सकता, उसे सत्पथ पर अग्रसर होना ही होता है, उसके बिना उसे चैन भी नहीं मिल सकता। प्रकाश की जो किरणें 'अखण्ड ज्योति' अपने पाठकों के मन में उत्पन्न करती है, उनसे उनका जीवन भी ज्योतिर्मय होने लगता है। गत अक्टूबर 1961 से तो उसका स्वरूप ही दूसरा बन गया है, वह अब 'साधारण ज्योति' न रहकर एक 'जाज्वल्यमान मशाल' बन गई है। युग−निर्माण के लिए ऐसी ही ज्वाला की आवश्यकता भी थी
फरवरी की 'अखण्ड ज्योति' में पृष्ठ 15 पर— 'अब नहीं तो 65 वर्ष बाद सही' नामक एक लेख छपा है। इसमें संसार के प्रमुख विचारकों एवं समाजशास्त्री वैज्ञानिकों के अभिमत दिए हैं, जिनमें उनने यह स्पष्ट घोषणा की है कि यदि प्रजनन का यही क्रम जारी रहा तो कुछ ही दिन में अन्न, स्थान, निवास की समस्या काबू से बाहर हो जाएगी। प्रो. हर्मन वेरी का कथन है कि, "ईसा के 10 हजार वर्ष पूर्व सारी दुनिया में मनुष्यों की आबादी केवल 10 लाख थी, वह अब बढ़कर 3 अरब हो गई
वर्त्तमान परिजनों का कर्त्तव्य है कि वे अपने क्षेत्र में अपना विचार परिवार बढ़ावें। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के सदस्य रहेंगे, वहाँ उतना ही अपना परिवार माना जाएगा। इसलिए यह प्रयत्न किया ही जाना चाहिए कि अपने विचार परिवार का विस्तार हो। संगठन का अब अपना प्रारंभिक आधार यही है
इसका आधार गुरु होता है। 'अखण्ड ज्योति परिवार' इस दूसरे प्रकार का ही कुटुंब है। वर्त्तमान परिजनों का कर्त्तव्य है कि वे अपने क्षेत्र में अपना विचार परिवार बढ़ावें। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के सदस्य रहेंगे, वहाँ उतना ही अपना परिवार माना जाएगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
कुछ दिन यह क्रम यदि हम लोग निष्ठापूर्वक चलाते रहें तो विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि हम आज जितने हैं उसकी अपेक्षा अगले वर्ष की जनवरी तक कई गुने हो जावेंगे और हममें से प्रत्येक अखण्ड ज्योति का सदस्य अपनी विचारधारा के लोगों के साथ सम्बन्धित एवं संगठित होकर एक छोटी संस्था का रूप धारण कर लेगा। संस्थाऐं बनावें नहीं, स्वयं एक संस्था बनें। संस्थाओं में लोग अकसर उत्तरदायित्व को एक दूसरे पर टालते हैं और पारस्परिक मनमुटाव एवं ईर्ष्या के दलदल में फंस जाते हैं
अखण्ड ज्योति परिवार में वे लोग हैं जो गत चौबीस वर्षों से हमारे साथ हिल-मिलकर बैठते और हमारे चौके में भोजन करते हैं। अखण्ड ज्योति का एक रसोई-घर है, हम अपने हाथ से अपनी गहरी प्रेम-भावना के साथ बड़े-बड़े अरमानों के साथ इस भोजन को पकाते हैं और जो स्वजन हमें अपना समझते हैं उनको माता जैसी वात्सल्य भावना के साथ परोसते खिलाते हैं। जिन्हें इस परिवार में रहते इस रसोई-घर में भोजन करते लम्बा समय हो गया उनसे हमें बड़ी-बड़ी आशाऐं यदि हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। गायत्री आन्दोलन गत दस वर्षों में कितने विशाल रूप में पनपा था
आत्मिक उत्कृष्टता और भौतिक श्रेष्ठता के दोनों लक्ष प्राप्त करने के लिए अब तक के चलते आ रहे अभियान को इस पुण्य पर्व पर बहुत ही सुव्यवस्थित रूप दिया गया है और इसे सुसंयत रूप से अग्रगामी बनाया जायेगा। अखण्ड ज्योति जिस मिशन को लेकर अवतीर्ण हुई थी उसे उसने अब तक बहुत शानदार ढंग से निबाहा है। अब आगे के दस वर्ष तो उसे जी जान से जुट जाने के लिए मिले हैं। लक्ष की पूर्ति के लिए हम सब को अब उसी ओर द्रुतगति से अग्रसर होना है
प्रस्तुत प्रचारात्मक योजना को लेकर अपना संघ-बद्ध अखण्ड ज्योति परिवार अग्रसर हो रहा है। हर परिजन को अभी हाल में प्रारंभिक कार्यक्रम ऐसा सौंपा गया है जिसे वह अकेला ही कर सके। औंधे-सीधे लोगों का भानमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाय तो वह ठहरता कहाँ है? गायत्री परिवारों की कितनी ही शाखाऐं इसी प्रकार ठप्प हुईं
जीवन का लम्बे कटु और मधुर अनुभवों का निष्कर्ष यही है। इसलिए हम अखण्ड ज्योति परिवार के लोगों को एक सुदृढ़ संघ मानते हैं और आशा करते हैं कि इस संघ की शाखाऐं देश के कौने-कौने में फैले। क्योंकि बिना संगठन के युग-निर्माण जैसा विशाल कार्य पूरा हो सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा। पर लंगड़े संगठन, अन्धी शाखाऐं बनने से कुछ लाभ नहीं
अखण्ड ज्योति परिवार अब तक शिक्षक संघ के रूप में परिणत होने जा रहा है। लोक-मानस को प्रबुद्ध करने के लिए हममें से प्रत्येक को कुछ करना पड़ेगा। अपना शिक्षा क्षेत्र हम स्वयं तलाश करें
इस दृष्टि में “अखण्ड ज्योति” के आध्यात्मिक मिशन में, आत्म कल्याण और युग निर्माण के उभय-पक्षीय कार्यक्रम सन्निहित हैं। गायत्री उपासना के माध्यम से हमारी आत्म−कल्याण प्रक्रिया निष्ठा और श्रद्धा के वातावरण में चल रही है। युग निर्माण के दूसरे कार्यक्रम पर भी अब हमें आवश्यक ध्यान देना है
इसलिए उस संगठन में कौन सम्मिलित हों इसकी तलाश आरंभ करने का अपना यह पहला कदम है। अखण्ड ज्योति और आगे छपने वाली 108 पुस्तिकाओं की अत्यन्त सुन्दर और सस्ती युग-निर्माण सीरीज पढ़ते रहने में जिनने रुचि ली है, जिन्हें आनन्द आया है, जिनने प्रसन्नता प्रकट की है, उत्साह दिखाया है उन्हें इस योग्य माना जा सकता है कि अपने संगठन के यह सदस्य बनें। विचारों की एकता से ही अखंड ज्योति परिवार एक प्रचंड शक्ति के रूप में विद्यमान है। विचारों की एकता एक अत्यन्त सुदृढ़ एवं अत्यन्त शक्तिशाली तत्व है
हम युग−निर्माण के उपयुक्त संयम की, उदारता की, विवेक की आवश्यकता की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करना चाहें तो प्रचार के बल पर ही हो सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार का एक बड़ा विशाल और शक्तिशाली संगठन है। हम सब मिलकर आज युग−निर्माण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक विचारों का प्रसार करें और कल उन आयोजनों, कार्यक्रमों, आन्दोलनों एवं अभियानों की व्यवस्था करें जो आज की अव्यवस्था को उखाड़ दें और उसके स्थान पर स्वर्गीय वातावरण को पृथ्वी पर अवतरित करने के उपकरण उपस्थित कर दें। हमें यही करना है—यही करेंगे भी
अखण्ड ज्योति परिवार में वे लोग हैं जो गत चौबीस वर्षों से हमारे साथ हिल-मिलकर बैठते और हमारे चौके में भोजन करते हैं। अखण्ड ज्योति का एक रसोई-घर है, हम अपने हाथ से अपनी गहरी प्रेम-भावना के साथ बड़े-बड़े अरमानों के साथ इस भोजन को पकाते हैं और जो स्वजन हमें अपना समझते हैं उनको माता जैसी वात्सल्य भावना के साथ परोसते खिलाते हैं। जिन्हें इस परिवार में रहते इस रसोई-घर में भोजन करते लम्बा समय हो गया उनसे हमें बड़ी-बड़ी आशाऐं यदि हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है
अखण्ड ज्योति परिवार की ओर से यह दोनों ही कार्यक्रम सुसंयत ढंग से चल रहे हैं। व्यक्तिगत उपासना की कक्षा ऊँची एवं तीव्र करने के लिए पंचसूत्री साधना क्रम चल रहा है। अशुभ अनिष्ट की शान्ति के लिए सामूहिक धर्मानुष्ठानों की गतिविधियाँ सक्रिय हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
जिनके साथ हम आत्मश्रद्धा और प्रेम के बंधनों से मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं, उन्हीं से तो अपने को बदलने का अनुरोध कर सकते हैं। जिनसे हमारा कोई परिचय नहीं, जिन पर हमारा कोई प्रभाव नहीं, वे क्यों हमारी बातें सुनेंगे और सुन भी लें तो क्यों मानेंगे; इसलिए 'घर बाँधकर तब बाहर बाँधने' वाली कहावत के अनुसार युग−निर्माण का कार्य अपने घर से, अपने स्वजनों से आरंभ कर रहे हैं और इसलिए इसका नाम 'अखण्ड ज्योति' परिवार की युगनिर्माण योजना रखा है। आरंभ यहाँ से होकर इसका विस्तार तो सारे देश में, सारे समाज में, सारे विश्व में होना है
पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
जिन दूसरों ने भी ऐसा प्रयोग अपने ऊपर किया है उनका भी यही निष्कर्ष है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को हम उसी सत्य का दर्शन और इसी तथ्य का अनुभव कराना चाहते हैं। इन्हें बदलना चाहते हैं, ताकि वे बदले हुए प्रतिफल का लाभ उठा सकें और यह देख सकें कि स्वर्ग यहीं मौजूद है और हम उसका पूरा−पूरा लाभ ले सकते हैं। अब आगे हम ऐसा ही प्रयत्न करने जा रहे हैं, उसी प्रक्रिया का नाम ‘युगनिर्माण योजना’ रखा है
अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन इस आधार पर किया जा रहा है कि एक कर्मठ कार्यकर्त्ता जिसे शाखा-संयोजक कहा जाएगा, अपनी देख−रेख में लगभग 10 सदस्यों का उत्तरदायित्व संभाले और उन्हें युग-निर्माण की विचारधारा को कार्यान्वित कराने के लिए आवश्यक प्रकाश और प्रेरणा देता रहे। युगनिर्माण योजना का कोई शुल्क नहीं है, पर अखण्ड ज्योति का स्थायी ग्राहक होना अनिवार्य है। कर्मठ कार्यकर्त्ता सदा से अपने प्रयत्नों से 10-5 ग्राहक अखण्ड ज्योति के बनाते रहे हैं। उन्हें ही फिलहाल शाखा-संयोजक नियुक्त किया जा रहा है
अखण्ड ज्योति परिवार को हम संगठित करना चाहते हैं। उसे आत्मबल का एक प्रचंड शक्तिस्रोत बनाना चाहते हैं। प्रत्येक को इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेना चाहिए और समुचित सहयोग करना चाहिए
अगले नौ वर्षों में यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। हर अक्टूबर में अखण्ड ज्योति का एक विशेष अंक गायत्री उपासकों के मार्गदर्शन के लिए निकलता रहेगा, शेष अंकों में युगनिर्माण योजना की विचारधारा रहा करेगी। लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए गायत्री उपासना की उपयोगिता असाधारण है। उसका प्रथम चरण हमें सद्बुद्धि प्रदान करके जीवन की अधिकांश उलझनों को सुलझा देता है और द्वितीय चरण में प्रस्तुत आत्मशक्ति के जागरण का जो रहस्य सन्निहित है, उसके द्वारा मनुष्य नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है
गत वर्ष स्वाध्याय और मनन-चिंतन की साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है
सर्वसाधारण के लिए उपयोगी एकमुखी गायत्री उपासना की विवेचना भी गत दस वर्षों से अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में, छोटी−मोटी दसियों पुस्तकों में, प्रवचन, सत्संगों और व्यक्तिगत वार्त्तालापों में हम समय−समय पर करते रहे हैं। लाखों मनुष्यों ने उस विज्ञान का लाभ उठाया है और अभी भी उस मार्ग पर चलते हुए असंख्यों व्यक्ति लोक एवं परलोक के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। गायत्री उपासना से साधक के मनःक्षेत्र में तत्काल सद्बुद्धि का विकास होता है, मलीन एवं अवरुद्ध पड़े हुए अंतःकरण की सफाई होना शुरू होती है और गुण, कर्म, स्वभाव में प्रवेश हुए दुरितों का समाधान होने की प्रक्रिया तत्क्षण आरंभ हो जाती है
सितंबर अंक में ‘परिचय और विवरण’ नामक फाॅर्म अंतिम पृष्ठ पर छपा है, उसे भरकर अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को इसी मास मथुरा भेज देना चाहिए। उससे उनकी परिस्थितियों का पता चलेगा और उस पर ध्यान रखते हुए उन्हें आवश्यक परामर्श देते रह सकना संभव होगा। इस फाॅर्म को भेजने में कोई सदस्य शिथिलता एवं आलस्य न करें
अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन इस आधार पर किया जा रहा है कि एक कर्मठ कार्यकर्त्ता जिसे शाखा-संयोजक कहा जाएगा, अपनी देख−रेख में लगभग 10 सदस्यों का उत्तरदायित्व संभाले और उन्हें युग-निर्माण की विचारधारा को कार्यान्वित कराने के लिए आवश्यक प्रकाश और प्रेरणा देता रहे। युगनिर्माण योजना का कोई शुल्क नहीं है, पर अखण्ड ज्योति का स्थायी ग्राहक होना अनिवार्य है। कर्मठ कार्यकर्त्ता सदा से अपने प्रयत्नों से 10-5 ग्राहक अखण्ड ज्योति के बनाते रहे हैं
सत्संगों के आरंभ में गायत्री जप, हवन, भजन आदि के कार्यक्रम भी रहें, पर प्रधानता विचार-विनिमय को दी जाए। जहाँ अच्छे वक्ता न हों, वहाँ अखण्ड ज्योति के लेख पढ़कर सुनाए जा सकते हैं
युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी संघशक्ति ही अपेक्षित है। इसलिए प्रारंभिक रूप से अखण्ड ज्योति परिवार को ही एक धर्मसंगठन का रूप दिया जा रहा है
अखण्ड ज्योति परिवार के सब सदस्यों को पंचकोशी साधना कर सकना कठिन प्रतीत हो तो उसके उपयोगी अंशों को तो अपना ही लेना चाहिए, वह भी साधना ही गिनी जाएगी। जप, तप न बन पड़े तो भी ब्रह्मर्चय का सीमाबंध और आलस्य के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा करने के लिए हममें से प्रत्येक को खड़ा हो ही जाना चाहिए। सबेरे जल्दी उठने की आदत निरालस्यता का पहला चिह्न है
शाखा-संयोजक का क्षेत्र किसी नगर विशेष तक सीमित न रहेगा, वरन जहाँ भी उसका प्रभाव हो, वहाँ अखण्ड ज्योति के सदस्य बनावेगा और उन्हें चंदा वसूल करके ही छोड़ न देगा, वरन आवश्यक पूछताछ और विचार-विनिमय करके तथा संभव हो तो विचार गोष्ठियों के द्वारा योजना को कार्यान्वित करने को प्रयत्नशील रहेगा। जिन नगरों में कई शाखा-संयोजक हैं, वे सब मिलकर अपने नगर का केंद्रीय संगठन बना लेंगे और अपने−अपने सदस्यों की सम्मिलित गोष्ठियाँ भी समय−समय पर किया करेंगे। अब विचार गोष्ठियों में यज्ञकार्य प्रतीक रूप रहेंगे
अखण्ड ज्योति के पाठकों को हम सदा से अपना व्यक्तिगत विचार−परिवार मानते रहे हैं। हमारे शरीर को नमस्कार करने वाली भीड़ को हमने लाखों की संख्या में इधर से ऊपर घूमते-फिरते देखा है; पर जिन्हें हमारे विचारों के प्रति श्रद्धा हो, ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े हैं। भीड़ को हम कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं, पर आत्मीय केवल उन्हें ही समझते हैं, जो हमारे विचारों का मूल्याँकन करते है, उन्हें प्रेम करते और अपनाते हैं
इसका लाभ सारे संसार को मिलने वाला है, पर आरंभ अखण्ड ज्योति परिवार से ही हो रहा है। जिनके साथ हम आत्मश्रद्धा और प्रेम के बंधनों से मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं, उन्हीं से तो अपने को बदलने का अनुरोध कर सकते हैं। जिनसे हमारा कोई परिचय नहीं, जिन पर हमारा कोई प्रभाव नहीं, वे क्यों हमारी बातें सुनेंगे और सुन भी लें तो क्यों मानेंगे; इसलिए 'घर बाँधकर तब बाहर बाँधने' वाली कहावत के अनुसार युग−निर्माण का कार्य अपने घर से, अपने स्वजनों से आरंभ कर रहे हैं और इसलिए इसका नाम 'अखण्ड ज्योति' परिवार की युगनिर्माण योजना रखा है
गत मास युगनिर्माण संकल्प आरंभिक पृष्ठ पर छपा है और उसकी विस्तार से व्याख्या भी की गई है। यह संकल्प अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को दैनिक-साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए
युगनिर्माण योजना का कोई शुल्क नहीं है, पर अखण्ड ज्योति का स्थायी ग्राहक होना अनिवार्य है। कर्मठ कार्यकर्त्ता सदा से अपने प्रयत्नों से 10-5 ग्राहक अखण्ड ज्योति के बनाते रहे हैं। उन्हें ही फिलहाल शाखा-संयोजक नियुक्त किया जा रहा है। जिनने प्रयत्न करके जिन्हें ग्राहक बनाया हो, वे उनसे मिल−जुलकर या पत्र व्यवहार द्वारा युग−निर्माण की विचारधारा को अपनाने और प्रस्तुत मार्ग पर चलने के लिए अनुरोध करते रहेंगे
यह मात्रा थोड़ी होते हुए भी अपनी शारीरिक, मानसिक, सांसारिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में बहुत सहायक होती है। साधारण गृहस्थों एवं कार्यव्यस्त व्यक्तियों के उपयुक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर साधनाक्रम बताया जा रहा है। जिन्हें अधिक अवकाश है, जिनका समय और मस्तिष्क खाली रहता है वे इन साधनाओं में अधिक तीव्रता उत्पन्न करके अधिक लाभ उठा सकते हैं। प्राण को निग्रहीत करने से मनुष्य मनचाही आयु प्राप्त कर सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने और भावना के साथ भावना का स्पर्श करने का यही तरीका है। हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उन्हें आदि से अन्त तक ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ते रहना चाहिये। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका साराँश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जायेगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें, हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिये पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है
सरसरी नजर से एक बार पन्ने उलटकर पत्रिका को एक तरफ रख देने से काम न चलेगा। हमारी चिट्ठी, वाणी, प्रेरणा, भावना और आकाँक्षा का मूर्तरूप ‘अखण्ड ज्योति’ ही है। इसे भावना और ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये और इन पत्रों के साथ लिपटी हुई प्रेरणाओं को मनन और चिन्तनपूर्वक हृदयंगम करना चाहिये। हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने और भावना के साथ भावना का स्पर्श करने का यही तरीका है
एक दिन में एक व्यक्ति से मिलने का कार्यक्रम बनाया जाय तो महीने में तीस व्यक्तियों से मिलने और धर्म चर्चा करने वाली बात आसानी से बन सकती है। इतना न हो सकता हो तो भी दस व्यक्तियों से हर महीने मिलने−जुलने और “अखण्ड ज्योति” पढ़ने तथा निर्धारित विषयों पर धर्म चर्चा करने का कार्य तो बहुत ही सरलतापूर्वक किया ही जा सकता है
जहाँ ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ की युग−निर्माण योजना का कार्य आरम्भ हो चुका है, जहाँ दस सदस्य बन चुके हैं, वहाँ योजना का एक कार्यालय भी नियत हो जाना चाहिए। इसके लिए अपना निज का भवन बनाने या किराये पर मकान लेने की आवश्यकता नहीं, वरन् किसी उदार सज्जन का एक कमरा इस कार्य के लिए प्राप्त कर लेना चाहिए। बड़े नगरों में जहाँ कई शाखा संचालक नियुक्त किये गए हैं वहाँ भी एक ही केन्द्रीय कार्यालय रहे
प्रभात फेरी और जुलूसों की व्यवस्था किया करें। इनके मनाने की पद्धति एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंकों में प्रकाश डालेंगे
उसके अनुसार कार्य करते हुए प्रत्येक अपने कर्तव्यों का पालन और अधिकारों का उपयोग करता रहे तो हमारे घर स्वर्गीय वातावरण से ओत−प्रोत हो सकते हैं। पारिवारिक आचार संहिता की रूपरेखा पाठक ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंकों में पढ़ेंगे
अपने भाई, भतीजे, बच्चे, बुजुर्ग जो भी पढ़ना जानते हों उन्हें आग्रहपूर्वक पत्रिका पढ़ानी चाहिये। जो पढ़े न हों उन्हें सप्ताह में एक दिन एक डेढ़ घण्टे का सत्संग लगाकर ‘अखण्ड ज्योति’ के लेखों को सुनाना चाहिए। चार से लेकर छह घण्टे में पत्रिका पूरी पढ़कर सुनाई जा सकती है। सप्ताह में एक दिन अवकाश का रखकर उस दिन परिवार के सब लोग इकट्ठे किये जायँ और उन्हें एक डेढ़ घण्टे का यह लाभ दिया जाय
ऐसे दान पर मनीआर्डर फीस भी नहीं देनी पड़ती। ‘अखण्ड ज्योति’ या ‛गायत्री परिवारों’ के नाम पर अलग से इस प्रकार का संग्रह कार्य कहीं भी न किया जाय। अपने परिवार का प्रत्येक व्यक्ति सप्ताह में एक दिन उपवास रखा करे और उस अन्न की बचत जब तक युद्ध चलता रहे तब तक रक्षा कोष में भेजा करे। इससे अन्न की कमी पूरी होने में भी सुविधा होगी और राष्ट्र को एक बड़ी कठिनाई के हल करने में सहायता मिलेगी
‘अखण्ड ज्योति’ जिनके भी पास पहुँचती हो वे उसे पत्रिका मात्र न समझें वरन् आदि से अन्त तक दो बार पढ़ें। सरसरी नजर से एक बार पन्ने उलटकर पत्रिका को एक तरफ रख देने से काम न चलेगा। हमारी चिट्ठी, वाणी, प्रेरणा, भावना और आकाँक्षा का मूर्तरूप ‘अखण्ड ज्योति’ ही है
अखण्ड ज्योति परिवार का प्रारम्भिक संगठन कार्य सन् 62 में पूरा हो जाना चाहिए। पत्रिका के जो ग्राहक इन दिनों हैं उन्हें संगठन सूत्र में जल्दी ही आबद्ध हो जाना चाहिए। सितम्बर अंक में जो फार्म लगा था वह अभी तक जिनने भरकर नहीं भेजा है उन्हें उसे तुरन्त ही भरकर मथुरा भेज देना चाहिये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
आस्तिकता और उपासना का जनजीवन में कोई स्थान होना ही चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ का पहला कार्यक्रम यही है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक एवं उपासक बने, गायत्री आंदोलन के पीछे यही भावना सन्निहित है। भारतीय धर्म की सबसे प्राचीन, सबसे श्रेष्ठ, सबसे वैज्ञानिक, सबसे महत्त्वपूर्ण उपासना ‘गायत्री’ ही मानी गई है
यों अखण्ड ज्योति का अब तक का सारा जीवन ही धर्म और अध्यात्म की विचारधारा प्रवाहित करने में व्यतीत हुआ है, पर अब इस वसंत पंचमी से— अष्टग्रही योग के पुण्यपर्व के साथ उसका विचार-क्रांति अभियान, पूर्ण तत्परता एवं सुव्यवस्थित योजना के साथ आरंभ होता है। युग निर्माण के लिए हमें पहले जनमानस को बदलना होगा, कार्यों में परिवर्तन तो उसके बाद ही संभव होगा। जैसे−जैसे हमारी विचारधारा प्रबुद्ध होगी, विवेकशीलता जगेगी, वैसे ही वैसे अनुपयुक्त को त्याग और उपयुक्त को ग्रहण करने की प्रवृत्ति सक्रिय होती जाएगी
ऐसे निशान लगे हुए समाचार कई दिन तक हमें निरन्तर विचारमग्न बनाये रहे और मन में बहुत उथल−पुथल मचाते रहे। उचित लगा कि इस चिन्तन में अखण्ड ज्योति के पाठकों को भी सम्मिलित कर लिया जाय। यह अंक इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-November
संकोच, झिझक, आलस, तौहीन जैसी छोटी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके कुछ समय ऐसा निकालना ही पड़ेगा कि अपनी ‘अखण्ड ज्योति’ अपने समीपवर्त्ती दस−बीस व्यक्तियों को पढ़ाने−सुनाने के लिए दौड़−धूप की जाती रहे। युग निर्माण के लिए आवश्यक लोक-शिक्षण और कार्यक्रम अखण्ड ज्योति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, इस चेतना का क्षेत्र व्यापक बनाने के लिए हमें जी-जान एक कर देना चाहिए। कोई मित्र, पड़ोसी ऐसा न बचे जो इस विचारधारा से अपरिचित हो
अखण्ड ज्योति इसी संजीवनी विद्या का व्यवस्थित शिक्षण अब आरंभ करने जा रही है। पत्रिका के पृष्ठों पर लेखरूप में और व्यावहारिक शिक्षण शिविर और सत्रों के रूप में जनसाधारण को प्राप्त होगा। विश्वास है कि उससे मानवता की सच्ची सेवा संभव हो सकेगी
अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक ग्राहक को युगनिर्माण योजना का सदस्य बनाया जा रहा है। सदस्यता की कोई फीस नहीं है। योजना की वाणी और प्रेरणा का संदेश लेकर निकलने वाली अखण्ड ज्योति को जो लोग मँगाते हैं, उनकी भावना और विचारधारा इस योग्य बन और ढल ही जाने वाली है कि वे प्रस्तुत कार्यक्रम में अपने उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए कटिबद्ध हो सके
शिक्षण पाए हुए अन्य व्यक्ति भी इन शिविरों का संचालन कर सकते हैं। इस प्रकार एक प्रकार से अखण्ड ज्योति परिवार के सभी सदस्यों को एक बार मथुरा आकर या अपने स्थानीय शिविरों में शिक्षण प्राप्त करना चाहिए। जब साधारण कार्यों के लिए ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है, हर जगह ट्रेंड व्यक्तियों को महत्त्व मिलता है, तो फिर युगनिर्माण योजना की महान प्रक्रिया का उत्तरदायित्व वहन करने वालों के लिए यह सब क्यों आवश्यक न होगा? संगठन कार्ययोजना का प्रथम चरण पूरा होते ही हमें द्वितीय चरण की तैयारी में लगना होगा। चांद्रायण व्रत संबंधी एक महीने का प्रथम सत्र पौष सुदी पूर्णिमा से माघ सुदी पूर्णिमा तक (9 जनवरी से 8 फरवरी 63 तक) चलेगा
दस−दस सदस्यों के एक ग्रुप लीडर (शाखा संचालक) नियुक्त करके अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को संघबद्ध करने की योजना कार्यान्वित की जा रही है। दस−दस शाखासंचालकों का अर्थात सौ सदस्यों का एक क्षेत्रीय संगठन रहेगा। इन क्षेत्रीय संगठनों के तीन−तीन दिन के शिक्षण शिविर रहें
मिठाई की जगह सद्भावनाओं का उपहार भेजें। शुभकामना के रंग−बिरंगे कार्ड, कलैंडर आदि उपहार भेजने के स्थान पर यह अच्छा है कि स्वजनों को अखण्ड ज्योति के अंक भेंट में दें। इस प्रकार हमारी आध्यात्मिक दीपावली मनेगी और युग निर्माण विचारधारा के ज्ञानदीप लोगों की अंतरात्मा में टिमटिमाने लगेंगे। इस वर्ष सितंबर का सत्−संकल्प अंक, अक्टूबर का उच्चस्तरीय गायत्री साधना अंक, नवंबर और दिसंबर के संजीवन विद्या अंक—इस प्रकार यह चार अंक अधिक महत्त्वपूर्ण हैं
अखण्ड ज्योति के प्रकाश से निशा समाप्त हो,—
प्रभात में नये समाज के प्रत्यक्ष चित्र हों!
हमें भी कुछ ऐसा ही प्रयत्न करना होगा। संकोच, झिझक, आलस, तौहीन जैसी छोटी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके कुछ समय ऐसा निकालना ही पड़ेगा कि अपनी ‘अखण्ड ज्योति’ अपने समीपवर्त्ती दस−बीस व्यक्तियों को पढ़ाने−सुनाने के लिए दौड़−धूप की जाती रहे। युग निर्माण के लिए आवश्यक लोक-शिक्षण और कार्यक्रम अखण्ड ज्योति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, इस चेतना का क्षेत्र व्यापक बनाने के लिए हमें जी-जान एक कर देना चाहिए। कोई मित्र, पड़ोसी ऐसा न बचे जो इस विचारधारा से अपरिचित हो
युगनिर्माण योजना के महान कार्यक्रम को अग्रसर करने के लिए अखण्ड ज्योति परिवार को अब एक सुगठित संगठन का रूप दिया जा रहा है। संघ के बिना वह शक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती, जिससे मानव जाति की अंतःचेतना तथा बाह्य वातावरण में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाकर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना संभव हो सके। भगवान बुद्ध ने तंत्रयुग की वाममार्गी दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने के लिए संघशक्ति का उद्भव किया था
इसके लिए एक क्रमबद्ध प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ेगी। अखंड ज्योति परिवार के हर व्यक्ति को केंद्रीय विचारधारा के अधिक निकट संपर्क में आना होगा; इसलिए योजना के प्रत्येक सदस्य को, अखण्ड ज्योति के प्रत्येक ग्राहक का यह निमंत्रण दिया गया है कि वह एक महीना मथुरा आकर हमारे संपर्क में रहने और शिक्षा, साधना, चिकित्सा और सत्संग वाले, अक्टूबर अंक में पृष्ठ 54 पर छपे कार्यक्रम में सम्मिलित होने की तैयारी करें। कुछ लोग अधिक कार्यव्यस्त हो सकते हैं, जिनके लिए एक महीना कठिन है। उनके लिए दस दिन वाला शिक्षणक्रम रखा जाया करेगा
सदस्यता की कोई फीस नहीं है। योजना की वाणी और प्रेरणा का संदेश लेकर निकलने वाली अखण्ड ज्योति को जो लोग मँगाते हैं, उनकी भावना और विचारधारा इस योग्य बन और ढल ही जाने वाली है कि वे प्रस्तुत कार्यक्रम में अपने उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए कटिबद्ध हो सके। सितंबर अंक में 'परिचय और विवरण' नामक एक फार्म छपा था, उसे भरकर अधिकांश पाठकों ने भेज दिया था, जिनने अभी तक नहीं भेजा है, वे बिना एक क्षण का आलस किए यह पंक्तियाँ पढ़ते ही अपना फार्म भरकर भेज दें। इन सूचनाओं के आधार पर प्रत्येक परिजन की परिस्थितियाँ और भावनाओं को, उनके व्यक्तित्व को ठीक तरह समझ सकना संभव होगा और उस विस्तृत जानकारी के आधार पर आगे की गतिविधियों का निर्धारण किया जाएगा
' इसके लिए विशाल परिमाण में संगठित प्रयत्नों की ही आवश्यकता होगी। युगनिर्माण योजना का आरंभ करते हुए पहला कार्य अखण्ड ज्योति परिवार की प्रबुद्ध एवं जागृत आत्माओं को संगठित रूप से सुगठित करना आवश्यक था। ‘घर बाँधकर बाँधने’ वाली कहावत के अनुसार जो मार्गदर्शन हमें सारे मानव समाज को, सारे विश्व को कराना है, उसकी एक प्रयोगशाला अपना घर, अपना परिवार बनने जा रहा है। युग−परिवर्तन के लिए संघशक्ति अनिवार्य है
इस दिन हर कोई दीपक जलाता है और मिठाई के उपहार बाँटते हैं। हम अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य आध्यात्मिक दीपक— ज्ञानदीपक जलावें। मिठाई की जगह सद्भावनाओं का उपहार भेजें। शुभकामना के रंग−बिरंगे कार्ड, कलैंडर आदि उपहार भेजने के स्थान पर यह अच्छा है कि स्वजनों को अखण्ड ज्योति के अंक भेंट में दें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
अन्य धर्मग्रंथ पढ़ने हों तो उन्हें भी प्रसन्नतापूर्वक पढ़ा जाए। जिस प्रकार गायत्री उपासना के साथ−साथ अन्य मंत्र या देवता की उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए
आत्मकल्याण का लोक-शिक्षण गत 24 वर्षों से अखण्ड ज्योति कर रही है। उसका उपयोग यदि पाठकों के मनोरंजन तक ही हुआ हो तो यही कहना होगा कि यह इतना लंबा प्रयत्न निष्फल चला गया; क्योंकि उच्च आदर्शों का कोई मूल्य तभी है, जब वे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित हों, उनके आधार पर अपनी गतिविधियाँ संचालित हों। अब हमें यह निर्णय करना है कि अध्यात्मवाद को एक मनोविनोद का साधनमात्र बनाए रखा जाए या वस्तुतः उसका कुछ प्रयोग किया जाए? यदि अध्यात्म के प्रति अपनी निष्ठा हो तो उसका प्रयोग जीवन-क्षेत्र में करने के लिए हमें कटिबद्ध होना ही चाहिए और इस ‘नकद धर्म’ के लाभों से लाभान्वित होने के लिए व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध कदम उठाना ही चाहिए
जैसे मधुमक्खी दूर−दूर से पुष्पों का पराग एकत्रित करती है और उसे मधुर रस देकर गुणवान शहद के रूप में प्रस्तुत करती है, उसी प्रकार हम अपने पाठकों की दैनिक स्वाध्याय की आवश्यकता को पूर्ण करते रहने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर अत्यंत सारगर्भित पुण्य-सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। अब सरसरी दृष्टि से अखण्ड ज्योति न पढ़ी जानी चाहिए, वरन प्रतिदिन आधा घंटा यह सोचकर उसे पढ़ना चाहिए कि इन पृष्ठों के लेखक को समीप बैठा मानकर उसके साथ सत्संग करते हुए अनेक धर्मग्रंथों का सार मधुर मधु के रूप में प्राप्त किया जा रहा है
इस समय एक पारिवारिक सत्संग प्रतिदिन चलाया जाए। 24 गायत्री मंत्रों का सब लोग मिलकर जप करें, माता के चित्र का धूप-दीप से पूजन करें, युग निर्माण संकल्प को एक पढ़े, दूसरे दुहरावें,कोई भजन गाया जाए, फिर किसी उत्तम पुस्तक का अंश अथवा अखण्ड ज्योति का पृष्ठ पढ़कर सब को सुनाया जाए। परिवार में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर भी इस सत्संग में विचार−विनिमय किया जाए। इस प्रकार सामूहिक उपासना एवं विचारगोष्ठी के रूप में यह सत्संग नियमित रूप से चला करे तो उसका प्रभाव सब लोगों के जीवन पर अवश्य पड़ेगा और घर में सद्भाव, सद्विचार ,सत्कर्म एवं सज्जनता की धर्मपरंपरा बनी रहेगी
पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
यह धर्ममैत्री विकसित होते-होते एक विशाल धर्मसंगठन के रूप में भी परिणत हो सकेगी। अखण्ड ज्योति परिवार के हजारों सदस्य अपने धर्म परिवार के साथ लाखों की संख्या में होंगे और फिर उनका विस्तार चक्रवृद्धि क्रम से होने लगा, तो देश के कोने−कोने में प्रत्येक भारतीय तक यह युग निर्माण विचारधारा पहुँचेगी और लाखों-करोड़ों व्यक्ति उस ढाँचे में ढलेंगे, जिसे लक्ष्य बनाकर हम लोग सांस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान के महान अभियान में संलग्न हो रहे हैं
अपने को बना लेने पर बाहर के जगत में सब कुछ बन सकता है, अपने को विकसित कर लेने पर बाहर की सारी गिरावट उत्कृष्टता में परिणत हो सकती है। व्यक्ति महान बने, तथा सारी वसुधा महानता से ओत−प्रोत हो, यह मिशन लेकर अखण्ड ज्योति जन्मी है। जब तक वह जलेगी, तब तक इसी प्रयत्न में लगी रहेगी
अधूरे और अस्पष्ट अक्षरों में लिखे हुए पतों पर उत्तर देना कठिन होता है। अखण्ड ज्योति का चंदा भेजते समय मनीआर्डर कूपन पर घसीट में अधूरा पता लिख देने से यहाँ रजिस्टरों में गलत पता दर्ज हो जाता है और पत्रिका ठीक स्थान तक न पहुँच कर बीच में ही गुम होने लगती है। पाठक अपने पत्रिका के पते को ध्यान से पढ़लें और यदि उसमें कुछ गलती रहती हो तो उसकी सूचना दे दें ताकि आवश्यक सुधार कर लिया जाय। ग्राहक नम्बर पते के पास ही लिखा रहता है
जो रोज ही कई रुपये का हो जाता है। अखण्ड ज्योति की लागत इस वर्ष तीन रुपये की अपेक्षा चार रुपये के करीब होते दिखाई पड़ रही है। उसमें स्पष्ट घाटा है। पुस्तक प्रकाशन का कार्य अब बन्द जैसा ही पड़ा है
इस प्रकार दस व्यक्तियों से बीस दिन धर्मचर्चा करने का अपने को अवसर मिलेगा और जो लोग अखण्ड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे, उनकी विचारधारा में कुछ-न-कुछ परिवर्तन भी निश्चित रूप से होगा ही। जिन्हें अखण्ड ज्योति के स्वाध्याय और आपका सत्संग करने का अवसर हर महीने मिलता रहेगा, वे अवश्य ही कुछ-न-कुछ प्रभाव ग्रहण करते चलेंगे और उनके जीवन में निश्चित रूप से कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता चलेगा। आगे चलकर जब छोटे−छोटे ट्रैक्ट प्रकाशित होंगे, तब उनके माध्यम से एक विचार विद्यालय भी बन सकेगा, जिसकी चर्चा जनवरी अंक के अंतिम लेख में की गई है। यह धर्ममैत्री विकसित होते-होते एक विशाल धर्मसंगठन के रूप में भी परिणत हो सकेगी
अखण्ड ज्योति हम वर्षों से पढ़ते रहे हैं, अब उस पठन को कार्यरूप में परिणत होना चाहिए। हमारा कुछ समय उन कार्यों में लगना चाहिए, जो किसी सच्चे आध्यात्मवादी के लिए आवश्यक है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों कार्यक्रम हमारे जीवन में यदि स्थान प्राप्त करने लगें— यदि अखण्ड ज्योति परिवार के बीस हजार सदस्य अपने कार्यक्रम में इस प्रस्तुत योजना को स्थान देने लगें तो उसका परिणाम बहुत ही दूरगामी होगा और युग निर्माण का वह स्वप्न जो आज एक कल्पना जैसा दीखता है, निकट भविष्य में साकार होकर रहेगा
जिस प्रकार सामान्य लोग अपने किसी लाभ या स्वार्थ के लिए मित्र बनाते या बढ़ाते हैं, उसी प्रकार हमें सदुद्देश्य के लिए धर्मभावनाओं की वृद्धि के लिए निःस्वार्थ मित्रता बढ़ानी चाहिए। यह कार्य अपनी अखण्ड ज्योति पढ़ाने के लिए किसी के घर देने जाने और फिर उसे वापिस लेने के लिए जाने के कार्यक्रम के साथ आरंभ करना चाहिए। एक महीने में दो बार इस बहाने जिनके घर जाया जाएगा, उनसे उस अंक में प्रकाशित किसी विशेष लेख के बारे में चर्चा भी होगी ही। इस प्रकार दस व्यक्तियों से बीस दिन धर्मचर्चा करने का अपने को अवसर मिलेगा और जो लोग अखण्ड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे, उनकी विचारधारा में कुछ-न-कुछ परिवर्तन भी निश्चित रूप से होगा ही
अखण्ड ज्योति के अगले तीन अंक युग−निर्माण कार्यक्रम को पाठकों के सम्मुख भली प्रकार प्रस्तुत करने के लिए छोटे−छोटे विशेषांकों की तरह निकाले जा रहे हैं। 1 मई का अंक ‘स्वस्थ शरीर अंक’ 1 जून का ‘स्वच्छ मन अंक’ और 1 जुलाई का ‘सभ्य समाज अंक’ होगा। पृष्ठ संख्या साधारण अंकों से प्रायः ड्यौढ़ी रहेगी
अखण्ड ज्योति विगत 24 वर्षों से इस उद्देश्य से निकाली जा रही है कि जनमानस में धर्मनिष्ठा की प्रकृति एवं प्रगति हो। यह उद्देश्य किस सीमा तक सफल हो रहा है, इसकी कसौटी एक ही हो सकती है कि प्रस्तुत विचारों का हमने कितना आदर किया, उनका महत्त्व कितना माना और कितना उन पर विश्वास किया? यदि सचमुच प्रस्तुत आध्यात्मिक विचारधारा को उपयोगी, उचित एवं आवश्यक माना गया है तो उसका क्षेत्र मस्तिष्क में सीमित न रहकर हृदय तक होना चाहिए और इन विचारों से हमारे जीवन की गतिविधियों को प्रभावित होना चाहिए। अब समय आ पहुँचा कि इस कसौटी पर अपने को कसा जाए और देखा जाए कि आध्यात्मिक विचारधारा को हम केवल मनोविनोद के लिए ही पढ़ते-सुनते हैं या उस पर श्रद्धा रखकर जीवन में उतारने का भी प्रयत्न करते हैं
एक महीने में दो बार इस बहाने जिनके घर जाया जाएगा, उनसे उस अंक में प्रकाशित किसी विशेष लेख के बारे में चर्चा भी होगी ही। इस प्रकार दस व्यक्तियों से बीस दिन धर्मचर्चा करने का अपने को अवसर मिलेगा और जो लोग अखण्ड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे, उनकी विचारधारा में कुछ-न-कुछ परिवर्तन भी निश्चित रूप से होगा ही। जिन्हें अखण्ड ज्योति के स्वाध्याय और आपका सत्संग करने का अवसर हर महीने मिलता रहेगा, वे अवश्य ही कुछ-न-कुछ प्रभाव ग्रहण करते चलेंगे और उनके जीवन में निश्चित रूप से कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता चलेगा। आगे चलकर जब छोटे−छोटे ट्रैक्ट प्रकाशित होंगे, तब उनके माध्यम से एक विचार विद्यालय भी बन सकेगा, जिसकी चर्चा जनवरी अंक के अंतिम लेख में की गई है
अखण्ड ज्योति के अगले अंक
अपने स्वजनों की स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति की पूरी जिम्मेदारी ‘अखण्ड ज्योति’ ने अपने कंधों पर ली है। जैसे मधुमक्खी दूर−दूर से पुष्पों का पराग एकत्रित करती है और उसे मधुर रस देकर गुणवान शहद के रूप में प्रस्तुत करती है, उसी प्रकार हम अपने पाठकों की दैनिक स्वाध्याय की आवश्यकता को पूर्ण करते रहने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर अत्यंत सारगर्भित पुण्य-सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। अब सरसरी दृष्टि से अखण्ड ज्योति न पढ़ी जानी चाहिए, वरन प्रतिदिन आधा घंटा यह सोचकर उसे पढ़ना चाहिए कि इन पृष्ठों के लेखक को समीप बैठा मानकर उसके साथ सत्संग करते हुए अनेक धर्मग्रंथों का सार मधुर मधु के रूप में प्राप्त किया जा रहा है
हमारा कुछ समय उन कार्यों में लगना चाहिए, जो किसी सच्चे आध्यात्मवादी के लिए आवश्यक है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों कार्यक्रम हमारे जीवन में यदि स्थान प्राप्त करने लगें— यदि अखण्ड ज्योति परिवार के बीस हजार सदस्य अपने कार्यक्रम में इस प्रस्तुत योजना को स्थान देने लगें तो उसका परिणाम बहुत ही दूरगामी होगा और युग निर्माण का वह स्वप्न जो आज एक कल्पना जैसा दीखता है, निकट भविष्य में साकार होकर रहेगा। हम अपनी आँखों से सभ्य समाज का सुखद स्वर्गीय वातावरण देखकर शांति और संतोष प्राप्त कर सकेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-August
पता - अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
पर उसमें कुछ पुनरुक्तियाँ तथा भाषा संबंधी अशुद्धियाँ रह जाने के कारण अब इसे परिष्कृत एवं संशोधित रूप से प्रस्तुत कर दिया गया है। युग−निर्माण, जिसे लेकर अखण्ड ज्योति परिवार अब निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज विचार यही है। उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होंगे। इसे अपना घोषणा−पत्र भी कहा जा सकता है
किसी मित्र, कुटुम्बी या सम्बन्धी के साथ इससे बड़ा उपकार और कुछ नहीं हो सकता कि उसके अन्तःकरण में उच्चकोटि की भावना और विचार−धारा भर दी जाय इसी आधार पर तो किसी का लोक−परलोक सुख−शान्तिमय बन सकता है। ब्रह्मदान से, ज्ञान−दान से, बढ़कर इस पृथ्वी पर और कोई दान नहीं है यदि हम अपने क्षेत्र के कुछ लोगों को अखण्ड ज्योति का नियमित पाठक बनाने में सफल हो जाते हैं तो निश्चय ही यह प्रयत्न युग−निर्माण की सेना के सैनिक भर्ती करने के समान ही महत्वपूर्ण है। जब इन सैनिकों का एक सुसज्जित संगठन बनकर तैयार होगा तब हम देखेंगे कि अनैतिकता की वे विभीषिकाऐं जो आज काली घटाओं की तरह हमारे सिर पर घुमड़ रही हैं सहज ही तिरोहित होने लगेंगी
यदि थोड़े से कम महत्वपूर्ण लगने वाले अंग प्रत्यंग भी अपना काम करना छोड़ दें तो सारे शरीर के लिए विपत्ति खड़ी हो जाती है। घड़ी के पुर्जों की तरह अखण्ड ज्योति परिवार के हर पुर्जे को अपने जिम्मे का काम निपटाने के लिए प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक तत्पर हो जाना चाहिए
‟अखण्ड ज्योति” परिवार के दूरवर्ती देशव्यापी सभी सदस्यगण मथुरा नहीं आ सकेंगे यह हम जानते हैं। इसलिए आगे ऐसा भी प्रयत्न करेंगे कि जहाँ अपने परिजन कुछ अधिक संख्या में हैं वहाँ गोष्ठियों का आयोजन किया जाय और जो विचार विनिमय शिविरों में करने वाले हैं वह इन तीन दिन की गोष्ठियों में भी पूरा कर लें। बड़े सभा-सम्मेलनों के ऐसे आयोजनों में जहाँ घटिया श्रेणी की भीड़ मनोरंजक बातें सुनने आया करती है, हमारा आने जाने का अब विचार नहीं है
जिनने अखण्ड ज्योति के इस वर्ष के पिछले सब अंक पढ़े हैं वे जानते हैं कि युग−निर्माण योजना क्या है? और उसकी पूर्ति के लिए हमें क्या करना होगा? युग−निर्माण के तीन अंग हैं—
पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
अपना परिवार बढ़ाने का यही तरीका है। अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका हम उन सब लोगों तक पहुँचावें—उसके लेखों की प्रशंसा करके पढ़ने का आकर्षण पैदा करें और समय−समय पर प्रस्तुत प्रसंगों पर चर्चा करते हुए उनकी अभिरुचि का परिष्कार करते रहें। आप इतना प्रयत्न करेंगे और पत्रिका के छपे पत्रों में लिपटी हुई हमारी भावना भी कुछ काम करेगी तो दोनों के समन्वय का एक बड़ा सुखद रूप सामने आवेगा और लोगों को तेजी से बदलते हुए हम प्रत्यक्ष देख सकेंगे। किसी मित्र, कुटुम्बी या सम्बन्धी के साथ इससे बड़ा उपकार और कुछ नहीं हो सकता कि उसके अन्तःकरण में उच्चकोटि की भावना और विचार−धारा भर दी जाय इसी आधार पर तो किसी का लोक−परलोक सुख−शान्तिमय बन सकता है
नया संगठन इसी आधार पर किया जा रहा है। सज्जनों का कर्तव्य है कि इस आधार पर अपने परिवार का निर्माण और विस्तार करने के लिए उसी प्रकार लगें जिस प्रकार हम प्रति ग्राहक के पीछे तेरह आना वार्षिक का घाटा देते हुए प्राणप्रण से अखण्ड ज्योति के पन्ने−पन्ने में भावना और प्रेरणा लपेटने में लगे हुए हैं
लगता है कि इस अभाव की पूर्ति के लिए भी हमें ही एक व्यापक और प्रभावपूर्ण व्यवस्था बनानी पड़ेगी। जब तक ऐसी कोई व्यवहारिक शिक्षण व्यवस्था नहीं बन जाती तब तक अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में ही बहुत कुछ मार्गदर्शन प्रस्तुत किया जाता रहेगा
जिस प्रकार वेतन और शस्त्र की व्यवस्था हुए बिना सेना का संगठन नहीं हो सकता उसी प्रकार सज्जनों की युग−निर्माण सेवा का संगठन भी पाठकों के प्रयत्न और अखण्ड ज्योति की विचारधारा का समन्वय हुए बिना संभव नहीं हो सकता। हम में से प्रत्येक को इस महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न होकर युग−निर्माण के क्षेत्र का विस्तार करना चाहिए। अपना परिवार बढ़ाने का यही तरीका है
अब उस भूल को सुधार लिया गया है और केवल उन्हीं को परिवार का सदस्य माना गया है जो हमारी भावनाओं को कम से कम सुनने को तो तैयार हों। अखण्ड ज्योति को नियमित रूप से पढ़ते रहना अब अपने परिवार की प्रारम्भिक शर्त बना दी गई है। नया संगठन इसी आधार पर किया जा रहा है। सज्जनों का कर्तव्य है कि इस आधार पर अपने परिवार का निर्माण और विस्तार करने के लिए उसी प्रकार लगें जिस प्रकार हम प्रति ग्राहक के पीछे तेरह आना वार्षिक का घाटा देते हुए प्राणप्रण से अखण्ड ज्योति के पन्ने−पन्ने में भावना और प्रेरणा लपेटने में लगे हुए हैं
इन दिनों ‘अखण्ड ज्योति’ के सदस्यों की मनोदशा क्या है? उनमें से भावना दृष्टि से कौन हमारे कितने समीप और कौन कितनी दूर है इसकी जाँच करना आवश्यक है। इस नाड़ी परीक्षा के बाद ही यह निश्चित किया जा सकेगा कि आज की परिस्थितियों में युग निर्माण योजना को कितना मूर्त रूप दिया जा सकता है। लेखनी और वाणी तक ही सीमित न रहकर अब हम रचनात्मक कार्यक्रम में प्रवृत्त होने वाले हैं और वैयक्तिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए कुछ प्रबल प्रयत्न करने के लिए अग्रसर होने वाले हैं
अखण्ड ज्योति को जन−मानस को खोलने वाली ताली के रूप में प्रस्तुत करने के लिए हम एक निष्ठावान लुहार की तरह कृतकार्य हो रहे हैं। आपका काम है कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र के हर सज्जन प्रकृति व्यक्ति के मन में अपने स्नेह, सौजन्य का तेल लगाकर चिकनाई पैदा करें और इस ताली को जिसे हमने अपनी सारी अन्तःचेतना उड़ेल कर एक कारगर वस्तु बना दिया है प्रवेश करा देने का यत्न करें। अपने मुँह से अपनी बात बढ़ी−चढ़ी कहना अच्छा नहीं लगता पर अनुभव यह बताता है कि जिन लोगों को अखण्ड ज्योति पढ़ने और सुनने का अवसर मिल रहा है वे निश्चित रूप से बदल रहे हैं, ढल रहे हैं, उठ रहे हैं, बढ़ रहे हैं, चल रहे हैं
आपका काम है कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र के हर सज्जन प्रकृति व्यक्ति के मन में अपने स्नेह, सौजन्य का तेल लगाकर चिकनाई पैदा करें और इस ताली को जिसे हमने अपनी सारी अन्तःचेतना उड़ेल कर एक कारगर वस्तु बना दिया है प्रवेश करा देने का यत्न करें। अपने मुँह से अपनी बात बढ़ी−चढ़ी कहना अच्छा नहीं लगता पर अनुभव यह बताता है कि जिन लोगों को अखण्ड ज्योति पढ़ने और सुनने का अवसर मिल रहा है वे निश्चित रूप से बदल रहे हैं, ढल रहे हैं, उठ रहे हैं, बढ़ रहे हैं, चल रहे हैं। प्रेरणा का प्रवाह यदि किसी कारणवश टूट ही न गया तो यह प्रवाह जिनके मनःक्षेत्र तक निरन्तर पहुँचेगा वे कुछ बन कर ही रहेंगे, कुछ होकर ही रहेंगे
वृक्षों के अभाव में एरंड का पेड़ ही वृक्ष कहलाता है। हम अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन अपने छोटे−छोटे व्यक्तियों को ही आदर्शवाद की दिशा में अग्रसर करें तो भी कुछ न कुछ प्रयोजन सिद्ध होगा। कम से कम एक अवरुद्ध द्वार तो खुलेगा ही। यदि हम मार्ग बनाने में अपनी छोटी−छोटी हस्तियों को जला दें तो कल आने वाले युग प्रवर्तकों की मंजिल आसान हो जायगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
‘अखण्ड ज्योति’ का अगला (जुलाई 55 का) अंक ‘यज्ञ महत्व विशेषांक’ होगा। इसमें यज्ञ की महत्ता, उपयोगिता, शक्ति एवं वैज्ञानिक विशेषता पर समुचित प्रकाश डाला जायेगा। इस अंक से पाठकों का यज्ञ सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
इस प्रकार कुछ ही समय में प्रायः सभी गायत्री उपासकों को अन्य उपासकों के नाम और चित्रों से परिचय हो जायगा। इस योजना के अनुसार गत चैत्र की नवरात्रि में मथुरा आये हुए साधकों के कुछ चित्र इस मास की अखण्ड ज्योति में छापे जा रहे हैं। जो चित्र इस मास नहीं छप सके हैं वे अगले अंकों में छपेंगे। अब अगला सरस्वती यज्ञ जेष्ठ सुदी 1 से लेकर जेष्ठ सुदी 10 तक होगा
यों अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार के अधिकाँश परिजन महायज्ञ में भागीदार एवं संरक्षक बनते हैं तथा महायज्ञ का सफल बनाने के लिए अपने अपने ढंग से प्रयत्न कर रहे हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक इस दिशा में सद्भावना रखने की अतिरिक्त प्रत्यक्ष रूप में कुछ कार्य नहीं किया है। ऐसे लोगों विशेष रूप से यह प्रार्थना है कि वे इन गर्मियों में कुछ न कुछ अवश्य करें
गायत्री परिवार के सभी सदस्यों को क्रमशः एक दूसरे से परिचित करा देने और पूरे परिवार का एक स्थिर सम्मेलन स्थायी रीति से दृश्य रूप में उपस्थित कर देने की दृष्टि से ऐसा विचार किया गया है कि तपोभूमि के विशेष आयोजनों में आते रहने वाले साधकों के सामूहिक चित्र अखण्ड ज्योति में छपते रहें। इस प्रकार कुछ ही समय में प्रायः सभी गायत्री उपासकों को अन्य उपासकों के नाम और चित्रों से परिचय हो जायगा। इस योजना के अनुसार गत चैत्र की नवरात्रि में मथुरा आये हुए साधकों के कुछ चित्र इस मास की अखण्ड ज्योति में छापे जा रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
भागीदारों की संख्या बढ़ाना प्रधान कार्य है। इस कार्य को सफल बनाने का एक महत्वपूर्ण उपाय यह है कि आप जनवरी की अखण्ड ज्योति के ‘गायत्री अंक’ धार्मिक प्रकृति के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयत्न करें। लगान से भी कम−दो आना मूल्य−इस अंक का इसी उद्देश्य से रखा गया है। थोड़े अंक सादा बुक पोस्ट से मंगाने में उनके रास्ते में खो जाने का डर रहता है, इसलिए इनकी कम से कम 50 प्रतियाँ मंगानी चाहिये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
(4) अखण्ड ज्योति की वी. पी. मंगाना अपने। ) बिल्कुल व्यर्थ बरबाद करना हैं। 3) चन्दा और
(8) यहाँ से हर महीने दो बाद जाँच कर ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती हैं। 1- पते में गलती, 2- डाक की गड़बड़ी, 3- पता बदल लेने पर भी उसकी सूचना न देना, प्रायः यही कारण अंक न पहुँचने के होते हैं। यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास ता. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति मंगा लेनी चाहिये बहुत दिन बाद अंक न पहुँचने की शिकायत मिलने पर-जब वे अंक समाप्त हो चुकते हैं, दुबारा भेजना कठिन होता है
(3) कई सज्जन आलस्यवश चन्द समय पर नहीं भेजते, कई मास बीत जाने पर सुधि लेते हैं, तब तक पिछले अंग समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि अखण्ड ज्योति उतनी ही छपती हैं, जितने ग्राहकों का चन्दा प्राप्त होता है। वर्ष की फाइल अधूरी न रहे, इस कठिनाई से बचने के लिये चन्दा दिसम्बर मास में ही भेज देना चाहिये
(2) सन् 56 से अखण्ड ज्योति की पृष्ठ संख्या ड्यौढ़ी हो जायगी, किन्तु चन्दा ड्यौढ़ा न करके केवल। ) ही बढ़ाये गये हैं। अब 2
31) यहाँ पर यज्ञ के शेष अमृत कहा गया है - और यज्ञ शेष का उपयोग करने वाले को सद्गति की प्राप्ति ही गई है। यज्ञों की अखण्ड ज्योति से ही वेदों की रक्षा होगी-हमारे हिंदू धर्म की रक्षा होगी अतः इसका यथायोग्य उपभोग रखना ही चाहिये
अखण्ड ज्योति के इस यज्ञ अंक के लिए अधिकारी विद्वानों के बड़े ही महत्वपूर्ण लेख बड़ी संख्या में आये हैं। पर अपनी नियत मर्यादा में पृष्ठ रखने के कारण उनमें से आधे में भी कम लेख इस अंक में आ सके है। इतने महत्वपूर्ण ज्ञान से पाठकों को वंचित रखना उचित प्रतीत नहीं होता
इस कठिनाई की पूर्ति तभी हो सकती हैं जब ग्राहक संख्या बढ़े। आप कुछ ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करके ‘अखण्ड ज्योति’ की सहायता ओर दूसरी को सद्ज्ञान की-सन्मार्ग की प्रेरणा देने का सत्कार्य कर सकेंगे। इसके लिए आपसे विशेष अनुरोध है
(7) यों पिछले वर्षों भी ‘अखण्ड ज्योति’ की कागज छपाई की लागत ग्राहकों से प्राप्त होने वाले चन्दे से मुश्किल से ही पूरी हो पाती थी। फिर इस वर्ष तो पृष्ठ ड्योढ़े किये गये हैं और चन्दा। ) ही बढ़ा हैं
व्यवस्थापक, ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा
विमल “अखण्ड ज्योति” के नीचे सब सच्चा पथ पावें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-August
अंकों का मूल्य पीछे सुविधानुसार भेजा जा सकता है। जिन संरक्षकों या भागीदारों के पास अखण्ड ज्योति नहीं जाती, उन तक ब्रह्मभोज (गायत्री अंक दान) की आवश्यकता समझाने और उनके लिये प्रेरणा देने का कार्य इन पंक्तियों के पाठकों को करना चाहिये
इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं देने के अतिरिक्त आपके द्वारा जो भागीदार तथा संरक्षक बने हों किन्तु अखण्ड ज्योति के ग्राहक न हों तो उन्हें इन दस प्रश्नों की सूचना देकर उनसे भी उत्तर भिजवाने का प्रयत्न करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-July
यह नहीं भूलना चाहिए। इस यज्ञ की ‘अखण्ड ज्योति’ को भारतीय कभी बुझने न दें, कभी बुझने न दें, यह उन्हें हमारी प्रेरणा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-March
जो आना चाहें वे अपना पूरा परिचय भेजकर स्वीकृति प्राप्त करें और तब आवें। अखण्ड ज्योति के पाठकों का कर्त्तव्य है कि वे अपने समीप इस प्रकार की अभिरुचि के जो छात्र देखें उन्हें मथुरा पढ़ने आने के लिए प्रेरणा करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
लगभग दो वर्ष हुए, मुझे अखण्ड ज्योति पढ़ने को मिली। उससे प्रभावित होकर मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक बना। आचार्य जी से अपने जीवन को सफल बनाने का मार्ग पूछा। उन्होंने श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करने का आदेश दिया
(3) सन् 56 से अखण्ड ज्योति की पृष्ठ संख्या अब की अधिक ड्यौढ़ी करदी जायगी। इस हिसाब से चन्दा भी 2॥) का ड्यौढ़ी 3। ) होना चाहिए था, पर उतना न बढ़ा कर केवल ॥) ही बढ़ाये जायेंगे अर्थात् 2॥) की अपेक्षा 3) कर दिये जावेंगे
गायत्री माता की शरण लेने से मुझे जो लाभ हुए हैं, उस अनुभव के आधार पर मैं अखण्ड ज्योति पढ़ने−सुनने वाली तथा अन्य बहनों से बल-पूर्वक प्रार्थना करती हूँ कि आप सभी गायत्री मन्त्र का सहारा लेकर अपने जीवन के असत्यों, दुःख और पीड़ाओं से अपना उद्धार पायें। जिस भाँति प्राण के सहारे ही शरीर के सभी अंग जीवित और क्रियाशील हैं, उसी भाँति गायत्री शक्ति ही मनुष्यों की साधना के अनुसार स्वर्ग और मुक्ति को देने वाली हैं। गायत्री मन्त्र, ईश्वर प्राप्ति का अचूक साधन है, भक्ति प्रदाता और जन−मन निर्मल कर्त्ता है
लगभग दो वर्ष हुए, मुझे अखण्ड ज्योति पढ़ने को मिली। उससे प्रभावित होकर मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक बना। आचार्य जी से अपने जीवन को सफल बनाने का मार्ग पूछा
माता की अशेष करुणा से मैं पन्द्रह वर्ष की उमर से ही तीन माला प्रतिदिन गायत्री महामंत्र का जप करने लगा था कुछ दिनों के उपरांत मैं ‘अखण्ड ज्योति’ का ग्राहक बना और गायत्री महा विज्ञान तीनों भाग पढ़कर अपना आध्यात्मिक गुरु भी एक प्रगट−गुप्त महापुरुष को चुन लिया। जप की संख्या बढ़ाकर 1000 एक हजार कर दिया
भाग्य का उदय, समय का परिवर्तन, मुझे एक पुरानी “अखण्ड ज्योति” पत्रिका कहीं से प्राप्त हो गई। मैंने उसे प्रेम पूर्वक आद्योपान्त पढ़ा। मैंने परमपूज्य आचार्य जी को अपनी सारी जीवन कथा लिखी और उन्होंने गायत्री उपासना का आदेश दिया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
जुलाई में हर साल एक ‘गायत्री अंक’ निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ का ग्राहक रहना आवश्यक है। वार्षिक मूल्य 2॥ ) मात्र
“अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
‘अखण्ड ज्योति’−यह गायत्री संख्या की मुख्य पत्रिका है। यह गत 14 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। ग्राहक संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में अखण्ड ज्योति का दूसरा नम्बर है
यह गत 14 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। ग्राहक संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में अखण्ड ज्योति का दूसरा नम्बर है। इसकी उपयोगिता तथा सस्ते पन की सर्वत्र भूरि भूरि प्रशंसा हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख,रंगीन चित्र तथा समय समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
यही सम्बन्ध सूत्र हैं, जो पाठकों को इस आध्यात्मिक केन्द्र से जोड़े रहता है, पथ -प्रदर्शन और प्रकाश देता है। यदि यह सम्बन्ध-सूत्र टूटा रहे, अखण्ड ज्योति द्वारा प्रकाशित प्रकाश एवं सन्देश प्राप्त न होते रहें, तो फिर लाभ को उठा सकने की कोई सम्भावना नहीं रहती , जो इस परिवार के सदस्य रहने पर मिलना सम्भव है
इस प्रकार की लेख माला अखण्ड ज्योति में आरम्भ की जायगी और भारतीय संस्कृति की महानता का रहस्य उपस्थित किया जायगा
वस्तुतः यह पौरोहित्य की परम्परा अपने मूल रूप से निरर्थक नहीं हैं, वरन् अतीव आवश्यक है देश व्यापी संस्कृति संगठन करने, और घर घर में भारतीय तत्व ज्ञान की अखण्ड ज्योति का प्रकाश पहुँचाने के लिए पुरोहित लोग सर्वश्रेष्ठ माध्यम का कार्य कर सकते हैं। कोई नई संस्था खड़ी करने और बड़ी संख्या में नये कार्यकर्ता नियुक्त करके उनके निर्वाह का प्रश्न हल करना साधारण कार्य नहीं है। पर पुरोहितों को तो यजमानों से उनका आवश्यक वेतन दक्षिणा के रूप में अनायास ही मिलता रहता है
पता-‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा
“अखण्ड ज्योति” के पाठकों से प्रार्थना है कि अपने क्षेत्र के पुरोहितों को इस शिक्षा में आने के लिए प्रेरणा दें। जो इन शिक्षाओं को प्राप्त कर लौटें उनके सहयोग से संस्कृति विकास को आगे बढ़ावें। जिनके पास अवकाश है ऐसे रिटायर लोग, वानप्रस्थी, साधु संन्यासी, पारिवारिक समस्याओं से जिन्हें छुटकारा मिल चुका है, जो कुछ धर्म सेवा, प्रचार आदि कार्य करना चाहते हैं, उन्हें इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए उत्साह पैदा करें
मुझे प्रसन्नता है कि मेरे जीवन में ‘अखण्ड ज्योति’ का पथ-प्रदर्शन मिला। आज पाँच वर्ष से पिताजी की प्रेरणा से प्रतिदिन पाँच माला गायत्री जप तथा उसका हवन करते आ रहा हूँ। उनकी आयु 70 साल है
अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में हम क्रमशः यह बताते चलेंगे कि हिन्दू धर्म की एक एक कड़ी किस प्रकार अत्यन्त ही बुद्धि संगत, उपयोगी एवं विज्ञान सम्पन्न आधारों पर विनिर्मित हुई है और उसको कितने गम्भीर परिणामों की संभावना सन्निहित है। यहाँ इन पंक्तियों में तो आज हमें यह विचार करना है कि भारतीय तत्वज्ञान को घर-घर में, मन-मन में पहुँचाने के लिए हमें क्या करना चाहिए। राजनैतिक और आर्थिक पंचवर्षीय योजनाएं सामने आती रहती है, पर उनसे भी महत्वपूर्ण-साँस्कृतिक योजनाएं हैं, जिनके बिना मनुष्य का मानसिक और आत्मिक विकास अवरुद्ध ही रह जाता है
अब समय आया है कि भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए हम में से प्रत्येक को कुछ न कुछ करना चाहिये। अखण्ड ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्यों को हम इनके लिए विशेष रूप से आमन्त्रित करते हैं। यह विद्यालय एक शुभ आरम्भ है इसके लिए कूड़ा करकट नहीं सुयोग्य छात्र जुटाने में सक्रिय सहयोग देना, हम सब का एक आवश्यक कर्तव्य है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
व्यवस्थापक- ‘अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-January
मथुरा पधारने वाले सज्जन नोट कर लें। पत्र व्यवहार में-”अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा” इतना ही पता लिखना पर्याप्त है
अखण्ड ज्योति के पाठकों में एक भी ऐसा न होगा जो संकल्प की शक्ति से अपरिचित हो। भावना से भगवान प्रकट होते हैं, फिर मैस्मरेजम की योग्यता प्रकट होने में तो संदेह ही क्या है। आतिशी शीशे द्वारा जब थोड़ी सी परिधि की सूर्य किरणें एक स्थान पर एकत्रित कर दी जाती हैं तो अग्नि उत्पन्न हो जाती है
अखण्ड ज्योति का दफ्तर अब पुराने स्थान से हट कर घीयामण्डी में सड़क के किनारे ही पहुँच गया है। मथुरा पधारने वाले सज्जन नोट कर लें। पत्र व्यवहार में-”अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा” इतना ही पता लिखना पर्याप्त है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-June
नोट- अखण्ड ज्योति कार्यालय, घीयामंडी रोड पर किशोर रमण गर्ल्स स्कूल के सामने है। स्टेशन से तीन चार आने की सवारी ताँगे वाले लेते हैं
सम्पादक- अखण्ड ज्योति, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
डेढ़ लाख, “अखण्ड ज्योति” मासिक पत्र मथुरा, एक वर्ष को बिना मूल्य
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से निम्नलिखित सात्विक सहायताएं भेजी हैं। अखण्ड ज्योति इसके प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
‘अखण्ड ज्योति’ अपने पाठकों को इसी महानतम पुण्य कर्म में प्रवृत्त कराने के लिए सतत प्रयत्नशील रही हैं। हमारी आन्तरिक इच्छा यही हैं कि पाठकों का मानसिक और आध्यात्मिक विकास हो, क्योंकि लौकिक और पारलौकिक सुख किसी की कृपा से नहीं मिलते वरन् मनोबल द्वारा पुरुषार्थ पूर्वक डडडड सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं। यह मनोबल जो उन्नति एवं आनन्द का प्रधान साधन हैं, ज्ञान के बिना प्राप्त नहीं होता
अखण्ड ज्योति अपने पाठकों से विशेष बल पूर्वक कहती हैं कि वे इस प्रश्न पर गंभीरता के साथ विचार करें। धर्म जीवन का मेरुदंड हैं, खासतौर से हिन्दू जाति का तो वह प्राण ही हैं। यदि धर्म के स्थान पर हम अधर्म की पूजा कर रहे हैं तो समझना चाहिए कि अपनी रक्त दाहिनी धमनियों का मुँह खोलकर शरीर का सारा रक्त निष्प्रयोजन और अनुचित स्थान पर बहाये दे रहे हैं
अगले मास में “अखण्ड ज्योति परिवार के सतयुगी कार्य” शीर्षक के नीचे एक पृष्ठ में संक्षिप्त समाचार भी दिये जाया करेंगे। पाठकों से प्रार्थना हैं कि आदर्श, अनुकरणीय, सत्कार्यों की जो घटनाएं अपने यहाँ हों उनके समाचार अखण्ड ज्योति में छपने के लिए भेजते रहा करें। जिन्हें पढ़कर दूसरे लोगों को भी आचरण सुधारने, परोपकार करने, सत्य प्रेम तथा न्याय के मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिले। डडडड
अगले मास में “अखण्ड ज्योति परिवार के सतयुगी कार्य” शीर्षक के नीचे एक पृष्ठ में संक्षिप्त समाचार भी दिये जाया करेंगे। पाठकों से प्रार्थना हैं कि आदर्श, अनुकरणीय, सत्कार्यों की जो घटनाएं अपने यहाँ हों उनके समाचार अखण्ड ज्योति में छपने के लिए भेजते रहा करें। जिन्हें पढ़कर दूसरे लोगों को भी आचरण सुधारने, परोपकार करने, सत्य प्रेम तथा न्याय के मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-February
-संपादक- ‘अखण्ड ज्योति’ मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-July
ज्ञान वृद्धि से बढ़कर और दूसरा पुण्य नहीं है। जो पाठक अपने यहाँ इस प्रकार के ज्ञान मन्दिर स्थापित करें उसकी सूचनाएं अखण्ड ज्योति को भी देने की कृपा करें
इस मास ज्ञान यज्ञ में निम्नलिखित सात्विक सहायताएँ प्राप्त हुई हैं। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
-मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
आपके थोड़े से प्रयत्न से अखण्ड ज्योति के
मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा
(6) अखण्ड ज्योति के संपादक आचार्य श्रीराम शर्मा की 32 वीं जन्म गाँठ ता0 9 दिसम्बर को है। इस अवसर पर हर एक अखण्ड ज्योति के प्रेमी का कर्त्तव्य है कि अपने चंदे के साथ कम से कम एक नये ग्राहक का चन्दा और भिजवाने का प्रयत्न करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-November
इस अवसर पर मेरा एक प्रस्ताव पाठकों के सामने है। वह यह कि ता. 18-19 और 20 सितम्बर को कम से कम एक-एक घंटा अखण्ड ज्योति के नये ग्राहक बढ़ाने का प्रचार करने में लगाया जाय। हर एक पाठक अपने सम विचार वाले बन्धुओं से अखण्ड ज्योति की महत्ता बताते हुए ग्राहक बनने का अनुरोध करने के लिए मिलें और कम से कम एक नया ग्राहक बढ़ाने में सफलता प्राप्त करें। अखण्ड ज्योति का प्रचार, सद्विचारों का विस्तार यही सबसे अधिक अपनी प्रिय वस्तु आचार्य जी बताया करते हैं
‘अखण्ड ज्योति’ अपने पाठकों को अपना कुटुम्बी मानती है। और उनकी वर्षगाँठ के अवसर पर अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक आध्यात्मिक विधि से धार्मिक कृत्य किया जाता है एवं उनके दीर्घ जीवन तथा सब प्रकार की उन्नति के लिए ईश्वर से मंगल कामना की जाती है। इस अवसर पर आचार्य जी एक सन्देश भी उन सज्जन के लिए भेजते हैं
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्न सहायताएं प्राप्त हुई। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
आशा है कि पाठक गण आचार्य जी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करने और सद्विचारों के प्रचार का पुण्य लाभ करने के लिए ता. 18-19 और 20 सितम्बर को कम से कम एक-एक घंटा समय अवश्य खर्च करेंगे। आपके यह तीन घंटे अखण्ड ज्योति के ज्ञान यज्ञ में असाधारण अमूल्य अमृतमयी सहायता करने वाले सिद्ध होंगे
वह यह कि ता. 18-19 और 20 सितम्बर को कम से कम एक-एक घंटा अखण्ड ज्योति के नये ग्राहक बढ़ाने का प्रचार करने में लगाया जाय। हर एक पाठक अपने सम विचार वाले बन्धुओं से अखण्ड ज्योति की महत्ता बताते हुए ग्राहक बनने का अनुरोध करने के लिए मिलें और कम से कम एक नया ग्राहक बढ़ाने में सफलता प्राप्त करें। अखण्ड ज्योति का प्रचार, सद्विचारों का विस्तार यही सबसे अधिक अपनी प्रिय वस्तु आचार्य जी बताया करते हैं। इस भेंट से उन्हें बहुत संतोष होता है
‘अखण्ड ज्योति’ अपने पाठकों को अपना कुटुम्बी मानती है। और उनकी वर्षगाँठ के अवसर पर अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक आध्यात्मिक विधि से धार्मिक कृत्य किया जाता है एवं उनके दीर्घ जीवन तथा सब प्रकार की उन्नति के लिए ईश्वर से मंगल कामना की जाती है। इस अवसर पर आचार्य जी एक सन्देश भी उन सज्जन के लिए भेजते हैं। मैंने कई महानुभावों की वर्षगाँठ अखण्ड ज्योति कार्यालय में मनाई जाती देखी है और उस अवसर पर प्रकट किये गये आचार्य जी के उद्गारों को सुना है
अखण्ड ज्योति के पाठको। आनन्दमय स्वर्गीय जीवन बनाने का प्रयत्न करो। इसका एकमात्र उपाय यह है कि शक्ति का सम्पादन करो, बलवान बनो, तभी दुखों की वैतरणी को तर सकोगे
हर एक पाठक अपने सम विचार वाले बन्धुओं से अखण्ड ज्योति की महत्ता बताते हुए ग्राहक बनने का अनुरोध करने के लिए मिलें और कम से कम एक नया ग्राहक बढ़ाने में सफलता प्राप्त करें। अखण्ड ज्योति का प्रचार, सद्विचारों का विस्तार यही सबसे अधिक अपनी प्रिय वस्तु आचार्य जी बताया करते हैं। इस भेंट से उन्हें बहुत संतोष होता है। आशा है कि पाठक गण आचार्य जी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करने और सद्विचारों के प्रचार का पुण्य लाभ करने के लिए ता. 18-19 और 20 सितम्बर को कम से कम एक-एक घंटा समय अवश्य खर्च करेंगे
कागज छपाई की महंगाई कई गुनी हो जाने के कारण विवश होकर अखण्ड ज्योति के चन्दे में वृद्धि करनी पड़ रही है। अब आगे से वार्षिक मूल्य 2 रु. होगा। जिन ग्राहकों का चन्दा अब तक जमा हो चुका है उनको पुराने चंदे में ही पूरे एक वर्ष तक पत्रिका दी जायेगी
इस अवसर पर आचार्य जी एक सन्देश भी उन सज्जन के लिए भेजते हैं। मैंने कई महानुभावों की वर्षगाँठ अखण्ड ज्योति कार्यालय में मनाई जाती देखी है और उस अवसर पर प्रकट किये गये आचार्य जी के उद्गारों को सुना है। उस समय ऐसा मालूम पड़ता है मानो आचार्य जी अपने सगे छोटे भाई की जयन्ती मना रहे हैं। वह महानुभाव यहाँ नहीं होते तो भी ऐसा लगता है मानो वह यहाँ मौजूद ही हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-September
अखण्ड ज्योति का संचालन एक दुर्बलकाय, व्यक्ति द्वारा होता है। कठोर परिश्रम, असाधारण अध्ययन, निरन्तर चिन्तन, नरनारायण की सेवा की असाधारण लगन आदि तपश्चर्याओं के कारण इसने अपना माँस सुखा डाला है। इस कृश काया में कोई खास सुन्दरता नहीं है फिर भी क्षणभर गंभीरतापूर्वक इसके चेहरे को देखने से प्रतीत होता है कि यह तेज का पुँज है, विद्या, अनुभव और ज्ञान की प्रौढ़ता इसके नेत्रों में से फूटी पड़ती है
एक साधारण से पन्द्रह रुपया मासिक किराये के मकान में घीयामंडी रोड पर अखण्ड ज्योति कार्यालय है। इस मकान में प्रवेश करने पर कोई ऐसा आकर्षण नहीं है जिसके चकाचौंध से कोई अजनबी मनुष्य प्रभावित हो जाए, परन्तु कुछ ही देर ठहरने पर ऐसा अनुभव होता है कि इस स्थान में अत्यन्त प्रभावशाली विद्युत तरंगें प्रवाहित हो रही हैं और उनके प्रभाव से अन्तःकरण एक ढांचे में उसी प्रकार अपने आप ढलने लगा है जैसे लोहा गरम होकर साँचे में जाता है और एक विशेष आकृति का तैयार हो जाता है। चुपचाप एकान्त होकर बैठिए तो भी ऐसा मालूम होता है कि यहाँ की वायु हृदय के भीतरी कोने में प्रवेश करके आध्यात्मिकता की शिक्षा दे रही है
मैं कई वर्ष से अखण्ड ज्योति का ग्राहक हूँ। उसके लेखों से हम लोग बहुत ही प्रभावित होते हैं, कितने ही व्यक्तियों को इन कागज के पन्नों ने कुछ न कुछ बना दिया। पत्रिका के लेखों में ऐसी यथार्थता और प्रभावशालीनता रहती है कि उससे अन्तःकरण में सीधी हलचल पैदा होती है
यों तो अखण्ड ज्योति द्वारा स्वाध्याय और सत्संग का अखण्ड कार्यक्रम सदा चलता रहता है। कर्मयोग गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत के कोने कोने से शिक्षार्थी लोग सदा आते रहते हैं परन्तु इस श्रावण मास में नाग पंचमी से लेकर श्रावणी तक 11 दिन के सत्संग का एक विशेष आयोजन हुआ था। मथुरा वृन्दावन में श्रावण के झूलों का उत्सव प्रसिद्ध है
आठ से कम पुस्तकों पर डाक खर्च ग्राहक के जिम्मे है। -मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-October
—मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्न सहायताएं प्राप्त हुई। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करती है
इस विशेषाँक में सिर्फ ऐसे ही साधन बताये जायेंगे जो अनेकों बार परीक्षा किये जा चुके हैं। जिनके द्वारा जादू भरे चमत्कार प्रत्यक्ष देख लिये गये हैं विशेष जानकारी एवं साधना कराने के लिए अखण्ड ज्योति कार्यालय तैयार रहेगा
1 जनवरी सन् 45 को अखण्ड ज्योति का “सिद्धि अंक” निकलेगा। आत्मिक साधनाओं द्वारा अद्भुत, आश्चर्यजनक एवं महत्वपूर्ण सिद्धियों का प्राप्त होना प्रत्यक्ष है। इस अंक में ऐसे साधन बताये जायेंगे जिनके आधार पर मामूली आदमी मामूली अभ्यासों द्वारा बहुत 2 अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त कर सकता है और उन चमत्कारों सिद्धियों द्वारा स्वयं अपने तथा दूसरों के दुखों को मिटाकर स्वर्गीय आनन्द का अनुभव कर सकता है
2. सन् 45 से अखण्ड ज्योति का चन्दा 2 रु. वार्षिक होगा। कागज छपाई की महंगाई कई गुनी हो जाने के कारण विवश होकर यह वृद्धि हमें करनी पड़ रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-September
अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति. प्रतिमास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें
अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते
अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोक सेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें
‘अखण्ड ज्योति’ प्रतिमास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने के उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए
मैनेजर- अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा
अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) रु. एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीऑर्डर से ही भेजना चाहिए। वी.पी. मँगाने पर 1) अधिक देने पड़ते हैं
पाप कर्म उससे बन ही नहीं पड़ते। अखण्ड ज्योति के पाठक ऐसी परमात्म दृष्टि को धारण कर सकें तो वे ईश्वर की सच्ची भक्ति कर सकेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
(5) अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते
(8) अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोकसेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें
हम जानते है कि अखण्ड ज्योति के पाठकों के अनेक मित्र होंगे और वे इस बात की तलाश में होंगे कि और भी कोई उपयोगी व्यक्ति मिले तो उससे मित्रता बढ़ावे। क्या तुम ऐसा नहीं चाहते? यदि चाहते हो तो तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति से मित्रता करने की सलाह देते हैं जो चौबीस घंटे का साथी हो सकता हैं। दूसरे मित्र कुछ घंटे से तुम्हारे साथ रह सकते हैं वे एक परिमित समय में तुम्हारे साथ रह सकते है और जो मदद कर सकते हैं वह शरीर और मन तक पहुँचती है फिर उन बेचारों की सहायता की शक्ति भी बहुत सीमित है
(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1 रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीआर्डर से ही भेजना चाहिये। बी0 पी0 मंगाने पर
(6) अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रति मास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें
मैनेजर-अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा
अखण्ड ज्योति के पाठक अपनी ‘उल्लू की दीवट’ को संभाल कर रखें और उसका ठीक उपयोग करें तो अपने परम उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं
(7) अखण्ड ज्योति प्रति मास 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
इन दिनों वह झगड़ों से ऊब गया था और आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त करने की प्यास उठ खड़ी हुई थी। अखण्ड ज्योति सम्पादक ने अपने इस बाल सखा को अपने ही पास बुला लिया था। और वह आगरे रह कर साधन तथा प्रचार कार्य करने लगा था। गत १५ मई को ज्वर आया, जो पाँच दिन में उतर गया
वह मुट्ठी बांधकर आया था और हाथ पसार कर चला गया। अखण्ड ज्योति के चित्र पृष्ठ पर जो तीन फोटो छपे हुए हैं उनमें बीच वाले चित्र को जरा ध्यान से देखिए। जोश उनके चेहरे में से मानों टपक पड़ रहा हैं। झुकी हुई भौंह, स्थिर दृष्टि, होटों की गंभीरता अपना एक खास अर्थ रखती हैं
मनुष्य के स्वभाव विचार और आदतों का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। यह बात अखण्ड ज्योति के पाठक अच्छी तरह जानते होंगे। महात्माओं के चेहरे से शान्ति और दुराचारियों पर से क्रूरता टपकते हुए एक बच्चा भी देख सकता है। चेहरे, आकृति और उसके आसपास का वातावरण ऐसा हो जाता है जिसके द्वारा दूसरों के मनोगत भावों का पता लग जाता है
यह पैशाचिक प्रहार किया क्रिया भी होती हैं इनसे सावधान रखने के लिए इन पंक्तियों का उल्लेख किया गया हैं। अखण्ड ज्योति के इन पृष्ठों में लगातार कितने ही मास तक चलने वाली इस लेख माला में उस अनैतिक आक्रमण की शिक्षा किसी को न मिलेगी। क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा पाजीपन लौट कर प्रयोक्ता को भी चबा डाल सकता है और उसकी सारी शक्ति को न्यायी प्रभु की सर्वशक्तिमान सत्ता द्वारा एक ही झटके में छीन लिया जा सकता है। समयानुसार हम अपने पाठकों को यह शिक्षा देंगे कि वे किस प्रकार दूसरों की शारीरिक एवं मानसिक सेवा कर सकने की योग्यता प्राप्त कर सकते हैं
यह विषय अत्यन्त गहन है इसे पूरी तरह से समझाये बिना अभ्यास के साधनों का वर्णन करने लग जाना उचित न होता। इस मास अखण्ड ज्योति संपादक की मारफत पाठक के करीब नो दर्जन पत्र मुझे मिले हैं जिनमें पाठकों ने अभ्यास में लाने में शीघ्रता करने का अनुरोध किया है। उनकी उत्सुकता का आदर करता हूँ। किन्तु एक बात कहूँगा कि केवल उत्सुकता और जल्दबाजी से काम न चलेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-February
इस शान्ति मन्दिर की टोह में चलते हुये जो साथी हमें मिल जाते हैं वे ही हमारे परिवारी हैं। अखण्ड ज्योति परिवार उन जिज्ञासु, ज्ञान पिपासु और आनन्द खोजी पथिकों का जखीरा बनना चाहता है। इस जखीरे के सब रास्तागीर, जितना जिससे बन पड़ेगा आनन्द मार्ग, ईश्वर, भक्ति पथ और सदाचार की राह पर चलते हुए सच्चा शान्ति ढ़ूँढ़ने का प्रयत्न करेंगे। सब साथी एक दूसरे को अपना अनुभव बताने और सहयोग देने को तत्पर रहेंगे
कुछ समय तक लगातार अन्तर्मुख होने के बाद आप की पीड़ा मेरी तरह उमड़ पड़ेगी तब आप अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे सदस्य होंगे। ऐसे सदस्यों की आत्मा को चूमता हुआ उनके हृदय से लग जाने के लिए मैं व्याकुल हो रहा हूँ
ऐसा निश्चय किया गया है कि "अखण्ड ज्योति" में आगामी अंक से अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र भी हर अंक में दिये जाया करें। इसलिये आध्यात्म विद्या प्रेमी, सदाचारी, ईश्वरभक्त और लोकसेवी भाई बहनों से प्रार्थना है कि वे अपने संक्षिप्त परिचय भेजने की कृपा करें। परिचय पाकर अपनी आवश्यकतानुसार उन सज्जनों से हम चित्र मंगवा लेंगे और पत्र में संक्षिप्त परिचय के साथ प्रकाशित करेंगे
हम आप एक महान पथ के पथिक के रूप में अपना सम्बन्ध स्थापित करते हैं। अखण्ड ज्योति हम लोगों के विचारों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को एक दूसरे के पास पहुँचाने वाली सन्देश वाहिका सेविका है। हम लोग अपनी एक छोटी दुनियाँ अलग बसाते हैं, हम आना एक परिवार अलग कायम करते हैं। हो सकता है कि आप सेठ, साहूकार, राजा, धनी, विद्वान, बलवान, शक्तिशाली, अधिकारी, उच्च पद प्राप्त, सौभाग्यशाली अथवा दीन, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, निर्बल, दुखी, शक्तिहीन, पीड़ित, चिन्तित और साधन हीन हों
जिन विद्वानों ने उस महातत्व की झांकी की है उन्होंने यह कहा है कि हम लोगों का सम्पूर्ण ज्ञान अभी रज कण के बराबर भी नहीं है। ऐसे अधूरे ज्ञान के आधार पर बने हुए सिद्धान्त और यन्त्र यदि उस अखण्ड ज्योति को नहीं जानते तो इससे उसकी असिद्धि नहीं होती। वह जीव जो इतनी आशाऐं करता है, आत्म चिन्तन में इतना लीन रहता है, सोते समय न जाने कहाँ कहाँ घूम आता है, गहन समस्याओं के हल करने में शरीर की सुध- बुध भूल जाता है, अभ्यास द्वारा शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं में आश्चर्य जनक घट- बढ़ कर लेता है क्या वह शारीरिक क्रियाओं की स्फुरण मात्र है? मैस्मरेजम, योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान द्वारा जो अद्भुत चमत्कार देखने में आते हैं, भूत प्रेतों के कभी- कभी दर्शन होते हैं, कुछ लोग अपने पूर्व जन्म की कथा सप्रमाण बताते हैं, किन्हीं- किन्हीं बालकों में जन्म जात अद्भुत प्रतिभा होती है यह बातें क्या जीव के अभाव में भी हो सकती हैं? हमारा अन्तःकरण इसे स्वीकार नहीं करता। पूर्वजों के स्मारक बनाने, उनकी कीर्ति को अमर रखने, मृतक के साथ सहानुभूति प्रकट करने की प्रथा बुद्धि विरुद्ध नहीं है
अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक को देखकर कई पाठकों ने शिकायत के पत्र भेजे हैं कि इसमें मैस्मरेजम, तन्त्र संतान, योग क्रियाओं का बहुत थोड़ा बयान है। अपने उन स्नेही बन्धुओं से एक प्रार्थना हमें करनी है कि जल्दी न करें। धीरे- धीरे और थोड़ा- थोड़ा ही वे ग्रहण करे मनन करते जाय और उसे अभ्यास में लाते जाय
"अखण्ड ज्योति" के पाठकों से भी प्रार्थना है कि उक्त प्रकार के किन्हीं अध्यात्म विद्या प्रेमी भाई बहिनों को जानते हों तो उनका पता और परिचय हमारे पास लिख भेजें, जिससे हम स्वयं उनसे फोटो की याचना कर लें। आशा है कि इस विषय में पाठक हमारी सहायता करेंगे
तब क्या यह कोई संस्था है? नहीं। विलायती प्रजातन्त्र की नकल करके जिस प्रकार की संस्थायें आजकल बन रही हैं ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ हरगिज उस तरह की कोई संस्था नहीं है। हमारे कुटुम्ब में दस आदमी हैं वे सब एक दूसरे के हित को अपना हित समझते हुये सम्मिलित स्वार्थ होकर रहते हैं, यदि यह कुटुम्ब संस्था है तो अखण्ड ज्योति परिवार भी संस्था हो सकती है
सब उस एक अखण्ड अमर और आदि अन्त रहित, सच्चिदानन्द महान तत्व के अंश हैं, जिसे राम, रहीम या चाहे जिस नाम से पुकारा जा सकता है। ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’’ हम शरीर धारी जीव मनुष्य उसी महासूर्य की किरणें हैं, उसी एक अखण्ड ज्योति की प्रकाश रश्मियाँ हैं। हम सब केवल भाई, सहोदर, साथी और मित्र ही नहीं वरन् इससे भी कुछ अधिक हैं। सूर्य की एक किरण से दूसरी का जो सम्बन्ध है, रूपये की एक पीठ से दूसरी का जो सम्बन्ध है, शरीर के एक अंग से दूसरे का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध हम लोगों के बीच में हैं
विलायती प्रजातन्त्र की नकल करके जिस प्रकार की संस्थायें आजकल बन रही हैं ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ हरगिज उस तरह की कोई संस्था नहीं है। हमारे कुटुम्ब में दस आदमी हैं वे सब एक दूसरे के हित को अपना हित समझते हुये सम्मिलित स्वार्थ होकर रहते हैं, यदि यह कुटुम्ब संस्था है तो अखण्ड ज्योति परिवार भी संस्था हो सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-January
जिन पत्रों के आरम्भ से ही सैकड़ों ग्राहक हों उनके लिये भी ग्राहकों के बारे में खोज बीन होती हैं और इस कार्य में कभी कभी तो वे महीनों लगा देते हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रथम मास से ही इतने ग्राहक हैं, जो डाकखाने की निश्चित संख्या से कई गुने होते हैं। फिर भी रजिस्टर नम्बर मिलने में देर न लगने की आशा नहीं है। सम्भव है वे इस कार्य में एक महीना से भी अधिक समय लगा लें
अखण्ड ज्योति इसी अध्यात्म विद्या की चर्चा करने को अवतीर्ण हुई है। इस पत्र में तन्त्र शास्त्र मैस्मरेजम, प्रेतवाद, मनोविज्ञान आदि की चर्चा में कुछ विलक्षणता और अटपटापन देखकर किसी को न तो भ्रम में पड़ना चाहिए और न आश्चर्य करना चाहिए। यह सब मनोविज्ञान और अध्यात्म विद्या द्वारा सामयिक रोगों की चिकित्सा विधि मात्र है
हमने ‘अखण्ड ज्योति’ को ठीक समय पर निकालने का निश्चित प्रबन्ध कर लिया है। वह बिना एक दिन के भी अन्तर के सदैव अपनी तारीख पर निकल जाया करेगी। किन्तु आगामी अंक में सम्भवतः कुछ देर हो जाय
अखण्ड ज्योति के सम्पादक जी ने मुझसे तन्त्र विज्ञान सम्बन्धी एक लेख मांगा है। हर्ष की बात है कि एक पत्र तो ऐसा निकला जो इस महाविज्ञान की चर्चा में अपने कुछ पृष्ठ दिया करेगा। नई सभ्यता के चकाचौंध में हम अपने यहाँ के उत्तमोत्तम विज्ञानों को झूठा समझने लगे हैं
अखण्ड ज्योति
यदि इस विषय के विद्वान इस विज्ञान पर प्रकाश डाले तो जन हित का एक बड़ा साधन लोगों को प्राप्त हो सकता है। यदि अखण्ड ज्योति सम्पादक ने मुझे अवसर दिया तो अपने क्षुद्र अनुभव के आधार पर पाठकों को प्रेषित करता रहूँगा
अखण्ड ज्योति क्यों?
जनता जनार्दन के सामने ‘अखण्ड ज्योति’ लेकर उपस्थित होते हुए मुझे अपनी अयोग्यता का संकोच अवश्य है। पर जिस सदुद्देश्य से इसका प्रकाशन हो रहा है वह लोक हितकारी होगा, ऐसा मुझे विश्वास है और इसी विश्वास के आधार पर एक आशा और उत्साह की लहर आज मुझमें दौड़ रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
आज नहीं तो कल उन्हें अर्थ संकट के कारण मुरझाते हुए इस धर्म तरु को सींचने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। अखंड ज्योति अखण्ड है वह खंडित नहीं होगी। तेल निबट जायगा तो बत्ती जलेगी, बत्ती निबट जायगी तो दोवट जलेगी। जब तक जीवन रहेगा
प्रभु की कितनी कृपा है कि आज वह अभिलाषा पूरी हो रही है। अब अखण्ड ज्योति सहित स्थायी तौर से वहाँ रहने का अवसर मिलेगा, और देश भर के वहाँ पधारने वाले भज्जनो का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अखण्ड ज्योति के हजारों प्रेमी जो वहाँ पधारेंगे अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करते रहेंगे यह कितने हर्ष की बात है
अब अखण्ड ज्योति सहित स्थायी तौर से वहाँ रहने का अवसर मिलेगा, और देश भर के वहाँ पधारने वाले भज्जनो का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अखण्ड ज्योति के हजारों प्रेमी जो वहाँ पधारेंगे अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करते रहेंगे यह कितने हर्ष की बात है
पाठकों को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि अखण्ड ज्योति कार्यालय ता0 25 दिसम्बर को आगरा से उठकर मथुरा चला जायगा
(6) अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रति मास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें
(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1 रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीआर्डर से ही भेजना चाहिये। वी0 पी0 मंगाने पर
आज गत वर्ष के अन्त और नवीन वर्ष के आगमन की संध्या में हमारी एक और भी इच्छा हो रही है वह यह कि अखण्ड ज्योति के सभी प्रेमी पाठक अपने कुशल समाचार व अपनी आध्यात्मिक आकाँक्षायें हमें लिख भेजें। और गत वर्ष के अखण्ड ज्योति के कार्य की निष्पक्ष समालोचना करते हुये बतावें कि इसको और अधिक उत्तम कैसे बनाया जा सकता है। हमें एक पत्र लिखते में पाठको का एक लिफाफा अवश्य खर्च होगा पर इसमें हम लोग एक दूसरे के हृदयों के अधिक निकट आवेंगे
’अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
आत्म ज्ञान, संयम श्रेष्ठ आचरण और उदारता के पवित्र आदर्शों से गीता का अन्तः करण भरा हुआ है। अखण्ड ज्योति उन्हीं महातत्त्वों को भिन्न-भिन्न स्वरों में गाती रहती है। गोविन्द और उनकी गीता के अमृत निर्झर की ही कुछ बूँदें, माया की तप्त अग्नि में जलते हुए प्राणियों पर छिड़कते रहने का हमारा यह प्रयत्न है
‘अखण्ड ज्योति कार्यालय’ मथुरा जी चला गया
अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा सद्ज्ञान ग्रन्थमाला नामक एक पुस्तकमाला का प्रकाशन भी आरम्भ हो गया है। इस योजना के अनुसार ऐसे ग्रन्थ रत्न प्रकाशित किये जायेंगे जो मानव जीवन में एक नवीन क्रान्ति उपस्थित करते हैं। जिस अलभ्य ज्ञान के लिये जीवन का बहुत बड़ा भाग तलाश और अभ्यास में लगाना पड़ता है
अखण्ड ज्योति भगवान कृष्ण के अखण्ड और सत्य शिव सुन्दर आदेशों का प्रकाश जन साधारण के हृदयों तक पहुँचाने के उद्देश्य को लेकर अवतरित हुई है। आत्म ज्ञान, संयम श्रेष्ठ आचरण और उदारता के पवित्र आदर्शों से गीता का अन्तः करण भरा हुआ है। अखण्ड ज्योति उन्हीं महातत्त्वों को भिन्न-भिन्न स्वरों में गाती रहती है
(7) अखण्ड ज्योति प्रति मास 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए
(8) अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोकसेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें
मैनेजर-अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा
आज गत वर्ष के अन्त और नवीन वर्ष के आगमन की संध्या में हमारी एक और भी इच्छा हो रही है वह यह कि अखण्ड ज्योति के सभी प्रेमी पाठक अपने कुशल समाचार व अपनी आध्यात्मिक आकाँक्षायें हमें लिख भेजें। और गत वर्ष के अखण्ड ज्योति के कार्य की निष्पक्ष समालोचना करते हुये बतावें कि इसको और अधिक उत्तम कैसे बनाया जा सकता है। हमें एक पत्र लिखते में पाठको का एक लिफाफा अवश्य खर्च होगा पर इसमें हम लोग एक दूसरे के हृदयों के अधिक निकट आवेंगे। हमें पता है कि प्रेमी पाठक अपने प्रेम सम्बन्ध का इस वर्ष-संध्या के उपलक्ष में एक पत्र द्वारा अपने प्रेम सम्बन्ध का परिचय देंगे
(5) अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-August
(5) अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते
(8) अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोकसेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें
(6) अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रति मास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें
(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1 रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीआर्डर से ही भेजना चाहिये। वी0 पी0 मंगाने पर
मैनेजर-अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा
(7) अखण्ड ज्योति प्रति मास 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
अपनी भावना के अनुकूल जन्म धारण करने में एक और सन्देह हो सकता है कि इससे तो जीव सब प्रकार स्वतन्त्र हो गया, उस पर कर्मफल प्राप्त करने के लिए कोई नियन्त्रण नहीं रखा गया? इसका पूरा समाधान तो ‘‘जीव का अस्तित्व और उसकी क्रिया’’ विषय को पूरी तरह समझे बिना नहीं हो सकता। पाठक इस तत्व को भी अखण्ड ज्योति के किसी आगामी अंक में पढ़ेंगे। यहाँ पर तो इतना ही कहा जा सकता है कि नियन्त्रण हैं अवश्य, पर जेलखाने की तरह नहीं। उसकी छूट रिहाई, सजा, मजदूरी किसी दफ्तर में नहीं रखी जाती
अमृतमयी मानसरोवर को नारकीय दुर्गन्धि भरा नाला बना रखा है। अपनी अखण्ड ज्योति को पद दलित करके चारों ओर अन्धकार पूर्ण बना दिया है। हाय रे। मनुष्य, तू इतना भूल गया
मनोबल और इच्छा शक्ति के द्वारा सभी मानसिक शक्तियाँ विकास कर सकती हैं इस सिद्धान्त को पाठक अखण्ड ज्योति के पिछले अंकों में अनेक स्थलों पर पढ़ चुके होंगे। स्मरण शक्ति के विकास पर भी वह सिद्धान्त वैसा ही लागू होता है जैसा अन्य शक्तियों पर। जिस भोज्य पदार्थ में घृत डाला जाता है वह सुस्वादु बन जाता है, जिस भूमि में खाद डालते है वही उर्वरा हो जाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
(खास अखण्ड ज्योति के लिए भेजे हुए अंग्रेजी लेख का अनुवाद)
इस सहायता के अनुसार 10 पुस्तकालयों को 1॥) की बजाय 1) में अखण्ड ज्योति दी जावेगी। इस सुविधा से लाभ उठाने वाले शीघ्रता करें
योग इतना गूढ़ तथा महत्व का विषय है कि मुझ जैसे पुरुष का लेखनी उठाना ही हास्यास्पद है, किन्तु मनुष्य अपने विचारों में स्वतन्त्र है। औचित्य तथा अनौचित्य पर सम्मति प्रगट करने के लिये संसार के सामने अपने विचार रखना भी प्रत्येक सत्यासत्य-निर्णय-प्रेमी का कर्तव्य है, यही धारण हृदय में धर का साहसपूर्वक आज उस अखण्ड ज्योति पर लिखने चला हूँ जिस ज्योति के प्रकाश में मनुष्य सदा सुख मार्ग पर चल सकता है
अखण्ड ज्योति का यह अंक जिस दिन पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, प्रायः उसके दूसरे दिन होलिका दहन का त्योहार होगा। गरीब अमीर सभी अपनी स्थिति के अनुसार होली मनाने की तैयारी कर रहे होंगे। पकवान, मिष्ठान, बनाने की तैयारियाँ हो रही होंगी, नये कपड़े बन रहे होंगे, बच्चे होलिका दहन का तमाशा देखने और धूलि उड़ाने के लिए उस समय की घड़ियां गिन रहे होंगे
श्री. रामगोपाल, वनवारीलाल, संभल जिला मुराद निवासी ने हमारे पास 5) इसलिए भेजे हैं कि जो पुस्तकालय पूरा मूल्य देकर अखण्ड ज्योति के ग्राहक बनने में असमर्थ हैं वे 1॥) की बजाय 1) में ही एक वर्ष तक पत्रिका प्राप्त कर सकें
प्राणायाम की महत्ता शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से अद्भुत है। अखण्ड ज्योति के पिछले दो अंकों में एक ख्यातिनामा डॉक्टर ने प्राणायाम द्वारा होने वाले लाभों को बताया है जिन लोगों ने क्रियात्मक रूप से प्राणायाम का अभ्यास किया है उन्होंने जाना है कि यह महाविज्ञान शरीर और मन को कितनी अलौकिक शक्ति प्रदान करता है। मोटे तौर से देखने में इतना ही मालूम पड़ता है कि साँस जल्दी-जल्दी और गहरी लेने तथा श्वास लेने की क्रिया में रोक थाम करने से जो कुछ होगा वह फेफड़ों तक सीमित रहेगा, हृदय पर कुछ असर पड़ेगा या रक्त संचार में कुछ परिवर्तन हो जायगा। यह कार्य साधारण व्यायाम या साँस की गति को बढ़ाकर किया जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते
अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोक सेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें
‘अखण्ड ज्योति’ प्रतिमास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने के उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए
अखण्ड ज्योति के पाठकों के सामने मैं एक ऐसे प्रश्न पर विचार करना चाहता हूँ जिसका सम्बन्ध प्रत्येक मानव शरीर से रहता है पर जिसकी तात्विक जानकारी बहुत कम लोगों को रहती है। सभी शास्त्रों, ऋषि महात्माओं की वाणी है कि पुण्य कार्य की ओर प्रवृत्त होना चाहिये और पाप कर्म से अपने को बचाये रखना चाहिये। पुण्य क्या है? कहा जाता है कि अच्छे कर्म से पुण्य होता है
अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रतिमास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें
अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीऑर्डर से ही भेजना चाहिए। वी.पी. मँगाने पर 1=) अधिक देने पड़ते हैं
मैनेजर- अखण्ड ज्योति, फ्रीगंज, आगरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
आस्तिकता को रोम-रोम में बसा देने वाली उपासना अपने को पवित्र एवं परिष्कृत बनाने की जीवन साधना के साथ-साथ उदार आत्मविस्तार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने वाली अंशदान प्रतिज्ञा का समावेश करना प्रत्येक अध्यात्मवादी का पुनीत कर्तव्य है। अखण्ड ज्योति परिजनों से इसी त्रिवेणी में स्नान करके परम पद प्राप्त करने का अनुरोध है। अंशदान की प्रवृत्ति को प्रखर बनाने और उसे इसी गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा के बीच कार्यरूप में परिणत कर देने के आग्रह सहित यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं
अखण्ड ज्योति के परिजनों को हम आरम्भ से ही आस्तिकता की आवश्यकता और उपासना की उपयोगिता समझाते रहे हैं। हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग उपासना के निमित्त ही समर्पित रहा है। इसके अतिरिक्त जो भी सम्पर्क में आया है उसे आस्तिकता अपनाने और उपासना में संलग्न होने का परामर्श देते रहे हैं
गायत्री जयन्ती 7 जून की और गुरु पूर्णिमा 11 जुलाई की। यह 35 दिन की अवधि इसके लिए रखी जानी चाहिए कि अखण्ड ज्योति के सभी परिजन अपने-अपने यहाँ अंशदान के प्रतीक ‘ज्ञानघट’ अपने यहाँ स्थापित कर लें और उनके प्रकाश में अपना एक घण्टा समय दान एवं दस पैसा अनुदान का क्रम अनवरत रूप से चलाते रहें। छपे हुए ज्ञान घट गायत्री तपोभूमि से मिल सकते हैं, पर उन्हें मंगाना कठिन हो तो बाजार से बच्चों की पैसा जमा करने वाली “गुल्लकें” खरीदी जा सकती हैं और उन पर ज्ञान घट लिखकर पूजा वेदी के निकट स्थापना की जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
जहाँ कुछ अधिक उत्साह हो वहाँ अगले वर्ष एक महिला सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिए जिसमें शान्तिकुँज से देव कन्याओं का जत्था भेजा जा सके और उस पुण्य प्रयोजन के लिए उस क्षेत्र में उत्साह उभारा जा सके। अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों की कन्याएं एक वर्षीय प्रशिक्षण में और महिलाएं दस दिवसीय अथवा एक महीने वाले सत्रों में पहुँच सकें ऐसा प्रयास होना चाहिए। यहाँ से प्रकाश लेकर लौटी हुई कन्याएँ एवं महिलाएं पुराने ढर्रे को बदल कर नये वातावरण का सृजन करने में संलग्न हो सकेंगी, ऐसी आशा सहज ही की जा सकती है
अखण्ड ज्योति के पाठकों में से जिन्हें उपरोक्त तीन धर्मों में से किसी में अधिक गहरी रुचि एवं जानकारी हो उनका परामर्श इन पंक्तियों द्वारा सादर आमन्त्रित किया जाता है। इस संदर्भ में परामर्श शान्ति कुँज, सप्त सरोवर, हरिद्वार के पते पर भेजे जायें
यह खुली सचाई है कि अखण्ड ज्योति पत्रिका के माध्यम से ही युग-निर्माण परिवार का गठन, सूत्र संचालन और हलचलों का अभिवर्धन सम्भव हो सका है। महिला जागरण अभियान अपने प्रयासों में अति महत्वपूर्ण है। इसे देशव्यापी और विश्वव्यापी होना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
व्यस्त परिजनों से भी अपेक्षा की जायगी कि जो पिछले पाँच वर्षों में किसी सत्र में आ चुके हैं वे भी और जो नहीं आ पाये हैं वे भी इन सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अखण्ड ज्योति के माध्यम से जो प्रकाश मिलता है उसे प्रेरणा के रूप में विकसित करने के लिए सान्निध्य की आवश्यकता है। दूरस्थ रहने और समीप पहुँचने पर क्या अन्तर होता है? स्वाध्याय और सत्संग के प्रभा में कितनी विशेषता होती है। इसका अनुभव इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले सहज ही अनुभव कर सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
इसी से वसन्त पञ्चमी की तरह दूसरा पर्व हम गुरु पूर्णिमा को मानते हैं। पर विचारात्मक दृष्टि से आज से तीन वर्ष पूर्व अखण्ड ज्योति के माध्यम से योजना की रूप-रेखा वसन्त पञ्चमी के अवसर पर ही जन साधारण के सामने रखी गई थी और उसी दिन से उसका प्रचार कार्य आदि किया था। इस प्रकार भगवती सरस्वती का ही नहीं, युग-निर्माण योजना का शुभारम्भ भी इसी अवसर पर होता है। अज्ञातवास से लौटने के बाद हम हर वर्ष इस पर्व को ही नहीं, पूरे माघ-मास को विशेष भावनाओं के साथ मानते आ रहे हैं
पता—अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड ज्योति संस्थान में ‘अखण्ड दीप’ की स्थापना और गायत्री तपोभूमि में ‘अखण्ड अग्नि’ की स्थापना वसन्त पञ्चमी के दिन हुई थी। इन दोनों ज्योतियों ने उपासना क्षेत्र में उत्साहवर्धक सहायता दी है। ‘अखण्ड दीप’ का सम्बल लेकर अपनी निज की गायत्री उपासना करते हुए हमने अपना पथ अधिक सफलतापूर्वक अधिक दूरी तक पार किया
प्रचलित परम्पराओं के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के जन्म से 25 वे वर्ष में रजत-जयन्ती, 50 वे वर्ष में स्वर्ण-जयन्ती, 75 वे वर्ष में हीरक-जयन्ती और 100 वे वर्ष में शताब्दी मनाई जाती है। गत वर्ष अखण्ड ज्योति के 25 वें वर्ष में हम लोगों ने उसकी रजत-जयन्ती मनाई भी है। डॉक्टर साहब के जन्म का यह 50 वाँ वर्ष था अतएव उसका हर्षोल्लास मनाना उचित भी था। युग निर्माण के वे कर्मठ सदस्य हैं
लगभग सभी महत्वपूर्ण कार्य हमने इसी शुभ मुहूर्त में आरम्भ किये हैं। अब से पच्चीस वर्ष पूर्व “अखण्ड ज्योति” पत्रिका का प्रकाशन इसी दिन से आरम्भ किया गया था। प्रथम वर्ष वह केवल 500 छपती थी अब उसके सदस्यों की संख्या 30 हजार से ऊपर निकल रही है। उसने लाखों व्यक्तियों के अन्धेरे में पड़े हुए मानसिक धरातल को आलोकित किया है और अपना एवं समाज का कल्याण करने की शिक्षाओं पर साहसपूर्ण कदम उठाने वाले शूरवीरों की पंक्ति में उन्हें ला खड़ा किया है
इसी प्रकार हमें अनुभवी, सच्चे और निःस्वार्थी लोक सेवी मिलेंगे और उसी आधार पर इस निर्माण का प्रयोजन पूरा होगा। इसके लिए अखण्ड ज्योति परिवार के उपरोक्त स्थिति वाले प्रत्येक नर-नारी को इन दिनों हम प्रबल प्रेरणा दे रहे हैं कि वे उचित अवसर पर वानप्रस्थ लेकर आत्म कल्याण एवं राष्ट्र के नव-निर्माण को अपना लक्ष्य बनायें और उसी में तत्परतापूर्वक संलग्न हों। यह कार्य घर में रहते हुए, अपने परिवार को भी समाज का एक अंग मानकर उसकी भी देखभाल एवं सेवा करते हुए हो सकता है। असल में यही उचित भी है कि अपनी आजीविका अपने घर में चलाई जाय और बचत का अधिकाधिक समय लोक सेवा के लिए लगाया जाय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
दो वर्ष में कितना बड़ा काम हुआ है इसकी झाँकी जुलाई में युग निर्माण पत्रिका का विशेषांक पढ़ने से अनुमान लगाया जा सकेगा। तीसरे वर्ष का कार्यक्रम मार्च की अखण्ड ज्योति में छपा है अब उसकी तैयारी में हमें लग जाना चाहिए। ताकि आगामी गुरु पूर्णिमा आते ही, तीसरा वर्ष आरम्भ होते ही निश्चित कार्यक्रमों को सुसंचालित किया जा सके। तीसरे वर्ष में जो लक्ष्य निर्धारित किया गया है वह इस प्रकार है-
युग निर्माण योजना का तृतीय वर्ष कितना शानदार होगा, इसका आभास मार्च की अखण्ड ज्योति में छपी सूचनाओं के आधार पर सहज ही लगाया जा सकता है। अभियान असाधारण है। इस युग का इसे सबसे बड़ा धार्मिक आन्दोलन कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
(4) अखण्ड ज्योति का चन्दा अधिकाँश सदस्यों का इस अंक के साथ समाप्त हो जाता है। उन्हें मनीआर्डर द्वारा इसी महीने भेज देना चाहिये। जिनका चन्दा बीच के किसी महीने में समाप्त होता हो, उन्हें भी शेष महीनों का चन्दा भेजकर अपना हिसाब जनवरी से दिसम्बर तक का कर लेना चाहिए
(8) रामायण के माध्यम से युग-निर्माण की विचारधारा के अनुकूल प्रवचनों की सामग्री जुटानी और छापनी है। अखण्ड ज्योति परिवार के जिन सदस्यों का रामायण के सम्बन्ध में इच्छा एवं गम्भीर अध्ययन, मनन, चिन्तन हो वे हमें अपनी जानकारी की सूचना दे दें, ताकि उनके परामर्श एवं सहयोग से उपरोक्त प्रकार के भाषण तैयार करने का कार्य आरम्भ किया जा सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं। बूढ़ा बाप, परिवार के बड़े लड़कों को गृह व्यवस्था चलाने का उत्तरदायित्व सौंपता है, इसको अर्थ यह नहीं कि घर के शेष सब लोगों का महत्व कम है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
पता - अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
लेखन शिविर यथाक्रम चलता रहा। अखण्ड ज्योति परिवार के दो प्रमुख साहित्य सेवी डॉ0 रामचरण महेन्द्र और श्री सत्यभक्त जी का सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया। उन्हें मान-पत्र दिये गये। समारोह में मथुरा के प्रायः सभी साहित्यकार और गण्यमान्य लोकसेवी उपस्थिति थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
रजिस्टर्ड नं. एम.टी.आर. 98 अखण्ड ज्योति मासिक’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
अखण्ड ज्योति प्रकाशन, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
इस पृष्ठभूमि को समझने-समझाने के लिए अखण्ड ज्योति का प्रस्तुत अंक विशेष रूप से उपयोगी है। उसे सुरक्षित रखने के लिए जिल्द बना ली जाय और बारी-बारी करके उसे ऐसे अनेक लोगों को पढ़ाया जाय, जिनमें आस्तिकता के बीजांकुर मौजूद है। उर्वर भूमि में बीज ही अंकुर फूलते और हरे-भरे पत्ते बहार देते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
ऐसी विचार पद्धति युग निर्माण-योजना के अंतर्गत सत्साहित्य के रूप में सृजन की जा रही है। सो हमें ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण पत्रिका’ और छोटे ट्रैक्ट मनोयोगपूर्वक स्वयम् पढ़ने चाहिए, अपने परिवार के हर शिक्षित को पढ़ाने और अशिक्षित को सुनाने चाहिये। तथा परिचितों से संपर्क बनाकर इसे पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिए
प्रथम रजिस्टर में सदस्यों और सहायकों की नामावली रहे। सदस्य वे माने जायें जो पैसा खर्च कर ‘अखण्ड ज्योति’ को मँगाते हैं। सहायक वे माने जायें जो पैसा तो खर्च नहीं करते पर दूसरों से लेकर नियमित रूप से पढ़ लेते हैं। पत्रिका पढ़ लेने की शर्त इसलिए रखी गई है कि प्रस्तुत विचार धारा का जिन्हें नियमित प्रशिक्षण मिल रहा होगा, उन्हीं से नियत प्रयोजन के लिए, नियत क्रिया पद्धति से कुछ काम करने की आशा की जा सकती है
जुलाई 67 की ‘अखण्ड ज्योति’ जिन्होंने ध्यानपूर्वक पढ़ी होगी उन्हें इस तथ्य का आभास हुआ होगा कि अगले दिन विश्व संकट की भयावह सम्भावनाओं से भरपूर है। उनमें अनेक अप्रत्याशित विपत्तियों के पहाड़ टूटेंगे और कुचल-कुचल कर मनुष्य को यह शिक्षा देंगे कि उसे सुख-सुविधायें उपलब्ध कर वासना और तृष्णा संकुलित घृणित जीवन जीने में ही मदमस्त नहीं रहना चाहिये वरन् सामाजिक उत्कृष्टता स्थिर रखने के लिये पुरुषार्थ करते रहने का, अपने महान् कर्त्तव्य को भी ध्यान में रखना ही चाहिए। इस तथ्य की उपेक्षा करके संसार को वर्तमान दुर्गति तक पहुँचा देने की जिम्मेदारी हम सब की है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
यह अंक पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, तब तक 3 फरवरी को सद्ज्ञान की देव गंगा- वीणापाणि- भगवती सरस्वती का जन्मोत्सव बसन्त-पंचमी (3 फरवरी) को सम्पन्न हो चुका होगा। अखण्ड ज्योति के हर सदस्य ने उसे किसी-न-किसी रूप में मनाया होगा, क्योंकि हम सबके लिए यह एक विशिष्ट पारिवारिक शुभ दिन है। इसी दिन ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रकाशित हुई, इसी दिन ‘युग-निर्माण-योजना’ आरम्भ हुई, इसी दिन ‘गायत्री तपोभूमि’ की नीव रखी गई, इसी दिन ‘यज्ञ आन्दोलन’ प्रारंभ किया गया एवं हमारा आध्यात्मिक जन्म-दिन भी है। अपनी ‘उपासना’ भी इसी दिन से आरम्भ की, लोक-मंगल के कार्यक्रमों में भी इसी दिन हमने हाथ डाला और अब जीवन की अन्तिम तप साधना भी इसी दिन से आरम्भ होगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
यह पहला कदम आज ही उठाया और आज ही आगे बढ़ाया जाना चाहिये। नव-निर्माण के मिशन का समारम्भ, शुभारम्भ, संचालन एवं अभिवर्धन का मूल तन्त्र ‘अखण्ड ज्योति’ और ‘युग निर्माण’ पत्रिकायें हैं। उन्हीं के माध्यम से इतने विशाल परिमाण में प्रबुद्ध परिजनो का एक अति प्रभावी और अति समर्थ संगठन उत्पन्न हो सका है और इन्हीं की प्रेरणा से शतसूची कार्यक्रमों को अपनाकर हजारों, लाखों कर्मवीर नव-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया में प्रवृत्त हुए हैं। अब अपना क्षेत्र बढ़ाना है, तो इन दोनों पत्रिकाओं को अधिक समर्थ एवं व्यापक बनाना होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
अनाहत कमल की फलभित्ति के केन्द्र में एक उल्टा त्रिकोण है, जिसमें अखण्ड ज्योति प्रज्वलित रहती है। यह अखण्ड ज्योति ही अपनी जीवात्मा है। अनाहत के मुख्य कमल के नीचे एक और लाल पंखुड़ियों वाला कमल है, जिसमें कल्पतरु है
अनाहत कमल की फलभित्ति के केन्द्र में एक उल्टा त्रिकोण है, जिसमें अखण्ड ज्योति प्रज्वलित रहती है। यह अखण्ड ज्योति ही अपनी जीवात्मा है। अनाहत के मुख्य कमल के नीचे एक और लाल पंखुड़ियों वाला कमल है, जिसमें कल्पतरु है। अनेक योगियों का विचार है कि अनाहत में स्थित कल्पतरु या शान्त झील पर ध्यान करना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
(7) यह योजना ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘वाङ्मय’ के घर-घर प्रचार-प्रसार की दृष्टि से आरंभ की गई है एवं घाटा उठाकर इसे हाथ में लिया गया है। इसे मिशनरी भाव से ही संपन्न किया जाना है
विगत 64 वर्षों की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिकाएँ अब उन्हें तो पढ़ने को नहीं मिल सकतीं, जो अभी जुड़े हैं, विगत एक या दो दशक में जुड़े हैं अथवा समय-समय पर संदर्भों को पत्रिका में पढ़ते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे ग्रंथ भी आज पढ़ने को नहीं मिल सकते, जो पूज्यवर ने 1940 में ‘मैं क्या हूँ’ से आरंभ कर क्राँतिधर्मी साहित्य तक अनवरत जीवनभर लिखे। इनकी संख्या भी प्रायः तीन हजार के आसपास है, जिनमें छोटी पुस्तिकाएँ, ट्रैक्ट्स एवं गायत्री महाविज्ञान, प्रज्ञापुराण जैसे ग्रंथ भी शामिल हैं
अखण्ड ज्योति के गत अंक में बताया गया है कि किस प्रकार से यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा विविध प्रकार के ज्वरों से छुटकारा पाया जा सकता है। यहाँ पर सरदी, जुकाम, खाँसी, दमा-ब्रौंकाइटिस, क्षय आदि से लेकर त्वचा रोग, प्रदर प्रमेह आदि रोगों की यज्ञ चिकित्सा के संबंध में वर्णन किया जा रहा है
(10) मिशन की मान्यताओं, आदर्शों के विपरीत आचरण करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं से कोई संपर्क नहीं रखेंगे। ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे, न ही ऐसी गतिविधियों में संलग्न होंगे, जिससे अखण्ड ज्योति संस्थान, युगनिर्माण योजना, शाँतिकुँज हरिद्वार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचे
उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा’ भेज दें। ज्ञान केंद्र संबंधी सारा पत्राचार इसी पते पर करें
जून 2001 की अखण्ड ज्योति में विस्तार से ‘पूज्यवर के ज्ञानशरीर को जन-जन तक पहुँचाएँ, शीर्षक से एक लेख दिया गया था। उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा’ भेज दें
उनका सिर पर हाथ रख देना हमारे प्रति अगाध प्रेम के प्रकटीकरण का प्रतीक था। ” (पृष्ठ 34, अप्रैल 1985 अखण्ड ज्योति)
परमपूज्य गुरुदेव ने अपने ज्ञानयज्ञ विशेषाँक (अखण्ड ज्योति सितंबर 1969) में लिखा है, “अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन कर देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत् गति से आगे बढ़ता चला आ रहा है, जो इस सड़ी दुनिया को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शाँत होगा। ” आगे वे लिखते हैं, “अगले क्षणों जिस स्वर्णिम उषा का उदय होने वाला है, उसके स्वागत की तैयारी में हमें जुट जाना चाहिए। अपना ज्ञानयज्ञ इसी प्रकार का शुभारंभ-मंगलाचरण है
(9) अनियमितता होने पर पंजीकरण समाप्त कर दिया जाएगा, तब अखण्ड ज्योति से उनका कोई संबंध न रहेगा
वे इस शर्त पर मिली हैं कि उनका एक-एक कण भी अपने लोभ-मोह के लिए स्वार्थ-साधन के लिए खरच न किया जाए एवं उन्होंने इस प्रतिबंध का सदा पूरा-पूरा ध्यान रखा है। ” ये पंक्तियाँ हैं फरवरी 1972 की अखण्ड ज्योति की ‘अपनों से अपनी बात’ की। लेखिका हैं परमवंदनीया माताजी। एक सच्ची शिष्या, आराधिका के रूप में उन्होंने अपनी गुरुसत्ता के सौंपे हर दायित्व को सँभाला
हीरक जयंती के इस वर्ष में इसे अब एक आँदोलन का रूप देकर ‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्रों’ की स्थान-स्थान पर स्थापना की बात सबसे कही जा रही है। चूँकि पूज्यवर के विचारों की धुरी ‘अखण्ड ज्योति’ ही रही है, इसीलिए इसे यह नाम दिया है। युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया में इन ज्ञान केंद्रों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। परमपूज्य गुरुदेव ने शक्तिपीठों, प्रज्ञा-संस्थानों के निर्माण से भी अधिक महत्त्व इन ज्ञान मंदिरों को दिया है
जीवनभर परमपूज्य गुरुदेव अपनी इस परोक्ष सूक्ष्मशरीरधारी सत्ता से मिले अनुदानों की ही चर्चा करते रहे। चाहे साठ के दशक की अखण्ड ज्योति हो या सत्तर के दशक की। दो या तीन अंक छोड़कर स्थान-स्थान पर उनके समर्पण भाव की अभिव्यक्ति पाठक को दृष्टिगोचर होती है
परमपूज्य गुरुदेव ने सितंबर 1969 का अखण्ड ज्योति अंक ‘ज्ञानयज्ञ अंक’ के रूप में लिखा। इसके संपादकीय में उन्होंने शीर्षक दिया, ‘अपना ज्ञानयज्ञ भी सफल और संपूर्ण होना चाहिए,। इसमें उन्होंने लिखा, “ अपने 1953 के शतकुँडी नरमेध तथा 1958 के सहस्रकुँडी महायज्ञ होमात्मक आयोजनों की परंपरा में बड़ी शान के साथ संपन्न हो गए
वे स्वयं पाँडिचेरी जाकर उनसे मिले भी। (1937) एवं 1940 से सतत प्रकाशित अपनी पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ में निरंतर वे लिखते रहे कि सूक्ष्मजगत् में तपकर रही इन दो सत्ताओं के द्वारा ही स्वतंत्रता संग्राम अपनी अंतिम परिणति को पहुँचेगा। भगतसिंह का बलिदान, गाँधी जी का सत्याग्रह आँदोलन अपनी जगह, पर परोक्ष जगत् से सक्रिय ऊर्जाप्रवाह को नकारा नहीं जा सकेगा, जिसने यह वातावरण बनाया। प्रत्यक्षतः यह अकर्म ही दिखाई देता है
इस तरह का साहित्य जो हमारे समाज की कुरीतियों से लोहा लेने में समर्थ हो सके, इस तरह का साहित्य जो मनुष्य के भीतर दबे हुए भगवान् को जगा सके। हमारा अखण्ड ज्योति का जरा-सा साहित्य, मुट्ठी भर पैसों से प्रकाशित होने वाला साहित्य अपनी भूमिका को बखूबी प्रस्तुत कर रहा है। अगर यही साहित्य और यही प्रकाशन असंख्य धाराओं में लिखा जा सके और उसके प्रकाशन की व्यवस्था की जा सके तथा उसके लिए बुकसेलर तैयार किए जा सकें। उसका सारी-की-सारी हिंदुस्तान की चौदह भाषाओं में प्रकाशन किया जा सके, तो क्या आप समझते हैं कि हम हिंदुस्तान में नई फिजा पैदा नहीं कर सकते? नई दिशाएँ पैदा नहीं कर सकते? मुट्ठी भर निकलने वाली अखण्ड ज्योति क्या गजब ढा रही है, आप देख नहीं रहे हैं? इस तरह की अखण्ड ज्योतियाँ अगर सब भाषाओं में निकलने लगें और जगह-जगह निकलने लगें, तो गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान के रूप में छोटे-से केंद्र, जिनमें थोड़ा सा प्रकाशन होता है, इस तरह का प्रकाशन अगर जगह-जगह चालू हो सके, तो क्या हम कुछ भी काम नहीं कर सकते हैं
इस हीरक जयंती वर्ष में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका अपने पाठकों को एक उपहार देने जा रही है। यदि वे ‘ज्ञान केंद्र’ स्थापित करेंगे, तो उन्हें पुण्य-परमार्थ का लाभ तो प्राप्त होगा ही, इस विद्या-विस्तार योजना के द्वारा सातों आँदोलनों को गति देने हेतु पर्याप्त व्यवस्था भी जुटा सकेंगे। इसके लिए निम्न नियम व व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं
जो आज सारे जीवन का ढाँचा आपने बताया है, उसमें राई-रत्ती प्रमाद न होगा। ” (पृष्ठ 5, अप्रैल 1985 अखण्ड ज्योति) आगे वे लिखते हैं, “नंदन वन पहुँचते ही गुरुदेव का सूक्ष्मशरीर प्रत्यक्षतः सामने विद्यमान था। उनके प्रकट होते ही हमारी भावनाएँ उमड़ पड़ीं। आँखें बरस पड़ीं
जीवनभर गुरुदेव ने लिख एवं जो भी लिखा उसने लाखों व्यक्तियों के जीवन को बदल दिया। अखण्ड ज्योति पत्रिका (1937 से अभी तक), युगनिर्माण योजना पत्रिका एवं इनके सभी भाषाओं में अनुवादों ने जीवन की हर समस्या को स्पर्श किया एवं सभी के सरल समाधान दिए हैं। मनःस्थिति कैसे बदली जाए, कैसे अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाए, इस पत्रिका के प्रतिपादनों ने इस संबंध में जन-जन का उंगली पकड़ाकर, मार्गदर्शन किया है। यदि गुरुदेव ने लिखा है कि “रोते हुए आँसुओं की स्याही से, जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो उनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969) तो निश्चित रूप से यह सत्य है
जो परिजन अखण्ड ज्योति पत्रिका बड़ी तादाद में मँगा रहे हैं, वे निश्चित ही ज्ञान केंद्रों के रूप में अपना पंजीयन करा सकते हैं एवं इस वाङ्मय-गुरुचेतना के विचारों के विस्तार की योजना में भागीदारी कर सकते हैं
परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से अक्टूबर 89 की ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखे एक लेख के एक उद्धरण को पाठकों को पढ़ाने को यहाँ मन है। “युग परिवर्तन की महाक्राँति के असंख्यों विभाग-उपभाग हैं। उन सभी में नवजीवन का संचार होता हुआ देखा जा सकता है
(8) ‘ज्ञान केंद्र’ केवल अखण्ड ज्योति संस्थान, युग निर्माण योजना, मथुरा एवं शाँतिकुँज, हरिद्वार से प्रकाशित सामग्री के अतिरिक्त अन्य कोई सामग्री नहीं रखेंगे
अगर यही साहित्य और यही प्रकाशन असंख्य धाराओं में लिखा जा सके और उसके प्रकाशन की व्यवस्था की जा सके तथा उसके लिए बुकसेलर तैयार किए जा सकें। उसका सारी-की-सारी हिंदुस्तान की चौदह भाषाओं में प्रकाशन किया जा सके, तो क्या आप समझते हैं कि हम हिंदुस्तान में नई फिजा पैदा नहीं कर सकते? नई दिशाएँ पैदा नहीं कर सकते? मुट्ठी भर निकलने वाली अखण्ड ज्योति क्या गजब ढा रही है, आप देख नहीं रहे हैं? इस तरह की अखण्ड ज्योतियाँ अगर सब भाषाओं में निकलने लगें और जगह-जगह निकलने लगें, तो गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान के रूप में छोटे-से केंद्र, जिनमें थोड़ा सा प्रकाशन होता है, इस तरह का प्रकाशन अगर जगह-जगह चालू हो सके, तो क्या हम कुछ भी काम नहीं कर सकते हैं। हाँ हम बहुत कुछ काम कर सकते हैं
(4) ट्राँसपोर्ट/रेलवे भाड़ा अखण्ड ज्योति संस्थान वहन करेगा
हीरक जयंती के इस वर्ष में इसे अब एक आँदोलन का रूप देकर ‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्रों’ की स्थान-स्थान पर स्थापना की बात सबसे कही जा रही है। चूँकि पूज्यवर के विचारों की धुरी ‘अखण्ड ज्योति’ ही रही है, इसीलिए इसे यह नाम दिया है। युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया में इन ज्ञान केंद्रों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी
परमपूज्य गुरुदेव के अदम्य आकाँक्षा एवं मिशनरी भावना से कार्य करने की ललक पैदा करने वाले इन शब्दों के प्रभाव को समझा जा सकता है। ‘अखण्ड ज्योति’ की प्राणचेतना-जीवनमूरि ने ही गायत्री परिवार जैसा विराट् संगठन खड़ा किया है। वे इसी अंक में, इसी लेख में आगे लिखते हैं, “हम भाग्यशाली हैं, जो सस्ते में निपट रहे हैं। असली काम और बढ़े-चढ़े त्याग-बलिदान अगले लोगों को करने पड़ेंगे
ज्ञानरथ, होर्डिंग, दीवाल लेखन आदि की भी आवश्यकता पड़ेगी। किसी भी प्रकार घाटा उठाते हुए संस्थान इन व्ययों को वहन करने के लिए विशेष प्रावधान कर रहा है, जिससे इन ज्ञान केंद्रों का संचालन सफलतापूर्वक हो सके, इसके अंतर्गत वाङ्मय के प्रत्येक 10,000 (100 खंड) रुपये के ऑर्डर पर बीस वाङ्मय के खंड अतिरिक्त अथवा 2500 रुपये के बराबर (मुद्रित) मूल्य का अखण्ड ज्योति संस्थान द्वारा प्रकाशित/प्रचारित साहित्य या सामग्री दी जाएगी। यह सुविधा तभी संभव होगी, जब ऑर्डर के साथ पूरी राशि अग्रिम ड्राफ्ट द्वारा भेजी जाए
मनःस्थिति कैसे बदली जाए, कैसे अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाए, इस पत्रिका के प्रतिपादनों ने इस संबंध में जन-जन का उंगली पकड़ाकर, मार्गदर्शन किया है। यदि गुरुदेव ने लिखा है कि “रोते हुए आँसुओं की स्याही से, जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो उनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969) तो निश्चित रूप से यह सत्य है
प्रत्यक्ष में लोगों को हमारा प्यार, हमारी लेखनी व हमारा संगठन दिखाई देता है, पर इससे भी बड़ा और अधिक महत्त्वपूर्ण है हमारा परोक्ष। ” गायत्री परिवार की अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना सहित आठ भाषाओं में प्रकाशित पत्रिकाएँ, साढ़े पाँच हजार प्रज्ञा संस्थान-गुरुसत्ता के प्रत्यक्ष कर्म की परिणतियाँ हैं, तो उनका अकर्म उनकी सूक्ष्मीकरण साधना, महाप्रयाण के बाद सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय उनका अस्तित्व, उनके द्वारा ब्राह्मीचेतना से एकाकार होकर किया गया अकर्म है, जिसका महत्त्व सर्वाधिक है। जिसे हम नहीं जानते, जिसे हमने नहीं देखा, अकर्म की स्थिति में किए गए उस कर्म के एक पल में किए गए कार्यों से इतिहास बदल जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
तुम्हारी मनोव्यवस्था को दूर करने के लिए हम प्रयत्न करेंगे और माता की कृपा हुई तो परिणाम कुछ अच्छा ही होगा। पुनश्चसंभव हो तो दिसंबर (1953) की अखण्ड ज्योति में छपी हुई अनुज्ञान योजना में भाग लेने का प्रयत्न करना गायत्री साहित्य का दान वितरण गौदान की बराबर फलदायक है। ’
जून 2001 की अखण्ड-ज्योति में विस्तार से ‘पूज्यवर के ज्ञान शरीर को जन-जन तक पहुँचाएँ’ एवं जुलाई 2001 की अखण्ड ज्योति में हो रहा है ज्ञानयज्ञ का शुभारंभ-मंगलाचरण (ज्ञान केंद्रों की स्थापना करें एवं वाङ्मय को जन-जन तक पहुँचाएँ) शीर्ष से लेख प्रकाशित हुए थे, उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा भेज दें। ज्ञान केंद्र संबंधी सारा पत्राचार इसी पते पर करें
यह एक महान् पुरुषार्थ है, जो करोड़ों साधकों ने अपनी आराध्य सत्ता के पदचिह्नों पर चलकर पूरा किया है। जनवरी 1986 में जब परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ण जयंती वर्ष की विशेष साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे
सभी दोनों ही योजनाओं में भागीदारी का ज्ञानयज्ञ में बढ़-चढ़कर भागीदारी करें। सितंबर का अखण्ड ज्योति अंक ‘याग साधना विशेषाँक ‘ होगा। अधिक-से-अधिक पाठकों तक इसे पहुँचाने का प्रयास करें
‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र’ योजना ने तीव्र गति पकड़ी है एवं ढेर सारे पत्र ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ पहुँच रहे हैं। विगत अंक जुलाई 2002 की ‘अपनों से अपनी बात’ में उसके संबंध में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। इसी के साथ-साथ शाँतिकुँज ‘साहित्य विस्तार पटल’ योजना भी गतिशील हुई है
हम सभी इस वर्ष प्रखर प्रज्ञारूपी सतत प्रज्वलित अखण्ड अग्नि के रूप में पहले अखण्ड ज्योति संस्थान एवं फिर शाँतिकुँज हरिद्वार में स्थापित’ अखण्ड दीपक के 85 वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती की विशिष्ट साधना का क्रम बना रहे हैं। साधना आँदोलन को गति दे रहे हैं एवं प्रत्येक को इस अभियान से जुड़कर परिष्कृत व्यक्तित्वसंपन्न इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी सँभालने योग्य महामानव बनने का आमंत्रण दे रहे हैं। सभी क्रियाप्रधान कार्यक्रम इसी साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे
युग की पुकार, हिंदी पत्रकारिता को आत्मविस्मृत एवं संकीर्ण व्यावसायिक स्वार्थों के दलदल से उबारकर गौरवमयी अतीत के मिशनरी भाव को ग्रहण एवं धारण करने के लिए उद्बोधित कर रही है। ‘अखण्ड ज्योति’ के इस संदेश को सुना जा सके, तभी आज की हिंदी पत्रकारिता सजग प्रहरी की भूमिका निभाती हुई जन-जन के बीच साँस्कृतिक क्राँति का अलख जगा सकेगी, जिसके आधार पर 21 वीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष युगऋषि कर चुके हैं
इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे। अस्तु उसकी प्रतीक्षा व्यर्थ है। सोचा गया कि क्यों न अगले वर्ष को साधना स्वर्ण जयंती वर्ष मना लिया जाए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की सूक्ष्म व कारण सत्ता को घर-घर पहुंचाने, श्रवण कुमार की तरह उन्हें कंधे पर बिठाकर भारतव्यापी तीर्थयात्रा कराने का किसी का मन हो तो उसे ‘अखण्ड ज्योति’ को जन−जन तक पहुँचाना चाहिए। इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं, परमार्थ नहीं, संस्कृति-सेवा नहीं। सभी को जानकारी है कि आज की विपरीत परिस्थितियों में जहाँ कागज के दाम आसमान छू रहें हों, प्रिंटिंग आदि का खर्च बढ़ता चला रहा हो, आसन्न तृतीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से महंगाई और भी बढ़ती जा रही हो, इसे निर्धारित चंदे के आधार पर छापना कितना कठिन है
1962 के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय प्रवास से लौटकर सभी से पंचकोषी साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना। गायत्री महाविज्ञान व आगे चलकर उनकी साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए
इसी आधार पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी थी, ‘नवयुग का मत्स्यावतार’। कहने का अर्थ यह कि जिस किसी ने भी मिशन को जाना है, गायत्री परिवार के उद्देश्यों को समझा है, उसने सबसे पहले अपनी प्राणप्रिय ‘अखण्ड ज्योति’ से साक्षात्कार किया है। आगे भी जो नए नीतिवान जुड़ेंगे, वे इसी ज्ञानयज्ञ के माध्यम से जुड़ेंगे
ये पंक्तियाँ फरवरी 1973 की अखण्ड ज्योति पृष्ठ 61 से उद्धृत हैं। परमपूज्य गुरुदेव का इन पंक्तियों के माध्यम से स्पष्ट अभिमत है कि तप के माध्यम से प्रखर आत्मबल संपन्न विभूतियाँ ही नवयुग की आधारशिला रखेंगी। इसी अंक के संपादकीय में प्राण प्रत्यावर्तन की महत्ता बताई गई थी एवं कहा गया था कि प्रत्यावर्तन में किसी प्रकार के जादू-चमत्कार आदि के कुतूहल जैसी कोई अनुभूति इंद्रियों को नहीं होनी है
गायत्री परिवार की आधिकारिक वेबसाइट GayatriPariwar.org पर अब अखण्ड ज्योति पत्रिका के पृष्ठ एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक हिन्दी में सभी पढ़ सकते हैं। इस वेबसाइट पर नवीनतम गतिविधियों को देने का क्रम भी अपडेटिंग के साथ चालू है
उसी की हीरक जयंती इस वर्ष हम मना रहे हैं। इस क्रम में कई साधनात्मक उपचार कराए गए, साथ ही पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण साधना के अनुयाज क्रम में जनवरी 1987 का अखण्ड ज्योति अंक ‘कुँडलिनी जागरण अंक’ (विश्वराष्ट्र कुँडलिनी) के रूप में तथा फरवरी 1987 का अंक इक्कीसवीं सदी विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। फरवरी के इस अंक में विचारपरक पूर्वार्द्ध में पूज्यवर ने ‘हम विनाश की कगार पर खड़े हैं’ ‘सर्वनाश का एक ही कारण दुर्मति’ जैसे लेख लिखे तो उत्तरार्द्ध में जो क्रियापरक था, ‘विनाश की विभीषिकाओं का अंत होकर रहेगा’ ‘विश्वशाँति में भारत की भूमिका तथा परिवर्तन की अदृश्य किन्तु अद्भुत प्रक्रिया’ जैसे लेख लिखे। यह पूरा अंक आज घट रही घटनाओं का दस्तावेज है
परमपूज्य गुरुदेव अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में निरंतर अपने शोध-निष्कर्ष जो उन्होंने साधना के विषय में किए थे, प्रकाशित करते रहे। मंत्र विज्ञान-शब्द शक्ति उनकी विशेष अभिरुचि का विषय रहा। वे एक स्थान पर लिखते हैं- ‘मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है
कादम्बिनी कथा प्रधान पत्रिका है, उसका वार्षिक चंदा दो सौ तीस रुपए हैं। ऐसे में सागर गर्भित सामग्री लिए विज्ञान और अध्यात्म की समन्वयात्मक ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मात्र 72 रुपये में अपने 68 पृष्ठों के साथ पाठक परिजनों तक पहुँचती है। अंतर सभी को स्पष्ट देख लेना चाहिए व जान लेना चाहिए कि किस तरह अंश-अंश की कटौती करके यह आँदोलन हम सभी ने जीवित बनाए रखा है
प्रज्ञा अभियान एवं अखण्ड ज्योति
अब वेब पृष्ठ पर भी
‘अखण्ड ज्योति’ एक मिशन है, एक आँदोलन है, युगऋषि का ज्ञानशरीर है। जिस जिसने इसे पढ़ा, उसका चिंतन बदल गया, जीवन की दिशाधारा दूसरी दिशा में मुड़ गई एवं उसका आमूल-चूल कायाकल्प हो गया। चिंतन के ऊर्ध्वगामी होने के सत्परिणाम निश्चित ही जीवन-व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगते हैं
‘अखण्ड दीपक’ जो 1926 से प्रज्वलित होकर 1972 में शाँतिकुँज आने के बाद से सतत प्रज्वलित है, अपनी हीरक जयंती इस वर्ष मना रहा है तथा परमपूज्य गुरुदेव के प्रखर तप का प्रतीक है। इसी ‘अखण्ड दीपक’, के, जो अब अखण्ड अग्नि, अखण्ड यज्ञ का स्वरूप ले चुका है, दिव्य प्रभामंडल में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का 1938 की वसंत पंचमी को शुभारंभ हुआ। हाथ से बने कागज पर हाथ से चलने वाली मशीन की मदद से इसकी छपाई मात्र दो सौ पत्रिका से आरंभ यह पत्रिका कुछ समय के लिए बंद हो गई। पुनः पूरी तैयारी के साथ फ्रीगंज आगरा से वसंत पर्व 1940 से इसका प्रकाशन आरंभ हुआ
पाठकगणों को वैसे तो जानकारी है, पर बता दें कि परमवंदनीया माताजी 1959 की मध्य से 1961 के मध्य तक ‘अखण्ड ज्योति’ का संपादन भार संभाले हुए थीं। उस अवधि में परमपूज्य गुरुदेव अपने आराध्य के निर्देशानुसार तप हेतु हिमालय जा रहे थे। वर्ष में 9 माह पर गंगोत्री दुर्गम-हिमालय में तथा 3 माह उत्तरकाशी व ऋषिकेश निवास था
इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर स्वयं में बीज जैसे शक्ति का स्रोत हैं। ’ (अखण्ड ज्योति वर्ष 54, अंक 12, पृष्ठ 26)
परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी 19878 जनवरी की ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादकीय में लिखा है कि आज गायत्री तपोभूमि, ब्रह्मवर्चस, गायत्री नगर, शाँतिकुँज एवं शक्तिपीठों के रूप में जो भी विस्तार नजर आता है, वह ‘अखण्ड ज्योति’ से ही जन्मा है। यह पत्रिका एक जीता-जागता मिशन है, जिसने इतना बड़ा संगठन खड़ा कर दिया। इसी आधार पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी थी, ‘नवयुग का मत्स्यावतार’
वे फरवरी 1987 की इस ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखते हैं, ‘नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि इक्कीसवीं सदी है। हमारी भविष्यवाणी का पहला आधार है- अदृश्य जगत् का वह सूक्ष्म प्रवाह, जो कुछ नई उथल-पुथल करने के लिए उद्गम से चल पड़ा है और अपना उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा। दूसरा आधार है-हमारा निज का संकल्प जो किसी उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया है
काम इन्हीं लोगों से लेना है, सो अच्छे लोग न मिलने पर भी किसी प्रकार काम चलाना ही है। यज्ञों का हिसाब ठीक रहे, इसके लिए एक कड़ा लेख अखण्ड ज्योति में छाप रहे हैं। ’
‘अखण्ड ज्योति’ एक पत्रिका नहीं, प्रेरणा पुँज हैं, प्राणचेतना की संवाहिका है। ‘अखण्ड दीपक’ जो 1926 से प्रज्वलित होकर 1972 में शाँतिकुँज आने के बाद से सतत प्रज्वलित है, अपनी हीरक जयंती इस वर्ष मना रहा है तथा परमपूज्य गुरुदेव के प्रखर तप का प्रतीक है। इसी ‘अखण्ड दीपक’, के, जो अब अखण्ड अग्नि, अखण्ड यज्ञ का स्वरूप ले चुका है, दिव्य प्रभामंडल में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का 1938 की वसंत पंचमी को शुभारंभ हुआ
लोगों ने एकाँगी पढ़ा-लिखा होता है, पर हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा समझा है। ’ (अखण्ड ज्योति वर्ष 30 मई अंक पृष्ठ 60) इस शोध के निष्कर्ष रूप में वे बताते हैं कि ‘यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के दोष से मुक्त किया जा सके तो उसे यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की अगणित शाखा-प्रशाखाएं इसी का विस्तार परिवार है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
किन-किन ने किन आँदोलनों को हाथ में लिया है एवं कैसे वे उस केंद्रीय शक्तिपीठ को संगठन की धुरी बनाकर अपने-अपने क्षेत्र में क्रियान्वित करेंगे, यह सब प्रशिक्षण पूरे जनवरी माह क्षेत्रों में चलेगा। न्यूनतम तीन कार्यक्रम तो हर परिजन, समयदानी, संगठन स्तर के युगनायक, प्रज्ञामंडलों, प्रज्ञापीठों से जुड़े परिजनों, अखण्ड ज्योति पाठकों-परिजनों के लिए दिए जा रहे हैं। ये हैं (1) जीवन-साधना को और अधिक प्रखर बनाना (2) नारी जाग्रति आँदोलन द्वारा परिवार निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बनाना (3) ग्रामतीर्थ योजना द्वारा समाज निर्माण में भागीदारी करना। सभी जानते हैं कि ग्रामतीर्थ से अर्थ है व्यसन मुक्त, स्वच्छ, संस्कारी, स्वस्थ, शिक्षित, सहकारी, स्वावलंबी ग्राम
विगत अंक में परिजन-पाठक उन पूर्व तैयारियों के विषय में पढ़ चुके हैं, जिनकी परिणतिस्वरूप एक विराट् महापूर्णाहुति आयोजन सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में संपन्न हुआ। 6 से 11 नवंबर तक संपन्न हुए इस महापुरुषार्थ का पूरा विवरण तो परिजन प्रज्ञा अभियान पाक्षिक में भी पढ़ सकते हैं, पर ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठकों के लिए चार रंगीन पृष्ठों सहित शेष सारा विवरण इस अंक में दिया जा रहा है
माता की सहायता आपको आड़े वक्त पर सदा काम आती रहेगी। अखण्ड ज्योति आप पढ़ते ही रहते होंगे। उसे अपने अन्य मित्रों को भी पढ़ाया करें। ”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
अखण्ड ज्योति की बढ़ती प्रसार संख्या के अनुपात में डाक विभाग की प्रेषण व्यवस्थाएँ नहीं बढ़ सकी हैं− प्रायः विलंब हो जाता है। दिसंबर में डाकर हड़ताल के कारण अंतिम डिस्पेच 30 दिसंबर तक हुए। दिसंबर की प्रतियाँ पाठकों को जनवरी में मिली
जुलाई 1969 (पृष्ठ 65) की अखण्ड ज्योति के संपादकीय में पूज्यवर लिखते हैं, “युग की परिवर्तन अवश्यंभावी है। हमारा छोटा−सा जीवन इसी की घोषणा करने, पूर्व सूचना देने के लिए है। हमने अपना सारा जीवन महाकाल के इस महान् प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिए, प्रबुद्ध आत्माओं को निमंत्रण देने में लगा दिया
कितना बड़ा शक्ति का स्रोत है, इसकी कल्पना सामान्यजन नहीं कर सकते। इसे अखण्ड ज्योति पाठकों−परिजनों को गुरुसत्ता की परोक्ष उपस्थिति का द्योतक एक प्रतीक मानकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानना चाहिए। यह वर्ष परमवंदनीया माताजी के 1926 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को धरती पर अवतरण के संदर्भ में उनका भी हीरक जयंती वर्ष है। परमवंदनीया शक्तिस्वरूपा माताजी ने सजलता दी, स्नेह−ममत्व के अभिसिंचन से परमपूज्य गुरुदेव के पुरुषार्थ को पूर्णता दी
मातृसत्ता के तराशा है हमें कुछ आश लेकर,
अखण्ड ज्योति ने तपाया है हमें विश्वास देकर। अगर हीरा बन गए हैं, तो समय अब आ गया है,
मातृसत्ता के लिए हीरे सँवारे जा रहे हैं॥
अखण्ड ज्योति का वार्षिक चंदा प्रतिवर्ष भेजने में पाठकों को असुविधा होती है, डाक व्यय लगता है और चंदा विलंब से मिलने पर पिछले अंक भी उपलब्ध नहीं हो पाते। जो परिजन निरंतर अखण्ड ज्योति पढ़ना चाहते हैं, वे आजीवन सदस्यता शुल्क 900/- अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भिजवा दें। जब तक अखण्ड ज्योति प्रकाशित होगी, उन्हें मिलती रहेगी
अब बड़े सरल शब्दों में ‘अवतार’ की अवधारणा पर पूज्यवर गुरुदेव का चिंतन देखें। अखण्ड ज्योति का अगस्त 1979 का अंक प्रज्ञावतार विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ था। उसमें पूज्यवर लिखते हैं, “यदा−कदा ऐसी परिस्थितियाँ हर युग में आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम को भारी देखते हैं और विपन्नता से लड़ते−लड़ते भी सत्य परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और पासा पलटने जैसी असंभाव्य को संभव बनाने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है
युग निर्माण योजना एक शंख−निनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है। “ परमपूज्य गुरुदेव ने ये पंक्तियाँ अखण्ड ज्योति के अगस्त 1969 (विचार क्राँति विशेषाँक) के प्रारंभिक लेख में लिखी थीं। इन्हें बार−बार पढ़ना और अपने आपको सुनाना चाहिए, ताकि हम उस विशिष्ट भागवत् मुहूर्त को पहचान सकें, जो हमारे समक्ष आकर खड़ा हुआ है
अगला काम स्वयं महाकाल करेंगे। ” अवतार का प्रयोजन क्या है, रहस्य क्या है, इसे पूज्यवर ने जून 1967 (पृष्ठ 17) की अखण्ड ज्योति में इस तरह दिया है, “भगवान् की अनेक शक्तियाँ हैं। उनके प्रयोजन, विधान, स्वरूप एवं प्रकरण भी अनेक हैं। जड़−चेतन जगत् के विविध क्रिया–कलापों को चलाने एवं बनाने−बिगाड़ने के संदर्भ में अनेक तथ्य जब सामने आते हैं, तो उनको सुव्यवस्थित कैसे रखा जाए, इस समस्या को हल करने के लिए भगवान् अपनी शक्ति को अनेक भागों में विभक्त करके अंशावतार के रूप में अनेक आत्माओं को जन्म देता है
अखण्ड ज्योति का वार्षिक चंदा प्रतिवर्ष भेजने में पाठकों को असुविधा होती है, डाक व्यय लगता है और चंदा विलंब से मिलने पर पिछले अंक भी उपलब्ध नहीं हो पाते। जो परिजन निरंतर अखण्ड ज्योति पढ़ना चाहते हैं, वे आजीवन सदस्यता शुल्क 900/- अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भिजवा दें। जब तक अखण्ड ज्योति प्रकाशित होगी, उन्हें मिलती रहेगी। जो भी पिछले आजीवन सदस्य अब पत्रिका बंद करना चाहें, अपना रुपया वापस ले सकते हैं
जो परिजन निरंतर अखण्ड ज्योति पढ़ना चाहते हैं, वे आजीवन सदस्यता शुल्क 900/- अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भिजवा दें। जब तक अखण्ड ज्योति प्रकाशित होगी, उन्हें मिलती रहेगी। जो भी पिछले आजीवन सदस्य अब पत्रिका बंद करना चाहें, अपना रुपया वापस ले सकते हैं
हम मध्यवर्ग, निम्न मध्यमवर्ग के सभी परिजन हैं। यदि मात्र अखण्ड ज्योति के पाठक प्रति सप्ताह एक समय का भोजन न लें, व्रत रखें व उसकी राशि संकलित करें, तो कितना बड़ा कोष खड़ा हो जाएगा, इसकी कल्पना करें, एक माह में 4 बार के भोजन की बचत। यदि पाँच रुपया न्यूनतम भी एक समय का भोजन मानें, तो बीस रुपये प्रतिमाह। दो सौ चालीस रुपया प्रतिवर्ष
तब पूज्यवर की आयु रही होगी, यही लगभग 32 वर्ष की। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलते हुए तीन−चार वर्ष ही हुए थे। पत्रिका ने जितने सदस्य गायत्री परिवार के या उनके आत्मीयों के नहीं बनाए, उनसे अधिक प्रेमभाव से लिखे इन पत्रों ने बनाए हैं
नहीं नकली हो प्रमाणित, कोई हीरक जयंती पर,
हो बुझा दीपक न कोई, अखण्ड ज्योति आरती पर। मातृसत्ता की निराशा के नहीं कारण बनेंगे,
बस यही संकल्प अब मन में उभारे जा रहे हैं॥
मानवी संवेदना विकसाएँगे, मृदु−सीप बनकर,
अखण्ड ज्योति की विभा विखराएँगे हम दीप बनकर। अब न भटकेगी मनुजता, भावना से शून्य तम में,
नेह भीगे प्राण के दीपक उजारे जा रहे हैं॥
यदि उसका साढ़े छह लाख पाठकों की संख्या से गुणा कर दिया जाए, तो यह राशि दो करोड़ पैंसठ लाख रुपये बैठती है। एक वर्ष में मात्र अखण्ड ज्योति के परिजन इतनी राशि संग्रह कर सकते हैं। यदि प्राणवान्−निष्ठावान्, दीक्षित, शुभेच्छु, सहयोग प्रायः पाँच करोड़ रुपये बैठती है। क्या इतना हम नहीं कर सकते कि एक प्रामाणिक तंत्र जिला स्तर पर खड़ा करें एवं परिजनों के संग्रह की राशि जमा करते चले एवं जहाँ दैवी आपदाओं में राहत राशि−अन्नदान−जल व्यवस्था−बीज आदि की व्यवस्था की जरूरत हो, केंद्र के मार्गदर्शन में उसका नियोजन करते चलें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
परमपूज्य गुरुदेव ‘अपनों से अपनी बात’ के अंतर्गत अखण्ड ज्योति जून 1969 की पंक्तियों में लिखते हैं, "नया युग कुछ आदर्शों को लेकर आ रहा है। एकता, समता, शुचिता और ममता, ये सत्प्रवृत्तियाँ जब उमगने और छलकने लगेंगी, तो आज प्रत्येक क्षेत्र में संव्याप्त विकृतियों अव्यवस्थाओं, उलझनों, कुंठाओं और समस्याओं को कोई कारण नहीं रह जाएगा। सर्वत्र सुख-शांति, प्रगति एवं समृद्धि भरली स्वर्गीय परिस्थितियाँ परिलक्षित होने लगेंगी
इन आठ चीजों में कुछ करके हवन सामग्री बनाते समय कुछ मात्रा बारीक होने के रूप में अलग से निकालकर, कपड़े से छानकर एक-एक डिब्बे में रख लेनी चाहिए और हवन करने के पश्चात् हुए शाम एक-एक चम्मच शहद के साथ खाना-खिलाना चाहिए। यह जान लेना भी जरूरी है कि इन आठ चीजों से वर सामग्री से ही हवन करते समय अखण्ड ज्योति के पूर्व अंकों में वर्णित नंबर (1) लेबल वाली सामग्री भी समान मात्रा में मिला लेनी चाहिए। उस नंबर () किसी सामग्री में जो औषधियां मिलाई जाती है, वे है- अगरबत्ती, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गृगन, चिरायता, गिलोय एवं अश्वगंधा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
1943 में परमपूज्य गुरुदेव के आगरा से मथुरा आकर घीयामंडी (वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान कार्यालय) के भवन में आने के बाद उनने वही किया, जो उनके आराध्य ने कहा। हर श्वास में उनके पूज्यवर ही बसे थे। दोनों में आयु का बड़ा अंतर था, परंतु परमवंदनीया माताजी तो जैसे उनके साथ ढलने के लिए ही आई थीं
परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 अखण्ड ज्योति के प्रज्ञावतार विशेषाँक में लिखते हैं, “आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। ” कितनी सटीक, आज के संदर्भ में युगानुकूल यह व्याख्या है
देखते-देखते अगणित महिलाएँ इस महान् यज्ञ में शामिल होती चली गईं। 1958 के सहस्रकुँडी महायज्ञ के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ संपादन का भार परमवंदनीया माताजी को सौंप दिया। कहा कि अब हम हिमालय जाएँगे, आर्ष साहित्य का पुनर्लेखन-भाष्य करने हेतु तप भी करना है, एकाँत भी जरूरी है। छह माह उत्तरकाशी रहेंगे, छह माह नंदनवन-तपोवन में गोमुख के ऊपर अपने गुरुदेव के साथ
एक वर्ष लगा परमवंदनीया माताजी को सारा कार्यभार सँभालने में। अक्टूबर 1959 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 4 पर एक लेख था, ‘अखण्ड ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन’ लेखिका के स्थान पर माता भगवती देवी पत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य लिखा था। मात्र तैंतीस वर्ष की आयु एवं यह महती जिम्मेदारी दो वर्ष के लिए पूज्यवर उन पर डालकर चले गए। 1961 की जनवरी तक उनने इस कार्य को बखूबी निभाया
साथ ही सीमित अवधि में वही तप संपन्न करना था, जो गुरुसत्ता ने पंद्रह वर्ष की आयु में आरंभ कर चौबीस वर्ष में पूरा किया था। अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए अखण्ड दीपक की साक्षी में पहले दस, फिर सोलह, फिर चौबीस कन्याओं का अखण्ड जप चला। उनका प्रशिक्षण भी माताजी ने सँभाला। यहीं से गायत्री परिवार के महिला जागृति आँदोलन ने जड़ें मजबूत कीं
परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “अवतार की प्रथम प्रेरणा, प्रथम प्रक्रिया देवमानवों के उत्पादन की होती है। वे आत्मपरिवर्तन का आदर्श उपस्थित कर अनेकानेकों को अनुगमन की प्रेरणा देते हैं। अग्रगमन ही साहसिकता है
हाँ बेटे, हमने सपने ही देखे हैं और हमारे सपने पूरे होकर रहे हैं। हमने सपने देखे, जब गायत्री तपोभूमि नहीं बनी थीं जब हमारे पास मात्र छह हजार रुपये थे, तब हमने ‘गायत्री तपोभूमि’ का एक नक्शा छापा था अखण्ड ज्योति पत्रिका में, तो लोगों ने कहा, क्यों साहब! आपने तो बड़ा लंबा-चौड़ा सपना छाप दिया। हाँ भाई ये सपना है। गायत्री तपोभूमि हम ऐसे ही बनाएँगे
लीवर (यकृत) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का उल्लेख अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में किया जा चुका है। यहाँ आम उदर रोगों जैसे अपच, वमन, डायरिया, हैजा, बवासीर आदि को दूर करने के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है। इसके साथ पूर्व वर्णित हवन सामग्री-’नंबर एक’ अर्थात् (1) अगर, (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) रक्त चंदन (6) गुग्गुल (7) लौंग (8) जायफल (9) चिरायता और (10) असगंध को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन किया जाता है
यह अलौकिक चमत्कार वे रोज देखतीं। कभी-कभी प्रेस को सँभालने हेतु भी उन्हें नीचे जाना पड़ता, बाद में वे उसका क ख ग अच्छी तरह सीख गईं एवं गुरुदेव को अनुपस्थिति में भी अखण्ड ज्योति की छपाई का काम देखने लगीं
काँग्रेस के आँदोलन का यह एक अंग भी था। रात्रि में अखण्ड ज्योति संस्थान में पुरुष वयोवृद्ध पढ़ने आते, जीवन जीने की कला सीखकर जाते। दिन में माताजी पूज्यवर के साथ बैठतीं, कभी-कभी पूज्यवर की माता श्री (ताई जी जिन्हें प्यार से कहते थे) भी शामिल होतीं। कुछ माता-बहनें आतीं, जिनमें एक बूढ़ी मुसलमान दादी माँ भी थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
अब कहीं-कहीं वह प्रक्रिया शिथिल होती दिखाई देती है। हीरक जयंती वर्ष में नए प्राणवान् साहित्य एवं ‘अखण्ड ज्योति’ सहित झोलाधारी अपने साथियों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए
मात्र आत्मसंयम की, राशि को बचाने की एवं व्यवस्थित रूप में केंद्र के परामर्श से उसके नियोजन की आवश्यकता है। यदि मात्र ‘अखण्ड ज्योति’ व अन्य सहयोगी पत्रिका के पाठक भी पचास रुपया प्रति सदस्य एकत्र करें, तो पाँच करोड़ की राशि एक माह में एकत्र कर सकते हैं। परिवार के सदस्य जुड़ जाएं, तो यह मात्रा कितनी भी बढ़ सकती है। इस राशि को ‘श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट भूकंप राहत कोष’ के नाम भेजा जा सकता है
इसके साथ ही पूर्व लिखित हवन सामग्री (नं 1) को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। विस्तृत विवरण अखण्ड ज्योति के फरवरी अंक 12 में पृष्ठ सं. 42-43 पर देखा जा सकता है। (नं. 1) हवन सामग्री में जो वनौषधियाँ बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं, वे हैं, अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गुग्गल, चिरायता, गिलोय एवं असगंध
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
प्राण संजीवनी वाड्मय एवं
अखण्ड ज्योति पत्रिका
अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र स्थान-पता...................................................................................
रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा हैं, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा। ” (अखण्ड ज्योति अगस्त क्−म्−, पृष्ठ ब्क्) यह अभिव्यक्ति है परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की, अपने विचारों के संबंध में, जो उन्होंने अपनी कलम से जीवनभर लिखे। उनकी लेखनी बहुत कम उम्र से प्रायः क्ख्-क्फ् वर्ष की आयु से ही सक्रिय हो उठी थी, किंतु विधिवत लेखन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने एवं श्री अरविंद, रवींद्रनाथ टैगोर एवं महात्मा गाँधी से मिलने के बाद प्रायः सत्ताईस वर्ष की उम्र में क्−फ्स्त्र-फ्त्त् में आरंभ किया, जब उन्होंने ‘अखण्ड ज्योति’ प्रकाशित करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में कुछ अवरोध आए, परंतु क्−ब् के वसंत पर्व से अनवरत यह प्रकाशित होने लगी एवं उसी वर्ष एक ग्रंथ लेकर भी आई, “मैं क्या हूँ’
अखण्ड ज्योति के गत दो अंकों में विविध प्रकार के मानसिक रोगों के निवारण एवं मस्तिष्कीय क्षमताओं की अभिवृद्धि हेतु शोधपूर्ण यज्ञोपचार प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था। इन पृष्ठों में विशिष्ट प्रकार की औषधियों से विनिर्मित हवन सामग्री के प्रयोग द्वारा नानाप्रकार के ज्वरों, ‘फीवर’ से कैसे छुटकारा पाया और स्वस्थ हुआ जा सकता है, इसका वर्णन किया जा रहा है। ज्वर चिकित्सा में हवन करते समय आहुतियाँ प्रदान करने का मंत्र का सूर्य गायत्री मंत्र ही प्रयुक्त होगा, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए
हमने परिजनों से फरवरी-मार्च की अखण्ड ज्योति में अनुरोध किया था कि यदि हम समय-समय पर आने वाली आपदाओं के लिए समय रहते एक निधि खड़ी करने की व्यवस्था कर लें, तो ठीक रहेगा। सरकार से कभी भी एक कौड़ी की सहायता न लेने वाला गायत्री परिवार अभी तक गुजरात भूकंप त्रासदी में जो कुछ भी कर पाया हैं, वह सभी परिजनों के अंशदान से ही संभव हो पाया है। इसके अतिरिक्त तप के माध्यम से सप्ताह में एक दिन के एक समय के व्रत की बात कही गई थी एवं यह बताया था कि यह बचत सीधे शांतिकुंज भेजी जानी चाहिए, जहाँ कि इसकी राहत कार्य हेतु सदैव त्वरित व्यवस्था हेतु उपयोगिता रहेगी
इससे पूर्व हम परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का इस संबंध में मत देखना चाहेंगे। वे अखण्ड ज्योति के वर्ष ब्ख्, अंक स्त्र के पृष्ठ क् पर लिखते हैं, "मनुष्य का जीवन एक खेत हैं, जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्हीं के अच्छे-बुरे फल पाता है। बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है। कहावत है, आम बोएगा वह आम खाएगा, बबूल बोएगा वह काँटे पाएगा
” (अखण्ड ज्योति अगस्त क्−म्−, पृष्ठ ब्क्) यह अभिव्यक्ति है परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की, अपने विचारों के संबंध में, जो उन्होंने अपनी कलम से जीवनभर लिखे। उनकी लेखनी बहुत कम उम्र से प्रायः क्ख्-क्फ् वर्ष की आयु से ही सक्रिय हो उठी थी, किंतु विधिवत लेखन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने एवं श्री अरविंद, रवींद्रनाथ टैगोर एवं महात्मा गाँधी से मिलने के बाद प्रायः सत्ताईस वर्ष की उम्र में क्−फ्स्त्र-फ्त्त् में आरंभ किया, जब उन्होंने ‘अखण्ड ज्योति’ प्रकाशित करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में कुछ अवरोध आए, परंतु क्−ब् के वसंत पर्व से अनवरत यह प्रकाशित होने लगी एवं उसी वर्ष एक ग्रंथ लेकर भी आई, “मैं क्या हूँ’। व्यक्ति को अपने अंदर की चेतना तक ले जाकर बोध कराने वाली यह पुस्तक आज भी परिजनों-पाठकों की प्रिय पुस्तक बनी हुई हैं
प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएं भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा वासंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा-अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही हैं। ” (पृष्ठ भ्-भ्क् नवंबर त्त्त्त् अखण्ड ज्योति)
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर न केवल मासिक पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के रूप में प्राण संजीवनी जन-जन तक पहुँचाने वाली पाती पहुँचाई, पुस्तकों के रूप में वह मार्गदर्शक साहित्य लिखा, जिसकी कि भारतवर्ष को ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व को अत्यधिक आवश्यकता थी। उन्होंने बेड़ियों में जकड़े धर्मतंत्र को न केवल मुक्त कर उसका स्वरूप सबके समक्ष स्पष्ट किया, उसका व्यावहारिक अध्यात्मपरक प्रतिपादन प्रायः फ्ख् से अधिक लिखी, बड़ी-छोटी पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित किया। कोई एक व्यक्ति इतना अधिक कार्य अपने जीवित रहते रह सकता है, यह अकल्पनीय है
यह क्रमशः और तीव्र गति लेता चला गया एवं प्रायः प्रतिवर्ष एक या दो विशेषांक एवं त्त्-क् पुस्तिकाओं का ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से प्रकाशन होने लगा। व्यक्ति के मन की समस्याओं का समाधान, शारीरिक स्वास्थ्य, समाज की विभिन्न समस्याओं का विधेयात्मक सुधारात्मक हल किए ‘अखण्ड ज्योति’ लोकप्रिय होने लगी। इसने राष्ट्र की आजादी वाला वर्ष पार किया, लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाया। एक आजाद राष्ट्र में किए जाने वाले कर्तव्यों का स्मरण कराया, साथ ही अध्यात्म दर्शन, गायत्री महामंत्र की विशद् व्याख्या यज्ञ के तत्वज्ञान से जन-जन को परिचित कराते हुए अपनी एक अलग पहचान बना ली
अखण्ड ज्योति सदस्य नं...............................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं............................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
उनसे प्राण प्रत्यावर्तन साधनाएँ संपन्न कराई, वानप्रस्थ का पुनरुज्जीवन किया एवं हरिद्वार में ब्रह्मवर्चस् षोध्पा संस्थान सहित प्रायः ढाई हजार गायत्री तीर्थों, शक्तिपीठों की स्थापना की। अस्सी वर्ष की आयु तक खिले ब्रह्मकमल की एक-एक पंखुड़ी एक महत्वपूर्ण स्थापना का इतिहास लिए, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण एवं इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष के साथ क्−− तक सुवासित रह गायत्री जयंती ख् जून के दिन स्थूल रूप में दृष्टि के वर्ष के लिए लिखे गए विचारों का सशक्त जखीरा उनकी पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं वाङ्मय के रूप में जीवंत है, सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय है एवं आज लाखों नहीं, करोड़ों के मर्म को स्पर्श करता दिखाई देता है
साथ ही एक पत्रिका और प्रकाशित होने लगी ‘युग निर्माण योजना’। व्यक्ति निर्माण यदि अखण्ड ज्योति की विषयवस्तु था, तो परिवार एवं समाज निर्माण ‘युग निर्माण योजना’ पत्रिका की। दोनों का ही इष्ट एवं लक्ष्य एक था, देवमानवों द्वारा युग का नवनिर्माण
इसकी स्थापना में अपने निज की या अन्य समान विचारधारा के व्यक्तियों की पूँजी मिल-जुलकर लगाई जा सकती है। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका जो अब म्भ्वें वर्ष में चल रही है, को अधिकाधिक पहुँचाना, वाङ्मय को सरकारी-सामाजिक संगठनों के माध्यम से एक अभियान के रूप में स्थापित किए जाने का महायज्ञ अब किया जाना चाहिए। इस हीरक जयंती वर्ष का यह अतिरिक्त पुरुषार्थ हमारा हो कि हम अपने प्रभाव का पूरा उपयोग कर स्थान-स्थान पर वाङ्मय स्थापित कर सकें। हर पोस्ट ग्रेजुएट, डिग्री एवं इंटर कालेजों में अपने प्रयासों से यह स्थापित हो जाए
इसके अतिरिक्त तप के माध्यम से सप्ताह में एक दिन के एक समय के व्रत की बात कही गई थी एवं यह बताया था कि यह बचत सीधे शांतिकुंज भेजी जानी चाहिए, जहाँ कि इसकी राहत कार्य हेतु सदैव त्वरित व्यवस्था हेतु उपयोगिता रहेगी। हमने परिजनों को बताया था कि यदि मात्र साढ़े छह लाख पाठक जो ‘अखण्ड ज्योति’ से जुड़े हैं, अपनी स्वयं की एक समय की भोजन की राशि बचा सकें, तो इससे एक माह में बीस रुपये प्राप्त होगी। वर्षभर में यह राशि बासठ करोड़ रुपये हो जाती है। यदि गायत्री परिवार के नैष्ठिक-प्राणवान् भावनाशील समर्थक-शुभेच्छुओं की संख्या पाँच करोड़ सारे भारत व विश्व में मान ली जाए, तो प्रति व्यक्ति एक हजार रुपया प्रतिवर्ष की बचत के साथ यह राशि पाँच हजार करोड़ हो जाती है
क्−भ्त्त् के सहस्रकुंडी महायज्ञ मथुरा के बाद इसने एक विराट गायत्री परिवार के संगठनात्मक नवसृजन की भूमिका संभाल ली एवं देखते-देखते यह प्रत्येक परिजन की एक अनिवार्य पाठ्य पुस्तिका बन गई। व्यक्ति, परिवार, समाज निर्माण की धुरी पर केंद्रित ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका ने युग के नवनिर्माण की योजना क्−म्ख् में प्रस्तुत की। इसके बाद साधनात्मक मार्गदर्शन हेतु लगातार ‘पंचकोशीय जागरण’ साधना का पत्राचार-मार्गदर्शन इससे चलने लगा। ढेरों व्यक्ति साधना के क्रम में इससे जुड़ें
तमिस्रा की व्यापकता देने वाली ऊषा अपने समय पर उदित होती रही है एवं परिवर्तन लाती रही है। ” प्रस्तुत उद्धरण परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से नवंबर क्−त्त्त्त् की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से लिया गया है। उन्होंने तब क्ख् वर्षीय युग संधि महापुरश्चरण की घोषणा की ही थी। यह भी कहा था, “इस कुसमय का अंत होते-होते कहर बरसेगा” तथा “सड़े फोड़े का गहरा मवाद यदि एक साथ ही निकलेगा, तो अधिक घिनौने दृश्य उपस्थित करेगा”, “इसीलिये इस अवधि को बारह से पंद्रह वर्षों की सृजन व ध्वंस से भरी संधि लीला में बदल दिया गया हैं, ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जाएगी, ताकि गहरी खाई पाटकर समतल ही नहीं वरन् पुष्पोद्यान के रूप में छटा भी दीखने लगे
वहाँ से मिशन की पत्रिकाओं तथा अभी सत्तर खंडों में फैले विचार समुच्चय के रूप में विद्यमान परमपूज्य गुरुदेव के ‘ज्ञान शरीर’ के रूप में वाङ्मय के विस्तार की, घर-घर स्थापना का अभियान चले, तो देखते-देखते परिवर्तन गति पकड़ने लगेगा। परिजन ऐसे केंद्रों की स्थापना, उनके संचालन की योजना, वित्तीय तंत्र आदि के विषय में संलग्न फार्म भरकर अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा भेज दें एवं इस गायत्री जयंती गुरुपूर्णिमा से इस योजना के सक्रिय अंग बनकर कार्य करें, ऐसा सभी से भावभरा आह्वान है
‘परिवर्तन की अदृश्य किंतु अद्भुत प्रक्रिया’ शीर्षक से फरवरी क्−त्त्स्त्र के इक्कीसवीं सदी विशेषांक (अखण्ड ज्योति) में छपे गुरुसत्ता के कुछ उद्गारों को पढ़ने से आज की असमंजस की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी, हम भलीभाँति युग बदलने की प्रक्रिया को समझ भी सकेंगे। वे पृष्ठ भ्क् पर लिखते हैं "बीसवीं सदी का अंत और इक्कीसवीं सदी का आगमन, जब अपना परिपूर्ण स्थिति में होंगे, तब उनके बदलने में काफी देर लगेगी। यह समय क्रमिक गति से बदलेगा
वाङ्मय का पुस्तकालयों में स्थापित कराना, विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों में एक अनिवार्य अंग के रूप में पहुँचाना अब हमारे सभी परिजनों का परम ध्येय बन जाना चाहिए। इसके लिए ‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र’ की स्थापना स्थान-स्थान पर हो एवं जिसके न्यूनतम फ् सदस्य हों। इसकी स्थापना में अपने निज की या अन्य समान विचारधारा के व्यक्तियों की पूँजी मिल-जुलकर लगाई जा सकती है। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका जो अब म्भ्वें वर्ष में चल रही है, को अधिकाधिक पहुँचाना, वाङ्मय को सरकारी-सामाजिक संगठनों के माध्यम से एक अभियान के रूप में स्थापित किए जाने का महायज्ञ अब किया जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति सदस्य नं.....................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं...........................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं..........................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
विज्ञान ओर अध्यात्म के समन्वयात्मक दार्शनिक प्रतिपादनों ने क्−म्म्-म्स्त्र के बाद एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी, तर्क-तथ्य प्रमाण की भाषा समझने वाले वर्ग को गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति परिवार से जोड़ा। बड़ी संख्या में छात्र-अध्यापक, वैज्ञानिक, चिकित्सक आदि इस चिंतन से जुड़ते चले गए। जीवन जीने की कला की विधा के रूप में अध्यात्म का प्रतिपादन कर जीवन साधना को एक अनिवार्यता बताने वाले आचार्य श्री ने जन-जन के हृदय स्थल को स्पर्श ही नहीं किया वरन् अपने विचारों से गजब का एक क्राँतिकारी आँदोलन खड़ा कर दिया
क्−ब् से प्रारंभ हुआ पुरुषार्थ कागज काले करने के लिए नहीं वरन् जन-जन के मन को मथने एवं अंतः में छिपे देवत्व को उभारने के लिए सक्रिय हुआ था। यह क्रमशः और तीव्र गति लेता चला गया एवं प्रायः प्रतिवर्ष एक या दो विशेषांक एवं त्त्-क् पुस्तिकाओं का ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से प्रकाशन होने लगा। व्यक्ति के मन की समस्याओं का समाधान, शारीरिक स्वास्थ्य, समाज की विभिन्न समस्याओं का विधेयात्मक सुधारात्मक हल किए ‘अखण्ड ज्योति’ लोकप्रिय होने लगी। इसने राष्ट्र की आजादी वाला वर्ष पार किया, लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाया
हम अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हैं। अपना तथा अपने सदस्यों का विवरण नीचे दे रहे हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी हमें भेजें
यदि वह सब हम युगऋषि के महर्षि अरविंद के शब्दों में समझे सके तो यह अवधि जिसे हम भोगकर कष्ट के रूप में बिता रहे हैं, तप बन जाएगी एवं हम सभी योगी उस महायोगी के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण किरदार नवनिर्माण के साक्षी होने का, युगनिर्माण में भागीदार होने का निभा जाएँगे। ’अखण्ड ज्योति’ इसीलिए सभी को सदैव आशावाद का संकेत देती है एवं अपने कर्त्तव्य की जानकारी कराती रहती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
आज जिसका सबसे अधिक अभाव है एवं अभाव के कारण दुखों का जन्म होता है वह ज्ञान ही है। अखण्ड ज्योति इसी ज्ञान की लाल मशाल को लेकर सारे समाज व विश्व में अपना आलोक फैला रही है
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1967 पृष्ठ 24
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
‘अखण्ड ज्योति’ फरवरी 1987, पृष्ठ 57
अवरण की वेला में एक नहीं, प्रबुद्ध आत्माएं एक साथ अवतरित होती है और वे मिलजुलकर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति करती है। ’
(अखण्ड ज्योति पृष्ठ 16 अक्टूबर 1967)
किसी पर अहसान जताने या अपनी विशेषता प्रदर्शित करने के लिए नहीं। लोकसेवा का प्रतिफल जब आत्मसंतोष के रूप में तुरंत मिल गया तो और कुछ चाहने की आवश्यकता ही क्या रहे?’ (‘प्रेम साधना और उसकी परिणति’ मई 1961 अखण्ड ज्योति)
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ की गई अखण्ड ज्योति पत्रिका ‘आजीवन’ योजना से अब अधिकाधिक व्यक्ति लाभ उठाने लगे एक बार रु. नौ सो (सुरक्षा निधि) देकर जीवनभर अपने लिए तथा परिवार के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ जैसा आध्यात्मिक संरक्षक नियुक्त करने में ही लोग समझदारी मान रहें हैं
इन शब्दों से ‘अखण्ड ज्योति’ की गंभीर गरिमा भरी महत्ता को समझा जा सकता है। विगत 64 वर्षों से सतत प्रवाहित यह ज्ञानगंगोत्री जन-जन को अभिशप्त मानसिकता से उबारती चली आ रही है। जिस-जिसने भी इसे पढ़ा है, वह इसके प्रतिपादनों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा
इसी के विषय में वे जनवरी 1988 की पत्रिका में लिखते हैं, ‘अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अंतराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘श्रद्धा’ कहते हैं। इसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्शों के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1987, पृष्ठ 41
यही स्वर तीखे होते चले गए एवं युगनिर्माण योजना के आधारभूत सिद्धाँत बन गए। यह कार्य मात्र एक ऐसी ही सत्ता ही कर सकती थी, जिसे संवेदना को, अपनेपन को अपने पत्रों की भाषा में, लेखनी जो ‘अखण्ड ज्योति’ लिखती थी, उसके शब्दों में तथा अपनी वाणी में गूँथना आता था, जो हम सबका, सभी शिष्यों का अपना था, सगा था
अतएव वह केवल अखण्ड दीप मात्र ही नहीं रहता वरन् अखण्ड यज्ञ बन जाता है, वहाँ अनायास ही हमें अपनी मनोभूमि उच्चस्तरीय रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण लाभ लेने में सुविधा मिलती है। ’ (अखण्ड ज्योति मई 1961, पृष्ठ 61) उपर्युक्त प्रसंग उस अखण्ड दीपक के विषय में हैं, जो आँवलखेड़ा, आगरा एवं मथुरा के बाद अब शाँतिकुँज हरिद्वार में सतत प्रज्वलित है एवं जिसकी साक्षी में हमारी गुरुसत्ता द्वारा उस प्राणचेतना का आह्वान किया गया, जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलती है। वस्तुतः अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ही 1937-38 में पूज्यवर ने यह विलक्षण नाम इस पत्रिका को दिया था
इन्हें देखकर यह तो अनुमान लगाया जा सकता है कि समय की गति किस दिशा में चल पड़ी है। इस समय की गति को नयी दिशा में मोड़ने वाला समय क्या होगा? परिजनों के इस सवाल के उत्तर में यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है कि जो अखण्ड ज्योति के नियमित पाठक हैं, उन्होंने अखण्ड ज्योति वर्ष 1989 के जून अंक के पृ. 57 का ध्यान होगा। इस पृष्ठ में प्रकाशित समाचार डायरी में एक शीर्षक प्रकाशित हुआ था निन्यानवे का फेर- क्या आखिरी फेर? इस शीर्षक के अंतर्गत चार्ल्स बर्लिट्ज की पुस्तक डूम्जडे; 1999 का उल्लेख है। इस पुस्तक के लेखक ने बाइबिल की भविष्यवाणियों एवं चिरपुरातन बेबीलोन की सभ्यता के अध्ययन द्वारा प्राप्त ज्योतिर्विज्ञान की गणना पर आधारित कैलेण्डर के निष्कर्षों का हवाला देते हुए लिखा है कि हमारे तारामण्डल का (वर्तमान) एक चक्र सितम्बर 2001 में पूरा होता है
‘अखण्ड ज्योति’ के आजीवन सहचर बनें
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1967, पृष्ठ 60
‘अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से बढ़ता चला आ रहा है, जो इस सड़ी-गली दुनिया को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ एवं समुन्नत बनाकर ही शाँत होगा। ’
(अखण्ड ज्योति पृष्ठ 65 सितंबर 1981)
शेष आधी को उस आधार पर उभरा पुरुषार्थ पूरी करा देता है। यही है ‘अखण्ड ज्योति’ का परिचय, स्वरूप और प्रभाव। ’
दुर्घटना, महामारी, अग्निकाँड, आक्रमण-उत्पीड़न से संत्रस्त हाहाकारी वातावरण में जो एकाँत साधना की बात सोचे, उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाए, यह सोचने के बाद कदाचित ही कोई दूसरा शब्द मिल सकें। ’ (अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1982, क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा)
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1971 पृष्ठ 13
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति नवंबर 1988, पृ. 31
अवतरण की वेला में एक नहीं, प्रबुद्ध आत्माएं एक साथ अवतरित होती हैं और वे मिलजुलकर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति करती हैं। ’
(अखण्ड ज्योति पृष्ठ 16, अक्टूबर 1967)
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
‘अखण्ड ज्योति’ अगस्त 1983, पृष्ठ 33
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1979, पृष्ठ 25, 26
उसी ब्रह्म को अर्पित थी। ‘अखण्ड ज्योति’ में वे एक स्थान पर लिखते हैं, ‘मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर, मन, अंतःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका ही नहीं जाता। जितना भी कुछ पास दीखता है, उसे अपने प्रिय आदर्शों के लिए लुटा डालने की ऐसी हूक उठती है कि कोई भी साँसारिक प्रलोभन उसे रोक सकने में समर्थ नहीं होता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
इसी मई अंक में समझाया गया कि अपनी शक्ति को दूसरे में सीधे प्रविष्ट करा देने की प्रक्रिया ही वस्तुतः प्रत्यावर्तन है। लोगों ने उसे पढ़ लिया, इसकी व्याख्या समझ ली, पर जब उनके पास जुलाई 1972 की अखण्ड ज्योति पहुँची व उसमें उनने ‘अपनों से अपनी बात’ के रूप में पढ़ा। “प्रत्यावर्तन की पात्रता विकसित की जाए” तब उन्हें गंभीरता समझ में आई। यह भी जानकारी मिली कि गुरुदेव बीच−बीच में आते रहेंगे एवं अब कुछ विशिष्ट होने जा रहा है
—अखण्ड ज्योति, पृष्ठ 8, अप्रैल 1960
अपनी एकवर्षीय हिमालय साधना में बीच में विराम लेकर परमपूज्य गुरुदेव फरवरी 1972 में एकाएक कुछ दिनों के लिए शांतिकुंज हरिद्वार वापस लौटे एवं परिजनों ने अप्रैल 1972 की ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादकीय में पढ़ा ‘गुरुदेव क्यों आए? क्यों चले गए?’ तब उन्हें विदित हुआ कि हमारी गुरुसत्ता की यह साधना और उसके लीला उपक्रम के पीछे छिपे गूढ़ रहस्य क्या हैं! परमवंदनीया माताजी की वेदना पूज्यवर से देखी नहीं गई। बिना तार के, संदेश के परावाणी से भेजी पाती उन तक पहुँची एवं उनके हृदयावरोध के कष्ट के दौरान वे शाँतिकुँज कुछ दिनों के लिए आ गए। कई विषयों पर उन्होंने परमवंदनीया माताजी से चर्चा की, जो अपने आराध्य के आते ही स्वस्थ हो गई थी
पत्रकारिता के इस विषम युग में अखण्ड ज्योति आज भी अपने संस्थापक के तप का प्रकाश सतत वितरण करने में लगी हुई है। पत्रकारिता के मूलभूत उद्देश्य क्या है? इसका उत्तर इसमें जीवन्त एवं जाग्रत् देखा जा सकता है। इसमें शुभ दृष्टि भी है और सम दृष्टि भी
यह पत्रिका धर्म और अध्यात्म को प्रस्तुत करने के साथ देश हित के लिए समर्पित थी। इसी दौर में युग पुरुष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने सन् 1940 में अखण्ड ज्योति मासिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया। अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित मासिक अखण्ड ज्योति, अध्यात्म के साथ जीवन के सभी क्षेत्र में अपना आत्मिक विकास के लिए प्रतिबद्ध हुई। यह प्रतिबद्धता युग की ज्वाला बन गयी, जिसमें प्रसाद, पंत, निराला, नवीन आदि सभी साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने अपना-अपना योगदान दिया
किसी भी व्यक्ति की किसी बीमारी की यज्ञ चिकित्सा करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि हवन करते समय रोग विशेष के लिए बनाई गई हवन सामग्री में अखण्ड ज्योति के विगत अंकों में वर्णित काँमन हवन सामग्री नंबर 1 को भी बराबर मात्रा में मिला लेना चाहिए। हवन का प्रभावी लाभ तभी मिलता है। इस काँमन हवन सामग्री में जो चीजें मिलाई जाती हैं, वे हैं—
गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर ‘ऋषि चिंतन के सान्निध्य में ‘नामक ग्रंथ का विमोचन गायत्री तपोभूमि मथुरा के व्यवस्थापक पं. श्री लीलापत शर्मा जी के द्वारा किया गया। चार सौ पृष्ठ की यह ग्रंथ 1940 से 1966 तक की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से लिए गए पूज्यवर के विचारों का संकलन है। दो सौ रुपये मूल्य की यह पुस्तक मँगाई जा सकती है एवं घर में स्थापित की जा सकती है
इसी दौर में युग पुरुष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने सन् 1940 में अखण्ड ज्योति मासिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया। अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित मासिक अखण्ड ज्योति, अध्यात्म के साथ जीवन के सभी क्षेत्र में अपना आत्मिक विकास के लिए प्रतिबद्ध हुई। यह प्रतिबद्धता युग की ज्वाला बन गयी, जिसमें प्रसाद, पंत, निराला, नवीन आदि सभी साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने अपना-अपना योगदान दिया। और इसी के साथ क्रान्ति से भारत देश ने विकास के नए युग में प्रवेश किया
प्रस्तुत भूमिका इसीलिए दी जा रही है कि हमारे आज के परिजन युग−साधना को, इस हीरक जयंती वर्ष में चल रहे साधना आँदोलन को तथा शाँतिकुँज के इतिहास के एक मील के पत्थर को आज अट्ठाइस वर्ष बाद पुनः समझ सकें, आज की आवश्यकता से अवगत हो सकें कि वैसी ही इसी स्तर की पुनरावृत्ति की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है। मई 1973 की अखण्ड ज्योति में प्राण−प्रत्यावर्तन साधना की सत्र−शृंखला का विस्तृत विवरण छपा तथा जून 1973 का पूरा अंक प्राण−प्रत्यावर्तन−साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई
धर्मयुग जैसी कई साहित्यिक पत्रिकाएँ बंद हो चुकी हैं। अखण्ड ज्योति और कल्याण के अलावा धार्मिक पत्रिकाएँ नजर नहीं आतीं। पत्रकारिता समर्पित भावना, तपस्या से आरंभ होकर व्यवसाय के जाल-जंजाल में फंस गई है। सच्चे और निष्पक्ष पत्रकारों के सीने पर सदा भय का निशाना सधा रहता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
श्री रामकुमार फरक्या रामपुरा से लिखते हैं-मुझे भयंकर क्षय हुआ था सेनेटोरियम में एक मित्र से अखण्ड ज्योति प्राप्त हुई। उससे प्रेरणा लेकर मानसिक गायत्री उपासना आरंभ की। फल यह हुआ कि एक पैसे बराबर गोलाई की कैविटी जो अकसर दो-दो वर्ष में भी बंद नहीं होती तीन मास में ही ठीक हो गयी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
सुसनेर (मन्दसोर) शाखा के मन्त्री पं. नन्दकिशोर शर्मा बड़ी लगन के कर्मनिष्ठ धर्म प्रेमी हैं। सन् 40 के अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य हैं और गत 17 वर्षों से धर्म प्रचार के कार्य में अपने व्यक्तिगत अन्य कार्यों की तरह ही दिलचस्पी लेते रहे हैं। उस प्रदेश के पिछड़े लोगों के हृदय जीतकर आपने हजारों से मद्य माँस का सेवन छुड़ाया और जनेऊ धारण कराके पवित्र जीवन व्यतीत कराने का व्रत लिवाया है। इस वर्ष ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्ति के लिए आपने 108 छोटे बड़े हवन कराने का संकल्प लिया है जिसमें से अधिक संकल्प पूरा भी हो चुका है
इसके लिये श्री बलभद्र प्रसाद स्वर्णकार और ध्वजा राम पटेल ने कोने-कोने में डुग्गी पिटवादी, जिससे जनता की खूब भीड़ हो गयी। 28 घन्टे तक अखण्ड कीर्तन किया गया और अखण्ड ज्योति भी जलती रही। मोहनलालजी गुप्ता ने सब कार्यों की देख-रेख में विशेष परिश्रम किया
अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार की विशेषता उसमें सम्मिलित आदर्शवादी सत्पुरुष ही हैं। उनके द्वारा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का जो महत्वपूर्ण कार्य इस थोड़े समय में हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य के सम्बन्ध में सहज ही यह आशा की जा सकती है कि यह संगठन युग निर्माण की भूमिका में महत्वपूर्ण पार्ट अदा करेगा। कुछ परिजनों के परिचय इस अंक में उपस्थित करते हैं
आगरा (मालवा) में श्रावण मास में लघु अनुष्ठान सामूहिक रूप से आरम्भ हो गया है। श्री गोपीलाल जी भावसार तथा श्री चतुर्भुज जी के प्रयत्न से अखण्ड ज्योति श्री बैजनाथ महादेव मंदिर में आषाढ़ी पूर्णिमा से प्रारम्भ हो गई है
श्री सीताराम श्रीवास्तव पछायागाँव (इटावा) से लिखते हैं कि मुझे सर्वप्रथम अक्टूबर 1955 को ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ने को मिली। उसके बाद जब मेरे परिवार में कलह हुई तो मैं लेटे ही लेटे मन में मन्त्र जपने लगा फलस्वरूप दो दिन में शाँति हो गई। इसी प्रकार मुझे बीड़ी पीने का दुर्व्यसन था जो छोड़ देने पर शरीर पर बुरा असर पड़ता था
अखण्ड ज्योति के पाठकों में से अनेकों ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठाये हैं पर अधिकाँश अभी ऐसे हैं जिन्होंने इधर कुछ ध्यान नहीं दिया है। यह उपेक्षा अखरने और खटकने वाली है। अखण्ड-ज्योति परिवार धर्मनिष्ठ, कर्तव्य परायण एवं जागरुक सत्पुरुषों का संगठन है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
“अखण्ड ज्योति” के जन्म काल के कुछ ही दिन पीछे से लेकर अब तक श्री महेन्द्र जी अपरिमित आत्मीयता के साथ अखण्ड ज्योति की भारी सेवा कर रहे हैं। अब तक उन्होंने लगभग 40 पुस्तकें इस संस्था के लिए लिखी हैं, अखण्ड ज्योति के संपादन में हर महीने बहुत श्रम करते हैं। 17 वर्षों में जो उनने अपने ज्ञान और श्रम द्वारा सेवा की है उसका मूल्य रुपये पैसों में लगाया जाय तो वह कितने ही हजार रुपयों का होता है पर आपने आज तक कभी भी एक पाई इस श्रम के बदले में नहीं ली
उन्होंने अपने साधना अनुभवों से अनेकों व्यक्तियों की आध्यात्मिक सेवाएं की हैं। अखण्ड ज्योति से प्रकाशित गायत्री संबंधी पुस्तकों का सार लेकर आपने कई पुस्तकें गुजराती भाषा में छापी हैं और गायत्री परिवार के बहुत से सदस्य बनाने का सफल प्रयत्न किया है
“अखण्ड ज्योति” के जन्म काल के कुछ ही दिन पीछे से लेकर अब तक श्री महेन्द्र जी अपरिमित आत्मीयता के साथ अखण्ड ज्योति की भारी सेवा कर रहे हैं। अब तक उन्होंने लगभग 40 पुस्तकें इस संस्था के लिए लिखी हैं, अखण्ड ज्योति के संपादन में हर महीने बहुत श्रम करते हैं। 17 वर्षों में जो उनने अपने ज्ञान और श्रम द्वारा सेवा की है उसका मूल्य रुपये पैसों में लगाया जाय तो वह कितने ही हजार रुपयों का होता है पर आपने आज तक कभी भी एक पाई इस श्रम के बदले में नहीं ली। सदा सब कुछ पूर्ण निस्वार्थ भाव से करते हैं
अखण्ड ज्योति में इस स्तंभ के अंतर्गत परिवार के कुछ आदर्श व्यक्तियों के परिचय हर महीने छापे जाते रहेंगे। कुछ परिचय इस अंक में दिये जा रहे हैं
श्री महेन्द्र जी अखण्ड ज्योति परिवार के अत्यंत निकटवर्ती हैं, के प्रायः मथुरा आते रहते हैं और इस मिशन की सचाई, सेवा भावना, उपयोगिता एवं सैद्धान्तिक श्रेष्ठता को अपनी आँखों से देखकर इतने प्रभावित हैं कि जो वे करते हैं उससे भी अनेकों गुना त्याग एवं सहयोग करने की बात सोचते रहते हैं। पीला चश्मा पहने हुए छिद्रान्वेषी जहाँ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ वस्तु में भी अपनी नीचता की छाया देखते हैं, वहाँ श्री महेन्द्र जी जैसे उत्कृष्ट मस्तिष्क एवं उज्ज्वल हृदय किसी अच्छी वस्तु की वास्तविकता को भी पहचानने में पीछे नहीं रहते। सत्प्रवृत्तियों में सच्चे मन से सहयोग करना सत्पुरुषों का कर्तव्य होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
अगले दिन स्नान आदि से निपट 9 बजे ठीक हम “अखण्ड ज्योति” कार्यालय पर आये। आचार्य जी हमें तैयार ही मिले। वहाँ से हमें वह अपने पूजा के कमरे में ले गये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
इस रोग की काफी चिकित्सा कराई पर किसी भी प्रकार रोग निवारण नहीं हुआ। एक दिन अचानक ही अखण्ड ज्योति पत्रिका की एक प्रति मुझे प्राप्त हो गयी। इसी की प्रेरणा से मैंने गायत्री उपासना तथा हवन प्रारम्भ किया। इसके कुछ समय उपराँत मेरे पेट का दर्द बिल्कुल ठीक हो गया
अखण्ड ज्योति में अब तक गायत्री परिवार के वे समाचार छपते हैं जिनमें सामूहिक जप, हवन, सम्मेलन आदि की चर्चा रहती है। अब ऐसे समाचार भी रहा करेंगे जिनमें परिवार के किसी व्यक्ति ने कोई ऐसा सत्कार्य, आदर्श, एवं अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किया हो जिससे दूसरे लोगों को भी श्रेष्ठता का उदाहरण उपस्थित करने की प्रेरणा मिले। गायत्री परिवार में बड़े आदमी (अमीर) भले ही न हों पर बढ़िया आदमी (महापुरुष) तो इस भण्डार में रत्न राशि की तरह जगमगाते ही रहने चाहिएं
लगभग सभी अनुभवी डाक्टरों ने चिकित्सा की परंतु लाभ कुछ नहीं हुआ। इसी बीच माता की कृपा से अखण्ड ज्योति का एक अंक प्राप्त हो गया। इसी के अनुसार मैंने क्वार की नवरात्रि में एक लघु अनुष्ठान किया। इसी समय माता जी की आँखों में अचानक ही ज्योति आ गयी
विलासपुर (म.प्र.) के गायत्री परिवार ने गायत्री-जयन्ती का पुण्य पर्व बड़े समारोह पूर्वक मनाया। 24 घंटे अखण्ड ज्योति जलती रही। 24 उपासकों ने 24-24 माला का जप किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
मझौला (पीलीभीत) में सामूहिक गायत्री साधना में 240 घंटे अखण्ड ज्योति जलाई गई, 34000 जप 24000 आहुतियाँ, 2400 मंत्र लेखन, 1000 गायत्री चालीसा पाठ, 500 गायत्री पुस्तक वितरण किया गया। पूर्णाहुति बड़े समारोह तथा विधिपूर्वक सम्पन्न हुई
चन्द्रनगर (छतरपुर) में ता. 24 सित. से 2 अक्टूबर तक प्रतिदिन बजरंग कीर्तन मंडल द्वारा प्रभातफेरी निकालकर प्रचार किया गया। इसमें ग्राम की समस्त जनता ने पूर्ण सहयोग दिया और ता. 1 को सुबह से अखण्ड ज्योति जलाकर 24 घंटे का कीर्तन व हवन का कार्यक्रम शुरू हुआ। पूर्णाहुति के पश्चात ग्राम की समस्त कन्याओं, ब्राह्मणों और प्रत्येक घर में से एक व्यक्ति- इस प्रकार 2500 व्यक्तियों का सामूहिक भोज किया गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-December
अनेक बार आकस्मिक आपत्तियों, दुर्घटनाओं, शत्रुओं अथवा आतताइयों द्वारा आक्रमणों से मनुष्य की इस प्रकार रक्षा हो जाती है कि जिसकी कोई आशा या सम्भावना नहीं होती। अन्य घटनाओं की बात छोड़ भी दें, तो ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित “गायत्री-साधना के अनुभवों” में भी पाठकों को ऐसे अनेक उदाहरण मिल सकते हैं, जिनको सिवाय दैवी सहायता के और कुछ नहीं कह सकते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
प्रज्ञा पुराण के तीन और खण्ड ‘‘महामानव प्रकरण’’ ‘‘परिवार निर्माण प्रकरण’’ एवं ‘‘देव संस्कृति प्रकरण’’ पर प्रज्ञोपनिषद एवं कथाओं के अनूठे समन्वय के रूपों में गायत्री तपोभूमि मथुरा से प्रकाशित हो चुके हैं। लगभग 325 अखण्ड ज्योति पृष्ठो में प्रत्येक सजिल्द खण्ड में सामग्री आ पाई है। मूल्य प्रत्येक का 25) रक्खा गया है। इनका गुजराती अनुवाद भी शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
इसमें आने वाली कमीवेशी ही व्याधि का कारण बनती है। समय-समय पर आग के शोले फूटने की तरह शरीर से ज्वाला-चिनगारियाँ निकलने, स्वतः जलन (आटोकम्बशन) के रूप में इनके प्रमाण भी देखे जाते हैं जिनका वर्णन अखण्ड ज्योति में पहले भी किया जाता रहा है। अध्यात्म प्रयोजनों में यह ऊर्जा जीवनी शक्ति का संचय करने एवं अधोगामी प्रवाह को रोककर ऊर्ध्वगामी बनाने की भूमिका निभाती है। क्षरित विद्युत जब सत्प्रयोजनों में नियोजित होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
एक बार दर्शन की दृष्टि से मथुरा देखा तो था पर वहाँ किसी से परिचय न था। चलकर पहुँच गया और “अखण्ड ज्योति” प्रकाशन के लायक एक छोटा मकान किराये पर लेने का निश्चय किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
(13) ‘अखण्ड ज्योति’ अब साधना पथ के पथिकों का मार्ग दर्शन कार्य ही प्रधान रूप से करेगी। सदस्य उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा करें। सदस्यों और तपोभूमि के बीच के संबंध सूत्र का प्रधान माध्यम यह पत्रिका ही है
चारों वेदों का कुल मूल्य 44 होता है। किन्तु अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को 35 में ही दिया जाएगा। डाक से मंगाने पर 5 और रेल से मंगाने 2 भाड़ा इसके अतिरिक्त लगेगा। आर्डर के साथ 5 पेशगी भेजना आवश्यक है
‘अखण्ड ज्योति’ के गत अंक में गायत्री परिवार के संबंध में, कुछ सूचनाएँ छपी थी। उनके संबंध में और भी अधिक स्पष्टीकरण किया जा रहा हे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
ज्ञान प्रधान इस पुण्य पर्व पर “अखण्ड ज्योति” के सदस्य बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना इस सब के लिये उचित और आवश्यक है
अखण्ड ज्योति परिवार में साप्ताहिक उपवास रविवार को किया जाता है। गायत्री का देवता सविता है। सविता अर्थात् सूर्य
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
सविता का मोटा अर्थ सर्व होता हैं, पर उसका वास्तविक अर्थ प्राण ही हैं। प्राण की गायत्री का देवता है इस रहस्य पर अखण्ड ज्योति के हाल के अंक में गायत्री का देवता सविता लेख में कुछ प्रकाश डाला भी जा चुका हैं। गायत्री उपासना की द्वितीय भूमिका में प्रवेश करने वाला साधक अपने को जिन शक्तियों तथा सिद्धियों से ओतप्रोत पाता हैं वस्तुतः वह प्राण शक्ति का ही प्रसाद एवं चमत्कार होता हैं
इस दिशा में परिजनों को अधिक परेशानी न हो इसलिए अब अखण्ड ज्योति भी दैनिक स्वाध्याय के उद्देश्य को पूरा करने जा रही हैं भविष्य में उसकी एक-एक पंक्ति इसी उद्देश्य को ध्यान रखते हुए लिखी जाया करेंगी। अब तक उसमें यदा-कदा अन्य प्रकार के लेख भी छपा करते थे पर अब आत्मोन्नति की दिशा में जनसाधारण का मार्गदर्शन करना ही एकमात्र लक्ष होगा। आत्म-सुधार आत्म-निर्माण आत्म-विकास से सम्बन्धित तथ्यों को ही पत्रिका के पृष्ठों पर स्थान दिया जाया करेगा
(3)पंचकोशी साधना क्रम दश वर्ष तक चलेगा। अगले वर्ष की साधना का पाठ्यक्रम बताने के लिए हर साल अक्टूबर मास में इसी प्रकार अखण्ड ज्योति का एक छोटा साधना अंक निकलता रहेगा
गायत्री जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए। माता के चित्र अखण्ड ज्योति कार्यालय से छपे हैं। पर यदि उनसे भी सुन्दर चित्र किसी चित्रकार की सहायता से बनाये जा सकें तो उत्तम हो। सुन्दर से सुन्दर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता मानकर जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना चाहिए
चारों वेदों की 7 जिल्दों का कुल मूल्य 44) होता है। पर अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को यह 35) में ही दिया जाता है। रेलवे से माँगने में लगभग 2) तथा डाक से मंगाने से लगभग 5) खर्चा अलग देना पड़ता है। आर्डर के साथ 5) भेजना आवश्यक है
अखण्ड ज्योति को माध्यम से
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-November
उपनिषदों में आत्मा को ज्योति स्वरूप माना हैं, ‘तमसो या ज्योतिर्गमय’ की प्रार्थना हैं। इस महाप्रकाश की अखण्ड ज्योति का दिव्य दर्शन करने की आकांक्षा की गई हैं। यही ब्रह्म का शाश्वत स्वरूप हैं। शरीर धारी इष्ट देवों के रूप साधक की कल्पना के अनुरूप बनते और बदलते हैं पर ब्रह्म का शुद्ध स्वरूप सदा अपरिवर्तित एवं शाश्वत हैं ज्योतिर्मय ही हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
अपने परिवार के असंख्य व्यक्ति यह अनुभव करते हे कि स्वर्ग कोई कल्पना नहीं वरन् तथ्य है और वह दूर नहीं वरन् हमारे पास मौजूद है, जिसके आनन्द का अनुभव हम हर घड़ी करते रहते है। अखण्ड ज्योति अपने मिशन को एक सीमा तक सार्थक हुआ देख कर अपने विगत 22 वर्ष के जीवन पर सन्तोष एवं गर्व अनुभव करती है
(1) इस अंक के साथ अधिकांश पाठकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। अखण्ड ज्योति’ की वी पी बिना मंगाई नहीं भेजी जाती। क्योंकि इसमें बिलकुल स्वयं ॥) पोस्टेज अधिक देना है। 3) के स्थान पर 3॥) लगते हैं
आज अगणित पत्र पत्रिकाएँ और पुस्तकें छपती रहती है, उन्हें लोग खरीदते बेचते भी हैं; उनमें से कितने में धर्म, ईश्वर, सदाचार आदि की बातें भी रहती हैं पर उसका कोई विशेष प्रभाव पाठकों पर नहीं पड़ता। ‘अखण्ड ज्योति’ का इतिहास इससे सर्वथा भिन्न है, उसके लाखों आदमियों के विचारों में क्राँति उपस्थित की है, अगणितों की जीवन-दशा को मोड़ा है और सहस्रों ऐसे है जिनका आन्तरिक कायाकल्प ही हो गया हैं इस भू पर सस्वर अवतरित करने की साध को लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ जन्मी थी। वह साध सर्वथा निष्फल नहीं हुई। अपने परिवार के असंख्य व्यक्ति यह अनुभव करते हे कि स्वर्ग कोई कल्पना नहीं वरन् तथ्य है और वह दूर नहीं वरन् हमारे पास मौजूद है, जिसके आनन्द का अनुभव हम हर घड़ी करते रहते है
(5) अखण्ड ज्योति’ हर महीने पहली तारीख को दो बार जाँच कर भेजी जाती है। यदि डाक की गड़बड़ी से कोई अंक गुम हो जाये तो उसी महीने सूचना देकर दुबारा माँग लेना चाहिये। कई महीने बाद सूचना देने से पुराने अंक समाप्त हो जाने पर उन्हें दुबारा भेज सकना संभव नहीं रहता
(6) अखण्ड ज्योति के मिशन का अधिकाधिक प्रसार उनकी ग्राहक संख्या बढ़ने पर है। पत्रिका की उपयोगिता पर ड़ड़ड़ड़ जो सच्चे मन से उसे प्रेम करते हों ड़ड़ड़ड़ है कि इसकी ग्राहक संख्या बढ़ाने का ड़ड़ड़ड़ एक-दो ग्राहक बढ़ा देना किसी भी व्यक्ति के लिये कुछ कठिन कार्य नहीं है
धर्मप्रचार हमारा प्रधान कार्यक्रम रहा है। ‘अखण्ड ज्योति में भी इसी प्रकार की पाठ्य सामग्री छपती रहती हैं ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम ओर अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों से हम परिजनों की आन्तरिक महत् को विकसित करने का प्रयत्न करते रहे है। फलस्वरूप एक विशाल जनसमूह आत्मकल्याण और युगनिर्माण के महान् लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुस्थिर और सुव्यवस्थित रीति से आगे बढ़ता चला जा रहा है। सभी सद्ग्रन्थों की भाँति हम भी अपने विशाल परिवार के परिजनों के प्रति उनकी प्रत्यक्ष सेवा सहायता करने का उत्तरदायित्व पूरा करने में भी संलग्न रहे है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
अब आगे उसमें वही सब छपेगा जो आचार्यजी अपने परिजनो को सिखाना उचित समझेंगे। अखण्ड ज्योति अब श्रम विकास के व्यवहारिक मार्ग दर्शन की पत्रिका रहेगी और उसमें प्राय सभी लेख आचार्यजी द्वारा लिखित एवं संगृहीत होंगे। अज्ञातवास से लौटने पर पत्रिका ने कुछ इसी प्रकार की मोड़ भी लिया है
परमपूज्य आचार्य जी के अज्ञातवास काल में मुझे अखण्ड ज्योति का सम्पादन कार्य अपने दुर्बल कन्धों पर वहन करना पड़ा। उस अवधि में जो त्रुटियाँ रही होगी पाठक ने उन्हें उदारतापूर्वक सहन किया है। इसे मैं स्वजनों की आत्मीयता उदारता एवं अथवा सौभाग्य ही मानती हूँ
इस संदर्भ में अखण्ड ज्योति परिवार के धर्मप्रेमी स्वजनों के लिए भी कुछ कर्तव्य बनते है। हम सब को उस पर ध्यान देना चाहिए और उसके लिए निम्न प्रकार सप्तसूत्र तैयार करनी चाहिए
अब तक अखण्ड ज्योति साधारण पत्र पत्रिकाओं के ढंग से सम्पादित ही तो रही है उसमें विभिन्न विषयों पर विभिन्न लेख छपते रहे है। अब आगे उसमें वही सब छपेगा जो आचार्यजी अपने परिजनो को सिखाना उचित समझेंगे। अखण्ड ज्योति अब श्रम विकास के व्यवहारिक मार्ग दर्शन की पत्रिका रहेगी और उसमें प्राय सभी लेख आचार्यजी द्वारा लिखित एवं संगृहीत होंगे
अब तक पाठक अखण्ड ज्योति को हलकी दृष्टि से पढ़ते रहे है। उन्हें अब पत्रिका की एक एक पंक्ति ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए। अपनी स्त्री, बच्चों और कुटुम्बियों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे वे भी उसका लाभ ले सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
प्रश्न:- कुछ व्यक्ति अखण्ड ज्योति को 1926 से एवं आरम्भ हुआ बताते हैं, कुछ 1937 से एवं कुछ 1940 से। इसमें -कौन सा सच है एवं प्रामाणिक है?
अनेक पाठ-परिजन ऐसे है जो विगत कुछ वर्षों में या अभी-अभी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से जुड़े हैं। सभी की अपनी-अपनी जिज्ञासाएँ होती है। वे पत्रों के माध्यम से यदा-कदा उनका समाधान पाते रहते हैं
भावनाशील परिजनों से अनुरोध है कि ‘अखण्ड ज्योति‘ के आलोक प्राणऊर्जा के दिव्य प्रवाह को घर-घर पहुँचाने के अपने में अद्भुत इस आध्यात्मिक पंख्का का वार्षिक चंदा 60 रुपये,विदेशों में 500 रुपये जपजसम मज वार्षिक है अपनी व स्वजनों की आगामी वर्ष की राशि तुरन्त भेज दी जाय, ताकि प्रवाह अवरुद्ध न हो आराध्य की जुलाई ज्योति ज्वालमाल बन घर-घर फैले, यही हमारी मंगल कामना है
प्रश्न:- गायत्री परिवार, युग निर्माण मिशन, प्रज्ञ अभियान,प्रज्ञापरिजन, अखण्ड ज्योति परवा नाम से बार-बार जो सम्बोधन दिए जाते हैं, वे अलग-’अलग हैं या एक ही समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले नाम है
शेष सभी नाम इस के पर्यायवाची है, अगल-अलग नहीं। हरिद्वार स्थित शांतिकुंज रूपी मुख्य चेतना केन्द्र से संचालित सारी गतिविधियों का विस्तार मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान द्वारा विगत 50 वर्षों से भी अधिक समय से संपन्न होता रहा है व आगे भी प्रकाशन विस्तार क्षरा यह प्रक्रिया जारी रहेगी। समग्र समुच्चय मालाकर एक लाल मशाल से परमपूज्य गुरुदेव व परमवंदनीय माताजी के बाद उनका प्रतिनिधित्व करती है, के रूप में ज्ञान की जाज्वल्यमान ज्योति को प्रतीक मानकर उसके अधीन काम कर रहा हैं मार्गदर्शन उसी गुरुसत्ता का है प्रसाति उसे पांचों केन्द्र-शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार से , युगतीर्थ जन्मभूमि आंवलखेड़ा (आगरा)- से तथा गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से करते हैं अखण्ड ज्योति, हिंदी एवं अन्यान्य भाषाओं में इसे वैचारिक प्रवाह के प्रतिनिधि के रूप में ‘युग निर्माण योजना’ मासिक लोकशिक्षण व समाज-निर्माण की वाणी के यप् में तथा ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक हिन्दी व गुजराती में इसे कार्यकर्त्ताओं के प्रबन्ध मार्गदर्शन के रूप में जन-जन तक पहुँचाने की प्रमुख भूमिका निभाते हैं
अखण्ड ज्योति की पाठ्य सामग्री की मूलभूत पृष्ठभूमि है गायत्री एवं यज्ञ के रूप में भारतीय संस्कृति के दो की धुरी पर पूरा भारतीय अध्यात्म देवसंस्कृति का लोक शिक्षण परक मार्गदर्शन टिका से लेकर कथा साहित्य द्वारा सद्गुणों की अवधारण का शिक्षण एवं सामयिक सभी समस्याओं का गहराई से विवेचन ‘अखण्ड ज्योति पख्का से तत दिया जाता रहता है विगत वर्षों में इस साहित्य ने जीवन संजीवनी के रूप में जो भूमिका निभाई है उससे की अधिक आज की मूर्च्छित मानव जाति के लिए यह अगले दिनों निभाने जा रही है
उसे संग्रहित करे एक स्थान पर वाङ्मय के रूप में अभी 70 खंडों में व बाद में 38 और शीघ्र प्रकाशित किया गया है अब तब के खंडों में बहुसंख्य भाग वह नहीं जो वह आगे के लिए मार्गदर्शन, लिखी हुई थी पढ़ी हुई सामग्री के रूप में दे गए है। यह संभावित है छोटी-बड़ी 500 पुस्तकों के रूप में हो इन्हें पहले ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में एवं फिर छोटी पुस्तकों तथा बाद में वाङ्मय में दिया जाएगा॥ प्रथम वरीयता। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को ही मिलेगी, क्योंकि यह वस्तुतः गुरुसत्ता की प्राणचेतना का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है। एवं जन-जन के लिए सुलभ है
उत्तर:- 1926 से ‘अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड दीपक परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रज्वलित किया गया था, जिसके माध्यम से वसंत पर्व रूपी उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस की बेला में उन्हें उनकी परोक्ष मार्गदर्शन सत्ता ने हिमालय से आकर दर्शन दिए थे एवं साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन दिया था। यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में
उत्तर:- परमपूज्य गुरुदेव ने प्रारम्भ में ‘गायत्री -चर्चा’ नाम से एक स्तम्भ अखण्ड ज्योति में अपनी बात पाठकों से संपादकीय के रूप में कहने के लिए आरम्भ किया था, जिसे बाद में उनने ‘अपनों से अपनी बात- कॉलम से प्रकाशित करना आरम्भ किया। चालीस वर्ष तक सतत् प्रकाशित यह स्तम्भ या तो पूज्यवर या शक्तिस्वरूपा माताजी की लेखनी से लिखा जाता रहा। बाद में यह लेखनी जिसे सौंपी जाती रही
प्रश्न:- एक बात बार-बार मन में आती है कि ‘अखण्ड ज्योति’ यदि जन जन की वाणी है तो इसकी भाषा इतनी क्लिष्ट क्यों है? क्या इसे सरल नहीं किया जा सकता?
अखण्ड ज्योति पत्रिका के मार्गदर्शन के रूप में वे अपने उत्तराधिकारियों को उपलब्ध करा गए इस पत्रिका से सतत् सान्निध्य इसमें दिये गए विचारों का नियमित स्वाध्याय परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी से साक्षात्कार करने के समान है यह हर किसी के लिए हर पल सहज ही उपलब्ध हैं इस पत्रिका को स्वयं पढ़ना व औरों को प्रेरित करना ऋषियुग्म की सत्ता के मानस पुत्रों में वृद्धि में वृद्धि करने के समान हैं इस संधिवेला में सभी का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि इन मानस पुत्रों में और वृद्धि हो एक पाठक न्यूनतम पाँच नये जपजसम मज पाठक तैयार करे पच्चीस सहयोगी पाठक तैयार करे
हरिद्वार स्थित शांतिकुंज रूपी मुख्य चेतना केन्द्र से संचालित सारी गतिविधियों का विस्तार मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान द्वारा विगत 50 वर्षों से भी अधिक समय से संपन्न होता रहा है व आगे भी प्रकाशन विस्तार क्षरा यह प्रक्रिया जारी रहेगी। समग्र समुच्चय मालाकर एक लाल मशाल से परमपूज्य गुरुदेव व परमवंदनीय माताजी के बाद उनका प्रतिनिधित्व करती है, के रूप में ज्ञान की जाज्वल्यमान ज्योति को प्रतीक मानकर उसके अधीन काम कर रहा हैं मार्गदर्शन उसी गुरुसत्ता का है प्रसाति उसे पांचों केन्द्र-शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार से , युगतीर्थ जन्मभूमि आंवलखेड़ा (आगरा)- से तथा गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से करते हैं अखण्ड ज्योति, हिंदी एवं अन्यान्य भाषाओं में इसे वैचारिक प्रवाह के प्रतिनिधि के रूप में ‘युग निर्माण योजना’ मासिक लोकशिक्षण व समाज-निर्माण की वाणी के यप् में तथा ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक हिन्दी व गुजराती में इसे कार्यकर्त्ताओं के प्रबन्ध मार्गदर्शन के रूप में जन-जन तक पहुँचाने की प्रमुख भूमिका निभाते हैं
यह संभावित है छोटी-बड़ी 500 पुस्तकों के रूप में हो इन्हें पहले ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में एवं फिर छोटी पुस्तकों तथा बाद में वाङ्मय में दिया जाएगा॥ प्रथम वरीयता। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को ही मिलेगी, क्योंकि यह वस्तुतः गुरुसत्ता की प्राणचेतना का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है। एवं जन-जन के लिए सुलभ है
इसी के प्रकाश-मार्गदर्शन में सभी निर्णय इस दैवी मिशन के लिए जाते हैं। यह हुई ‘अखण्ड दीपक’ की बात ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका इसी तप-साधना के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्रथम बार 1937 की वसंत पंचमी से हस्तनिर्मित कागज पर हाथ से चलने वाली मशीनों से निकलने के प्यास द्वारा आरम्भ की गयी थी। 1 अंक निकलने के बाद से अनौपचारिक रूपों से पत्रों द्वारा 200 पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास आगरा से चलता रहा है बाद में फ्रीगंज आगरा से नियमित प्रकाशन वसंतपर्व 1940 के प्रथम अंक से हुआ तो 20 जनवरी को प्रकाशित हुआ। यही प्रामाणिक रूप में उपलब्ध प्रथम अंक है
उत्तर:- जो भी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का नियमित स्वाध्याय करता है,
यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में। मथुरा में यह कक्ष वैसा ही बनाए रखा गया है एवं घीयामंडी में सभी उसके दर्शन कर सकते हैं। 1971 की 20 जून से यह अखण्ड दीपक परमवंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी उपस्थिति में व बाद में उनके परीक्षा संरक्षण में सतत् शांतिकुंज सप्तसरोवर हरिद्वार में जल रहा है, जहां नित्य नियमित रूप से इसको दर्शन प्रणाम करने हेतु हजारों व्यक्ति आते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
अब तक हजारों की संख्या में प्राप्त पत्रों और टेलीफोन सन्देशों में आत्मीय परिजनों की व्याकुलता, चिन्ता और तरह-तरह की आशंकाओं की झलक मिलती रही है। इसके समाधान में पहले तो कुछ दिनों तक यही उचित समझा गया कि उनमें से हर एक को व्यक्तिगत पत्र लिखकर शंका का समाधान कर दिया जाय और उनकी संवेदना से अभिभूत अपने मनोभावों को उन्हें बता दिया जाय लेकिन जब पत्रों का अम्बार बढ़ता चला गया तो मिशन की ओर से प्रति मास प्रेमी स्वजनों को भेजी जाने वाली ‘पाती’ अखण्ड ज्योति में अपने उद्गारों को व्यक्त करना एक विवशता बन गयी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
अन्तःकरण में इस भाव की घनीभूत अनुभूति से प्रेरित होकर हम सब आपकी सन्तानें, आपकी द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर अखण्ड ज्योति के इस अंक को नारी अंक के रूप में आपको समर्पित करते हैं। भावों की इस पुष्पाँजलि को स्वीकार करो माँ ! और हम सब पर सदा की भाँति अपने आँचल की वरद् छाया बनाए रखना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
आध्यात्मिक पुनर्जागरण के इस क्रम में घर परिवार के सुसंस्कारों की स्थापना अखण्ड ज्योति के मिशन पत्रिकाओं को पढ़कर, गायत्री चालीसा पाठ, देवस्थापना करने वालो की संख्या में अभिवृद्धि, 24000 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन या भगवान्नाम रूपी एक सुनियोजित कार्यक्रम पाठकगण आगामी माह की अखण्ड ज्योति एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक युग निर्माण योजना मासिक में पढ़ सकेंगे। इस प्रक्रिया से देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रहेगा और सूक्ष्म स्तर पर यह विराट धर्मानुष्ठान व सम्पन्न हो सकेगा जो भावी आयोजनों के आधारशिला रखेगा, नवयुग की पृष्ठभूमि बनायेगा
इस ऊर्जा केन्द्र की - टकसाल को किस भाव संवेदना के खाद पानी से विनिर्मित किया गया है। उसे परम पूज्य गुरुदेव के मार्च 1978 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखी गयी इस पंक्तियों को पढ़कर समझा जा सकता है जिसमें उनने भावभरे हृदय से उन सबका आमंत्रण किया था जिन्हें वे अपने देव परिवार में सम्मिलित करना चाहते थे। उनने इसी अंक के पृष्ठ 62 पर लिखा था- “ जीवन के इस अंतिम अध्याय के मिशन के सूत्र संचालकों का मन है कि परिवार को जागृत आत्माओं के साथ रखने और रहने का अवसर मिल सके तो कितनी प्रसन्नता रहे। यह सान्निध्य मोहवश नहीं, वरन् उद्देश्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट है
”जिस स्थान को घनीभूत ऊर्जा का का केन्द्र बनाया हो उसे उनने अकारण ही “छावनी” अथवा कायाकल्प के लिए बनी अकादमी नाम नहीं दिया था। स्वयं जब वे बाद में शाँतिकुँज का विस्तार कर ब्रह्मवर्चस आरण्यक एवं गायत्री नगर की स्थापना कर रहे थे तब उनने मार्च 1978 की अखण्ड ज्योति में था-” उत्तराखण्ड की साधना के सर्वथा उपयुक्त संस्कारवान देव भूमि समझ लेने के उपरान्त ही इसे सृजन सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त समझा गया है और उसे एक छावनी के रूप में विकसित करने का निश्चय किया गया है। अन्यत्र स्थानों में व्यापक परिश्रम से भी जो सत्परिणाम उपलब्ध होने असंभव थे, वे यहाँ अल्प प्रयास में संभव होंगे क्योंकि यहाँ के वातावरण में चिरकाल के आच्छादित ऋषियों के विचारों के संकल्प का लाभ साधकों को मिलेगा। यह बात जग जाहिर है कि शाँतिकुँज आज यहाँ स्थित है उसके नीचे गंगा की सात धाराओं में से एक बहती थी पर अभी भी उसके चिन्ह थोड़ा खुदाई करके देखे जा सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
उपरोक्त 14 अनुयाज संकल्पों की एक-एक करके विस्तृत विवेचना तथा क्रियान्वयन पद्धति अखण्ड ज्योति में प्रकाशित की जाती रहेगी, साथ ही इस पर एक समग्र पुस्तिका प्रारम्भ में एवं अलग-अलग प्रत्येक पर सभी प्रकाशित की जा रही हैं, ताकि सभी उसे क्रिया रूप दे सकें। परिजनों से अनुरोध है कि वे इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें, समझें तथा कार्यान्वित करें। परिवार-जनों से, सम्बन्धियों से तथा मित्रों से व्यक्तिगत चर्चाओं में इन्हें सभी सम्मिलित किया करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
जिसमें परिजनों को उनने उसी ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन का प्रथम अध्याय समाप्त होने की बात कही। यही प्रसंग मार्च 1990 अखण्ड ज्योति के सम्पादकीय एवं अप्रैल 1990 की पत्रिका में हमें क्या करना होगा। ’ के अंतर्गत दिए गए। ‘हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं’ शीर्षक लेख में उनकी लेखनी से प्रकट हुआ-”दृश्य शरीर रूपी गोबर की मषक चर्म चक्षुओं से दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरुकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा” आगे के शब्द हैं- “शांतिकुंज परिसर में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर, अदृश्य अस्तित्व बनाए रखेंगे
फरवरी 1987 में प्रकाशित अखण्ड ज्योति के ‘इक्कीसवीं सदी विशेषांक’ में पहली बार परम पू. गुरुदेव ने ‘इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य’ का उद्घोष किया। इसी अंक में उनने लिखा कि- “इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बन्द कर दिया है। उसके साथ एक हलका तन्तु ही जुड़ा रखा है
“ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे अपने दृश्य कार्यों को एक पूर्व निर्धारित, अवधि में समेट रहे थे, ताकि अपने भावी उत्तरदायित्व को सूक्ष्म शरीर के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे एवं यह आश्वासन हम देते हैं कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं” जैसे शब्दों से उन्होंने भावुक परिजनों को आश्वासन भी दे दिया था कि वे स्वयं को सँभाले व भावी सुनिश्चितता तो समझते हुए सौंपे दायित्वों को पूरा भर करते चलें
शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा, पर क्षणभर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक का ज्वलन्त ज्योति में समा जाएँगे जिसके आधार पर अखण्ड ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म-चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे व इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत स्थिति में रहे हैं
यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं जो पत्रिका के नियमित सदस्य नहीं हैं
यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं
प्रायः दो शताब्दियों से तीर्थयात्रियों की उत्तराखण्ड यात्रा का जो पैदल मार्ग था, उसके एवं सप्तर्षि आश्रम के मध्य स्थित इस भूमि खण्ड को जो आज प्रारम्भिक स्थिति से प्रायः दस गुना बड़ा एवं भविष्य में भी जिसके बढ़ते रहने की सम्भावना है, पूज्यवर द्वारा भावी कार्यक्षेत्र के रूप में चुन लिया गया। प. पूज्य गुरुदेव ने मार्च .69.के अपने अखण्ड ज्योति के सम्पादकीय में लिख है - “ यहाँ से जाने के बाद शरीर जीवित रहने तक तीन महत्वपूर्ण कार्य करने है। पहला अग्र तपश्चर्या, दूसरा गुप्तप्रायः अध्यात्म की शाँध साधना, तीसरा परिजनों की विशिष्ट सहृदयता, आत्मीयता, ममता का विस्तार ॥ इसी में उन्होंने आगे लिखा - “ रामकृष्ण परमहंस, योगिराज अरविंद, महर्षि रमण की अनुपम साधनाओं ने भारत का भाग्य परिवर्तन करके रख दिया। अगले दिनों भारत को जिसे अभी भाग्य परिवर्तन का निर्माण का अधिकार मात्र मिला है, हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना है
अखण्ड ज्योति मार्च 1969..के सम्पादकीय में ‘हमारे पाँच पिछले एवं पाँच अगले कदम’ शीर्षक से परम पू. गुरुदेव ने लिखा “ अब हम मथुरा स्थायी रूप से छोड़कर जा रहे हैं। माताजी हमारी धर्मपत्नी भगवती देवी शर्मा, हिमालय और गंगातट पर एक ऐसे स्थान पर रहेंगी, जहाँ लोग उनसे संपर्क रख सकें और हमारा संपर्क भी बना रहें। हरिद्वार ऋषिकेश के बीच गंगा तट पर, जहाँ सात ऋषि तप करते थे, जहाँ गंगा की सात धाराएँ है, उस एकाँत भू-भाग में डेढ़ एकड़ माप की छोटी -सी जमीन प्राप्त की गयी, माताजी वहीं रहेंगी
प. पू. गुरुदेव का यह चिंतन शाँतिकुँज से ही क्रियान्वित होना था। पं.पू. गुरुदेव ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए मार्च 69..की अखण्ड ज्योति में लेखनी से अभिव्यक्ति दी है कि आज धर्म, नीति, सदाचरण आदि की शिक्षा देने वाले ग्रंथ एवं प्रवक्ता तो मौजूद है, पर उस विज्ञान की उपलब्धियाँ हाथ से चली गई, जो इसी शरीर में विद्यमान अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय शक्ति कोषों की क्षमता का उपयोग करके व्यक्ति की, समाज की कठिनाइयों को हल कर सके। पातंजलि योग दर्शन, मंत्र महार्णव, कुलार्णव तंत्र आदि शक्ति विज्ञान के ग्रंथ तो कई है लेकिन उसमें वर्णित सिद्धियों को जो प्रत्यक्ष कर दिखा सके ऐसी मिश्रित साधना नहीं के बराबर दिखायी देती है। यदि इन लुप्त विद्याओं को खोज निकाला जाय तो भौतिक विज्ञान को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान की महत्ता प्रतिस्थापित की जा सकेगी और लोकमानस के प्रवाह को उस स्थिति की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं
तभी तो पू. गुरुदेव उनके बारे में कहा करते थे-” माताजी आदि से अन्त तक माताजी ही हैं। मई 1971 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने लिखा- “यों वे रिश्ते में हमारी धर्मपत्नी लगती हैं, पर वस्तुतः वे अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं। उनमें मातृत्व की इतनी उदारता गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सकें” और सचमुच यह स्नेह उन्होंने अपनी अन्तिम साँस तक दिया भी। बीमारी के दिनों में तो यह शायद पहले से भी कहीं अधिक बढ़ गया था
इस महान साधना के दिनों में एक और महान प्रयोग सम्पन्न हुआ- विश्व कुण्डलिनी का जागरण- यह जागरण पुरातन काल में विश्वामित्र के द्वारा सम्पन्न हुआ था, उस बार भी विश्व-वसुधा का कायाकल्प हुआ था इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है। इसके प्रभाव और परिणामों को बताते हुए उन्होंने जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में लिखा-महाप्रज्ञा की जो इन तीन वर्षों में कुण्डलिनी जाग्रत हुई है, उसकी ऊर्जा का उदय प्रथम इस देश में होगा। पीछे क्रमशः वह समस्त विश्व में फैलता जाएगा। उसके प्रभाव से होता हुआ परिवर्तन विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होगा
बसन्त पर्व 1988 के अखण्ड ज्योति विशेषांक में ‘ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं’ शीर्षक से एक लेख में उनने लिखा-”सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते हैं। इस महाप्रयाण का समय अब दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले अनिवार्य कामों को जल्दी -जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जाएगा
इन सत्रह वर्षों में लगातार प्रयोग-परीक्षणों का क्रम अबाध गति से चलता रहा है। समय- समय पर इसके निष्कर्षों को अखण्ड ज्योति में प्रकाशित भी किया जाता रहा है। अब जिज्ञासुओं, मनीषियों, परिजनों, विज्ञानविदों के आग्रह को ध्यान में रखते हुए शोध पत्रों, रिसर्च बुलेटिन प्रकाशित करने का सिलसिला भी शुरू किया जाने वाला है। अभी इन पंक्तियों में विगत वर्षों के परिणामों को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि ब्रह्मवर्चस का शोध अनुसंधान अगले दिनों समस्त मानव समाज को वर्तमान बुद्धिवाद के कुचक्र से निकालने में सहायक ही नहीं समर्थ भी सिद्ध होगा
शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा, पर क्षणभर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक का ज्वलन्त ज्योति में समा जाएँगे जिसके आधार पर अखण्ड ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म-चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे व इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत स्थिति में रहे हैं। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जाएँगी और उसे तेल बाती की प्रथक सत्ताओं की एक लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा, यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा
दस मिनट बाद ही परम वन्दनीया माताजी अपने आराध्य से एकाकार हो गयीं। परम पू. गुरुदेव ने इस स्थिति की चर्चा करते हुए जनवरी 1988 की अखण्ड ज्योति में-’जोति फिर भी बुझेगी नहीं’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है-”प्रकृति के नियम बदले नहीं जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्द्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते
सूक्ष्मीकरण की साधना के बाद उनका यहाँ आना तो नहीं हुआ पर वहीं अपने निवास पर गोष्ठी, चर्चा परामर्श द्वारा क्रिया -कलापों को संचालित करते रहते थे। उनके महाप्रयाण के बाद यह दायित्व अखण्ड ज्योति के सम्पादक के कन्धों पर आ पड़ा है। जिसे उनके सान्निध्य में ब्रह्मवर्चस की स्थापना के समय से ही रहने, प्रशिक्षण पाने का सुयोग प्राप्त हुआ है। आज इस स्थापना को 17 वर्ष पूरे हो चुके हैं
वैसे तो वं. माताजी की पं. पूज्य गुरुदेव के साथ नवनिर्माण के इस अभिनव आँदोलन में भागीदारी तब से ही आरम्भ हो गई थी, जब वे अखण्ड ज्योति संस्थान के पुराने भवन में पं. पूज्य गुरुदेव के साथ परिणय के बाद एक सूत्र में बंधकर कटिबद्ध हो गयी थी। आये हुए हर परिजन को भोजन कराने से लेकर घर की आर्थिक व्यवस्था तथा पत्रिका एवं पुस्तकों के प्रकाशन तथा आये हुए हर पत्र का जवाब देने में उनका सक्रिय योगदान प्रारम्भ से ही रहा। 1926 में जन्मी वंदनीया माताजी के कंधों पर बहुत ही कम उम्र में, एक बहुत ही बड़ी जिम्मेदारी आ गयी थी
अंतिम बार हम सब एक बार और मिल लें ‘ शीर्षक से मार्च 1971 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित सम्पादकीय में प. पूज्य गुरुदेव ने लिखा- “हमारे जाने के दिन अति निकट आ गये है। अति महत्वपूर्ण कार्य पूरा करने के लिए हमें जाना पड़ रहा है। ’ परम पूज्य गुरुदेव जैसी सत्ता, जिसके लिये मथुरा रहकर भी वह सब कुछ कर पाना सम्भव था जो उनने हरिद्वार में किया, तथापि यदि यह सत्य है कि आत्मविद्या की शून्यता और दिग्भ्रान्तिओं के उपचार निवारण हेतु एवं ब्रह्मवर्चस सम्पन्न व्यक्तियों को उभारने के लिए उन्हें जीवन के अंतिम चरण में तप,पूत वातावरण की आवश्यकता पड़ेगी और इसी कारणवश वे स्थान परिवर्तन करने जा रहे थे, तो शाँतिकुँज की स्थापना का मूल मर्म समझ में आ जाता है
यद्यपि परम पू. गुरुदेव अखण्ड ज्योति के माध्यम से इस तरह के प्रयास प्रारम्भ से ही कर रहे थे। सन् 1965 में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर विशेष लेखमालाएँ भी प्रकाशित हुई। पर 1971 हिमालय यात्रा के समय तक उनके चिन्तन में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि एकाकी लेख प्रकाशन इसके लिए पर्याप्त नहीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
उसमें घर-परिवार कैसे बनने चाहिए, कुटुम्ब-समाज कैसे बनने चाहिए, यह बताया गया था। गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार, अखण्ड ज्योति परिवार जैसे शब्द हमें बहुत प्यारे लगते हैं। बेटे, यह हमारा परिवार है जिसमें स्वर्ग का अवतरण होने वाला है। स्वर्ग का अवतरण सबसे पहले कहाँ होगा ? परिवार में होगा, फिर वहाँ से व्यक्तियों में फैलेगा और समाज में फैलेगा
जनवरी 1969 में छपे लेखों से आरम्भ किया यह क्रम विगत दो माह से जारी है। अब मार्च महा में भी फरवरी 69 की अखण्ड ज्योति के इसी शीर्षक के भाव से लिखे गए लेख के अंश पुनः प्रस्तुत हैं
परिजनों में से या प्रोफेशनल अनुवादकों में से जो पाठकगणों के परिचित ऐसे सज्जन हैं जो भावानुवाद कर सकें तुरंत उनके नाम-पते टेलीफोन या फैक्स नंबर शांतिकुंज हरिद्वार के पते पर भेज दें। यह प्रकाशन एक वर्ष के अंदर ही अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा द्वारा किया जाएगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
जब आगरा में ‘सैनिक’ समाचार-पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में श्रीकृष्ण दत्त पालीवालजी ने उन्हें अपना सहायक बनाया। बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए सतत् स्वाध्यायरत रहकर उनने अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की बसंत पंचमी पर प्रकाशित किया। प्रयास पहला था, जानकारियाँ कम थी अतः पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत् 1940 की जनवरी से उनने परिजनों के नाम पाती के साथ अपने हाथ से बने काज पर, पैर से चलने वाली मशीन से छापकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का शुभारंभ किया जो पहले तो दो सौ पच्चीस पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु क्रमशः उनके अध्यवसाय घर-घर पहुँचाने, मित्रों तक पहुँचाने वाले उनके हृदयस्पर्शी पत्रों द्वारा बढ़ती-बढ़ती नवयुग के मत्स्यावतार की तरह आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है
उनने भी सूक्ष्म में विलीन हो स्वयं को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योति पुरुष का एक अंग स्वयं को बना लिया। आज दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु नूतन सृष्टि कैसे ढाली गयी, कैसे मानव को गढ़ने का साँचा बनाया गया ? इसे शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान एवं युगतीर्थ आँवलखेड़ा जैसी स्थापनाओं तथा संकल्पित सृजन सेनानी जनों के वीरभद्रों की करोड़ों से अधिक की संख्या के रूप में देखा जा सकता है
बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए सतत् स्वाध्यायरत रहकर उनने अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की बसंत पंचमी पर प्रकाशित किया। प्रयास पहला था, जानकारियाँ कम थी अतः पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत् 1940 की जनवरी से उनने परिजनों के नाम पाती के साथ अपने हाथ से बने काज पर, पैर से चलने वाली मशीन से छापकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का शुभारंभ किया जो पहले तो दो सौ पच्चीस पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु क्रमशः उनके अध्यवसाय घर-घर पहुँचाने, मित्रों तक पहुँचाने वाले उनके हृदयस्पर्शी पत्रों द्वारा बढ़ती-बढ़ती नवयुग के मत्स्यावतार की तरह आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है
वैदिक मन्त्रों की भाँति इसका अवतरण चेतना के उच्चतम स्तर से हुआ है। इस सत्य को उद्घाटित करते हुए स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के शब्द है- ‘अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं से कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक सीमित नहीं हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह, अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना आ समन्वित अथवा उसकी किसी प्रतिनिधि सत्ता का सूत्र संचालन है
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका लोगों के मनों को प्रभावित करती रही, इसमें प्रकाशित ‘गायत्री चर्चा’ स्तम्भ से लोगों को गायत्री व यज्ञमय जीवन जीने का संदेश मिलता रहा, साथ ही एक आना से लेकर छह आना सीरिज की अनेकानेक लोकोपयोगी पुस्तकें छपती चली गयीं। इस बीच हिमालय के बुलावे भी आए, अनुष्ठान भी चलता रहा जो पूरे विधिविधान के साथ 1953 में गायत्री तपोभूमि की स्थापना, 108 कुंडी यज्ञ व उनके द्वारा दी गयी प्रथम दीक्षा के साथ समाप्त हुआ। गायत्री तपोभूमि की स्थापना के निमित्त धन की आवश्यकता पड़ी तो परम वंदनीया माताजी ने जिन्होंने हर कदम पर अपने आराध्य का साथ निभाया, अपने सारे जेवर बेच दिए, पूज्यवर ने जमींदारी के बाँण्ड बेच दिए व जमीन लेकर अस्थायी स्थापना कर दी गयी
युग निर्माण योजना व ‘युग निर्माण सत्संकल्प’ के रूप में मिशन का घोषणापत्र 1963 में प्रकाशित हुआ। तपोभूमि एक विश्वविद्यालय का रूप लेती चली गयी तथा अखण्ड ज्योति संस्थान एक तपःपूत की निवासस्थली बन गया। जहाँ रहकर उनने अपनी शेष तप साधना पूरी की थी, जहाँ से गायत्री परिवार का बीज डाला गया था। तपोभूमि में विभिन्न शिविरों का आयोजन किया जाता रहा, पूज्यवर स्वयं छोटे-बड़े सम्मेलनों युवा योजनाओं के द्वारा विचार-क्रान्ति की पृष्ठभूमि बनाते रहे पूरे देश में 1970-71 में पाँच 1008 कुण्डी यज्ञ आयोजित कर स्थायी रूप से विदाई लेते हुए एक विराट सम्मेलन (जून 1971) में परिजनों को विशेष कार्यभार सौंप परम वंदनीया माताजी को शांतिकुंज हरिद्वार में अखण्ड दीप के समक्ष तप हेतु छोड़कर स्वयं हिमालय चले गए
अपनी अनुभूति पर आधारित होने पर भी उनके चिन्तन में पूर्व एवं पश्चिम अनायास समा गये हैं। सहस्राधिक पुस्तकों एवं अखण्ड ज्योति के लक्षाधिक पृष्ठों में लहराते उनके सम्बोधि सागर में कहीं निषेध का भाव नहीं है। आचार्य जी पहले महायोगी हैं फिर विचारक एवं लोक-नायक। उनके विचार योग के गहन आयामों में प्रत्यक्ष सत्य, सूक्ष्म से स्थूल में घटित होने वाले भविष्य की अनुभूति का बौद्धिक विश्लेषण हैं
इस यज्ञ के पश्चात् वे सूक्ष्मीकरण की स्थिति में चली गई। अगस्त 1994 की पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ में उनने अपनी अंतर्वेदना व्यक्त कीं एवं 19 सितम्बर, 1994 (भाद्रपद पूर्णिमा-महालय श्राद्धारम्भ) की मध्याह्न बेला में महाप्रयाण के पश्चात् वे अपने आराध्य के बगल में जा विराजीं। श्रद्धेय पं0 लीलापति जी सहित शान्तिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के द्वारा उनके देहावशेष ‘सजल श्रद्धा’ में स्थापित कर दिये गये। दोनों ही स्मृति चिन्ह अभी भी वहाँ उसी रूप में विद्यमान है
चार बार कुछ दिन से लेकर एक साल तक ही अवधि तक हिमालय आकर रहने, कठोर तप करने का भी उनने संदेश दिया एवं उन्हें तीन संदेश दिए- (1) गायत्री महाशक्ति के चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण जिन्हें आहार के कठोर तय के साथ पूरा करना था। (2) अखण्ड घृतदीप की स्थापना एवं जन-जन तक उसका प्रकाश फैलाने के लिए समय आने पर ज्ञान यज्ञ अभियान चलाना, जो बाद में अखण्ड ज्योति पत्रिका के 1938 के प्रथम प्रकाशन से लेकर विचार क्रान्ति अभियान के विश्वव्यापी होने के रूप में प्रकटा तथा (3) चौबीस महापुरश्चरण के दौरान युगधर्म का निर्वाह करते हुए राष्ट्र के निमित्त भी स्वयं को खपाना, हिमालय यात्रा भी करना तथा उनके संपर्क से आगे का मार्गदर्शन लेना
पिछले दिनों अनेकानेक नये परिजन गायत्री परिवार के- अखण्ड ज्योति परिवार के अंग- अवयव बने हैं। प्रज्ञा अभियान- युग निर्माण योजना - गायत्री परिवार तीनों एक ही मिशन को प्रतिध्वनित करने वाले नाम हैं, जो समय-समय पर इस संस्थान के लिए प्रयुक्त होते रहे हैं। परमपूज्य गुरुदेव- परम वंदनीया माताजी एवं विशिष्ट उद्देश्यों को लेकर चला यह मिशन परस्पर गुँथे हुए हैं
2400 तीर्थों के जल व रज की स्थापना वहाँ की गयी, 2400 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन वहाँ स्थापित हुआ, अखण्ड अग्नि हिमालय के अति पवित्र स्थान से लाकर स्थापित की गयी जो अभी तक वहाँ यज्ञशाला में जल रही है। 1941 से 1971 तक समय परमपूज्य गुरुदेव का गायत्री तपोभूमि - अखण्ड ज्योति संस्थान में सक्रिय रहने का समय है। 1956 में नरमेध यज्ञ, 1958 में सहस्रकुंडी यज्ञ करके लाखों गायत्री साधकों को एकत्र कर उनने गायत्री परिवार का बीजारोपण कर दिया। कार्तिक पूर्णिमा 1958 में आयोजित इस कार्यक्रम में दस लाख व्यक्तियों ने भाग लिया, इन्हीं के माध्यम से देश भर में प्रगतिशील गायत्री परिवार की दस हजार से अधिक शाखाएँ स्थापित हो गयी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
इसी सोच को आधार मानकर शान्तिकुँज के संचालन तन्त्र ने भावी युग के लोकनायकों के चयन एवं निर्माण के लिए व्यापक एवं प्रभावी योजना तैयार की है। पिछली अखण्ड ज्योति एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के पृष्ठों में परिजनों ने इस सम्बन्ध में पढ़ा भी होगा। शान्तिकुँज के दिव्य वातावरण में चलायी जाने वाली यह शिक्षण योजना अपनी बौद्धिक एवं भावनात्मक विशेषताओं के सँजोये रहने पर भी मूलतः तप प्रधान होगी। स्वयं के चरित्र-चिन्तन और व्यवहार को प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा सोना साबित करने वाले ये लोग ही भविष्य में समाज एवं शासन की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उठाने में समर्थ होंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
(4) समयदान की दृष्टि से अपील करते-करते हम अखण्ड ज्योति के कई पन्ने रंग चुके हैं। हमें सभी वर्ग के व्यक्तियों का सुनिश्चित निर्धारित समयदान चाहिए। शाँतिकुँज का संगठन प्रकोष्ठ अब समयदानियों का जो कम समय के लिए हैं (3 या 6 माह के लिए) यदि वे प्रशिक्षण ले चुके हैं तो स्थानीय स्तर पर उपयोग करना चाहता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
स्त्रियों के लिए मासिक-पत्रिकाओं में शाँति, ‘दादी’ ‘मनोरमा’, ‘कला’, ‘भारती’, ‘सरस्वती’ कोई भी चुनी जा सकती है। उच्च मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित पत्रिकाओं में ‘अखण्ड ज्योति’ कल्याण, कल्प वृक्ष, ‘शाँति संदेश, ‘आरोग्य’ इत्यादि पत्र मँगाने चाहिए। एक दैनिक पत्र ‘हिन्दुस्तान’ या ‘वीर अर्जुन’ इत्यादि मँगवाया जा सकता है। परिवार में एक छोटा सा घरेलू पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए जिसमें मानव-जीवन को ऊँचा उठाने वाले सद्ग्रन्थों का चुनाव रहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
मानव जीवन की जितनी भी गुत्थियाँ उलझी पड़ी हैं, उन सब को गायत्री रूपी सद्बुद्धि, सात्विकता एवं सत्प्रवृत्ति को अपनाने से सुलझाया जा सकता है। इसी विश्वास के आधार पर अखण्ड ज्योति द्वारा गायत्री का महान् ज्ञान यज्ञ आरम्भ किया गया है। अन्य अनेक विचार वान व्यक्तियों की भाँति मेरा भी यही विश्वास है कि गायत्री के अध्यात्मिक तत्व-ज्ञान का प्रसार करके मानवता की महत्व पूर्ण सेवा की जा सकती है और मानव जीवन की सभी उलझनों को सुलझाया जा सकता है
अखण्ड ज्योति ने जो गायत्री साहित्य छापा है, उससे एक अच्छा गायत्री पुस्तकालय बन सकता है। बीस रुपये से भी कम की लागत में ब्रह्म विद्या का एक महत्व पूर्ण भंडार जमा कर लेना किसी भी गायत्री प्रेमी के लिए कठिन नहीं हो सकता। कई साधक मिल कर भी एक पुस्तकालय स्थापित कर सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
सिद्ध पीठ का भूमिगत महत्व और आचार्य जी का अनुभवपूर्ण पथप्रदर्शन इन दो कारणों से अनेक साधक मथुरा रहकर अपनी साधना करना चाहते हैं पर ऐसी सुविधा प्राप्त करने से बहुधा साधकों को वंचित ही रहना पड़ता। कारण यह है कि अखण्ड ज्योति का प्रेस, दफ्तर एवं आचार्य जी का परिवार जिस छोटे से भाड़े के मकान में रहता है उसमें इतनी गुँजाइश नहीं है कि साधकों का भी रहना उसमें हो सके धर्मशालाओं की भीड़ और तीन दिन से अधिक न ठहरने का प्रतिबंध साधकों के लिए सुविधाजनक नहीं होता। बाहर से पहुँचने वाला व्यक्ति भोजन व्यय तो स्वयं कर सकता है पर साधना काल में ठहरने की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकता। निराश होकर उसे लौटना पड़ता है
जैसा कुछ बन पड़ा यह अंक पाठकों के सामने है। गायत्री जयन्ती पर यह विनम्र श्रद्धाँजलि अखण्ड ज्योति परिवार की ओर से भेंट करते हुए इतना ही संतोष है कि प्रयत्न से गायत्री महा तत्व की अधिक जानकारी बढ़ेगी और माता का आश्रय लेकर अनेकों व्यक्तियों को जीवन सफल करने का अवसर मिलेगा। हमारी आन्तरिक इच्छा है कि गायत्री का अधिकाधिक प्रचार हो, इस प्रयत्न में सहयोग देकर ज्ञान यज्ञ के भागीदार बनने की पाठकों से हमारी आग्रह पूर्वक प्रार्थना है
अनेक सूत्रों से मुझे एक ही उपाय दृष्टिगोचर हुआ -गायत्री उपासना। अखण्ड ज्योति के प्रकाश में मुझे वह मार्ग भी दिखाई दिया जिस पर चलकर पिता से उस दस गुनी ममता रखने वाली माता की आनन्दमयी गोद प्राप्त हो सकती है
वर्तमान काल में तीर्थ स्वरूप शरीर धारण किये हुए अनेक महात्मा, जिनमें से कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात स्थानों में तप कर रहे हैं, गायत्री की अनन्य श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं महात्मा गान्धी, महामना मालवीय, कवीन्द्र रवीन्द्र टी.सुवाराव, सर राधाकृष्णन, जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी शिवानन्द आदि महापुरुषों ने गायत्री की महानता के संबंध में अपने जो उद्गार प्रकट किये हैं वह बहुत ही विचार पूर्ण और मनन योग्य हैं। अखण्ड ज्योति संचालक आचार्य द्वारा गायत्री का जो असाधारण प्रकाश हुआ वह तो आश्चर्यजनक है
तलाश आरम्भ की। इसी खोज के सिलसिले में अखण्ड ज्योति से प्रकाशित एक छोटी पुस्तक मृत्यु से पीछे क्या होता है, इस सम्बन्ध की मिली। उससे नई बातें ज्ञात हुई। कई शंकाएं हुईं
यह निर्विकार सत्य है कि जहाँ चाह है वहाँ राह भी है। कुछ ही समय के बाद देवी की कृपा से ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका हाथ लग गई और उसमें गायत्री महा विज्ञान सम्बन्धी पुस्तकें प्रकाशित हो जाने की सूचना मिलने पर मैंने उन पुस्तकों को मँगवा कर मनन और चिन्तन द्वारा अध्ययन किया। इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होने पर मेरे भावों में काफी जाग्रति का प्रसार होने लगा। दृढ़ता के साथ नियमित उपासना करना तभी से प्रारम्भ कर दिया
ऐसी घटनाएं एक दो नहीं अनेकों हैं जिनको कन्याएं ही कन्याएं होती हैं या कोई सन्तान नहीं हैं उन्हें मनोवांछित सन्तान मिलने की अनेक घटनाएं अखण्ड ज्योति सम्पादक को मालूम हैं। पूर्व काल में पुत्रेष्टि यज्ञ गायत्री मंत्र से ही होते थे। राजा दशरथ ने जो पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था
मथुरा, गायत्री केन्द्र तीर्थ अति प्राचीन काल से रही है। उसे अखण्ड ज्योति द्वारा भी आलोकित किया जा रहा है। ऐसी पुण्य भूमि में केन्द्रीय गायत्री तीर्थ स्वभावतः ही उपयुक्त हो सकता है। परन्तु खेद है कि किसी समर्थ व्यक्ति का ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया है
‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रज्वलित की गई गायत्री आन्दोलन की मशाल, वर्तमान विश्वव्यापी अशान्ति के विरुद्ध एक दैवी चुनौती है। यह प्रचण्ड शक्तिशाली मानसिक क्रान्ति की एक महान् योजना है। मुझे भारत के भाग्याकाश में उज्ज्वल ऊषा की तरह यह प्रकाश रेखा चमकती दिखाई दे रही है
अब से कोई 10 वर्ष पहले तक मैं गायत्री-साधना के विषय में नितान्त अनभिज्ञ था। परन्तु अखण्ड ज्योति में प्रकाशित गायत्री सम्बन्धी लेखों को पढ़कर हृदय में आकाँक्षा जोर पकड़ती गई कि हमें भी गायत्री-साधना अवश्य करनी चाहिए। एक ओर बात जिसने हमारी गायत्री-साधना को नियमित तथा सफलीभूत बनाया-इस साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है
इन सभी को लेकर एक छोटा पुस्तकालय बना लिया जाय। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पुस्तकालय में आती रहे और भी पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी कहीं से मिले या भविष्य में अखण्ड ज्योति से छपे तो उन्हें भी समय-समय पर इस पुस्तकालय में बढ़ाते रहा जाय
अखण्ड ज्योति द्वारा गायत्री प्रचार का जो आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसमें मुझे सर्वोत्कृष्ट लाभ यह पड़ दिखाई पड़ता है कि ईश्वर की, नारी (गायत्री) के रूप में आराधना करने के स्त्री जाति के प्रति पवित्रता, आदर और श्रद्धा की भावना का जन समाज में विकास होगा। गायत्री उपासनाओं में कुमारी कन्याओं की पूजा होती है। ध्यान और पूजन में अमित सौंदर्य की प्रति मूर्ति गायत्री के प्रति मातृभावना स्थापित करनी पड़ती है
अपनी साधना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए स्वयं स्वाध्याय करना और दूसरों को परमार्थ पथ पर लगाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना यह दोनों ही कार्य पूरे हो सके इसके लिए अपने साधक बन्धुओं के सामने मैं एक कार्यक्रम उपस्थित करता हूँ, वह यह कि हममें से हर एक के घर में छोटा ‘गायत्री पुस्तकालय’ हो। अखण्ड ज्योति ने अब तक 12 पुस्तकें छापी हैं। इन सभी को लेकर एक छोटा पुस्तकालय बना लिया जाय। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पुस्तकालय में आती रहे और भी पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी कहीं से मिले या भविष्य में अखण्ड ज्योति से छपे तो उन्हें भी समय-समय पर इस पुस्तकालय में बढ़ाते रहा जाय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
पता-”अखण्ड ज्योति” प्रेस-मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
पता-”अखण्ड ज्योति “ प्रेस, मथुरा
ऐसा विचार किया गया है कि गायत्री जयंती ज्येष्ठ सुदी 10 गंगा दशहरा के उपलक्ष में प्रति वर्ष अखण्ड ज्योति का एक गायत्री अंक निकाला जाया करे। जिसमें उपासकों के अनुभवों का निचोड़ रहा करे। साधक एक दूसरे के अनुभवों साधन विधानों, विचारों, सलाहों से लाभ लेकर अपने मार्ग को बहुत कुछ सरल कर सकते हैं, भूलों को जान सकते हैं तथा इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली अपनी अनेक शंकाओं का समाधान कर सकते हैं
-व्यवस्थापक-’अखण्ड ज्योति’ मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
पता - “अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा
व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
परन्तु यह एक आश्चर्य ही है कि गायत्री की विधिपूर्वक व्यवस्थित साधना करने वाले साधकों में कोई विरले ही ऐसे होंगे जो यह अनुभव करते हों कि कोई दिव्य शक्ति उनके साथ नहीं चल रही है एवं कोई दिव्य ज्योति उनके भीतर नहीं जल रही है। गत जुलाई मास के गायत्री अंक में कुछ ऐसे अनुभव अखण्ड ज्योति में छपे थे। इन नवरात्रियों में तो ऐसे चमत्कारी अनुभव अत्यन्त विशाल परिणाम में हुए हैं। उनमें से जो छापने योग्य समझे जायेंगे सन् 52 की जुलाई के गायत्री अंक में छपेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
पता - “अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
जो समाचार पत्र के स्वामी हो तथा जो समस्व पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक क साझेदार या हिस्सेदार हो। - अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
अब एक स्थान पर यह दोनों पत्रिकाएँ मँगायी जायें और अंखड ज्योति का चन्दा 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये होगा ऐसा समझा जाय। याँ हिसाब की दृष्टि से दोनों अलग-अलग ही रहेगी और अखण्ड ज्योति का चंदा “अखण्डज्योति” के पुराने पते पर, युग निर्माण योजना का चन्दा “गायत्री तपोभूमि संस्थान” के पते पर अलग-अलग भेजना पडेगा। तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है
साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रुपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे। परिजनों के आर्थिक दबाब को ध्यान में रखकर मासिक नयी प्रकाशित होने वाली पत्रिका “युग निर्माण योजना” को भी बन्द किया जा रहा है। उसकी आवश्यकता को भी पाक्षिक द्वारा पूरा किया जायेगा
प्रगति पथ पर दूसरा कदम पाक्षिक युग निर्माण योजना मंगाने का उठाना चाहिए। मिशन के बौद्धिक प्रतिपाद “अखण्ड ज्योति” में छपते हैं। उनके क्रियान्ययन का मार्गदर्शन इस पाक्षिक में छपा करेगा। इस प्रकार ज्ञान और कर्म का समन्वय एक बड़े अभाव की पूर्ति करेगा
तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है। साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रुपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
अखण्ड ज्योति परिवार में ऐसी अगणित प्रतिभाएँ मौजूद है जो टोली बनाकर अपने क्षेत्र में निकल पडे़ तो हजारी किसान द्वारा लगाये गये हजार उद्यानों की आदर्शवादिता के नये उदाहरण प्रसतुत कर सकती है। तीन हजार या पाँच हजार के धर्म संस्थान बनाना किसी भी गाँव के लिए भारी नहीं हो सकते, शर्त यही है कि भाव उत्तेजना के निमित्त प्रामाणिक प्रतिभाएँ आगे आये। इन दिनों मिशन की पत्रिकाओं के चार लाख के लगभग सदस्य है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
अखण्ड ज्योति परिजनों को प्रतिपादन, परामर्श की तरह ही यदि तदनुरुप वातावरण भी मिल सका होता तो निश्चित रुप से वे वहाँ नहीं होते जहाँ गतिरोध उन्हें रोके खड़ा है। चिन्तन में उत्कृष्टता का महत्व कम नहीं पर तथ्य यह भी है कि यदि किसी को असामान्य बनना या बनाना हो तो त्दनुरुप वातावरण उपलब्ध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसी अभाव की यह दुखद परिणित है कि परिजन सामान्य स्तर के बने और सामान्य स्थिति में पडे हुए हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-May
डाक विभाग की अनियमित वितरण व्यवस्था के कारण गत कई उपासों से अखण्ड ज्योति अत्यधिक विलम्ब से पहुँच रही है। अप्रैल की पत्रिका 2-3 अप्रैल को डाक घर से रवाना कर दी गई थी फिर भी अनेक स्थानों पर अप्रैल के अन्त तक नहीं पहुँची। बहुत-सी मार्ग में भी खो गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
इस प्रयोजन के लिए छपी हुई रसीद बहियाँ मँगा लेनी चाहिए। गतवर्ष की अपेक्षा इस वर्ष अपने क्षेत्र में अधिक अखण्ड ज्योति के सदस्य हों इसके लिए प्रत्येक परिजन को शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए
युग-निर्माण के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि इस साहित्य को अधिकाधिक व्यापक बनाने के लिये प्राणपण से प्रयत्न करे। जिनके पास अखण्ड ज्योति युग -निर्माण पत्रिकायें पहुँचती हैं उनका कर्तव्य है कि कम से कम दस व्यक्ति एक प्रति को पढ़ें और अधिकाधिक नये ग्राहक बनाये। इसके लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहा जाय परिवार कि सदस्यता की फीस दस पैसा और एक घण्टा समय नित्य देना है। यह दोनों ही अनुदान अपने घर में ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय की स्थापना के लिये नियमित रूप से धन कि व्यवस्था रखने तथा नित्य जन संपर्क स्थापित करके उस साहित्य को पढ़ाने सुनाने के लिये ही है
परिचित क्षेत्र को प्रभावित कर सकना, मोड़-मरोड़ सकना, अपरिचितों की अपेक्षा अधिक सरल होता है। अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन यदि चाहें तो उनके लिए यह कुछ भी कठिन नहीं कि अपने क्षेत्र के विभूतिवानों से संपर्क स्थापित करें और उन्हें यह बतायें कि इस युग का एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण अभियान किस प्रकार मानव जाति का भविष्य निर्माण करने के लिए सचेष्ट है और उसके साथ कदम मिलाकर चलना ही उनके लिए श्रेयस्कर है
युग की यह माँग है और उसे पूरा करना ही पड़ेगा। पिछले दिनों अखण्ड ज्योति पत्रिका के माध्यम से विज्ञान और अध्यात्म का संबंध समन्वय प्रतिपादन किया भी जाता रहा है अब उसे और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष करना पड़ेगा
इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति के अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। नये वर्ष का चंदा यथासंभव जल्दी ही, हो सके तो दिसम्बर में ही भेजना चाहिए ताकि जनवरी का अंक उतनी ही संख्या में छपाया जाये जितने कि पत्रिका के स्थायी ग्राहक हों
वी पी से अखण्ड ज्योति मँगाने में लगभग सवा रुपया अतिरिक्त डाकखर्च मंगाने वाले पर पड़ता है जो बिल्कुल निरर्थक है। चंदा जहाँ तक सम्भव हो पोस्टल आर्डर से ही भेजना चाहिए। अधिक ग्राहकों का चन्दा एक साथ भेजना हो तो बैंक ड्राफ्ट से भेजना जहाँ काफी सस्ता पड़ता है, वहाँ जल्दी पहुंचने के कारण पत्रिकाएं भी तुरन्त चालू हो जाती हैं,
हममें से हर एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि अखण्ड ज्योति गुरुदेव की वाणी है। अपनों से अपनी बात स्तम्भ के अतिरिक्त प्रायः सभी लेख उनकी लेखनी के रहते हैं। इस विचारधारा को स्वयं भावना पूर्वक हृदयंगम करना और अपने परिचय क्षेत्र में उसका प्रकाश अधिकाधिक व्यापक बनाना हममें से प्रत्येक का परम, पवित्र कर्तव्य है
उसे हम सब भाव भरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। उस अवसर पर सर्वोत्तम श्रद्धाँजली अखण्ड ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने के रूप में ही विश्वयात्रा का प्रथम चरण करके वापस लौटेंगे। इस बीच में हमें अपनी सक्रियता का एक प्रमाण इस रूप में विनिर्मित कर लेना चाहिए कि किसने उनकी वाणी अखण्ड ज्योति को अधिक व्यापक बनाने के लिए क्या प्रयत्न पुरुषार्थ किया। इस प्रयास के लिए टोली बनाकर निकलना अधिक सफल और कारगर तरीका है
उस अवसर पर सर्वोत्तम श्रद्धाँजली अखण्ड ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने के रूप में ही विश्वयात्रा का प्रथम चरण करके वापस लौटेंगे। इस बीच में हमें अपनी सक्रियता का एक प्रमाण इस रूप में विनिर्मित कर लेना चाहिए कि किसने उनकी वाणी अखण्ड ज्योति को अधिक व्यापक बनाने के लिए क्या प्रयत्न पुरुषार्थ किया। इस प्रयास के लिए टोली बनाकर निकलना अधिक सफल और कारगर तरीका है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
दस वर्ष पूर्व के एक वर्ष वाले अज्ञातवास का प्रायः सारा विवरण अखण्ड ज्योति में छपा था। वहाँ कइयों को बुलाया भी था और कइयों को पत्र भी लिखे थे पर अब की बार सब कुछ अप्रकट अविदित रखा गया है। कारण कि अब कि गतिविधियाँ पिछली बार की अपेक्षा अत्यधिक महत्वपूर्ण और अत्यधिक रहस्यपूर्ण हैं समय से पूर्व उनके प्रकट होने में लाभ की अपेक्षा सार्वजनिक हानि ही अधिक समझी गई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड ज्योति का जनवरी अंक उठा कर देखें। पेज नं. 23 में लिखा है-”इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फसाद से भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फसाद से भारत तबाह हो जायेगा यहाँ तक कि हिन्दू बौद्ध और मुसलमानों में बराबर-बराबर विभक्त हो जायेगा” जिन दिनों यह भविष्यवाणी छपी थी वह दिन वरतानी दमन चक्र के दिन थे। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भारत स्वतन्त्र होगा पर प्रो. कीरी का कथन था-”भारतवर्ष का सूर्य ग्रह बलवान है और कुम्भ राशि पर है उसका अभ्युदय संसार की कोई ताकत नहीं रोक सकती” सो सच ही होकर रहा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
परिजनों की व्यक्तिगत, आत्मिक प्रगति, परिवार का शाखा संगठन, शान्तिकुँज की भावी रूपरेखा तथा युग परिवर्तन की विश्वव्यापी प्रक्रिया पर उनने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये। वे सभी नोट कर लिये गये हैं; उन्हें अगले महीने की अखण्ड ज्योति में छाप दिया जायगा। अगला पूरा अंक इसी विवरण का होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
इन दिनों जोर इस पर दिया जा रहा है कि प्रत्यावर्तन अनुदान के गृहीता अपनी पात्रता विकसित करें ताकि उनके लिये जो खर्च किया जाना है वह सार्थक सिद्ध हो सके। इस संदर्भ में जुलाई की अखण्ड ज्योति में कुछ चर्चा की जा चुकी है। स्थूल परीक्षण की दृष्टि से उसमें यह कहा गया है कि उस पथ के पथिकों को ‘युग साधना’ में संलग्न होना चाहिये। अध्यात्म साधनाएं युग के अनुरूप बदलती रही हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
घनिष्ठता उमंगे और आत्मीयता तादात्म्यता तक जा पहुँचे तो समझना चाहिए कि कोई अतिरिक्त −असामान्य बात है। अखण्ड ज्योति की विचार धारा को एक शब्द में युगान्तरीय चेतना की विचार धारा को एक शब्द में युगान्तरीय चेतना कहा जा सकता है। समय प्रवाह के यह सर्वथा प्रतिकूल पड़ती है ऐसी दशा में जिनका रुझान उस दिशाधारा के साथ साथ बहने लगा उनके सम्बन्ध में यही सोचा जा सकता है कि प्रवाह को चीरती हुई उलटी दिशा में चलने जैसी कोई विशेषता यहाँ विद्यमान है। हर अखण्ड−ज्योति परिजन को अपने सम्बन्ध में यह मान्यता बना ही लेनी चाहिए कि वे असामान्य है और यदि सुयोग मिले तो वे निश्चित रूप से असामान्य भूमिका निभा सकने में समर्थ हैं
शिवाजी,नेपोलियन आदि को महानता के पथ पर धकेलने में उनकी माताओं का ही हाथ रहा है। अखण्ड ज्योति की बौद्धिक सामग्री संग्रह करने वाली हलवाई की दुकान से नहीं−उस मेघमाला से तुलना की जानी चाहिए जो जहाँ जाती है वहीं नव जीवन उभारती है
अखण्ड ज्योति अपने प्रिय परिजनों में से प्रत्येक से इन शब्दों में एक ही अनुरोध करने चली है कि वे अपने छोड़ें। उनकी आयु इतनी हो गई है कि अपने पैरों खड़े हो सकते हैं, दीवार पकड़ कर चल सकते हैं और उत्साह दिखाएँ तो बिना किसी कठिनाई के पूरे आँगन में ठुमक–ठुमक कर चलने पर सारे परिवार में हर्ष उत्साह की एक लहर दौड़ा सकते हैं। प्रज्ञापुत्र बड़ी आयु के हैं वे अग्रिम पंक्ति में खड़े और युग प्रहरी की− जुझारू योद्धा की भूमिका निभा रहे हैं
चर्चा प्रज्ञा पुत्रों और प्रज्ञा परिजनों की ही रही थी। अखण्ड ज्योति के सदस्यों में से ऐतिहासिक सन्धि बेला में मूक दर्शक किसी को भी नहीं होना चाहिए। किसी को भी ऐसी आत्म प्रताड़ना ही सहनी चाहिए कि कभी−कभी ही आने वाले सौभाग्य सुयोगों में से एक अपने जीवन में आया था। उनमें जीवन्तों जागृतों में रहने या योग्य भूमिका निभाई थी किन्तु हम विवशता व्यक्त करते, कठिनाइयों की आड़ लेते और परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना रोते रहे
कुछ ही सौंपे उसके लिए मुँह खोलती हैं, कुछ ही केले कपूर पाने और कुछ बाँस बंसलोचन उगाने का सौभाग्य लाभ लेते हैं। अखण्ड ज्योति की युगान्तरीय चेतना के साथ जो क्रमशः तादात्म्य स्थापित करते आये हैं, उन्हें अखण्ड ज्योति परिजन कहा जाता रहा है। अब ‘प्रज्ञा परिजन’ का जाएगा
सभी बालक महान बने। अखण्ड ज्योति का प्रयास भी मदालसा जैसा ही रहा है। माता मूर्ति ने नर−नारायण को—कुन्ती ने अपने लाड़लों को जो ज्ञान दिया, उसी प्रवाह को युगान्तरीय चेतना के अंतर्गत भी बहाया गया है। भर्तृहरि शिष्य गोपीचन्द को ब्रह्मज्ञानी उनकी माता ने ही बनाया था
प्रसंग दूसरी पंक्ति दूसरी का चल रहा है। उनकी अखण्ड ज्योति पठन, अवगाहन, बुद्धि विलास तक सीमित न रहना चाहिए। उसे धुने बीज की तरह निरर्थक निष्क्रिय सिद्ध नहीं होने देना चाहिए वरन् वर्षा ऋतु आने पर जीवन्त बीज को अंकुरित होने की तरह अधिग्रहण को गतिशील बनने देना चाहिए। इस समुदाय के लिए सप्त सूत्री योजना निर्धारित की गई है
हनुमान की उपरोक्त गाथा अखण्ड ज्योति के प्रिय परिजनों को इसलिए सुनाई जा रही है कि वे उस प्रसंग के साथ अपना तुलनात्मक अध्ययन करें और देखें कि उनकी जीवनचर्या में क्या किसी बड़े सौभाग्योदय की सम्भावना है? अब तक महान सम्भावना के बीच यदि प्रत्यावर्तन सम्भव हो सके तो समझना चाहिए वैसा सुयोग अपने पल्ले भी बँधा था जैसा कि महावीर को उपलब्ध हुआ
युग सन्धि की बेला में महाकाल की गलाई और ढलाई वाला कारखाना क्रमशः अधिक गरम होता और अधिक गतिशील बनता जा रहा है। इस प्रसंग में अखण्ड ज्योति की छत्र छाया में एकत्रित हुए समुदाय की उस परिवर्तन प्रवाह में अग्रदूतों की भूमिका निभानी होगी। प्रभातकाल की किरणें सर्वप्रथम पर्वत के उच्च शिखरों पर ही दीख पड़ती है। दूध गरम करने पर मलाई तैर कर ऊपर आती है
प्रज्ञा परिजनों को प्रज्ञा युग के अनुरूप अपनी भूमिका में परिवर्तन करना होगा। यही अखण्ड ज्योति और उसके परिकर के मध्य चल रही घनिष्ठ आत्मीयता की वह ऐतिहासिक परिणति। जिसके सम्मुख भावी पीढ़ी अनंतकाल तक भावभरी स्मरण गाथा कहती सुनती और यश गाथा से प्रेरणा ग्रहण करती रहेगी। यह संपर्क सान्निध्य इसी रूप में सार्थक एवं कृतकृत्य होने जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
जहाँ विज्ञान और दर्शन को अध्यात्म की धुरी के साथ दो पहियों की तरह जोड़ने और प्रगति-रथ को लक्ष्य की दिशा में दौड़ाने में प्रयत्न चला है, वहाँ इस प्रयास में भी कोताही नहीं की गई तो धर्मतत्त्व को तर्क के आधार पर जन-जन के गले उतारने योग्य बनाया जाए। इस संदर्भ में अखण्ड ज्योति का तथा उसकी सहयोगी अन्य पत्रिकाओं का लेखन सामने है। आर्ष साहित्य से लेकर प्रचुर परिमाण में छोटा-बड़ा साहित्य लिखा और छपा है। इसकी लाखों प्रतियाँ छपती हैं और करोड़ों की संख्या में पढ़ी जाती हैं
नजर अखण्ड ज्योति परिवार पर है, उसमें आस्थावानों की संख्या कम नहीं लगती। मन आता है कि उन्हीं में से कुछ को युगमनीषा की छुट-पुट भूमिका निभाने और रीछ-वानरों के संयुक्त प्रयास से बन पड़े, महान पुरुषार्थ की पुनरावृत्ति का प्रयत्न किया जाए
‘जागृत आत्मा’ से तात्पर्य उन सभी भावनाशीलों से है जो अंतराल की वरिष्ठता उपलब्ध होते ही युगधर्म को समझने और उसके निर्वाह का कष्टसाध्य साहस करने से चूकते नहीं। ऐसे लोग कहाँ हैं, कौन हैं, कब क्या करेंगे? यह ढूँढ़ने की अपेक्षा यही अच्छा है कि अखण्ड ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजन अपने आपको इसी वर्ग में सम्मिलित कर लें और वर्तमान परिस्थितियों में पतन-पराभव से जूझने, उज्ज्वल भविष्य की हरीतिमा का बीजारोपण करने के उभयपक्षीय प्रयत्नों में, जितनी संभव हो उतनी भूमिका निभाने के लिए कमर कस लें
ग्वालबालों से अधिक अयोग्यता किसी की नहीं। टिटहरी का समुद्र सुखाने का संकल्प अगस्त के सहयोग से पूरा हो सका, भागीरथ गंगा को धरती पर उतारने में शिव का समर्थ सहयोग अर्जित कर सके तो कोई कारण नहीं कि अखण्ड ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजन प्रस्तुत युग विभीषिका से जूझने में अपने को अक्षम समझें और कुछ भी न कर सकने की कृपणता व्यक्त करे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
इमारत ठीक वही बनी है, जहाँ गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र का निवास था। नौ कुण्ड की यज्ञशाला में नित्य दो घण्टे यज्ञ, पचपन साल से निरन्तर जल रही अखण्ड ज्योति, नित्य का चौबीस लाख सामूहिक जप पुरश्चरण, जड़ी-बूटी उद्यान जैसी विशेषताएँ चर्म चक्षुओं से देखी जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त वैसा भी बहुत कुछ है जिसे मात्र ज्ञान चक्षुओं से ही देखा जा सकता है। हिमालय की दिव्य सत्ता का संरक्षण वशिष्ठ अरुन्धती का सान्निध्य, अनुभव पूर्व मार्ग दर्शन तथा प्राणवान अनुदान जैसी ऐसी सुविधाएँ जो अन्यत्र मिल सकना कठिन है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
अखण्ड ज्योति परिजनों में देवमानवों की एक बड़ी संख्या है। उन्हें ही सर्वप्रथम बुलाया गया है। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बच्चे बलि चढ़ा दिए तो दूसरों की मनुहार नहीं करनी पड़ी
पता - अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
हमारे प्रत्यक्ष जीवन का पुरुषार्थ पक्ष पूरा होकर उसका वह पक्ष आरंभ होता है, जिसे अति सूक्ष्म कहा जा सके। “अखण्ड ज्योति” के लिये हमने भावी 14 वर्षों के लिये काफी कुछ लिखकर रख दिया है अथवा ऐसी व्यवस्था बनादी है कि हमारा चिन्तन निरन्तर जनमानस को झकझोरता रहे, चाहे लेखनी किन्हीं भी हाथों में हो। पाठकों को सामयिक मार्ग दर्शन भी समय-समय पर हमारी अनुपस्थिति में मिलता रहेगा। अब साधना क्षेत्र का वह पक्ष आरंभ होता है जिसे युग के अनुरूप एक उपलब्धि माना जा सके और असंख्यों अध्यात्मवादी उच्चस्तरीय लाभ उठा सकें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
तद्नुसार अधिकाँश पत्र-पत्रिकाओं ने उनके मूल्य बढ़ा दिये हैं। पर अखण्ड ज्योति इन वर्षों में यही प्रतीक्षा करती रही कि यदि लागत में थोड़ा घाटा आता है तो भी उसे सहकर मूल्य यथावत् बनाये रहा जाय। इसी प्रतीक्षा काल में प्रायः एक लाख का घाटा हो गया। बाहर की यह राशि अभी चुकाना शेष है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
गतमास की अखण्ड ज्योति में वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के करने योग्य पाँच कार्य बताए गए हैं। वे सभी एक-एक लाख की संख्या में पूरे होने हैं। पाँचों को मिलाकर वे पाँच लाख होते हैं
चूँकि अब हर महीने एक लाख के करीब प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक कार्यक्रम संपन्न होने लगे हैं। उन सबके समाचार छापने के लिए हर महीने, हर प्रांत का विवरण छापने वाली दस अखण्ड ज्योतियाँ छपनी चाहिए। यह संभव नहीं, इसलिए नाम छपने की महत्त्वाकांक्षा को तिलांजलि देकर हमें निस्पृह सेवाभाव से ही कार्य में संलग्न रहना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
इसी अवसर पर मिशन के सूत्र संचालक की 75 वीं हीरक जयंती भी है। अखण्ड ज्योति पत्रिका के पचासवें वर्ष की स्वर्ण जयंती भी। तीसरा सुयोग इसी में और आ मिलता है। तीन वर्ष की सावित्री साधना का समापन भी इसे राष्ट्रेव की कुण्डलिनी जागरण तप भी कहा गया है
1269 के बसंत की बेला में मिशन के सूत्र संचालन की हीरक जयन्ती अखण्ड ज्योति की स्वर्ण जयन्ती, राष्ट्रीय कुंडलिनी जागरण की त्रिवर्षीय त्रिवेणी इन सबका एक साथ मिलन ऐसा है, जिसे त्रिवर्गों का, तीन लोकों का, तीन देवताओं का एक साथ मिलन कह सकते है। उसके सत्परिणाम जिस रूप में सामने आने वाले हैं उसे मनुष्य देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण रूप में देखा जा सकेगा। वह समय अब दूर नहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
अखण्ड ज्योति मनोरंजन के लिए चित्र विचित्र लेखों का लदस्ता बनाकर पाठकों का मन बहलाने वाली पत्रिका नहीं है। उसके पीछे एक उच्चस्तरीय लक्ष्य है, वह है लोक चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अति कठिन है
जो कुछ बन पड़ा है उसके श्रेयाधिकारी संचालक प्रस्तोता कम और उसके परिजन अधिक हैं। अखण्ड ज्योति अब से 51 वर्ष पूर्व जब आरम्भ हुई थी, जब उसका पहला अंक मात्र 500 छपा था। उसकी सदस्य संख्या बढ़ाने में संचालक स्वयं कोई बड़ी योजना न बना सके। चिन्तन मनन और अध्ययन अवगाहन में संलग्न व्यक्ति बहिरंग व्यवस्था बना सकने में अवकाश उपलब्ध करते हैं और उससे प्रचार तंत्र संभाल सकना संभव ही होता है
अखण्ड ज्योति की लौ कभी भी धूमिल होने या बुझ जाने जैसी स्थिति में पहुँचने वाली नहीं है। उसके लिए ऐसा सुनिश्चित प्रबन्ध कर दिया गया है कि कम-से-कम बीसवीं सदी के अन्त तक तो अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे। भले ही उसे अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे। भले ही उसे इन दिनों लिखने वाले जीवित रहें या न रहें
उत्साहवर्धक भूत और उत्साहवर्धक भविष्य परिलक्षित होने का एक बड़ा कारण अखण्ड ज्योति का प्रतिपादन, प्रकाशन और प्रयत्न भी रहा है। यह असंदिग्ध है। उसके द्वारा संचालित यह प्रयास आगे और भी द्रुतगति से चलता रहेगा
वे तो विज्ञापनों के सहारे सहायता स्रोतों के सहारे जीते और फलते-फूलते हैं। पर अखण्ड ज्योति के पास तो इन दोनों में से एक भी आधार नहीं है। उसकी स्थिरता और प्रगति तो पूरी तरह स्वजनों के प्रचार प्रयत्नों पर निर्भर है। अब तक तो बन पड़ा है, उसका श्रेय इसी एक स्रोत को है और उज्ज्वल भविष्य की आशा का अवलम्बन भी
संकेत अखण्ड ज्योति की वर्तमान स्थिति को ओर है। उसके साथ मूलतः जुड़े हुए लोग मात्र अढ़ाई लाख हैं। यह संख्या संसार के प्रमुख पत्रों की तुलना में कहीं पीछे है
यह मणि मुक्तक वितरण करने जैसे प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही है वह प्रयत्न जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले 51 साल से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है। प्रायः ढाई लाख ग्राहक और हर पत्रिका को कम से कम दस को पढ़ाये जाने का अनुबन्ध पच्चीस लाख को और पढ़ाने है
उसके द्वारा संचालित यह प्रयास आगे और भी द्रुतगति से चलता रहेगा। अखण्ड ज्योति की लौ कभी भी धूमिल होने या बुझ जाने जैसी स्थिति में पहुँचने वाली नहीं है। उसके लिए ऐसा सुनिश्चित प्रबन्ध कर दिया गया है कि कम-से-कम बीसवीं सदी के अन्त तक तो अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे। भले ही उसे अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
उन्हीं ने क्रियात्मक रूप से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की क्रियात्मक भूमिका निबाही है। अखण्ड ज्योति को मस्तिष्क कहा जाए तो उसके परिकर को समर्थतासंपन्न काय-कलेवर। काया के माध्यम से ही तो मस्तिष्क अपने मनोरथों को पूरा करता है। अखण्ड ज्योति की योजनाएँ उसके पाठक परिजनों के विशालकाय परिकर के द्वारा ही संपन्न होती हैं
जीवन साधना सत्रों में आने के लिए इन दिनों असाधारण उत्साह उमड़ा है। मिशन के सूत्रसंचालक का नित्य नियमित संदेश घर-घर पहुँचाने वाली अखण्ड ज्योति और युग निर्माण योजना, युग शक्ति, के पाठकों को उनमें प्राथमिकता दी जा रही है। गुरुदेव के वर्तमान कार्यकाल में ही एक बार प्रत्यक्ष संपर्क साधने के लिए सभी परिजन लालायित हैं। स्थान सीमित और इच्छुक अधिक होने से बारी-बारी से ही उनको आने की स्वीकृति भेजी जा रही हैं
अखण्ड ज्योति पत्रिका कलेवर में दिखती भर है। उससे वाचनकाल के स्वल्प रसास्वादन मात्र मिलने से मन बहलता तो है; पर वस्तुतः वह इतनी ही तुच्छ नहीं है। इसके साथ लिपटी प्राण-उर्जा में वह क्षमता है कि अपने संपर्क-क्षेत्र को उसी प्रकार अपनी लपेट में ले सके जैसे ज्वलंतशिखा सूखे ईंधन को अपनी पकड़ में लेकर अपने जैसा बना लेती है
अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण-प्रवाह भी बहता है। ऐसा प्रवाह जो स्रोतों को जगाता है। जागों का खड़ा करता है
जो ऐसा नहीं करते, उनका व्यवहार कृपण, संकीर्ण, स्वार्थपरता से भरा माना जाता हैं। यही उदाहरण उन पर भी लागू होता हैं, जो स्वयं तो अखण्ड ज्योति नियमित रूप से मँगाते हैं— पढ़ते और रसास्वादन का लाभ भी लेते हैं, पर इतना नहीं बन पड़ता कि इस दीपक की नांद के नीचे बंद कर देने की अपेक्षा उस ज्योति से संपर्क क्षेत्र को आलोकित करने की उदारता दिखाई जाए
काया के माध्यम से ही तो मस्तिष्क अपने मनोरथों को पूरा करता है। अखण्ड ज्योति की योजनाएँ उसके पाठक परिजनों के विशालकाय परिकर के द्वारा ही संपन्न होती हैं। शरीर न हो तो अकेला प्राण कहीं आकाश में ही अदृश्य रूप में उड़ता-फिरता रह सकता है
अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया ‘हस्तामलकवत्’ प्रत्यक्ष है। उसकी उपयोगिता एवं क्षमता को हर पारखी ने भूरि-भूरि सराहा हैं। इसे तर्क, तथ्य और प्रमाण के अंबार प्रस्तुत करते हुए कहीं भी कोई भी सिद्ध कर सकता है
अखण्ड ज्योति का एक ही लक्ष्य है कि व्यक्ति के अंतःकरण को छूने वाला ऐसा तत्त्वदर्शन प्रस्तुत किया जाए, जो व्यक्तियों के परिष्कार में सुनिश्चित रूप से सफल हो सके। इसके लिए जिन तर्कों, तथ्यों, प्रमाण-प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें विश्व साहित्य के महासागर में गहरे गोते लगाकर पाठकों के समक्ष पहुँचाया जाता है। इसका गंभीरतापूर्वक अध्ययन-अवगाहन जिनने भी किया है, वे द्रुत गति से आगे बढ़े हैं, ऊंचे उठे हैं
अखण्ड ज्योति की, उसके सुत्रसंचालाकों की एकमात्र अभिलाषा यही रही है कि उसे अब की अपेक्षा अधिक घरों में प्रवेश करने का, अधिक विचारशीलों के साथ जुड़ने का अवसर मिले। वह अपने परिवार को तीन गुना बढा हुआ देखे। उसे अपने पुत्र-पौत्रों की अधिक सार्थक सेवा करने का अवसर मिले, जिससे सभी का मन हुलसे और युगचेतना का कार्य-विस्तार अधिक लोगों में अधिक जीवन-संचार कर सके
अखण्ड ज्योति के संचालक अपनी भावनाओं और प्रेरणाओं का वितरण करने हेतु हर विचारशील के घर में प्रवेश पाने के लिए व्याकुल हैं। इस व्याकुलता में उत्सुकों के हाथ तो आत्मसंतोष ही पड़ने वाला है; पर जो दरवाजे खोल देंगे और प्रवेश की अनुमति देंगे, उनके लिए विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे दो रुपये मासिक का अतिथि सत्कार करके बदले में इतना कुछ प्राप्त कर सकेंगे, जिसे दिव्य वरदान-अनुदान की उपमा दी जा सके। जिसका अभाव जीवन के हर क्षेत्र में उत्साहवर्धक विभूतियाँ उत्पन्न करते हुए प्रत्यक्ष देखा जा सके
वर्त्तमान पाठकों में से प्रत्येक के पास अखण्ड ज्योति का— उसके सुत्रसंचालको का भावभरा अनुरोध पहुँचना चाहिए कि वे इन दिनों एक आदर्शवादी लक्ष्य सामने रखें कि उन्हें अखण्ड ज्योति के दो नए ग्राहक बनाए बिना चैन नहीं लेना है। अपनी सदस्यता तो जीवनभर स्थिर रखनी ही है
देश के कोने-कोने से खोजकर एवं प्रतिनिधि भेजकर ऐसे संदर्भ ग्रंथों का संकलन किया जा रहा है। “अखण्ड ज्योति” पाठकों से अनुरोध किया गया है, कि यदि उनके पास इस विषय पर महत्त्वपूर्ण साहित्य हो तो उनकी जानकारी भेजें। आवश्यकता समझी जाने पर उन्हें मँगा लिया जाएगा और काम पूरा होते ही उन्हें सुरक्षित रूप से वापस कर दिया जाएगा। पाठक इस पुण्य प्रयास में सहयोग दे भी रहे हैं
अब तक जो कुछ कार्य विस्तार बन पड़ा है, उसमे अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को जितना श्रेय दिया जा सकता है, उससे हजार गुना श्रेय उनको है, जो इस परिकर से जुड़े है और अपने श्रम-सहयोग से अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी रूचि एवं सामर्थ्यानुसार नवसृजन प्रयासों में लगे हैं। उन्हीं ने क्रियात्मक रूप से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की क्रियात्मक भूमिका निबाही है। अखण्ड ज्योति को मस्तिष्क कहा जाए तो उसके परिकर को समर्थतासंपन्न काय-कलेवर
माली के उपेक्षा दिखाने पर बगीचे की भी तो शोभा-संभावना चली जाती है। अखण्ड ज्योति इक्यावन वर्ष की होने पर भी इतनी बौनी बनी रहे कि हिंदी भाषी प्रदेशों के घर-घर में उसकी पहुँच न हो सके तो समझना चाहिए कि दुर्भाग्य आड़े आ गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन को इन दिनों अपने निजी काम धंधे में कटौती करके भी युग देवता के आमंत्रण को चुनौती रूप में स्वीकार करना चाहिए और नव सृजन की ऐतिहासिक बेला में हाथ बटाने कंधा लगाने और कदम से कदम मिलाकर चलने की तैयारी करनी चाहिए। साथ ही यह विश्वास भी रखना चाहिए कि लोक मंगल के लिए बरती गई उदार साहसिकता उससे अधिक मूल्यवान फसल लेकर वापस लौटेगी जितना कि बीज बोया गया है
आवश्यक उपकरण भी वहीं सुरक्षित रहे। अखण्ड ज्योति के सदस्य स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा पीठ समर्थ शाखा संगठन कार्य क्षेत्र में उतरेंगे तो विश्वास है कि नये शाखा संगठन जिनमें तीन तीन सदस्य हों एक लाख की संख्या में एक वर्ष के भीतर ही बन जायेंगे
यह युग संधि बेला है। इसमें भी वर्तमान वर्ष का अपना विशेष महत्व है दो वर्ष से चल रही हीरक जयन्ती अखण्ड ज्योति देश की कुण्डलिनी जगाने की त्रिवर्षीय योजना का यह त्रिविधि संगम समागम है। इसे त्रिवेणी संगम भी कह सकती है और पूर्णाहुति वर्ष भी। किन्तु कार्य पद्धति इतनी सरल है जिसे वयस्क व्यक्ति भी अपने निजी प्रयास से अथवा संपर्क परिकर के सहारे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
मथुरा (उ0प्र0) श्री टीकाराम शर्मा निष्ठावान युग शिल्पी 1975 से सद्वाक्य लेखन प्रारंभ किया मान्टेसरी स्कूलों तक में सद्वाक्य (स्टीकर्स) लगवाये इससे भी मन न भरा तो अपने दरवाजे पर एक बोर्ड लगवाया उसमें प्रतिदिन स्टीकर्स मान्यता प्राप्त सद्वाक्य और अखण्ड ज्योति के सू. एवं आप्त वचन लिखना प्रारंभ किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
अखण्ड ज्योति का जुलाई का अंक ‘गायत्री अंक’ होगा। उसमें उन सज्जनों के वृत्तान्त रहेंगे जिनने गायत्री की उपासना में सन्तोषजनक सफलता पाई है। ऐसे लोगों के चरित्रों का वृत्तान्त जानने से साधारण साधकों को आशा और उत्साह के साथ इस कल्याण मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिलता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
(5) “अखण्ड ज्योति” पत्रिका, गायत्री संस्था की प्रमुख पत्रिका है। इसको स्वयं पढ़ना और इसके नये सदस्य बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
अखण्ड ज्योति संस्था की ओर से लम्बे समय से इस महाविज्ञान सम्बन्धी कुछ शोध हो रही है। हजारों प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन करके गायत्री सम्बन्धी जानकारियों का संकलन, देशव्यापी गायत्री उपासकों के अनुभवों का संग्रह, महान तपस्वियों एवं विद्वानों का सहयोग, रहस्यमय सिद्ध पुरुषों की खोज, स्वयं की कठोर तपश्चर्याएँ, उपलब्ध ज्ञान का प्रयोग एवं परीक्षण आदि मार्गों द्वारा इस दिशा में जो कार्य हुआ है उसकी जानकारी रखने वाले विज्ञ पुरुषों को बड़ा हर्ष और सन्तोष है। इस कर्क प्रगति को देखते हुए ऐसा विश्वास होता है कुछ ऐसे आश्चर्यजनक परिणाम जल्दी ही सामने आवेंगे जिन पर भारत के आध्यात्मिक जगत को गर्व हो सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
इसी ऊहापोह में मुझे अखण्ड ज्योति की प्रकाशित गायत्री पुस्तकें मिलीं, उन्हें पढ़ा तो मेरी तार्किक बुद्धि और पिछले वर्षों के अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर बनी हुई अभिरुचि को उनसे असाधारण तृप्ति मिली और ऐसा प्रतीत हुआ कि मानों यह सब मुझ जैसे व्यक्तियों को दृष्टि में रखकर ही किसी अधिकारी एवं अनुभवी व्यक्ति ने लिखा हो। परन्तु केवल पुस्तकें पढ़ना पर्याप्त न समझा गया मैं इनके लेखक से मिलने मथुरा पहुँचा। आचार्य जी के दर्शनों से ही मैं गदगद होगा
इसी भ्रमण में कही पर मैंने अखण्ड ज्योति के गायत्री साहित्य की बड़ी प्रशंसा सुनी। एक जगह वह पुस्तकें मिल भी गई। मैंने उन्हें पढ़ा
“अखण्ड ज्योति के पुराने अंक”
मेरे बीस वर्षीय पुत्र शान्ताराम की मृत्यु हो जाने के उपरान्त चित्त की स्थिति बड़ी अस्थिर रहने लगी थी, साँसारिक कार्यों से उदासीनता हो रही थी, पर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए कोई उपयुक्त पथ प्रदर्शन नहीं मिल रहा है। इसी विषम स्थिति में मेरा संपर्क अखण्ड ज्योति से हुआ, व्यावहारिक पथ प्रदर्शन से साधन में मेरी रुचि, श्रद्धा और अन्तः प्रेरणा बढ़ी और में बताये हुए मार्ग से उपासना करने लगा
रोगी, असमर्थ, वृद्ध, कम पढ़े, या कार्य व्यस्त लोग अपनी स्थिति के अनुसार एक हजार या कम से कम 240 मंत्र लिख सकते हैं। पूरे हो जाने पर इन्हें रजिस्ट्री बुक पोस्ट से “अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा” के पते पर भेज देना चाहिए
अखंड ज्योति के पाठकों को खेद के साथ सूचित करना पड़ता है कि जनवरी से लेकर मई 52 तक का अखण्ड ज्योति का अब एक भी अंक स्टॉक में नहीं बचा है। जिनका इनमें से कोई अंक गुम गया हो वे अब उसे दूसरा मँगाने के लिए न लिखें। अंकों के बिलकुल समाप्त हो जाने के कारण अब भेजने में विवशता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
(3) ‘अखण्ड ज्योति’ के तत्वावधान में अ. भा. गायत्री संस्था का जो संगठन है, वह देश भर की जागृत आत्माओं को एक सम्बन्ध सूत्र में बाँधने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस माध्यम द्वारा जो प्रयोग, अन्वेषण, तप, साधन तथा प्रशिक्षण का कार्य हो रहा है, उसके अब तक के छुटपुट परिणाम बहुत ही उत्साहवर्धक और आशाजनक रहे हैं। भविष्य बहुत ही उज्ज्वल दिखाई पड़ता है
(19) गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 1 जुलाई का अखण्ड ज्योति का ‘गायत्री विशेषाँक’ निकलेगा उसमें गायत्री उपासना के ऐसे अनुभव रहेंगे जिनसे इस मार्ग के पथिकों का पथ-प्रदर्शन हो और उनके उत्साह एवं श्रद्धा-विश्वास में अभिवृद्धि हो। गायत्री उपासना से जिन सज्जनों को स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हों, या किन्हीं दूसरों को प्राप्त हुए लाभों का वृत्तांत विदित हो तो वह घटनाएँ सम्बन्धित व्यक्तियों का आधे शरीर का फोटो भी भेजने का प्रयत्न करना चाहिए। उस प्रकार के लेख यथासम्भव शीघ्र ही भेजने चाहिए ताकि फोटो ब्लॉक बनवाने और लेख संशोधन का कार्य समय पर पूरा हो सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-January
जिनके पास पत्रिका पहुँचती है उन्हें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि अपने घर के पढ़े लिखे सदस्यों को उसे पढ़ने के लिए विवश करेंगे, और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें पढ़कर सुनाया करेंगे। आजकल हम अपनी अन्तरात्मा की सारी भावनाएं समेटकर अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखते हैं। यदि हममें कोई कसक और सचाई होगी तो उसका प्रभाव पढ़ने या सुनने वाले पर अवश्य पड़ेगा
इस विचारधारा का व्यापक विस्तार होना सबसे पहला कार्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य तो मुट्ठीभर हैं, कुछ हजार लोग इतने बड़े देश को, इतने बड़े संसार को नहीं बदल सकते। इसके लिए अधिक व्यापक जनजागृति एवं प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। इसलिए अपनी विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराना युग निर्माण योजना की सफलता के लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य-क्रम माना जा सकता है
हम जो समय युग निर्माण योजना में सहयोग देने के लिए दें उसमें से आधा तो अपने घर के लोगों को अखण्ड ज्योति की प्रेरणाओं को समझाने के लिए लगाया जाय और आधा अपने मित्र, पड़ोसी, स्वजन सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित, धर्मप्रेमी लोगों से मिलने जुलने के लिए-धर्म फेरी के लिए-सुरक्षित रखा जाय। इसका आरम्भ भी अखण्ड ज्योति पढ़ने की प्रक्रिया के साथ हो सकता है। जिनके पास धर्म प्रेरणा देने के लिए जाया जाय उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति पढ़ने देने और फिर एक दो दिन बाद वापिस लेने जाने के निमित्त को लेकर महीने में दो बार मिलने जाया जा सकता है और योजना में सन्निहित विषयों पर चर्चा की जा सकती है। उस प्रकार अपना समयदान, परिवार का शिक्षण और सत्प्रवृत्तियों को व्यापक बनाने की प्रक्रिया में इस छोटे-से अत्यन्त सरल कार्यक्रम के अनुसार लग सकता है
इससे विशाल जन समूह को परिचित कराया जाना चाहिये। आगे चलकर इस पसार-कार्य के लिए दूसरे उपाय भी काम में लाए जावेंगे पर अभी तो फिलहाल एक ही उपाय हाथ में है और वह यह है कि अखण्ड ज्योति को अधिकाधिक लोग पढ़े। जिनके पास पत्रिका पहुँचती है उन्हें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि अपने घर के पढ़े लिखे सदस्यों को उसे पढ़ने के लिए विवश करेंगे, और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें पढ़कर सुनाया करेंगे। आजकल हम अपनी अन्तरात्मा की सारी भावनाएं समेटकर अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखते हैं
हम जो समय युग निर्माण योजना में सहयोग देने के लिए दें उसमें से आधा तो अपने घर के लोगों को अखण्ड ज्योति की प्रेरणाओं को समझाने के लिए लगाया जाय और आधा अपने मित्र, पड़ोसी, स्वजन सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित, धर्मप्रेमी लोगों से मिलने जुलने के लिए-धर्म फेरी के लिए-सुरक्षित रखा जाय। इसका आरम्भ भी अखण्ड ज्योति पढ़ने की प्रक्रिया के साथ हो सकता है। जिनके पास धर्म प्रेरणा देने के लिए जाया जाय उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति पढ़ने देने और फिर एक दो दिन बाद वापिस लेने जाने के निमित्त को लेकर महीने में दो बार मिलने जाया जा सकता है और योजना में सन्निहित विषयों पर चर्चा की जा सकती है
प्रत्येक पाठक को इनके कुछ सैट मँगाकर अपने पास रख लेने चाहिएं और उन्हें अपने सभी परिचितों को एक वर्ष में पढ़ा देना चाहिए। इस वर्ष जो नये ग्राहक अखण्ड ज्योति के बन रहे हों उन्हें भी उपरोक्त चार अंक प्राप्त कर लेने चाहिएं। ताकि युग निर्माण योजना की आवश्यक जानकारी से वे वंचित न रहें। स्वजन संबंधियों को प्रेमोपहार में यह चार अंक भिजवाने की प्रक्रिया इस वर्ष भी जारी रहनी चाहिए
इसी का नामकरण हम लोगों ने सुविधा की दृष्टि से युग-निर्माण योजना रख लिया है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना समय इस कार्य के लिए भी उसी तरह निकालना चाहिये जैसी अपने निजी जरूरी कामों के लिए निकालते हैं
अपना कुछ समय आत्म-सुधार और लोक सेवा के लिए लगाने का निश्चय कर लेना व्यक्तिगत कार्य-क्रम की दृष्टि से आवश्यक है। परिवार निर्माण के लिए घर का हर सदस्य हर महीने अखण्ड ज्योति की विचार धारा को पढ़ या सुन लिया करे, इतना आरम्भ तो हो ही जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति जिस विचारधारा और प्रेरणा का सृजन कर रही है, वह राष्ट्र निर्माण की, युग निर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। इससे विशाल जन समूह को परिचित कराया जाना चाहिये। आगे चलकर इस पसार-कार्य के लिए दूसरे उपाय भी काम में लाए जावेंगे पर अभी तो फिलहाल एक ही उपाय हाथ में है और वह यह है कि अखण्ड ज्योति को अधिकाधिक लोग पढ़े
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
जिस युग परिवर्तन के लिए अखण्ड ज्योति परिवार के लाखों सदस्य प्राणप्रण से कटिबद्ध हो रहे हैं वह न तो कठिन है और न असंभव। क्योंकि मानव अन्तरात्मा में सत्प्रवृत्तियों की, सद्भावनाओं की कोई कमी नहीं है। उपयुक्त अवसर आने पर वे सहज ही जाग पड़ती हैं
इसी प्रकार एक घरेलू पुस्तकालय, ज्ञान-मन्दिर भी आसानी से हर कोई चला सकता है। इसका आरम्भ अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र से ही हो सकता है। अपने घर का कोई भी साक्षर व्यक्ति ऐसा न बचे जो उसे आदि से अन्त तक न पढ़ता हो। इसी प्रकार पड़ौसी, मित्रों और समीपवर्ती विचारशील व्यक्तियों को अपने अंक पढ़ा देने और वापिस लेने का क्रम बनाना चाहिए
हमें इस तथ्य पर हजार बार विचार करना चाहिये और जन मानस का स्तर ऊँचा उठाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए। कंधे पर इस अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के संदर्भ में कुछ विशेष उत्तरदायित्व आया है। युग निर्माण योजना के अंतर्गत हम सब इस प्रतिज्ञा में आबद्ध हैं कि जीवन का उपयोग केवल कमाने खाने तक ही सीमित न रखेंगे वरन् आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की ओर भी समुचित ध्यान देंगे। यह भावना कागजी नहीं रहनी चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
अपने परिवारों में हमें नम्रता, शिष्टाचार, उदारता, प्रेम, न्याय, एकता और सहिष्णुता की परम्परा कायम करनी है। ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ को इस दिशा में सब से पहले और सबसे प्रभावशाली कदम उठाना है। प्राप्त समाचारों से विदित होता है कि यह कदम हजारों विचारशील पाठकों ने इसी गुरुपूर्णिमा से उठा दिया है और शेष कुछ ही दिनों में उठाने जा रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
इन पंक्तियों का लेखक अपने व्यक्तिगत परिवार में ‘अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की गणना करता है। शने गत 24 वर्षों से जिन लोगों के साथ निरन्तरता ही व्यक्तिगत संपर्क रखा है—जिनके सुख-दुख में उसी प्रकार भाग लिया है जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने अंश-वशं के लोगों के साथ लेता है— ही लोग “अखण्ड ज्योति “ के सदस्य हैं। अखण्ड-ज्योति” साधारण अखबारों की श्रेणी में नहीं आती। श्रेय पथ पर चलने वाले संस्कारवान् व्यक्तियों को सम्बन्ध-सूत्र में पिरोये रहने की यह एक सूत्र शृंखला है
अन्नमय कोश को विकसित करके आत्म साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने के लिए इस साधना की बहुत उपयोगिता है। गत दो वर्षों से अक्टूबर मास की अखण्ड ज्योति में एक-एक वर्ष का साधना क्रम प्रस्तुत किया जा रहा है। जिनने उसे आरंभ किया है उनने आशाजनक प्रगति की है। जो अभी तक उसे आरंभ नहीं कर सके हैं उन्हें उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए
हर व्यक्ति का एक प्रभाव-क्षेत्र होता है वही उसका समाज है। अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य हमारे प्रभाव-क्षेत्र में आते हैं, इसलिए हमारा समाज, हमारा संसार, हमारा सेवा-क्षेत्र वही है। पूरी शक्ति के साथ हम उन्हें ही प्रभावित करने और कार्यक्रम में लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यही प्रयत्न आप लोगों को भी करना चाहिए
कभी यह कल्पना ही नहीं आती कि हमारा कुटुम्ब घीयामंडी के छोटे मकान में रहने वाले लोगों तक ही सीमित है। “अखण्ड ज्योति परिवार “ के तीस हजार व्यक्ति सदा हमें अपने सच्चे स्वजन सम्बन्धी दीखते रहे हैं। उनके सम्बन्ध में हमारी चिंता, आकाँक्षा और जिम्मेदारी उतनी ही रहती हैं जितनी किसी दूसरे को अपने निजी परिवार की रहती है। यों सारा समाज और सारा संसार ही अपना है, पर जिनके साथ प्रेम और कर्त्तव्य के आवश्यक बंधन बँधे होते हैं उनके लिए कुछ विशेष सोचना और करना पड़ता है
उन लोगों को योजना की आवश्यक जानकारी एवं प्रेरणा मिले उसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाना चाहिए। तीन अरब जनसंख्या के संसार और 44 करोड़ के भारतवर्ष में हम 30 हजार ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ के सदस्य नगण्य हैं। अपना प्रभाव-क्षेत्र न बढ़ेगा तो युग-निर्माण योजना का विकास-विस्तार कैसे हो सकेगा? इसलिए प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि अपने प्रभाव-क्षेत्र में योजना को व्यापक और लोकप्रिय बनाने के लिए हम में से प्रत्येक व्यक्ति पूरी दिलचस्पी के साथ काम करने लगे
इन दोनों पर्वों के दिन दीप-दान करना चाहिए। अखण्ड ज्योति परिवार के हर सदस्य के घर-घर दिवाली की तरह दीपक जलाये जाया करें। इन 36 दिनों में सवालक्ष या चौबीस हजार जिससे जितना बन पड़े एक अनुष्ठान भी करने का प्रयत्न करना चाहिए। ब्रह्मचर्य, भूमि शयन आदि अन्य जो तपश्चर्या बन पड़े वे भी इस अवधि में करनी चाहिए
यह भली प्रकार याद रखना चाहिये कि ‘अखण्ड ज्योति’ घाटे में चलती है। उसकी कागज, छपाई की लागत तीन रुपया बारह आना है, तीन रुपया नहीं। यह विशुद्ध पारमार्थिक प्रकाशन है
यह सभी लोग हमें व्यक्ति गत रूप अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय हैं और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। पारस्परिक प्रेम भाव और भावनात्मक आदान-प्रदान को बनाये रखने में ‘अखण्ड ज्योति” पत्रिका महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती रहती है
जो लोग उपासना को उस विधि में तो नहीं करते, पर जीवन निर्माण के कार्यक्रमों में सहमत हैं ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं। उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्ति गत रूप अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय हैं और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। पारस्परिक प्रेम भाव और भावनात्मक आदान-प्रदान को बनाये रखने में ‘अखण्ड ज्योति” पत्रिका महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती रहती है
घी का दीपक एवं अगरबत्ती जलाना भी यज्ञ विधि का ही एक रूप है। इनमें से जिसे जैसी सुविधा हो वह यज्ञ क्रम बना ले, पर यह प्रथा ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ के हर घर में जीवित अवश्य ही रहनी चाहिए
‘अखण्ड ज्योति’ ही अपनी प्रेरणा का एक मात्र साधन है। इसी के आधार पर तीस हजार स्वजनों को हम इस महा अभियान में संलग्न कर सकने में समर्थ हो रहे हैं। इसी माध्यम से आप सबके लिए भी योजना का क्षेत्र विस्तार कर सकना सम्भव होगा
इसी माध्यम से आप सबके लिए भी योजना का क्षेत्र विस्तार कर सकना सम्भव होगा। इसलिए प्रयत्न होना चाहिए कि जिन पर भी अपना व्यक्तिगत प्रभाव हो उनके घर जाने, संपर्क बनाने और अखण्ड ज्योति पढ़ाने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाय। इस एक महीने में यह अंक अपने प्रभाव-क्षेत्र के 10-20 व्यक्तियों को पढ़ा ही देना चाहिए और उनके नाम और अभिमत संलग्न फार्म में लिख कर मथुरा भेजने चाहिये। इस प्रकार इसी एक महीने में हम 30 हजार व्यक्ति 5-7 लाख व्यक्तियों तक इस प्रकाश और पुकार को पहुँचा सकने में सफल हो सकते हैं
अपने अधिकार क्षेत्र में ही कुछ कर सकना हमारे लिए सम्भव भी था, वही कर भी रहे है। परिवार निर्माण का काम “अखण्ड ज्योति” के सदस्यों से —अपने विचार परिवार से आरम्भ करते हुए हमें पूरा और पक्का विश्वास है कि इसे ध्यानपूर्वक सुना और समझा जायगा। इतना ही नहीं वरन् प्रत्येक परिजन उससे जितना बन पड़ेगा उतना करेंगे भी
यह सभी प्रयत्न ऐसे हैं जो सामूहिक रूप से ही प्रसारित किये जा सकते हैं। इन्हें आन्दोलन का रूप मिलना चाहिए और इनका संचालन ‘अखण्ड ज्योति परिवारों’ के सम्मिलित प्रयत्नों से होता रहना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
‘अखण्ड ज्योति परिवार’ के प्रत्येक सदस्य से अनुरोध है कि वह मार्च ओर अप्रैल के इन दो अंकों को विशिष्ट ध्यानपूर्वक दो बार पढ़े और इनमें जो विचारधारा व्यक्त हुई है, उसके संबंध में अपना अभिमत हमें सूचित करे। युगनिर्माण योजना को कार्यान्वित करने के लिए कौन क्या तैयारी कर रहा है, यह जानने के पश्चात् ही अगले कदमों को उठाया जाना सम्भव होगा। आशा है कोई परिजन उपेक्षा न करेंगे और अपना अभिमत इसी महीने में भेज देंगे
हमारा एक भी प्रिय परिजन ऐसा न रहे जो अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत होने पर भी सद्विचारों में अभिरुचि लेने के लिए प्रेरणा प्राप्त न करे। स्वाध्याय का साधन “अखण्ड ज्योति” प्रस्तुत करती है, सत्संग की प्रेरणा पूर्ति हम स्वयं करें। उभय पक्षीय लाभों के प्रभाव से अपने परिवार को पूरी तरह लाभान्वित करें। इसमें हमारा धर्म-कर्तव्य पालन होता है, स्वजनों का जीवन सुधारता है और युग-निर्माण का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होता है
“अखण्ड ज्योति परिवार” के प्रत्येक सदस्य को हम उस दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हम में से हर एक को अपना-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी “अखण्ड-ज्योति परिवार” के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी-ही आत्मीयता की दृष्टि से देखे और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने समझे
“अखण्ड ज्योति परिवार” के 30 हजार सदस्य यदि इसी वर्ष यह कार्य आरम्भ कर दें तो सवा लाख व्यक्तियों को वे शिक्षित कर सकते हैं। आगामी दश वर्षों में 15 लाख का शिक्षण इन दिनों जो हम लोग हैं वे ही कर सकते हैं। यदि अपना परिवार बढ़ता रहे और उसका प्रत्येक सदस्य हर वर्ष एक नया शिक्षित व्यक्ति ऐसा और तैयार कर ले जो हमारी ही तरह प्रौढ़ शिक्षा के लिए समय देने लगे तो आगामी दश वर्ष में वह शृंखला चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती हुई साक्षरता की देश व्यापी आवश्यकता को सहज ही पूरा कर सकती है
“अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक पाठक को व युगनिर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को (1) अपने दैनिक जीवन में उपासना को स्थान देना चाहिये। (2) स्वाध्याय के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। (3) नित्य युग निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये
सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म के रूप में हममें से प्रत्येक को इसे एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में अपनाना चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक सदस्य को ज्ञान-यज्ञ का होता बनना चाहिए। कुछ नियत निर्धारित समय नियमित रूप से हमें इस कार्य के लिए निकालना ही चाहिए और उसका उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र में सद्भावनाएं उत्पन्न करने के लिए करना चाहिए। युगारंभ का श्रीगणेश हमारे इसी शुभ संकल्प के साथ होना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
इसमें युग-निर्माण के लिए आवश्यक जागृति और जीवन उत्पन्न करने के लिए मेरी जैसी श्रद्धा भावना रखने वाले अनेकों साहित्यिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। आशा करनी चाहिए कि ऐसे धर्म सेवकों की भी निकट भविष्य में कभी न रहेगी जो गुजरात में दीपक के समान जलने को तैयार होकर प्रकाश पाने को तैयार हों, तेल की प्रचुर मात्रा हमें ‘अखण्ड ज्योति’ से मिल ही जाती है
शाम को सामूहिक पूजा आरती होती है। युग निमार्ण का सत्संकल्प आरती के द्वारा दुहराया जाता है, एक लेख अखण्ड ज्योति का पढ़ा जाता है, जिसे घर के सभी सदस्य ऐसे प्रेम से सुनते हैं मानों आचार्य जी स्वयं ही अपना प्रवचन कर रहे हों। कपड़ों की सफाई, हर वस्तु को नियत स्थान पर रखना, समय का कार्यक्रम बना कर उसी के अनुसार दिनचर्या पूरा करना, दैनिक व्यायाम आदि कई अच्छी प्रथाएँ इस एक महीने में ही चल पड़ी हैं। इसे देखते हुए लगता है कि परिवार का सुधार संतोषजनक रीति से हो रहा है और आशा बँधती है कि हम लोग आगे चलकर अपना व्यक्तित्व ऐसा उत्तम गठित कर सकेंगे जिसके संपर्क में आने वाले भी सभ्य नागरिक बन सकेंगे
‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से ‘युग निर्माण योजना’ की जो प्रबुद्ध विचारधारा प्रसारित हो रही है उसे जब मैं ध्यानपूर्वक पढ़ता हूँ तो अन्तःकरण पुलकित हो उठता है। मनुष्य जाति आज जिस पतन पथ पर चलती हुई अपना सर्वनाश करने के लिए बढ़ रही है उसे रोकने के लिए ठोस और प्रभावशाली उपाय यही हो सकता है कि नैतिक विचारधारा को परी शक्ति के साथ जनमानस प्रवेश करने का एक सुसंगठित आन्दोलन किया जाय। ‘युग निर्माण योजना’ में इस उद्देश्य की पूर्ति की सभी संभावनाएँ बीज रूप से मौजूद हैं
अनुवादों को गुजराती पत्र पत्रिकाओं में छपाना ही होगा। सितम्बर के ‘अखण्ड ज्योति’ में युग-निर्माण सत् संकल्प की जो विस्तृत विवेचना छपी थी उसका धारावाहिक अनुवाद गुजराती की ‘गायत्री विज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित हो रहा है। ‘ज्ञान यज्ञ ग्रन्थ माला’ के नाम से मैंने एक छोटा सस्ता प्रकाशन स्वयं भी आरंभ किया है, जिसमें युग-निर्माण विचारधारा का ही विस्तार है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
पता-”अखण्ड ज्योति” प्रेस-मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
इस प्रकार हवन आदि की कोई असुविधा पड़े तो वह भी इसी प्रकार सहयोग के आधार पर पूरी की जा सकती है। किसी साधक की साधना खंडित न होने देने, उसका संकल्प पूरा करने के लिये अखण्ड ज्योति से भी समुचित उत्साह, पथप्रदर्शन तथा सहयोग मिल जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
अखण्ड ज्योति का विशेषांक
अखण्ड ज्योति का जनवरी सन् 51 का अंक “जीवन विद्या अंक” होगा। इसमें जीवन को सुख शान्तिमय बनाने वाली विचार धारा एवं कार्यप्रणाली का बड़ा ही महत्वपूर्ण विवेचन होगा। यह अंक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए. द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-August
दश वर्षों के कठोर परिश्रम से दो हजार ग्रंथों का अध्ययन करके वेदमाता गायत्री के संबंध में अखण्ड ज्योति द्वारा दो दो रुपये मूल्य की पाँच पुस्तकें (गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्री तंत्र, गायत्री योग) प्रकाशित की गई थीं। हर्ष की बात है कि देश भर के विद्वानों ने एक स्वर से इस अद्वितीय साहित्य की भूरि भूरि प्रशंसा की। आध्यात्म प्रेमियों ने भी इस साहित्य को खूब अपनाया, फलस्वरूप डेढ़ वर्ष के भीतर ही इनका प्रथम संस्करण समाप्त हो गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
आत्मिक गुणों और विशेषताओं के बढ़ने के कारण साधन को साँसारिक कठिनाइयाँ पार करना, स्वल्प साधन में भी सुखी रहना एवं सुखकर स्थिति को उपलब्ध करना सहज होता है। अब तक इसी विधि-विधान की चर्चा अखण्ड ज्योति के पिछले अंकों में की गई है। यह योग-विज्ञान है, इसे दक्षिण मार्ग भी कहते हैं। यह सत् प्रधान होने से हानिरहित एवं व्यक्ति तथा समाज के लिए सब प्रकार हितकर है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-July
व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा
गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया हो जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दस वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्व साधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है
पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ व्यवस्थापक-’अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
इसे करने का साहस एवं उत्साह अपने में उत्पन्न करना हमारे लिये एक परम कल्याणकारी दिव्य आयोजन सिद्ध हो सकता है। अखण्ड ज्योति अपने पाठकों को इस आयोजन के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी देने के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि-गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया हो जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दस वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्व-साधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है
पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ। व्यवस्थापक-‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
इस मास चैत्र की नवदुर्गाओं में एक गायत्री उपासक (जिसने अपना नाम छापने की मनाई कर दी है) ने अपनी विशेष कामना पूर्ति के उपलक्ष्य में गायत्री पुरश्चरण किया है। तथा 324 रु 0/ अखण्ड ज्योति कार्यालय को इस लिए भेजे हैं कि गायत्री के अमूल्य 5 ग्रन्थ रत्न 10 रु 0/ के स्थान पर 7 रु 0/ में 108 सज्जनों को दिये जायं। पिछली बार की भाँति एक मास के भीतर ही वह सुविधा समाप्त हो जाने की संभावना है। इसलिए जो सज्जन इस सुविधा से लाभ उठाना चाहे शीघ्र ही पुस्तक मँगा लें
‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
“अखण्ड ज्योति” के पाठकों को कुछ आवश्यक सूचनाएं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
सांस्कृतिक पुनरुत्थान आज विश्व मानव की सर्वोपरि आवश्यकता है उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपने आपको प्रस्तुत करना एक ऐसा महान् कार्य है, जिसे देश और काल की दृष्टि से एक अत्यन्त उत्कर्ष परमार्थ कह सकते हैं। हम चाहते हैं कि अखण्ड ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्य इस महान् कार्य में अपने समय और श्रम का समुचित योग दान करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
आप लोग जो अपना काम काज छोड़ कर, किराये आदि में बहुत सा रुपया खर्च करके जो यहाँ तक आये हैं, उसका उद्देश्य कोरा शैर तमाशा नहीं हैं। यह उन गायत्री उपासकों को सम्मेलन है जिनको हमने बारह वर्ष तक एक विशेष प्रकार की शिक्षा ‘अखण्ड ज्योति’ के द्वारा दी है। इन लोगों में अनेकों ऊँची श्रेणी के विद्वान तथा कार्यकुशल लोग सम्मिलित हैं। हमने इतने वर्षों के परिश्रम से जो 10 - 15 हजार योग्य व्यक्ति समस्त देश से संग्रह किये हैं, 5 - 6 हजार व्यक्ति उन्हीं में से इस समारोह में भाग लेने आये हैं
अब से 14 वर्ष पूर्व “अखण्ड ज्योति” में दो पंक्तियाँ प्रकाशित हुई थीं और अभी तक प्रत्येक अंक में, मैं उन पंक्ति यों को विशेष ध्यान पूर्वक पढ़ता रहा हूँ। पंक्तियाँ ये है:—“सन्देश नहीं मैं स्वर्ग लोक का लाई—मैं भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई”। प्रारम्भ में इसमें सार कम, और कविता अधिक जान पड़ती थी
इस तपोभूमि में समस्त मानव के त्रिविध तापोद्धार के लिये ‘भागीरथ’ की तरह हमारे प्राचार्य जी ने गायत्री की निर्मल गंगा बहा दी है। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के मंगलमय अवसर पर पहुँच कर अज्ञानान्ध सहस्रों नर−नारियों ने वस्तुतः एक दिव्य ज्योति प्राप्त की है, जिसे ‘अखण्ड ज्योति’ में सविस्तार व्यक्त करना मेरे लिये कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है
20—अखण्ड ज्योति का यह मई का अंक पूर्व सूचनानुसार 15 दिन लेट छप रहा है। यज्ञ की व्यस्तता के कारण तथा अपना प्रेस इन दिनों बन्द होने के कारण यह अंक समय पर न निकल सका। जल्दी में पृष्ठ भी कम छापे जा रहे हैं
यज्ञों के अन्त में प्रवचनों की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। जहाँ अच्छे विद्वान वक्त न हों वहाँ अखण्ड ज्योति के कोई लेख सुनाये जा सकते हैं। इस प्रकार साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम का मंगलाचरण प्रत्येक स्थान पर होने के उपरान्त स्थान स्थान पर धार्मिक शिक्षा का कार्यक्रम किया जाना है, जिसकी रूपरेखा मार्च 56 की अखण्ड ज्योति में विस्तार पूर्वक छापी जा चुकी है
जहाँ अच्छे विद्वान वक्त न हों वहाँ अखण्ड ज्योति के कोई लेख सुनाये जा सकते हैं। इस प्रकार साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम का मंगलाचरण प्रत्येक स्थान पर होने के उपरान्त स्थान स्थान पर धार्मिक शिक्षा का कार्यक्रम किया जाना है, जिसकी रूपरेखा मार्च 56 की अखण्ड ज्योति में विस्तार पूर्वक छापी जा चुकी है
21—यज्ञ कार्य में आय से बहुत अधिक खर्च हुआ। उसकी पूर्ति में अखण्ड ज्योति के ग्राहकों का एक वर्ष के लिए जमा किया गया चन्दा भी खर्च हो गया है। अगले महीनों के अंक निकालने में कठिनाई पड़ेगी। पाठक यदि कुछ नये ग्राहक बढ़ाने की कृपा कर सकें तो उस चन्दे की आय से अगले अंकों के ठीक प्रकार छपते रहने की व्यवस्था में सुविधा होगी यों पत्रिका तो चालू ही रहेगी, पर इस वर्ष एक तो पृष्ठ अधिक बढ़े, मूल्य उसके मुकाबले में केवल आठ आना ही बढ़ा, इस दृष्टि से वैसे भी घाटा चल रहा था, दूसरे जमा चन्दा यज्ञ की मदद में खर्च हो जाने से यह अड़चन और बढ़ गई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
कहकर ‘अन्धकार के पार में सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति है, इसकी शिक्षा दी थी वणित सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति की उपमा के भ्रमवश वाह्य जगत के स्थूलाकाश स्थित सूर्य-प्रकाश के समान ही उस अखण्ड ज्योति को नहीं समझना चाहिये। उस अखण्ड ज्योति का पटतर बाह्य संसार के करोड़ों सूर्य से भी नहीं दिया जा सकता। इस उपमा को तो जिमि कोटिशत खद्योत सम रवि कहत अति लघुता लहैं, की भाँति ही जानना चाहिये
अतएव वाह्य जगत में इसकी खोज सर्वथा भ्रम परिपूर्ण है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने हनुमान जी को इस अखण्ड ज्योति की शिक्षा देते समय स्पष्ट कहा था कि-व्यर्थ ही बहुत से शास्त्रों की कथाओं के मन्थन से क्या फल? हो वायु सुत! अत्यन्त यत्नवान् होकर अपने अन्तर की ज्योति का अन्वेषण कर
वे गुरु नानक देव की भाँति ही निःशंक और स्पष्टवादी हो जाते हैं- ‘अन्तरि ज्योतिभई गुरु साखी चीने रामकरंमा’। यही अन्तर ज्योति अखण्ड ज्योति है
कहकर ‘अन्धकार के पार में सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति है, इसकी शिक्षा दी थी वणित सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति की उपमा के भ्रमवश वाह्य जगत के स्थूलाकाश स्थित सूर्य-प्रकाश के समान ही उस अखण्ड ज्योति को नहीं समझना चाहिये। उस अखण्ड ज्योति का पटतर बाह्य संसार के करोड़ों सूर्य से भी नहीं दिया जा सकता। इस उपमा को तो जिमि कोटिशत खद्योत सम रवि कहत अति लघुता लहैं, की भाँति ही जानना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया तो उसका वर्णन करते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था—
यही अनन्त ज्योति ‘अखण्ड ज्योति है’। किन्तु स्मरण रहे कि इसका दर्शन गुरु कृपापात्र जन ही करने में समर्थ हो सकते हैं। जिसका सर्वस्व धन ‘गुरु कृपा हि केवलम्’ है
अखण्ड ज्योति उस महान ज्योति या प्रकाश पुञ्ज को कहते हैं जो सतत् अव्याहत, अप्रतिहत, अविच्छिन्न, एक सर और स्थिर हो। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत प्रकाश या परमात्मा प्रदत्त प्राकृतिक किसी भी नक्षत्र, रवि या शशि प्रभृति के प्रकाश में ये गुण प्रदर्शित नहीं होते। वर्णित गुणमय अखण्ड ज्योति बाह्य जगत के स्थूलाकाश में नहीं, अपितु अंतर्जगत के सुक्ष्माकाश में अवश्य अवस्थित है
वे गुरु नानक देव की भाँति ही निःशंक और स्पष्टवादी हो जाते हैं- ‘अन्तरि ज्योतिभई गुरु साखी चीने रामकरंमा’। यही अन्तर ज्योति अखण्ड ज्योति है
तारे की टिमटिमी और विद्युत की चापल्यता से कौन अनभिज्ञ है? शशि और सूर्य नित्य प्रति उदय और अस्त होते हैं, इनकी ज्योति को भी लोग अखण्ड रूप में नहीं देखते। सहज यह प्रश्न उदय होता है कि अखण्ड ज्योति क्या है, कहाँ है और इसकी अनुभूति कैसे हो सकती है?
एक बंगाली साधक ने भी कहा है—‘निवात निष्कम दीपेरमतन योगीगनध्याऐं करे दरशन’। और जब साधक की वृति वहाँ से और अग्रसर होती है तब उसे उस प्रकाशपुञ्ज—अखण्ड ज्योति की भी प्रत्यक्षानुभूति होती है। संत गुलाल साहब ने कहा है—
वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत प्रकाश या परमात्मा प्रदत्त प्राकृतिक किसी भी नक्षत्र, रवि या शशि प्रभृति के प्रकाश में ये गुण प्रदर्शित नहीं होते। वर्णित गुणमय अखण्ड ज्योति बाह्य जगत के स्थूलाकाश में नहीं, अपितु अंतर्जगत के सुक्ष्माकाश में अवश्य अवस्थित है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
प्रत्येक रविवार को एक-एक सदस्य के घर पर क्रमशः साप्ताहिक सत्संग होते रहें। सामूहिक गायत्री जप, हवन, कीर्तन के अतिरिक्त व्याख्यानों की, किन्हीं सद्ग्रंथों की अथवा गायत्री साहित्य या अखण्ड ज्योति के लेखों का वाचन करने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें खर्च कम से कम हो ताकि निर्धन सदस्यों को भी अपने घर सत्संग कराने में भार न पड़े। अभी इस एक बात पर ही सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
गायत्री तपोभूमि में अखण्ड गायत्री जप, घृत दीप की अखण्ड ज्योति, अखण्ड जलधारा का गायत्री अभिषेक भी चालू करने का प्रबन्ध किया जा रहा है। जेष्ठ सुदी 10 को गायत्री जयन्ती के दिन तपोभूमि में समारोहपूर्वक उत्सव मनाया गया तथा यह तीनों ही कार्य-क्रम चलाये गये। गुरु पूर्णिमा तक यह प्रयोग परीक्षात्मक चलेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
अखण्ड ज्योति विशुद्ध साँस्कृतिक एवं विचार प्रधान पत्रिका रहेगी। अब तक गायत्री परिवार के समाचार अखण्ड ज्योति में ही छपते थे। पर वह लेखों की विचार प्रधान पत्रिका है इसलिए उसमें गायत्री विज्ञान, साधन विधान, अनुभव, पथ-प्रदर्शन, शंका समाधान, गायत्री समाचार परिचय, आदेश आदि के लिए नाम मात्र का स्थान मिल पाता था। गत मास 108 यज्ञ समाचारों में हर यज्ञ के लिए दो-दो चार-चार लाइनें भी नहीं दी सकीं
इस संगठन को सुव्यवस्थित रखने और मार्ग दर्शन करने के लिए अगले मास से “गायत्री परिवार पत्रिका” अलग से निकाली जा रही है। अखण्ड ज्योति विशुद्ध साँस्कृतिक एवं विचार प्रधान पत्रिका रहेगी। अब तक गायत्री परिवार के समाचार अखण्ड ज्योति में ही छपते थे। पर वह लेखों की विचार प्रधान पत्रिका है इसलिए उसमें गायत्री विज्ञान, साधन विधान, अनुभव, पथ-प्रदर्शन, शंका समाधान, गायत्री समाचार परिचय, आदेश आदि के लिए नाम मात्र का स्थान मिल पाता था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
तद्नुसार कार्य आरम्भ कर दिया गया है। अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में गायत्री परिवार के संगठन की सदस्यता की अपील छापी गई थी
अखण्ड ज्योति के पाठक अधिकतर गायत्री उपासक हैं। उन्हीं के प्रयत्न से गतवर्ष महायज्ञ के निमित्त नये गायत्री उपासकों को बढ़ाया गया, तथा पुरानों को ढूँढ़ा गया था। अब परिवार संगठन का कार्य भी उन्हें ही सौंपते हैं
अखण्ड ज्योति प्रेस की दोनों मशीनें टाइप केस आदि सभी सामान तपोभूमि में पहुँच गया है। यह लगभग छह, सात हजार रुपये का सामान अब तपोभूमि की ही सम्पत्ति है इस पर अब गायत्री परिवार का प्रचारात्मक साहित्य शाखा शृंखलाओं के लेटर पेपर, विज्ञापन, पर्चे, पोस्टर आदि बाजार भाव की अपेक्षा लगभग आधे मूल्य की लागत पर छाप कर भेजे जाया करेंगे। गायत्री परिवार की शाखाऐं अपने उत्सवों के विज्ञापन एवं धर्म प्रचार के व्याख्यानात्मक पत्र यहाँ बहुत सस्ती लागत पर छपा कर अपने क्षेत्रों में ज्ञान प्रचार का महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी, यह प्रेस इन्हीं कार्यों के लिये सीमित रहेगा
गायत्री परिवार की शाखाऐं अपने उत्सवों के विज्ञापन एवं धर्म प्रचार के व्याख्यानात्मक पत्र यहाँ बहुत सस्ती लागत पर छपा कर अपने क्षेत्रों में ज्ञान प्रचार का महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी, यह प्रेस इन्हीं कार्यों के लिये सीमित रहेगा। अखण्ड ज्योति अन्यत्र छपा करेगी। प्रेस खोलने के इच्छुक, एवं प्रेस शिल्प सीख कर आजीविका कमाने वाले व्यक्ति इस कला का व्यवहारिक शिक्षण यहाँ प्राप्त कर सकेंगे। मन्दिर के पीछे के दो कमरों में कम्पोज एवं मशीनें रखी गई हैं
जिस कार्य को मनुष्य ‘आवश्यक’ समझता है उसके लिए अनेक अड़चनों के बीच भी समय निकाल लेता है, निकाल सकता है। हर्ष की बात है कि अखण्ड ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य निष्ठा और श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय वाले कर्तव्य परायण व्रतधारी हैं। वे बहाने बाजी नहीं वरन् धर्म कर्तव्यों के लिये श्रम करने का आदर्श सदा ही आगे रखते रहे हैं
5– अपनी गतिविधियों की सूचना केन्द्रीय संगठन-तपोभूमि को भेजते रहना। 6– “अखण्ड ज्योति” को स्वयं पढ़कर तथा दूसरों को पढ़वाकर निर्धारित लक्ष की ओर अग्रसर होने का प्रकाश प्राप्त करना, यह छह कार्य हम अखण्ड ज्योति परिवार के सक्रिय कर्मठ और उत्साही कर्मयोगियों पर छोड़ देते हैं। गत अंक में जो सदस्यता फार्म गया था वह जिनने अभी तक भर कर न भेजा हो वे अपना फार्म भर कर भेजने के साथ ही समीपवर्ती क्षेत्र के अन्य गायत्री उपासकों को संगठित करने उन्हें सदस्य बनाने का कार्य भी आरम्भ कर दें। सदस्यता के फार्म, शाखा स्थापना सम्बन्धी फार्म, आवश्यक ज्ञातव्य आदि की जितनी संख्या में आवश्यकता हो मथुरा से मंगालें और उनके आधार पर तुरन्त संगठन कार्य आरम्भ कर दें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
(5) यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती है। 1-पता अधूरा या अस्पष्ट लिखना। 2-डाक की गड़बड़ी
हर महीने गायत्री-उपासना के अनुभव भी रहा करेंगे। गायत्री-उपासकों को अपनी उपासना में जो अध्यात्मिक एवं भौतिक विशेष अनुभव हुए हों उन्हें अखण्ड ज्योति में प्रकाशनार्थ भेजते रहें
(2) अखण्ड ज्योति की वी. पी. भेजने में बिलकुल व्यर्थ के कुछ पैसे अधिक देने पड़ते हैं। वी. पी. पोस्टेज के अतिरिक्त खर्च समेत सवा तीन रु. की वी. पी. पहुँचती है। इसलिए मनीआर्डर से ही चन्दा भेजने में लाभ है
इस अष्ट सूत्री ब्रह्मास्त्र-अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिये अखण्ड ज्योति तथा गायत्री परिवार के कर्मठ कार्यकर्ता गण इस एक वर्ष में कम से कम दो घंटा प्रतिदिन इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिये लगावें। इसकी पूर्ति के लिये सबसे अधिक आवश्यकता समय देने की है। यह महा अनुष्ठान सफल होता है, तो इसका श्रेय परिवार के सदस्यों के अपना मूल्यवान समय देने की उदारता को ही होगा यदि यह असफल हुआ, अपूर्ण रहा तो इसका एकमात्र कारण यह होगा कि अपने स्वजन इस पुनीत कार्य में समय देने में संकोच कर गये
इस योजना से उसी परम्परा को पालन करने की आवश्यकता है। अखण्ड ज्योति तथा गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य से आज यह याचना की जा रही है कि अपना समय, श्रम एवं उत्साह गायत्री उपासक बढ़ाने के लिए दान दें और घर-घर भिक्षुक की तरह घूम घूमकर प्रत्येक-धर्म प्रेमी से छह-छह मिनट गायत्री उपासना के लिए समय देने की याचना करें। यज्ञोपवीत संस्कार भिक्षा माँगने की परम्परा पूरी किये बिना पूरा नहीं होता, यह “ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान” भी जन सहयोगी की भिक्षा के बिना पूरा न होगा। अपने सम्पूर्ण स्वजन के अन्तः करण में जितना ब्रह्मतेज है, उसे उद्बोधन करके इस संकल्प की सफलता में जुट पड़ने के लिए हम आह्वान करते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
अखण्ड ज्योति परिवार के विचारशील व्यक्तियों को इन सत्रों में सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए। प्रत्यावर्तन सत्रों की तुलना में समय तो दूना अवश्य लगेगा पर इस परिष्कृत प्रशिक्षण का लाभ भी कई गुना है। जो लोग प्रत्यावर्तन में सम्मिलित हो चुके हैं उन्हें भी इनमें सम्मिलित होने की स्वीकृति मिल सकती है
अखण्ड ज्योति का 28वाँ बसन्त पर्व आगामी 16 फरवरी को आ रही है उस अवसर पर हमें (1) सामयिक समारोह, (2) ग्राहकों की वृद्धि का प्रयत्न (3) पत्रिका दस को पढ़ाते रहने का संकल्प (4) शाँति कुज में चल रहे प्रशिक्षित में सम्मिलित होने की तैयारी यह चार प्रयत्न करने के लिये अभी से कटिबद्ध होना चाहिये। मिशन के जन्म दिन का यह पावन पर्व इस प्रकार मनाया जाना चाहिये कि उससे निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में उत्साहवर्धक सहयोग मिल सकें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
अखण्ड ज्योति परिजनों को इस विषम बेला में विशेष रूप से युग निमन्त्रण मिला है उन्हें अपना सम्पूर्ण समय, श्रम, ज्ञान, प्रभाव, धन मात्र लोभ और मोह के परिपोषण में ही नहीं लगाये रहना हे वरन् उसमें से एक बड़ा अंग काटकर युग देवता के चरणों में प्रस्तुत करना है। यदि इस विषम बेला में इतना भी न बन पड़ा तो इस में हम सब का ही नहीं समूची मानव जाति का दुर्भाग्य माना जायगा। जागरुक आत्माएँ ही यदि हथियार डाल देंगी, वे भी सदुद्देश्यों के लिए कुछ साहसिक कदम बढ़ाने के लिए तैयार न होंगी तो फिर पशु प्रवृत्तियों में उलझे हुए सामान्य आमन्त्रण को हम इस आधार पर अस्वीकार करदें कि “इससे क्षुद्र स्वार्थपरता की पूर्ति में कमी पड़ जायगी” तो भी फिर यही कहना चाहिए कि आदर्शों का जमाना लद गया
अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को हजार बार अपनी स्थिति पर विचार करना चाहिए और वह साहस जुटाना चाहिए जिसे अपनाने में ही उसके विशिष्ट जीवन की सार्थकता है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी तपश्चर्या युग साधना है। इससे बढ़कर पूजा, भजन, जप, तप, ज्ञान, ध्यान और दूसरा नहीं हो सकता कि आदर्शवादिता को जीवित रखने के लिए हम अपनी सारी शक्तियों को झोंक दें
यहाँ तो न्यूनतम की चर्चा हो रही है। एक छोटी इकाई हमें ऐसी बना लेनी चाहिए जिसके बारे में यह कहा जाय कि अपने आदर्शवाद की प्रतिष्ठापना में अग्रसर अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य अनुदान मानना पड़े और उसके लिए इतना तो करना ही है यह सोचना पड़े
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
एक ही नहीं अनेक और भी आधार एक के बाद एक, शृंखलाबद्ध रूप में उभरे है और उन सब का जन्म भी इसी दिन होता चला आया है। अखण्ड ज्योति बसन्त पंचमी को आरम्भ हुई। कुछ समय बाद उसी दिन युगनिर्माण अभियान ने जन्म लिया। गायत्री तपोभूमि जैसी विशालकाय संस्था का निर्माण एवं धर्मचेतना में संलग्न जीवित आत्माओं को एक सूत्र में पिरोकर एक परिवार के रूप में विकसित करने का प्रयास-सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ-जैसे अपने दो प्रमुख कार्य इसी दिन आरम्भ हुए
(12) युग - निर्माण पत्रिकाओं का चन्दा एवं युग-निर्माण साहित्य सम्बन्धी पत्र - व्यवहार युग-निर्माण योजना के पते से करना चाहिए। अखण्ड ज्योति एवं गायत्री साहित्य सम्बन्धी धनराशि अखण्ड ज्योति संस्थान के पते से भेजना चाहिए। दोनों स्थान दूर - दूर होने से एक साथ डाक आने में असुविधा होती है और अनावश्यक विलम्ब होता है
(9) ग्राहक बनाने के लिए टोली बनाकर यदि प्रभावशाली परिजन निकलें तो पुरानों से चन्दा वसूल करने और कुछ नये बनाने का अभियान बहुत सफल हो सकता है। इस वर्ष इस दिशा में प्रत्येक सदस्य को विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिए और इस प्रयोजन के लिए चन्दा वसूल करने की छपी रसीद बहियाँ अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से मंगा लेनी चाहिएं
पिछले पाँच वर्षों से अखण्ड ज्योति से पृष्ठों पर अध्यात्म सिद्धांतों को विज्ञान के आधार पर प्रतिपादित करने का प्रयास चला है। अब इस वर्ष उस प्रशिक्षण का दूसरा चरण बढ़ रहा है। जनवरी 73 से साधना एवं उपासना का विज्ञान समझाने वाली प्रक्रिया आरम्भ होगी
(10) बसन्त पर्व अपने मिशन का जन्म दिन है। उस अवसर पर श्रेष्ठतम श्रद्धांजलि अखण्ड ज्योति के अधिकाधिक सदस्य बढ़ाने के रूप में दी जानी चाहिए। इस संदर्भ में आगे बढ़ने की हम सबको परस्पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
इसके लिए अपने ही परिवार की ढेरों कन्याएं मिल सकती हैं। पर शान्ति कुंज के स्वल्प साधन को सुविस्तृत अखण्ड ज्योति परिवार की आवश्यकता को देखते हुए फिलहाल इतना ही बन पड़ा है कि एक-एक वर्ष का पाठ्य-क्रम रखा जाय जिसमें थोड़ा उथला ज्ञान सही पर अनेक बालिकाओं को लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। प्रयत्न यह किया जायेगा कि एक वर्ष में ही चार वर्ष की पढ़ाई जितना लाभ शिक्षार्थी को मिल सके
सन्तों, सुधारकों और अवतारों को बार-बार इसी एक प्रयोजन के लिए अपनी असाधारण भूमिका निभानी पड़ती है। अखण्ड ज्योति को यही सब करना पड़ा। उसने अपने जन्म दिन से लेकर आज पर्यन्त इसी मोर्चे पर कट-कटकर लड़ाई लड़ी है और जब तक वह जीवित है अन्तिम साँस तक अवतारी प्रवाह सदा एक ही लक्ष्य सामने लेकर आते रहे हैं “ समय की दार्शनिक भ्रष्टता को दूर कर उसे उच्चस्तरीय चिन्तन स्तर तक घसीट ले जाना” कहा जा सकता है। श्रेष्ठता का आधार सनातन है-शाश्वत है-निकृष्टता की दिशाएं भी गिनी-चुनी हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
प्रतिपादन की यथार्थता को सराहा गया। इस पसन्दगी और समर्थन का ही प्रभाव है कि अखण्ड ज्योति इतनी बड़ी संख्या में लोकप्रिय हो सकी और उसकी अनुवाद रूप में अँग्रेजी, गुजराती, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं में दूसरी पत्रिकाएँ, प्रकाशित करनी पड़ी। लाखों व्यक्ति अपने को युग-निर्माण मिशन का अनुयायी कहने लगे
अखण्ड ज्योति ने अपनी प्रिय परिजनों को सदा से यह कहा है- लोग बड़े निकम्मे हैं- लोक-प्रवाह पतन और नरक की दिशा में बह रहा है। तुम इनके साथ मत चलो-इनके प्रवाह में मत बहो- इनकी सलाह मत मानो अन्यथा इनके साथ-साथ तुम भी उस गर्त में औंधे मुँह गिरोगे जिसमें से उबरना अति कठिन है। लोग प्रशंसा करें तो समझना तुम किसी निन्दनीय आधार को पकड़े खड़े हो
यदि एक लाख ग्राहक है तो उसके पाठक दस लाख से कम नहीं होने चाहिए। जब तक रेडियो से कई व्यक्ति समाचार सुन सकते हैं तो एक अखण्ड ज्योति के कई पाठक क्यों नहीं होने चाहिए। घर के-बाहर के सभी क्षेत्रों में इस विचारधारा का-ज्ञान-गंगा का लाभ मिलना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
इस बार एक बार फिर पूरा साहस बटोरकर अन्तिम अनुरोध करने की बात सोची गई है और उसे पिछले अंक में व्यक्त किया गया है। कहा इतना ही गया है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक परिजन अपने दैनिक आवश्यक एवं व्यक्तिगत कामों में एक महत्वपूर्ण कार्य युग साधना को भी सम्मिलित कर लें। उसे व्यक्तिगत कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों में गिनलें। किसी पर अहसान समझ कर नहीं वरन् अनिवार्य कर्तव्य के रूप में स्वीकार करे
संघ शक्ति के अभाव में जो बन पड़ रहा है उसे दूसरों की दृष्टि में कितना ही महत्व क्यों ने मिल रहा हो अपनी दृष्टि में नगण्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के एक लाख परिजनों में से मात्र कुछ हजार की ही वै हलचलें है। यदि पूरा परिवार अपना एक एक बूँद सहयोग लेकर खड़ा हो जाय तो जो कुछ हो रहा है उसकी प्रगति सौ गुनी तीव्रगति पकड़ सकती है और जिसे आज आश्चर्य मात्र समझा जा रहा है वह कल चमत्कार बनकर सामने खड़ा हो सकता है
संगठन कर्ता टोलियों के कंधों पर दुहरा उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि वे (1) अखण्ड ज्योति ग्राहकों को संघ बद्ध करे और युग निर्माण शाखा बनाये। (2) उनके परिवारों की सक्रिय महिलाओं को आगे बढ़ाकर महिला जागरण अभियान की शाखा खड़ी कर दे। इन दोनों संगठनों को बसन्त पर्व तक अपने पैर मजबूत करने चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
मनुष्य जाति की सर्वोपरि समस्या नारी पुनरुत्थान के लिए व्यापक प्रयत्न संगठित आन्दोलन के रूप में ही हो सकते हैं। इसके लिए अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को कहा गया है कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को आगे धकेलकर छोटा-मोटा शाखा संगठन खड़ा करने और नियमित साप्ताहिक सत्संग चल पड़ने तक उसका पूरा सूत्र संचालन करें। पीछे तो प्रगति अपनी गति से घूमने लगेगा, तदनुसार उनका उत्तरदायित्व भी हल्का हो जायेगा
आशा की गई है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य महिला जागरण अभियान के लिए पूरी तत्परता व्यक्त करेगा। युग की इस महती आवश्यकता को पूरा करने में हम सब का भाव भरा साहसिक योग दान होना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
वहाँ एक हजार आहुतियों का हवन नित्य होता है। अखण्ड ज्योति कार्यालय में जो अखण्ड दीप जलता है उसके सम्मुख हम दोनों मिलकर कम से कम 60 माला जप अवश्य कर लेते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में 24 लक्ष्य पुरश्चरण हम लोग अभी भी अवश्य कर लेते हैं। छह वर्ष पूर्व तक अकेले आचार्यजी अपना एक महा पुरश्चरण एक वर्ष में स्वयं पूरा करते थे
ऐसी दशा में ग्राहक संख्या अब की अपेक्षा उसकी और भी घटेगी। यह बहुत ही अच्छा और सुविधाजनक होगा कि आगे से अखण्ड ज्योति के ग्राहक वे ही रहें जो अध्यात्म मार्ग के सच्चे जिज्ञासु हैं। मनमौजी लोग इसकी सदस्यता छोड़ दें। उनके कारण यहाँ की व्यवस्था में भी बड़ी गड़बड़ी पड़ती हैं
उसे आत्मदानी बच्चे उत्साहपूर्वक चला रहे हैं। अखण्ड ज्योति का उद्देश्य अध्यात्म और साधना है, वह उत्तराधिकार मेरे कंधे पर आता है तो उसे भी आचार्य जी के आशीर्वाद और पाठकों के सद्भाव पर विश्वास करते हुए मुझे किसी प्रकार शिरोधार्य करना ही हैं
इसके रहस्यों का उद्घाटन दक्षिणी मार्गी एवं वाममार्गी साधना क्षेत्र में एक आश्चर्य ही माना जायगा। इसी जनवरी से वह लेख माला चल पड़ेगी एवं आचार्य जी के सुविज्ञ सहचरों के लेख अखण्ड ज्योति में आने लगेंगे तो मेरा सम्पादन कार्य-भार बहुत कुछ सरल हो जायगा
अध्यात्म क्षेत्र के अविकारी पात्रों से भविष्य में अखण्ड ज्योति के उपयुक्त लेख बराबर भेजते रहने और उनकी परम्परा को यथावत् बनाये रखने का आचार्य जी स्वयं प्रबंध कर रहे हैं। वे स्वयं भी अब तक प्रकाश में न आये हुए गायत्री विज्ञान के अत्यंत रहस्यमय ग्रन्थ ‘विश्वामित्र कल्प’ में सन्निहित तत्वज्ञान पर प्रकाश डालने वाली एक लेख माला इसी जनवरी से आरंभ करेंगे। और वे कहीं भी रहें, हर महीने अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म तत्व ज्ञान पर प्रकाश डालने वाला एक लेख देते रहेंगे
यों अखण्ड ज्योति अब भी अध्यात्मिक है। अध्यात्म विषय रूखा होता है। उसमें सबकी रुचि नहीं होती
अखण्ड ज्योति का महान् मिशन गत 20 वर्षों में बहुत कुछ कार्य कर चुका। उसे सफल कहा जा सकता है। आचार्य जी के कार्य सफल रहे हैं इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं हैं
अखण्ड ज्योति कार्यालय अभी तक तपोभूमि से अलग इसलिए रखा गया था कि आचार्य जी की चिरकाल में यह इच्छा रही हैं कि भारतीय महिला समाज में भी धर्म जागृति के लिए कुछ ठोस कार्य होने चाहिएं। वे सदा से इस बात के पक्ष में रहे हैं कि पुरुषों और स्त्रियों का कार्यक्षेत्र अलग अलग हैं और वह अलग-अलग ही रहना चाहिए। दोनों क्षेत्रों को जब भी सार्वजनिक जीवन में इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया हैं तभी उसके दुष्परिणाम उपस्थित हुए हैं
अखण्ड ज्योति के सम्पादन के बारे में यही हैं कि मैं अपनी स्वल्प योग्यता को जानती हूँ, उससे चिंतित भी हूं। पर जो कार्य सौंपा गया है इसे ईश्वरीय आदेश मानकर शिरोधार्य करना ही ठहरा। युग निर्माण के लिए समाज सेवा और धार्मिक क्रान्ति के लिए जीवन यज्ञ का एवं गायत्री परिवार से संगठन के लिए गायत्री परिवार पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादन संबंधी यह परिवर्तन आचार्य जी ने क्यों किया इसकी एक विस्तृत पृष्ठभूमि है। उनका जीवन साधनामय जीवन है। सच्चे अर्थों में उनका अन्तः विश्लेषण किया जाय तो वे और कुछ पीछे-साधक पहले हैं
इसलिए अगले एक वर्ष में सप्त सूची संकल्प का शेष भाग पूरा करने के साथ साथ वे अपनी वर्तमान सीधी जिम्मेदारियों को दूसरों के हाथों सौंप देने में लगे हुए हैं। अखण्ड ज्योति का यह सम्पादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है
कुछ दिन पूर्व वे दोनों बच्चों को समाज को देकर मुझे अपने साथ लेकर धर्म प्रचार के लिए देशव्यापी पर्यटन की बात सोचते थे तब भी मेरी पूर्ण सहमति थी। अब उनने अपनी वर्तमान इच्छा मुझे अखण्ड ज्योति चलाते रहने और स्वयं अन्यान्य महत्वपूर्ण कार्यों की ओर अग्रसर होने का निश्चय किया तो इनसे भी मुझे क्यों इनकारी होती। मेरी अयोग्यता बाधक थी, उसी के कारण संकोच भी था, पर जब उनका आदेश आशीर्वाद सामने है तो दूसरी बात सोचने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। मैंने अपने इस छोटे से जीवन में ऐसी अगणित घटनाएं देखी हैं जिनमें उनके आशीर्वाद को पाकर तुच्छ व्यक्ति भी महान कार्य संपन्न कर सके हैं
(3) अखण्ड दीप और अखण्ड जप जहाँ रहे वहाँ के संस्कार लेकर ही ‘अखण्ड ज्योति’ निकले
हमारे छोटे भौतिक परिवार-की जिसमें मैं, आचार्यजी, मेरी सास तथा दो बच्चे कुल पाँच प्राणी हैं-की परिस्थितियों तथा गतिविधियों से परिजन भली प्रकार परिचित हैं। कुछ समय से आचार्य जी ने अखण्ड ज्योति का कार्य अपने जिम्मे लेने के लिए मुझसे कहा था, पर इन दिनों जो कार्य मेरे ऊपर या उसकी व्यस्तता, अपनी स्वल्प सामर्थ्य तथा अनुभवहीनता के कारण मुझे भारी संकोच था और मैं उनसे अपनी कमजोरियों की ओर ध्यान दिला कर यह बराबर कहती रही है कि यह कार्य मेरे बस का नहीं है। इतना बड़ा कार्य भार अपने कंधे पर उठाने में मुझे भारी झिझक, संकोच और भय दबा रहा था अपनी उस मानसिक स्थिति को मैं बराबर आचार्यजी के सामने रख रही थी, वे भी वस्तुस्थिति से अपरिचित नहीं हैं, अन्त में जो निर्णय उनने किया, जो आदेश उन्होंने दिया। उसे शिरोधार्य करना ही मेरे लिए एकमात्र मार्ग था
बहुत दिनों से यही मेरी कार्य शैली रही है। अब उस कार्य शैली से भिन्न ‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादन के कार्य से भी मुझे संलग्न देखकर पाठकों को निश्चय ही आश्चर्य होगा
‘अखण्ड ज्योति’ के इस अंक पर संपादक के स्थान पर मेरा नाम पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा। अपने परिवार के अधिकाँश सदस्य ऐसे हैं जो बहुधा मथुरा आते रहते हैं और मेरे कार्य क्षेत्र से भली प्रकार परिचित हैं। काफी दिन हो गये परिवार के परिजनों की भोजन व्यवस्था का कार्य मेरे जिम्मे है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
अखण्ड ज्योति के गत अंकों में व्रतधारी आन्दोलन की संक्षिप्त रूप रेखा पाठकों को समझाने का प्रयत्न किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि युग निर्माण की इस योजना का सर्वत्र हार्दिक स्वागत किया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार प्रगतिशील धर्मसेवी सत्पुरुषों का संगठन है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
गत बीस वर्षों में ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार द्वारा सद्विचारों के प्रचार एवं सज्जनों को इस पत्रिका के माध्यम से एक संगठित सूत्र में पिरोने का काम किया है। यह कार्य सचमुच ही महत्वपूर्ण है। पर केवल इतने तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा
खेती सूखती रहे और नहर का पानी, सींचने के लिए उपलब्ध न होने दे तो उस अफसर की निन्दा ही की जायगी। अखण्ड ज्योति परिवार की भी यही स्थिति है, उसके पास वह व्यक्ति हैं-वह सामान है-जिनके द्वारा इस महान राष्ट्र की महान नैतिक एवं साँस्कृतिक परम्पराओं को पुनः प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। यदि हम लोग आलस्य एवं उपेक्षा वश अपने कर्तव्य में विमुख होते हैं तो कर्तव्यहीनता के वैसे ही अपराधी बनते हैं जैसा कि एक फौजी कप्तान युद्ध के आवश्यक कर्तव्यों की उपेक्षा करने पर ‘कोर्ट मार्शल’ का दंड पात्र बनता है। उपेक्षा, लापरवाही और कर्तव्य हीनता भी विशिष्ट व्यक्तियों के लिए उतना ही बड़ा अपराध है जितना सामान्य व्यक्तियों के लिए चोरी, लूट, हत्या आदि दुष्कर्मों को भयंकर कुकृत्य समझा जाता है
सद्ज्ञान की—विवेक एवं सद्विचारों की देवी—गायत्री—और सत्कर्म-परमार्थ एवं आदर्शवाद के प्रतीक-यज्ञ-देवता को उपास्य मानकर यह परिवार अपने विचारों और कार्यों को उस दिशा में प्रस्फुटित करता है, जिसमें मानव जीवन की सच्ची सफलता सन्निहित है। अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा ऐसी ही चेतना एवं प्रेरणा देने का प्रयत्न किया जाता रहता है
पता— अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा
(1) प्रकाशन का स्थान-अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा
अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन अब साधारण स्वाध्यायशील धर्म प्रेमी ही न रहें ऐसी हमारी आंतरिक इच्छा है इस संस्था ने युग निर्माण का परम पुनीत व्रत लिया है इसे सफल बनाने में हम सब शक्ति भर प्रयत्न करें
अखण्ड ज्योति के गत अंक में पाठकों और परिजनों को केवल एक पत्रिका के पाठक न रह कर नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान मिशन को सफल बनाने में सहयोग देने का आह्वान किया गया। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसका समुचित स्वागत किया है
जो लोग अखण्ड ज्योति को एक अखबार मानते हैं और इसके पाठकों को “कुछ बाँचने के शौकीन” मानते हैं वे वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित ही कहे जा सकते हैं। सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है। इस प्रकार की एक–सी अभिरुचि एवं प्रकृति के लोगों का एक कौटुम्बिक संगठन ही अखण्ड ज्योति परिवार है। सद्ज्ञान की—विवेक एवं सद्विचारों की देवी—गायत्री—और सत्कर्म-परमार्थ एवं आदर्शवाद के प्रतीक-यज्ञ-देवता को उपास्य मानकर यह परिवार अपने विचारों और कार्यों को उस दिशा में प्रस्फुटित करता है, जिसमें मानव जीवन की सच्ची सफलता सन्निहित है
अखण्ड ज्योति परिवार ने जो व्रत लिया है क्या वह उसके लिए कठिन है? नहीं-कदापि नहीं! प्रबुद्ध अन्तःकरण से सम्पन्न धर्म-परायण आत्माएं ही सदा से चारित्रिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का कार्य सम्पन्न करती रही हैं। इतिहास की इस परम्परा को दुहराना हमारे लिए कठिन है यह सोचना बिलकुल अनुचित है। यह कार्य तो ब्राह्मण संस्थाएं ही पूर्ण करती रही हैं
अखण्ड ज्योति परिवार को अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान है। शत्रु चढ़ आये और सेना हाथ पर हाथ रखे बैठी रहे, आग से घर जलते रहें और ‘फायर ब्रिगेड’ वाले खड़े तमाशा देखते रहें, दंगा होता रहे और पुलिस वाले हंसते रहें, तो यह उसके लिए एक बड़ी लज्जा की बात होगी। जो जिस कार्य का विशेष रूप में उत्तरदायी है उसकी उपेक्षा असहनीय होती है
हमारा उदीयमान राष्ट्र- अज्ञानान्धकार की लम्बी रात्रि को पार करके आशामयी ऊषा का दर्शन करने में समर्थ हुआ है। इस पुनीत बेला में जब सब ओर निर्माण की पुकार है तब हम अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन भी चुपचाप नहीं बैठ सकते। पिछले अन्धकार युग में जहाँ हमारी विभिन्न प्रकार की क्षति हुई है वहाँ नैतिक और साँस्कृतिक क्षति भी कम नहीं हुई। इन जख्मों को पूरा करने के लिए जिस मरहम की आवश्यकता है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती
अखण्ड-ज्योति परिवार विवेकवानों का-सहृदय और सद्भावना युक्त सज्जनों का एक कौटुम्बिक संगठन है। जो लोग अखण्ड ज्योति को एक अखबार मानते हैं और इसके पाठकों को “कुछ बाँचने के शौकीन” मानते हैं वे वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित ही कहे जा सकते हैं। सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है। इस प्रकार की एक–सी अभिरुचि एवं प्रकृति के लोगों का एक कौटुम्बिक संगठन ही अखण्ड ज्योति परिवार है
पता— अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा
अब इस संस्था की ओर से चार पत्र प्रकाशित होने लगे हैं (1) अखण्ड ज्योति ता. 1 को (2) जीवन यज्ञ सामाजिक अंक ता. 8 को (3) गायत्री परिवार पत्रिका ता.15 को (4) जीवन यज्ञ धर्म कथा अंक ता. 23 को। इस प्रकार हर हफ्ते एक पत्र प्रकाशित होता है। प्रत्येक अंक में इतने पृष्ठ होते हैं कि एक घंटा प्रतिदिन उन्हें पढ़ा जाय तो एक सप्ताह लग जाता है
सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है। इस प्रकार की एक–सी अभिरुचि एवं प्रकृति के लोगों का एक कौटुम्बिक संगठन ही अखण्ड ज्योति परिवार है। सद्ज्ञान की—विवेक एवं सद्विचारों की देवी—गायत्री—और सत्कर्म-परमार्थ एवं आदर्शवाद के प्रतीक-यज्ञ-देवता को उपास्य मानकर यह परिवार अपने विचारों और कार्यों को उस दिशा में प्रस्फुटित करता है, जिसमें मानव जीवन की सच्ची सफलता सन्निहित है। अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा ऐसी ही चेतना एवं प्रेरणा देने का प्रयत्न किया जाता रहता है
सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के मंगलाचरण के साथ-साथ अखण्ड ज्योति परिवार ने राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का व्रत लिया है। अपना परिवार इस व्रत को लेकर ‘व्रतधारों’ बना है। इस व्रत से हम सब बँधे हुए हैं
इसी प्रकार जो विवेकशील धर्म प्रेमी अपनी ही आत्मा से धर्म की ज्योति जलाते रहे दूसरों को उस स्वर्गीय स्थिति का आस्वादन कराने के लिए कुछ प्रयत्न न करें—उस धार्मिकता को धिक्कार है। इस आत्म धिक्कार से बचने के लिए ही अखण्ड ज्योति परिवार की प्रयुद्ध आत्माओं ने धर्म जागरण के लिए व्रत लिया है। हमारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी एवं कर्तव्य बुद्धि ने ही हम सबको व्रतधारी बनने के लिए प्रेरित किया है। यह कोई आवेश या अत्युत्साह नहीं है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
अपना निज का अच्छा प्रेस है। ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ निकलती है तथा अगले मास में ‘जीवन यज्ञ’ नामक एक उच्च कोटि का पाक्षिक पत्र निकलने जा रहा है। इन पत्रिकाओं के परिवर्तन में सैकड़ों पत्र पत्रिकाएं आते हैं, जिन्हें देखने, पढ़ने और समझने से पत्रकारिता सम्बन्धी अनेक बातें सहज ही समझ में आ सकती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
संस्था के अपने तीन पत्र निकलते हैं। ‘जीवन यज्ञ’ महीने की 8 तथा 23 को निकलता है, अखण्ड ज्योति 1 को और गायत्री-परिवार-पत्रिका 15 को इस प्रकार प्रति सप्ताह एक नया पत्र पहुँचता है। अपने संगठन क्षेत्र में आरम्भ में 7 व्यक्ति लेने चाहिए। इन अंकों को एक-एक दिन एक-एक के यहाँ देने और दूसरे दिन लेने जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-December
वे जिस कार्य में हाथ डालते हैं वह पूरा होता ही चला जाता है उस खुले रहस्य को हममें से हर कोई भली भाँति जानता है। उनके हाथों में अखण्ड ज्योति का भविष्य और भी अधिक उज्ज्वल होने की हर कोई आशा कर सकता है। पर जब वे अपने उत्तरदायित्व को छोड़ रहे हैं और छोड़ कर मेरे दुर्बल कंधे पर डाल रहे हैं तब तो सहज ही अनेकों आशंका मन में उठने लगती हैं और भय होने लगता है कि गत बीस वर्ष का इतिहास कही आगे धुँधला पड़ जाय। इधर से उधर परिवर्तन में कहीं इस दीपक की लौ मन्द न होने लगे, कहीं बुझ जाने का अवसर उपस्थित न हो जाए
जो उच्चकोटि के विचार अब तक दिये जाते रहे हैं, उससे एक दर्जे और भी ऊंचे विचार पाठकों को मिलेंगे। अखण्ड ज्योति का भविष्य अन्धकारमय होने का किसी को कल्पना तक नहीं करनी चाहिए। जो लक्ष अभी सामने पड़ा है उसे पूरा होने तक यह दीपक जलता ही नहीं रहेगा वरन् और भी ऊंची बत्ती से, और भी ऊंची लौ के साथ जलेगा
अब चूँकि उनका सारा समय ही अध्यात्म साधना में लगेगा इसलिए जून के बाद से योग और आध्यात्म के दक्षिण मार्गों और वाममार्गी साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे
अखण्ड ज्योति को उन्होंने तप साधना का माध्यम बनाकर उचित ही किया है। युग निर्माण के सामाजिक कार्यक्रमों को अब गायत्री पत्रिका पूरा करेगी। साधना और तपस्या का मार्ग दर्शन अखण्ड ज्योति के जिम्मे छोड़ दिया गया है
युग निर्माण के सामाजिक कार्यक्रमों को अब गायत्री पत्रिका पूरा करेगी। साधना और तपस्या का मार्ग दर्शन अखण्ड ज्योति के जिम्मे छोड़ दिया गया है। आगे से उसमें इसी साधना के तत्वाधान पर आध्यात्मिक लेख रहा करेंगे। वह साधकों के आध्यात्मिक पथ के पथिकों के काम की चीज ही रह जायेगी
इस लम्बे समय में कितनी यात्रा की जा चुकी इस पर दृष्टिपात करने से परिवार के प्रत्येक सदस्य का मस्तक गर्व से ऊँचा हो सकता है। अखण्ड ज्योति पत्रिका अब से 20 वर्ष पूर्व आरम्भ की गई थी। तब परमपूज्य आचार्य जी के मस्तिष्क में एक ही आकाँक्षा थी कि इस देवभूमि भारत में पुनः देवत्व की अमृतमयी सुरसरी वैसे ही प्रवाहित हो जैसे प्राचीन काल के ऋषि युग में यहाँ प्रवाहित होती थी और उस अकृत जल से अभिसिंचित होकर इस उद्यान का प्रत्येक प्रफुल्लित पौधा-इस देवलोक का प्रत्येक मानव अपने यज्ञ विचारों की सुगन्ध तथा श्रेष्ठ कार्य के सौंदर्य द्वारा सर्वत्र आनन्द एवं उल्लास बखेरता था
अखण्ड ज्योति लकड़हारे के हाथ की कुल्हाड़ी की तरह आचार्य जी के महान मनोरथों को पूरा करने में भारी योगदान करती रही है। उसने एक हृदय में जलती हुई आम को प्रदीप्त ही नहीं किया वरन् उसकी चिंगारियाँ उड़ाकर अनेकों जगह आम की ज्वालाएं जलाई हैं। यह दीपक एक ही जगह जलता नहीं रहा है वरन् असंख्य दीपक इससे जले हैं उसकी क्रमबद्ध पंक्ति आज जगमग करती हुई दीपावली की तरह चारों ओर दीख रही है
इस अंक के साथ ‘अखण्ड ज्योति’ को 20 वर्ष पूरे होकर 21 वाँ आरम्भ होता है। इस लम्बे समय में कितनी यात्रा की जा चुकी इस पर दृष्टिपात करने से परिवार के प्रत्येक सदस्य का मस्तक गर्व से ऊँचा हो सकता है। अखण्ड ज्योति पत्रिका अब से 20 वर्ष पूर्व आरम्भ की गई थी
विषय परिवर्तन की दृष्टि से अगले वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक घटना उचित है और आवश्यक भी। इस एक कमी के अतिरिक्त अखण्ड ज्योति का भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल है ऐसा आश्वासन पूज्य आचार्यजी को प्राप्त हो चुका है। भारत की इस पुण्य भूमि में धर्म भावनाओं का आवश्यक विस्तार होना है, यह होगा, होकर रहेगा। इस पुण्य श्रेय में अखण्ड ज्योति अगले वर्षों में भी योगदान देगी
गत बीस वर्षों का अतीत बहुत ही उज्ज्वल रहा है पर आगे जो और भी उनके गुनी कठिन मंजिल उपस्थित है उसे पूरा करने में अखण्ड ज्योति का योगदान और भी अधिक मात्रा में अपेक्षित है। पर यकायक जो परिवर्तन इस समय हुआ है उसे देखते हुए मेरी ही तरह अनेकों पाठकों का भी जी कमजोर पड़ता है। परम पूज्य आचार्य जी शारीरिक दृष्टि से बहुत दुर्बल हैं पर उनके रोम-रोम में से शक्ति का श्रोत बहता है
पता - अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा
आगे भी इस शान में कोई कमी आवेगी ऐसी संभावना नहीं है, यह आश्वासन प्राप्त होने के बाद अब अपनी सारी आशंकाएं दूर हो गई हैं। परिजनों को मेरी व्यक्तिगत कमजोरियों को, अयोग्यताओं को ध्यान में रख कर संभव है, अखण्ड ज्योति के भविष्य में बारे में कुछ चिन्ता हुई हो, पर हम लोग तो बाँस की तुच्छ बंशी मात्र हैं। बजाने वाले की कला अमर है उसकी ध्वनि लहरी में कभी-कभी पड़ने वाली नहीं है। अखण्ड ज्योति अपना विनम्र प्रयत्न वैसा ही जारी रखेगी जैसा गत बीस वर्षों में रखती आई है
भारत की इस पुण्य भूमि में धर्म भावनाओं का आवश्यक विस्तार होना है, यह होगा, होकर रहेगा। इस पुण्य श्रेय में अखण्ड ज्योति अगले वर्षों में भी योगदान देगी। पिछले बीस वर्ष उसके बहुत शानदार रहे। आगे भी इस शान में कोई कमी आवेगी ऐसी संभावना नहीं है, यह आश्वासन प्राप्त होने के बाद अब अपनी सारी आशंकाएं दूर हो गई हैं
विषय परिवर्तन की दृष्टि से अगले वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक घटना उचित है और आवश्यक भी। इस एक कमी के अतिरिक्त अखण्ड ज्योति का भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल है ऐसा आश्वासन पूज्य आचार्यजी को प्राप्त हो चुका है। भारत की इस पुण्य भूमि में धर्म भावनाओं का आवश्यक विस्तार होना है, यह होगा, होकर रहेगा
लेखक कितने ही इस देश में मौजूद हैं। अखबार निकालने वालों और पुस्तकों की रचनाएं करने वालों की भी कमी नहीं है, ‘अखण्ड ज्योति’ की या यहाँ के प्रकाशन की उन लोगों की कृतियों से तुलना की जाए तो अपना पलड़ा हर दृष्टि से हलका ही रहेगा। पर बात कुछ और ही थी। पत्रिका निकाली गई केवल विचारों के विस्तार की सुविधा के लिए
पिछले दो महीनों में हजारों पत्र पाठकों ने ऐसे अनुरोध भरे पत्र भेजे हैं कि जिनमें मुझसे कहा गया है कि आचार्य जी की संभावित यात्रा को रोका जाय, उन्हें अभी न जाने दिया जाए, अखण्ड ज्योति की जिम्मेदारी से उन्हें मुक्त न होने दिया जाए। परिजनों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुये मैंने आचार्यजी से यह अनुरोध किया था। पर उनका जो उत्तर है उसके पीछे जो भारी बल है उसे देखते हुए निरुत्तर ही होना पड़ता है
बजाने वाले की कला अमर है उसकी ध्वनि लहरी में कभी-कभी पड़ने वाली नहीं है। अखण्ड ज्योति अपना विनम्र प्रयत्न वैसा ही जारी रखेगी जैसा गत बीस वर्षों में रखती आई है। अब तक वह सर्व साधारण की भी पत्रिका थी अब वह आध्यात्म मार्ग के जिज्ञासुओं एवं साधना पक्ष के पथिकों के मार्ग दर्शन करने के लिए निकलेगी। इसी लक्ष के आधार पर व्यक्ति का तथा विश्व का सच्चा कल्याण सन्निहित भी है
उन्होंने मुझसे कहा-तुम्हें केवल अखण्ड ज्योति का व्यवस्थापक मात्र बनाया गया है, जो प्रेरणाशक्ति अब तक उसके द्वारा प्रवाहित होती रही है वह हमारे न रहने पर भी यथावत् जारी रहेगी। जो उच्चकोटि के विचार अब तक दिये जाते रहे हैं, उससे एक दर्जे और भी ऊंचे विचार पाठकों को मिलेंगे। अखण्ड ज्योति का भविष्य अन्धकारमय होने का किसी को कल्पना तक नहीं करनी चाहिए
पिछले बीस वर्षों में ‘अखण्ड ज्योति’ केवल अपने अंक निकालती रही है। पाठकों का मनोरंजन करने वाले लेख ही छापती रही हो ऐसी बात नहीं है। उसने असंख्यों निष्प्राणों में प्राण फूँके हैं और अगणित मनुष्यों का कायाकल्प किया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
पता- अखिल भारतीय अखण्ड ज्योति गायत्री प. शा.
द्वारा श्री रामभाई चश्मा वाला
मार्डन आप्टिकल्स गान्धी रोड़
पोरबन्दर (गुजरात)
इस अवसर पर केवल उन्हें ही आमन्त्रित किया गया है जो हमारे अन्तरंग से, दर्द से, मिशन से, परिचित हैं और उनसे सहानुभूति रखते हैं। अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य इसी स्तर के होंगे। वे आ सकते हैं, और उन्हें भी आग्रह पूर्वक साथ ला सकते हैं जो नियमित सदस्य तो नहीं हैं पर मिशन की क्रिया पद्धति और विचारणा से परिचित हैं। उसे पढ़ते -सुनते रहे हैं और उपयोगिता से सहमत हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
आगन्तुक 20 को दो पहर बाद जा सकेंगे। इन पंक्तियों में अखण्ड ज्योति परिजन अपने लिए विशेष निमंत्रण नोट करले और यदि बिलकुल ही असंभव न हो तो प्रयत्न करें कि उस अवसर पर किसी तरह मथुरा पहुँच ही जायें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
किसी भी एक बिन्दु को ले लें और कल्पना करे कि वहाँ सभी विकरण आड़ी टेढ़ी दिशा में गमन कर रहे है तो पता चलेगा कि एक ही स्थान पर सूर्य प्रकाश का कण चन्द्रमा के कण को ,चंद्रमा का बृहस्पति के कण को बृहस्पति का शनि के कण को पार कर रहा होगा-फिर यह क्रम निरन्तर चल रहा होगा अर्थात् सिनेमा के पर्दे की तरह की गति और दृश्य उस समय हर ग्रह-नक्षत्र के अंतर्वर्ती क्षेत्र का विद्यमान होगा। जिस प्रकार सूर्य के रासायनिक आकाश मंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, सोडियम, सिलिकन, गन्धक, टाइटेनियम, मैंगनीज, कोबाल्ट, निकेल जिंक आदि 24 रासायनिक तत्व विद्यमान है उसी प्रकार हर ग्रह के आकाश क्षेत्र में भिन्न जाति के आकाश मंडल है यह तत्व ही ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं विकिरण उनका प्रभाव क्षेत्र लिये होगे अर्थात् वातावरण के हर बिन्दु पर विश्व का हर दृश्य विद्यमान है मूल चेतना उनमें से अपनी इच्छा (इच्छा आकाश स्वरूप है) यह अखण्ड ज्योति में पहले एक विस्तृत लेख में दिया जा चुका है। और वासना के क्षेत्र में विद्यमान रहती होगी तो कुछ आश्चर्य नहीं यदि वह पृथ्वी के ही किसी आकाश में रहकर भी किसी अन्य ग्रह दृश्यों और रासायनिक अनुभूतियों का रस ले रही हो। भले ही जैसा कि योगवशिष्ठ ने उनके काल और ब्रह्माण्ड की कल्पना की है उनका संसार कैसा भी क्यों न हो पर उस अणु में भी जीव-चेतना के लिये विराट् ब्रह्माण्ड दिखता होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
तमाम जीवन में उसने 1606000 पंक्तियाँ लिखीं। इतनी कविताओं की-पंक्तियाँ यदि छपाई जाये तो अखण्ड ज्योति साइज की 5577 फर्मे अर्थात् 44616 पेज के बराबर मोटी पुस्तक बैठेगी। इस मोटाई का अनुमान लगाना हो तो अखण्ड ज्योति के 58 वर्ष 1 माह के समस्त अंकों को एक के ऊपर एक चुनना होगा। यह ऊँचाई लगभग 25 फुट बैठेगी
इतनी कविताओं की-पंक्तियाँ यदि छपाई जाये तो अखण्ड ज्योति साइज की 5577 फर्मे अर्थात् 44616 पेज के बराबर मोटी पुस्तक बैठेगी। इस मोटाई का अनुमान लगाना हो तो अखण्ड ज्योति के 58 वर्ष 1 माह के समस्त अंकों को एक के ऊपर एक चुनना होगा। यह ऊँचाई लगभग 25 फुट बैठेगी। जबकि कविताओं में कोई भी पंक्ति दुबारा उपयोग में नहीं लाई गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
स्वप्नों का सत्य होना उसके स्पष्ट प्रमाण है वैसे प्रमाण सैंकड़ोँ संग्रहित है वह अखण्ड ज्योति में पहले भी छपे आगे भी छपते रहेंगे पर उनकी सार्थकता तभी है जबकि हम आत्मा की प्राप्ति में मन के महत्व को समझें और उसे शुद्ध पवित्र बनाने के संकल्प और साधनाओं का अभ्यास करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्म पत्नी ने असाधारण योगदान दिया है
अखण्ड ज्योति अ॰ भा0 गायत्री परिवार शाखा
श्रीमंस विद्यालय - पोलोग्राउड के सामने
बड़ौदा (गुजरात)
अब तो वह दीपक दीपावली के दीप पर्व की तरह अपनी नस-नाड़ियों में जगमगाता दीखता है। अपनी भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही जब 32 वर्ष पूर्व यह पत्रिका प्रारम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगता था- पसन्द आता था “ अखण्ड ज्योति” रख दिया। हो सकता है उसी भावावेश में प्रतिष्ठापित पत्रिका का छोटा सा विग्रह संसार में मंगलमय प्रगति की प्रकाश किरणें बिखरने में समर्थ और सफल हो सका हो
इन अनुभूतियों, आत्मबल, दिव्य दर्शन और अन्तः उल्लास को विकासमान बनाने में इतनी सहायता पहुँचाई जिसका कुछ उल्लेख नहीं किया जा सकता। हो सकता है यह कल्पना ही हो पर सोचते जरूर है कि यदि यह अखण्ड ज्योति जलाई न गई होती तो पूजा की कोठरी के धुँधलेपन की तरह शायद अन्तरंग भी धुँधला बना रहता। अब तो वह दीपक दीपावली के दीप पर्व की तरह अपनी नस-नाड़ियों में जगमगाता दीखता है। अपनी भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही जब 32 वर्ष पूर्व यह पत्रिका प्रारम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगता था- पसन्द आता था “ अखण्ड ज्योति” रख दिया
हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि जल का संयोग रेल इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करना हो। हो सकता है अंतर्ज्योति जगाने में इस ब्राहा ज्योति से कुछ सहायता मिलती हो, जो ही अपने को इस अखण्ड ज्योति में भावनात्मक प्रकाश, अनुपम आनन्द, उल्लास से भरा पूरा मिलता रहा। बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर ही बाहर जलता दीखा, पीछे अनुभूति बदली और लगा कि हमारे अन्तःकरण में यही प्रकाश ज्योति ज्यों की त्यों जलती है और जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योर्तिमय हो रहा है। शरीर, मन और आत्मा में- स्थूल सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता का ध्यान करते रहे हैं सम्भवतः वह इस अखण्ड दीपक की ही प्रतिक्रिया रही होगी
अभी भी स्थिति ऐसी नहीं है जिस पर चिन्ता न की जा सके। अखण्ड ज्योति के 3 पेज पढ़ने में जितना समय लगेगा उतने समय में मध्य संसार में कही न कही 25 हत्यायें हो चुकी होती है। प्रत्येक दिन हत्याओं का विश्व औसत 1440 है जो बहुत चिन्ताजनक है
अखण्ड ज्योति गायत्री परिवार शाखा
5, विट्ठलवाडी, झवेरी बाजार, दूसरी मंजिल
बम्बई- 2 फोन न॰ 299672
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
" योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाशपुंज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव तो अगले दिनों युगसृजन के रूप में देखने को मिलेगा। "
" अखण्ड ज्योति बड़ी संख्या में छपती है। वह हर महीने लाखों-करोड़ों के अंतराल को नियमित रूप से झकझोरती है। इसका प्रभाव-परिणाम भी हाथों-हाथ सामने आता रहता है
"अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन के पीछे पत्रिका निकालने भर का शौक कम नहीं कर रहा था वरन् उसके साथ लोकमानस के परिष्कार का अत्यंत विशाल और कष्टसाध्य लक्ष्य था। "
प्रस्तुत लेख में इसी एक अंक के विभिन्न लेखों से उद्धृत अंश यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे है। इससे न केवल हमारी दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान हमें प्राप्त होगा, हमें ऐसी खुराक भी मिलेगी, जो आज के घटाटोप भरे अंधकार जैसी परिस्थितियों में संजीवनी का कार्य करेगी, अखण्ड ज्योति के महात्म्य को आत्मसात करके नियमित स्वाध्याय हेतु प्रेरित करेगी एवं विधेयात्मक चिंतन को गतिशील करेगी
" युगधर्म- के निर्वाह हेतु समय की चुनौती के रूप में अनिवार्य है युगपरिवर्तन। इस परिवर्तन के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसके सुविस्तृत होते हुए भी सरंजाम जुटाने का संकल्प अखण्ड ज्योति ने अब तक पूरा किया है और वह व्यक्तिविशेष का सञ्चालन उठ जाने पर भी अनंत कल तक अपनी ज्योतिज्वाला ज्वलंत रखे रहेगी। "
" अखण्ड ज्योति की अनेक प्रेरणाओं और स्थापनाओं में से एक शांतिकुंज भी है, जिसे तीर्थपरंपरा का ऋषियुग की रीति-नीति का सार-संक्षेप समझा जा सकता है। यहाँ वे सभी प्रवृत्तियाँ चलती है, जिनके आधार पर इन दिनों भी इन्हीं कारणों से ऋषियुग का साक्षात्कार किया जा सकता है। "
मंदामरुत शीतलता लिए हुए प्रवाहित होने लगता है। इसी प्रकार महाप्रज्ञा की, भावश्रद्धा की अखण्ड ज्योति का जब और जहाँ अवतरण होता है, वहां उसका प्रभाव सुदूर क्षेत्रों के अनेकानेक पक्षों को प्रभावित करते देखा जा सकता है। "
" अखण्ड ज्योति की ऊर्जा ने अनेकों में प्राण-संचार किया है। चौबीस लाख की गणना तो सदस्यों-पाठकों की है। फिर उनका संपर्क-सान्निध्य-परामर्श भी तो कम करता है और एक से अनेक होने की पद्धति का अनुसरण करते हुए यह परिकर करोड़ों की संख्या को पर कर चुका है
परमपूज्य गुरुदेव ने जनवरी, १९८८ की अखण्ड ज्योति पत्रिका को 'ज्योति जागरण विशेषांक' के रूप में लिखा था। प्रस्तुत लेख में इसी एक अंक के विभिन्न लेखों से उद्धृत अंश यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे है। इससे न केवल हमारी दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान हमें प्राप्त होगा, हमें ऐसी खुराक भी मिलेगी, जो आज के घटाटोप भरे अंधकार जैसी परिस्थितियों में संजीवनी का कार्य करेगी, अखण्ड ज्योति के महात्म्य को आत्मसात करके नियमित स्वाध्याय हेतु प्रेरित करेगी एवं विधेयात्मक चिंतन को गतिशील करेगी
" इन परिस्थितियों में अखण्ड ज्योति जीवित कैसे है, यह व्यवसायिक दृष्टि से एक आश्चर्यचकित कर देने वाला प्रश्न है। दान-अनुदान के रूप में कोई राशि स्वीकार न करने पर भी वह कागज, छपाई, पोस्टेज का खर्च किसी प्रकार निकाल लेती है। इस रहस्य की बारीकी में जाने वालों को कुछ समाधानकारक रहस्य और तथ्य हस्तगत हो सकते है
" अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र नहीं है। उसमें लेखक का-सूत्र संचालक का दिव्यप्राण भी आदि से अंत तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी ने इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने बड़े ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी-अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयाइयों की की ही यह विशेषता है की जिस लक्ष्य को उन्होंने हृदयंगम किया है, उसके लिए निरंतर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है
वह उसके अंतराल में बसने वाला निराकार स्वरूप है। इसी का साकार स्वरूप है 'अखण्ड ज्योति' जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बनाकर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह मन जाना चाहिए की खंडित न होने वाली निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक को कलेवर प्रदान किया गया अखण्ड ज्योति के रूप में। "
अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के एक पैकेट जैसा लगता है, पर वास्तविकता यह है की उसके पृष्ठों पर युगदृष्टा-परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना लहराती है, पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। लेखनी का मार्गदर्शन-अनुग्रह-अवतरण किसी ऊपर की सत्ता से ही होता है। वस्तुतः स्वयं पूज्यवर के शब्दों में, यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित-प्रतिनिधि सत्ताओं द्वारा सूत्र-सञ्चालन है, अन्यथा इसके माध्यम से असंभव दिख पड़ने वाला युग-परिवर्तन जैसा कार्य संभव नहीं हो पता
" अखण्ड ज्योति के विगत ५२ वर्ष ( आज प्रायः ६३ वर्ष ) के उत्पादन में बहुत बड़ी संख्या उन चन्दन वृक्षों की है, जिनकी सुगंध और शोभा से सारा वातावरण महक उठा है। उन्हें शांतिकुंज हरिद्वार में, गायत्री तपोभूमि मथुरा में तथा सहस्रों शक्तिकेंद्रों में कम करते देखा जा सकता है। इन सबके पारस्परिक मिलन तो यदाकदा होते है
उसे इन सबकी सम्मिलित सम्पदा भी कहा जाता सकता है। अखण्ड ज्योति को ज्ञानगंगा कहा जाये, तो मानना पड़ेगा की वह किसी व्यक्ति या शक्ति का एकाकी प्रयास नहीं है। उसके साथ अनेक मूर्धन्य शक्तिकेंद्रों की दिव्यचेतना जुड़ती चली गई है। "
जब व्यवसायिक दृष्टिकोण और रीति-नीति अपनाकर निकालने वाले पत्रों का हाल बुरा है, तो उन व्रतशीलों के लिए तो कहा ही क्या जाये जिनका प्रकाशन कल के बाद अपवाद रूप में कुछ वर्षों के बाद से ही विज्ञापन न लेने का संकल्प रहा है। आजीविका हेतु विज्ञापनों से कमाना अखण्ड ज्योति को अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं लगा। इसलिए उसने इस नीति का आरम्भ से ही परित्याग कर दिया। यह जानबूझकर आर्थिक संकट मोल लेना था
" अखण्ड ज्योति की प्रधानचेतना विचारक्रांति अभियान के रूप में फूटी है। उसने त्रिदेव की भांति, त्रिपदा गायत्री की भांति, तीनों लोकों और तिन शरीरों की भांति बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रांति का पांचजन्य बजाया है और उस तुमुलनाद ने न केवल अपने देश में, वरन् समस्त विश्व के वातावरण में अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न की है। उसे विचारशीलों का परिपूर्ण सहयोग भी मिलेगा, व्यक्ति-निर्माण, परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण उसके त्रिविध क्रिया−कलाप है
इन सभी को दूसरे शब्दों में ' चेतना विस्तार केंद्र ' कहना चाहिए। हरिद्वार का शांतिकुंज गायत्रीतीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई से दीखते है, पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो, वे सभी अखण्ड ज्योति के अंडे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। "
" अखण्ड ज्योति की प्रकाशप्रेरणा से अनेकों महत्त्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा-संस्थानों का निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ संपन्न कर रहे है। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि, युगनिर्माण योजना से प्रज्ञापरिवार का हर सदस्य परिचित है
" अखण्ड ज्योति को एक प्रतीक माना जाये, एक आदर्श कहा जाये या उसे उसके आराधक का प्रतिनिधि स्वरूप माना जाये, हर हालत में उसकी ऐसी प्रकाश किरणें फूटनी चाहिए, जो युगधर्म की महती आवश्यकताओं को पूरा करने में प्राणपण से कटिबद्ध दृष्टिगोचर हों। "
" विज्ञापनों, चित्रों की भरमार से सज-धजकर निकलने वाली पत्रिकाओं में ठोस सामग्री उनके कलेवर की तुलना में भूत ही कम रहती है। इस प्रतियोगिता में अखण्ड ज्योति कहीं आगे है। इसमें रहने वाले कवर सहित ५८ पृष्ठों में ठोस और ठसाठस भरी हुई इतनी सामग्री होती है, जितनी उसकी तुलना में दूना कलेवर रखने वाली पत्रिकाओं में भी नहीं रहती है। "
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
-परमपूज्य गुरुदेव
(अप्रैल 1982 अखण्ड ज्योति सम्पादकीय)
इटली के नसीदा द्वीप में खेत की जुताई के समय एक किसान की एक कब मिली। जब उसे खोदा गया तो काँच के बक्से में बन्द एक अखण्ड ज्योति मिली, जो लम्बे काल से उसी में बन्द जल रही थी
नाम है ‘युगसंधि महापुरश्चरण ‘। शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित यह पुण्य आयोजन सारे भारत व विश्व में सन् 2000 तक चलता रहेगा, इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही उसकी पूर्णाहुति होगी, जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर १९८८ की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है
बहुतों ने तो अपना मरणोत्तर संस्कार भी अपने सामने अपने हाथों ही कर लिया था। उन दिनों अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर यह आश्वासन छपता था कि अष्टग्रही योग अपना प्रभाव दिखाकर संपन्न हो जाएगा। निश्चिंत रहा जाना चाहिए कि इस योग के कारण प्रलय नहीं होने वाली है
धन्य हैं गुरुदेव-धन्य हैं आपकी लीला। अखण्ड ज्योति पत्रिका का वर्तमान संपादक जो तथाकथित बुद्धिजीवी भी रहा है। इन सब बातों की वैज्ञानिकता को नहीं समझता, किंतु वह स्वयं साक्षी रहा है अपने गुरु के दैवीस्वरूप का। वह क्या तो समीक्षा करे, वह क्या किसी को समझाए?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना
22 जनवरी, 1999 का वसंत इस मायने में ऐतिहासिक रहा है कि इस युग ही नहीं, कई युगों में एक अपने आप में अभूतपूर्व एक साधनात्मक पुरुषार्थ का प्रखर वेग से सूत्रपात इस दिन हुआ है। जिस पावन दिन को प्रज्ञा परिजन-अखण्ड ज्योति के पाठक वृन्द अपने सूत्र−संचालक के अध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में मनाते रहे हैं-उस दिन से एक साथ प्रायः चौबीस हजार से अधिक स्थानों पर युगसाधना का शुभारम्भ परोक्ष जगत की ऐसी घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम प्रत्यक्ष जगत में परिजन आगामी कुछ दिनों-माहों में देखेंगे। यह वसंत मानवों के देवमानवों के रूप में ‘विकसित’ होने, अपनी गरिमा को पहचान अपनी साधना को जीवनसाधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
अपने देवपरिवार के स्वजनों से इस सम्बन्ध में कतिपय महत्वपूर्ण अपेक्षाएँ भी की गयी है। इनमें से सर्वप्रथम यह है, परिजन-दैवी सन्देश देने वाली पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना मासिक को व्यापक बनाएँ। साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों। पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए
रचनात्मक स्तर पर जिन तीन क्राँतियों की चर्चा होती है, उनके क्रियाशील होने की चर्चा परमपूज्य गुरुदेव ने व्यक्ति के तीन स्तरों पर की है। पूर्व की अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना पत्रिकाओं का अनुशीलन करने पर वे इस प्रकार हैं-
ऐसी परिस्थितियों में हमें महाकाल की महायोजना को तीव्रतम गति देकर क्रियान्वित करने हेतु तत्काल ही गतिशील होना चाहिए। सामूहिक अध्यात्मिक अनुष्ठानों का क्रम विराट गायत्री परिवार के अधिष्ठाता, कुलपति द्वारा सन् 1942 से सतत् चलाया जाता रहा है, जबकि ‘अखण्ड ज्योति ‘ पत्रिका अपनी शैशवावस्था के मात्र चौथे वर्ष में थी। इस बीच द्वितीय विश्वयुद्ध करी पराकाष्ठा का समय आया, अणुबम का विस्फोट नागासाकी व हिरोशिमा में हुआ, भारत को आजादी मिली, छिटपुट युद्ध चलते रहे, जिनमें कश्मीर का एक हिस्सा भारत से अलग हो गया, अष्टग्रही योग, चीन युद्ध, पाक के विरुद्ध दो युद्ध अमेरिका के स्काईलैब का अनियंत्रित हो जाने की प्रक्रिया भी हुई। सभी संदर्भों में सामूहिक प्रयोगों में सभी वर्गों एवं सम्प्रदायों के सभी भावनाशील सम्मिलित हुए तथा उसके सत्परिणाम भी देखे गए
इनमें से सर्वप्रथम यह है, परिजन-दैवी सन्देश देने वाली पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना मासिक को व्यापक बनाएँ। साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों। पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए। सम्पूर्ण वांग्मय एवं अखण्ड ज्योति का नियमित स्वाध्याय साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए
वसन्त पर्व अब मात्र अखण्ड ज्योति परिवार ही नहीं, समग्र विश्व गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए प्रकाश-पर्व प्रेरणा-पर्व बन गया है। इसे न केवल मिशन के सूत्र-संचालक का, उनकी बहुमुखी जनकल्याणकारी प्रवृत्तियों का जन्मदिन माना जाता रहा व उसी दृष्टि से मनाया जाता रहा है, बल्कि इस परिवार का प्रत्येक घटक अपने भावनात्मक
उत्कर्ष का अभिनव पर्व भी इसे मानता और मनाता है। इस वर्ष का वसन्त पर्व भी ऐसी ही ऐतिहासिक वेला में सारे भारत व विश्व में मनाया गया
दुष्टता भरे दुष्कर्म बढ़ते रहेंगे, फलस्वरूप आतंक-अनाचार के दुःखद दुष्परिणाम सामने आते रहेंगे, वर्तमान जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं विपत्तियों में नष्ट हो जाएगा। अखण्ड ज्योति के किशोर पाठक नोट कर लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे। अभी तो सूक्ष्मजगत में उनका बीजारोपण मात्र हो रहा है
परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति जुलाई 1989 में लिखा है- “मनुष्य की अपनी विचारणा, क्षमता, लगन, हिम्मत, उमंग और पुरुषार्थ परायणता की महत्ता भी कम नहीं। इन मानसिक विभूतियों के जुड़ जाने पर उसकी सामान्य दीखने वाली क्रिया-प्रक्रिया भी असामान्य स्तर की बन जाती है और दैवी विभूतियों के समकक्ष कार्य करने लगती है। फिर भी उनकी समय-सीमा निर्धारित है और सफलता का भी एक मापदण्ड है
पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए। सम्पूर्ण वांग्मय एवं अखण्ड ज्योति का नियमित स्वाध्याय साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए
इस पर अविश्वासियों को भी विश्वास करने हेतु बाधित होना पड़ेगा। प्रत्यक्ष को असंभव मानते रहने की हठधर्मिता कितने दिन टिक सकेगी?” (अखण्ड ज्योति जुलाई, 1989 पृ. 58-59)
युगपरिवर्तन एवं इसमें युग निर्माण आन्दोलन की अहम् भूमिका के संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव अगस्त, 1966 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 43 में लिखते हैं, “अगले 34 वर्ष काफी कष्ट भरे हैं। प्रसव पीड़ा की तरह सभी को बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ेंगी। महँगाई, अनावृष्टि, बीमारियाँ, दुर्घटनाएँ, आन्तरिक कलह आदि विविध-विधि विग्रह-उपद्रव सामने आते रहेंगे और उनसे जनसाधारण को नित-नई मुसीबतें सहनी पड़ेंगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
जब भी गाय को और बछड़े को अलग अलग बाड़े में देखते थे और यह पाते थे कि माँ व्याकुल है उसे पास नहीं आने दिया जा रहा, तो वेदना से उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे। अपनी अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं कि बछड़े से बिछुड़ी गाय की उदासी, म्लान और व्यथा-वेदना जिन्होंने देखी हैं, उन्हें यह अनुमान लगाने की कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि गाय से अधिक भावनासंपन्न और मुहब्बत भरे प्राणी, इस मानव की क्या दशा हो सकती है। वीतराग, परमहंस, स्थितप्रज्ञ, समदर्शी होने का हमने कभी दावा नहीं किया। हमारी विशेषता रही है तो वह है - ममता, आत्मीयता स्नेह और सद्भावना का अंश दूसरों से कुछ अधिक होना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ भाइयो, बहनो! आज से लगभग पचास वर्ष पहले हमने गायत्री परिवार की स्थापना की थी और अखण्ड ज्योति पत्रिका निकालना शुरू किया था। बहुत लंबा समय हो गया। इस पचास साल में हमने क्या किया जिस तरीके से समुद्र में डुबकी लगाने वाली मोती ढूँढ़कर लाते है
नहीं करोगे तो कोई और कर लेगा। यदि हम काम नहीं भी करेंगे तो क्या इतना विराट दैवी अभियान आगे नहीं बढ़ेगा? हाँ काम तो बढ़ेगा, हम अर्जुन बनने से चूक जायेंगे परमपूज्य गुरुदेव अखण्ड ज्योति अप्रैल 1982 में लिखते है- आत्मसत्ता का वजन भारी, जिम्मेदारी बड़ी स्पष्ट की अपेक्षा ऊँची समय की गरिमा अनुपम इतना सब हो हुए भी वह क्षुद्रता कैसी जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर आ गई समर्थ को असमर्थ बनाने वाला यह व्यामोह आखिर भवबंधन है। कुसंस्कार है। दुर्विपाक है या मकड़ी का जाला है
शाँतिकुँज के अट्ठाईस वर्षीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय और जुड़ गया, जब गुरुसत्ता की सूक्ष्म उपस्थिति में संतों के सान्निध्य में देश विदेश से आए प्रायः तीस हजार से भी अधिक कार्यकर्ताओं द्वारा विस्तार योजना के अंतर्गत खरीदे गए दिल्ली-ऋषिकेश रोड स्थित नए परिसर में विश्वविद्यालय स्तर के देवसंस्कृति शिक्षण एवं शोध संस्थान का भूमिपूजन-नींवस्थापन कार्यक्रम संपन्न हुआ। जो भी परिजन अखण्ड ज्योति के माध्यम से गायत्री परिवार से जुड़े है, सभी शाँतिकुँज के क्रमशः विस्तार होकर आज की स्थिति के प्राप्त स्वरूप को जानते है, समझते है। महाकाल के स्तर की योजना ही गोवर्धन बाँधने, सेतुबंधनं विनिर्मित होकर तैयार होकर तैयार होने के रूप में यह विलक्षण सरंजाम प्रस्तुत करती रही है। मानवी-पुरुषार्थ इसमें बड़ा-छोटा व नगण्य-सा प्रतीत होता है
गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पंडित लीलापत जी शर्मा के प्रतिनिधि के रूप में श्री द्वारिकाप्रसाद जी चैतन्य श्री प्रमोद कुमार शर्मा एवं श्री रमेश चन्द्र पराशर जी उपस्थित हुए। आँवलखेड़ा व अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के प्रतिनिधि भी मौजूद थे
परमपूज्य गुरुदेव
अखण्ड ज्योति नवंबर, 1988
क्योंकि जब हमने तलाश किया जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तलाश किया कि कौन आदमी हमारे हैं, कौन हमसे संबंधित हैं, कौन हमार साथ जुड़े हुए हैं। हमने जब यह पता लगा लिया और अखण्ड ज्योति पत्रिका भेजी, चिट्ठियाँ भेजी तो मालूम पड़ा कि आप लोग गायत्री परिवार में शामिल हो गए हैं। कब हुए थे? आज से पचास साल पहले। पचास वर्ष के बाद में पीढ़ियाँ बदलती चली गयी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते, वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण−प्रवाह भी बहता है। परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना सोतों को जगाती है, जागों को खड़ा करती है, खड़ों को चलाती है और चलतों को उछाल देती है। इस प्राण−प्रवाह की दिव्यक्षमता में कहीं कोई सन्देह की गुँजाइश नहीं है
अखण्ड ज्योति पृष्ठ 63, नवंबर 1988
इसकी सामग्री अति रोचक व पूरी सहस्राब्दी के सफरनामे से लेकर भविष्य की संभावना से भरी होगी। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर नवीनतम खोजों के निष्कर्ष-भारतीय संस्कृति के विश्व-विद्यालय की समग्र पाठ्यसामग्री लिए, इक्कीसवीं सदी के समाज का संविधान का स्वरूप तथा साधनापद्धति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत नए सूत्रों के समावेश से भरे लेखन का समुच्चय होगा अखण्ड ज्योति 2000 व उसके बाद के अंकों का प्रारूप
सभी पाठकों से यही भावभरा अनुरोध है कि वे इन दिनों एक आदर्शवादी लक्ष्य अपने सामने रख ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठक-ग्राहक अधिक-से-अधिक बनाए बिना चैन न लें। पत्रिका महंगाई के युग में भी उसी मूल्य में परंतु बढ़े कलेवर में परिजनों तक पहुँचती रहेगी। वार्षिक चंदा है 60 रुपये, आजीवन के लिए 750 रुपये एवं विदेश के लिए 5000 रुपये प्रतिवर्ष
महापूर्णाहुति जिस विराट् लक्ष्य को लेकर आयोजित की गई है, वह सफल निश्चित ही होनी है, जो लक्ष्य परिजनों को प्रभावित कर उसकी प्रखर आभा से आलोकित करने का रखा गया है, वह करोड़ों की संख्या को स्पर्श करने जा रहा है। इससे जो भूख पैदा होगी वह विचारक्राँति प्रधान साहित्य एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका जन-जन तक पहुँचाकर ही पूरी की जा सकती है। अखण्ड ज्योति हर व्यक्ति तक पहुँचाने का अर्थ है-संस्कारों का समुच्चय एवं परमपूज्य गुरुदेव की प्रखर प्रज्ञा व परमवंदनीया माताजी की सजल श्रद्धा को उनके घरों में पहुँचाना
मिशन की पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या बढ़ाएँगे। अखण्ड ज्योति पत्रिका अधिक-से-अधिक पाठकों तक पहुँच सके, वे इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे। प्रयास यह हो कि महापूर्णाहुति वर्ष में इसकी ग्राहक संख्या दुगुनी हो जाए ताकि एक-से-दस के माध्यम से एक करोड़ व्यक्ति हिंदी व शेष एक करोड़ व्यक्ति अन्यान्य भाषाओं में गुरुसत्ता की प्राणचेतना से जुड़ सकें, यही प्रयास मिशन की अन्यान्य पत्रिकाओं के लिए भी किया जाना है। दीक्षा सेट की तरह पाँच प्रारंभिक पुस्तकों का एक नया सेट भी इन दिनों तैयार किया जा रहा है
परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से नवंबर 1949 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अग्रलेख
जो भी कुछ सामग्री ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित होती है, इस उत्पादन को समुद्रमंथन में उपलब्ध हुए अमृतकलश के समान माना जा सकता है। इसकी महिमा गाई जा सकती है, पर वह वहाँ जाकर अवरुद्ध हो जाती है, जब उसकी वितरण व्यवस्था जन-जन तक पहुँचाने की क्रियाप्रणाली अपंग-असहाय जैसी अस्त−व्यस्त दिखाई पड़ती है। जनसाधारण तक महापूर्णाहुति की वेला में इसे पहुँचाने के लिए अभीष्ट संख्या में कर्मवीर बादलों की तरह मैदान में उतरते नहीं देखे जाते तो लगता है वह लक्ष्य कैसे पूरा होगा, जो युगऋषि ने दिया है
महापूर्णाहुति के प्रथम चरण में पूर्वाभ्यास के दीपयज्ञ के बाद सभी परिजनों को यह लक्ष्य दिया जा रहा है कि वे पत्रिका की पाठक संख्या वसंतपर्व तक की ढाई माह की अवधि में कम-से-कम पाँच गुना कर दें। यह तभी हो सकेगा जब अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान् ऊर्जा के महत्व को स्वयं समझा जा सके, उस चेतना में स्वयं को स्नान कराया जा सके। जो उपयोगी है, जिसकी प्रकाशप्रेरणा में जीवन का ज्योतिर्मय होना माना जाता है, उसे अग्रगामी होने के लिए अवसर क्यों न दिया जाए? यह उत्साह मन में क्यों न जगाया जाए कि अपने घर-परिवार के सभी सदस्य उसे पढ़ें या सुनें। एक कदम और आगे बढ़कर मित्रों-संबंधियों-पड़ोसियों-परिचितों तक भी इस प्रयास को गतिशील किया जा सकता है
‘अखण्ड ज्योति’ का कलेवर अब बढ़े पृष्ठों के साथ 65 पृष्ठ का होगा। यही नहीं, इसमें नियमित चल रहे लोकप्रिय स्तंभों के अतिरिक्त युगानुकूल नई सदी का चिंतन लिए नवीनतम सामग्री भी होगी। पहली शुरुआत हम जनवरी 2000 के सहस्राब्दी विशेषाँक ‘महापूर्णाहुति विशेषाँक’ से कर रहे हैं
व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
जो अब तक ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से हो चुका है, उसे इतिहास के प्रेरणा पृष्ठ भर कहा जा सकता है। दर्शनीय वह है जो वर्तमान में योजनाबद्ध ढंग से हो रहा है। उत्साहवर्द्धक वह है जो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, जिसकी संभावना का चित्र खींचने की सामर्थ्य जिनके भी पास है, वे पुलकन अनुभव करते हैं व विश्वास करते हैं कि ‘सतयुग की वापसी-नवयुग का अवतरण’ निकट भविष्य में होना ही है
ध्यान-धारणा से लेकर सभी योगपरक उपचार एवं तपसाधनाएँ व्यक्ति के विचारों को परिष्कृत करने के निमित्त ही तो हैं, यह बात उनने हमें घूंटी की तरह पिलाई हैं। अखण्ड ज्योति 1969 में परमपूज्य गुरुदेव ने पृष्ठ 40 पर लिखा है-मुद्दतों से हम यह भी भूल गए हैं कि विचार भी कोई तत्व है और उसका भी मानवजीवन पर कोई प्रभाव पड़ता है। इस विस्मृति का एक ही कारण है कि हम जीवननिर्माण और मनुष्य के सामने उपस्थित ज्वलंत समस्याओं के बारे में न कभी कुछ सोचते हैं, न कहते हैं, न पढ़ते-सुनते हैं। ऐसी चर्चा हमें वैसी ही निरर्थक लगती है जैसे भीलनी को रत्नराशि की कीमत एवं उपलब्धि की चर्चा
इससे जो भूख पैदा होगी वह विचारक्राँति प्रधान साहित्य एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका जन-जन तक पहुँचाकर ही पूरी की जा सकती है। अखण्ड ज्योति हर व्यक्ति तक पहुँचाने का अर्थ है-संस्कारों का समुच्चय एवं परमपूज्य गुरुदेव की प्रखर प्रज्ञा व परमवंदनीया माताजी की सजल श्रद्धा को उनके घरों में पहुँचाना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
मुझे गायत्री चालीसा व अन्य पुस्तकें भी दी हैं। ” कमाँडिंग ऑफिसर ने अखण्ड ज्योति पत्रिका देखते ही कहा कि यह आप कहाँ से मँगाती हैं, यह तो मेरे घर भी आती है। इतना कहकर उसने पत्रिका रख ली एवं इसी काँस्टेबल से कमला जी को मिलिट्री की जीप में छोड़ आने को कहा। सुरक्षित कमला जी तनावग्रस्त श्यामलाल जी के पास पहुँची व कहा कि गुरु जी के साहित्य के कारण मैं सुरक्षित आ गई
यदि जीवित रहे तो यश की पराकाष्ठा पर पहुँचोगे। यही बात तो हमें अपने सद्गुरुदेव भी समझा गए, तो फिर किस बात का असमंजस? परमपूज्य गुरुदेव ने सितंबर 1978 की अखण्ड ज्योति में लिखा है- “रिजर्वफोर्स के सैनिक बहुत दिन सो लिए, आलस्य कर चुके। कर्त्तव्य से विमुख होंगे तो उसका कल्याण न आज है, न कल। ” यह वाक्य अपने आप में न केवल गुरुसत्ता की टीस बताता है, हमें अपना कर्त्तव्यकर्म भी समझाता है
कृपया अपना नाम-पता, फोन नं., आयु, शिक्षा, पद-व्यवसाय, आप पर कौन-कौन आश्रित हैं? गायत्री परिवार से कब जुड़े? समयदान की अवधि का विवरण देते हुए पत्र व्यवहार करें। व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अन्य विवरण के साथ हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव, प्रुफरीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ 55, 56, 57 का अनुवाद भी संलग्न करें
बड़े सम्मान से कमला जी ने कमांडिंग ऑफिसर के समक्ष रखी टेबल को अपने पल्लू से साफ कर उस पर पुस्तकें रखना आरंभ की। अखण्ड ज्योति व अन्य पुस्तकें रखी ही थीं कि एक काँस्टेबल वहाँ आया, बोला- “यह माताजी मुहल्ले-मुहल्ले घूमकर साहित्य पढ़ने को देती हैं। मुझे गायत्री चालीसा व अन्य पुस्तकें भी दी हैं। ” कमाँडिंग ऑफिसर ने अखण्ड ज्योति पत्रिका देखते ही कहा कि यह आप कहाँ से मँगाती हैं, यह तो मेरे घर भी आती है
कुछ और भी जुड़ना चाहिए था क्या? इस संबंध में मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत समय से अच्छा और कोई समय नहीं हो सकता। परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ हमने ‘अखण्ड ज्योति’ के पन्ने पलटे, थोड़ा गहरे डूबकर स्वाध्याय किया एवं कुछ पाया है, जो जन-जन को दिशा दे सकता है, सही अर्थों में हम सभी को साधक बना सकता है
परमपूज्य गुरुदेव मई 1969 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखा है- “आत्मिकप्रगति के लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुंजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अन्य विवरण के साथ हिंदी से गुजराती अनुवाद का अनुभव, प्रुफरीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ 55, 56, 57 का अनुवाद भी संलग्न करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
अप्रैल, 1949 की अखण्ड ज्योति के अग्रलेख के कुछ अंश
आज जब सारा विश्व एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जहाँ महाविनाश सुनिश्चित दीखता है, मानवकृत कुबुद्धिजन्य प्रयासों से, भोगवादी लिप्सा से, सब दैवी विभीषिकाओं से-तब कलियुग का देवता महाकाल-महारुद्र-भगवान शिव ही विचारों को बदलने का कार्य करेंगे। परमपूज्य गुरुदेव ने यह तथ्य अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में आज से प्रायः बत्तीस वर्ष पूर्व 1967 में ही लिख दिया था। जब उन्होंने महाकाल की युग-परिवर्तन प्रक्रिया के विस्तृत चरणों की घोषणा की थी। जब कोई परिवर्तन की बात नहीं सोच सकता था, तब उन्होंने लिखा था- “महाप्रलय करोड़ों वर्ष बाद होती है, पर युगपरिवर्तन के अवसर पर खंडप्रलय जैसा एक भयानक विस्फोट प्रायः होता रहता है
श्री क्लार्क की उपर्युक्त भविष्यवाणी को यदि ‘नोस्ट्राडेमस 1999’ जिसके लेखक श्री स्टीफेन पाँलस हैं व जिनकी 1999 में संभावित विभीषिकाओं के संबंध में चर्चा विगत अंक में ‘कहीं हम महाविनाश की ओर तो नहीं बढ़ रहे। ’ पृष्ठ 7, 8 अखण्ड ज्योति मार्च, 1999 शीर्षक लेख में की गयी थी, को सामने रखकर अध्ययन करें, तो लगता है कि इस महान भविष्यद्रष्टा ने तो यह आकलन आज से चार सौ वर्ष पूर्व ही कर लिया था। नोस्ट्राडेमस ने भी इन विभीषिकाओं की चर्चा सूर्य व अंतरिक्षीय परिस्थितियों से जोड़कर ही की है। नोस्ट्राडेमस पर बड़ा विषद अध्ययन कर सारी परिस्थितियों का आकलन कर अपना षोधप्रबंध लिखने वाले स्टीफेन पाँलस का कहना है कि भगवान करे वह न हो जो नोस्ट्राडेमस ने 1999 व सन् 2000 के लिए लिखा है
उसे गाँडीव उठाना ही होगा और अधर्म के संहार और धर्म स्थापना के लिए जूझना ही होगा। -अखण्ड ज्योति (फरवरी, 1962)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
-अखण्ड ज्योति, दिसम्बर, 1962
किंतु परमपूज्य गुरुदेव द्वारा स्थापित विराट गायत्री परिवार इस नींव पर खड़ा हुआ है, जिनकी सिंचाई आत्मीयता-सघन ममत्व रूपी शांतिप्रदाता जल से हुई हैं। जो प्यार- आत्मीयता उन्होंने अपनी लेखनी से अखण्ड ज्योति द्वारा निजी स्तर पर पत्रों द्वारा तथा तथा व्यक्तिगत संपर्क में आने वालों को अपने जादू भरे स्नेहिल स्पर्श से परिजनों को बाँटी, वही इस संगठन की समर्थता का मूल आधार है। आज जो क्षेत्र में कार्य कर रहे एक सक्रिय प्राणवान कार्यकर्ता हैं अथवा केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय समयदानी- सभी ने घूँटी को पिया है। वह प्राण-सुधा है, जिसने युग-परिवर्तन लाने वाले ऐसे मिशन की आधार-भूत स्थापना की है
(क) अंग्रेजी अनुवाद। : अन्य विवरण के साथ हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 44, 46, 47 का अनुवाद भी संलग्न करें
इस सम्बन्ध में वे पत्र भी लिखा करते थे। उनके पत्र का जवाब सामान्यतया यह भी जा सकता था कि आप पुस्तिका का अध्ययन करें ‘ अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पढ़ें किन्तु नहीं। पूज्यवर ने श्री धर्मपालसिंह को 4 जनवरी, 46 को लिखें अपने इस पत्र में सारा निचोड़ कुछ ही पंक्तियों में डालकर न केवल उनका असमंजस मिटाया, उन्हें एक सक्रिय समर्पित कार्यकर्ता भी बना दिया। वे लिखते हैं- ईश्वर भक्ति के संबंध में आपका विचार ही हमें अधिक उचित प्रतीत होता है
वे एक विराट परिवार के मुखिया भी थे, संत भी थे, एक संगठन एक व्यवस्थापक, एक दार्शनिक, एक द्रष्टा एवं एक महान लेखक-साहित्यकार भी। अखण्ड ज्योति पत्रिका जीता-जागता वह दर्पण है, जिसके माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना को स्पंदन लेते देखा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व के और भी कई रूप हैं, परंतु इस मिशन का जन्म जिस आधार पर हुआ- जिसके बलबूते पाला-पोसा जाकर वह बढ़ता चला गया और आज के 6 से लेकर 9 करोड़ परिजनों वाले विराट रूप तक पहुँच गया है, उसका आधार हैं उनकी संवेदना से भरी जीवन लेखनी। उसी से न केवल उन्होंने लेख लिखें वे पतियाँ भी लिखी जो लाखों व्यक्तियों के जीवन परिवर्तन का आधार बन गई, उन्हें संगठन से जोड़ कर उनसे कुछ ऐसा कराती चली गई कि संगठन का ढाँचा बनता चला गया
परमपूज्य गुरुदेव ने कहा था कि जो शान्तिकुञ्ज में रहने वाले कार्यकर्ता हैं, यदि सन 2000 तक भी मेरे साथ गाड़ी खींच ले गए, जो बाहर हैं, वे मेरे विचारों से जुड़े रह कर प्रचार प्रसार करते रहें तो उनका निश्चित ही कल्याण हो जाएगा। सन 1967 की अखंड ज्योति पत्रिका के संपादकीय एवं 1970 में दिए गए प्रवचनों से लेकर 1973-1974 की अखण्ड ज्योति में यह आश्वासन पाया जा सकता है
(अगस्त 1949 की अखण्ड ज्योति का अग्रलेख)
अर्जुन जैसे समर्थ को असहाय बनाने वाले व्यामोह पर श्रीकृष्ण की प्रतिक्रिया अब दूसरे अध्याय में आती है जिसे ‘सांख्ययोग’ नाम से वर्णित किया गया है। अर्जुन के असमंजस का वर्णन करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने अप्रैल, 1972 की अखण्ड ज्योति में लिखा था कि यह व्यामोह कुसंस्कार है, भवबंधन है, दुर्विचार है या मकड़ी का जाला, कुछ समझ में नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के गाण्डीव क्यों हाथ से छूटते चले जा रहे है? उनके मुख क्यों सूख रहे है? पसीने क्यों छूट रहे है? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखे जाने का कोई समय नहीं आएगा? कृष्ण झुंझला पड़े थे कथनी और करनी के बीच इतना असाधारण व्यतिरेक उन्हें सहन नहीं हुआ
” जिसे जीवनदान दिया था- उसे वे बता रहे थे कि उसी की तरह किसी और के कष्ट को, उन्होंने अपने ऊपर लेकर ठीक किया था। यह घटना ‘अखण्ड ज्योति’ में पहले भी छप चुकी है व चर्चित है। कि जयपुर की एक सुविख्यात कर्मठ कार्यकर्ता बहिन के मृत्युदायी संकट को पूज्यवर ने अपने ऊपर उक ‘ रिनल स्टोन’ की तकलीफ के रूप में लेकर उन्हें प्रत्यक्ष जीवनदान दिया था उसी का संदर्भ संकेत मात्र में अपनी मानसपुत्रों को दिया था
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
संपर्क सूत्र
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
इसी प्रकार पूज्यवर ने अपने अन्दर एक हिला देने वाली लेखनी से ‘ अखण्ड ज्योति’ (1962) के दिसम्बर अंक के पृष्ठ 51 पर लिखा था- “असत्य सदा हारता है। अन्याय की अंत में पराजय होती है। इतिहास साक्षी हैं कि अनेक नृशंस आततायी अपने-अपने समय में कुछ दिनों के लिए आतंक उत्पन्न कर सकें हैं, पर अंत में उनका पाप और अन्याय उन्हें ही खा गया है
(ख) गुजराती अनुवाद : अन्य विवरण के साथ हिन्दी से गुजराती अनुवाद का अनुभव प्रुफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 44, 46, 47 का अनुवाद भी संलग्न करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
अब तक गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान-युगांतरीय चेतना-युगनिर्माण योजना के रूप में जो भी कुछ कार्य विस्तार बन पड़ा है उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को जितना श्रेय दिया जा सकता है, उससे हजार गुना श्रेय उनको दिया जाना चाहिए, जो इस परिकर से जुड़े हैं और अपने श्रम सहयोग से अपने क्षेत्र में अपनी रुचि एवं सामर्थ्यानुसार नवसृजन के प्रयासों में लगें हैं। अखण्ड ज्योति यदि मस्तिष्क है तो पाठक परिजनों के रूप में फैला विशालकाय परिकर उसका कायकलेवर। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर टिका है। अखण्ड ज्योति के माध्यम से पूज्यवर की योजनाएँ प्रेरणाएँ जन-जन तक पहुँचती हैं एवं पाठक-परिजनों के विशालकाय परिकर द्वारा संपन्न होती हैं
प्रस्तुत प्रसंग इस संदर्भ में उद्धृत किया गया कि जो पाठ्य सामग्री अखण्ड ज्योति पत्रिका के पृष्ठों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचती है, यदि बादलों का आश्रय न पा सकी-अमृत कलश बनकर रैपरों में बद रखी रह गई तो अगणित लोग उस लाभ से वंचित रह जाएँगे, जो बादलों के बरसने से मिलता। अखण्ड ज्योति जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना की संवाहिका है, कितने ही सारगर्भित प्रतिपादनों के साथ विगत 62 वर्षों से अनवरत प्रकाशित हो रही है। छपने-कटिंग व रैपर में बंद होने के बाद उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ‘पोस्टमैन’ रूपी हमारी अग्रणी श्रेणी के उन परिजनों की है, जो सतत् इसी पुरुषार्थ में लगे रहकर उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाते हैं
इस पत्रिका का भी तिरसठवाँ वर्ष आगामी माह से आरंभ होने जा रहा है। भली-भाँति समझा जा सकता है कि युगधर्म की महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड ज्योति एक प्रतीक बनी, अनवरत जली एवं उसने समय की चुनौती को स्वीकार कर युगपरिवर्तन की आँधी को जन्म दिया
अखण्ड ज्योति 62 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो अब प्रायः छह लाख पाठकों तक हिंदी में छह लाख तक अन्यान्य भाषाओं में पहुँचती हैं। एक पाठक यदि पाँच को पढ़ाता है तो इस प्रकार यह प्रतिपादन साठ लाख व्यक्तियों तक पहुँचता हैं। आबादी में अनुपात की दृष्टि से यह भारत का 0.6 प्रतिशत ही हो पाता है
‘अखण्ड ज्योति’ वह प्रचंड प्राण-प्रवाह है, जो जहाँ जाता है वहाँ शक्ति का संचार करता देखा जा सकता है। इसे मात्र छपे अक्षरों का पुलिंदा न मानकर शक्तिपुंज माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की सूक्ष्म चेतना इन पृष्ठों में प्रवाहित होती देखी जा सकती है
वर्ष 2000-2001 में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर महापूर्णाहुति प्रधान-नवयुग प्रधान प्रतिपादन ही प्रमुख होगा। इस ऐतिहासिक महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति इसी माह से आरंभ हो चुकी है। अब यह प्रायः डेढ़ वर्ष तक चलेगी
सहायकों का अभाव, पूँजी की कमी, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बच पाने जैसे अवरोधों के होते हुए भी परमपूज्य गुरुदेव ने जिस अखण्ड ज्योति को निरंतर प्रज्वलित रखा, कभी बुझने न दिया वह सतत् प्रकाशित हो प्रतिमास संजीवनी के रूप में परिजनों के पास पहुँचती हैं। योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाशपुँज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव युगों-युगों तक प्रकाश देता रहेगा-यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए
अखण्ड ज्योति का एक ही लक्ष्य है कि व्यक्ति के अन्तःकरण का छूने वाला ऐसा तत्त्वदर्शन प्रस्तुत किया जाए जो व्यक्तित्वों के परिष्कार में सुनिश्चित रूप से सफल हो सके। इसके लिए जिन तर्कों, तथ्यों, प्रमाण-प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें विश्वसाहित्य के महासागर में गहरे गोते लगाकर पाठकों के समक्ष पहुँचाया जाता है। इसका गम्भीरतापूर्वक अध्ययन-अवगाहन जिनने भी किया है, वे द्रुतगति से आगे बढ़े हैं, ऊँचे उठे हैं
यह तभी संभव है जब पत्रिका बड़ी संख्या में प्रकाशित हो- अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचे। उधार की भाषा में परिजन व्यवहार न करें एवं नित्य-नियमित इसका वितरण करते रहें, तो उस घाटे की पूर्ति हो सकती है, जो विज्ञापन न छपने से अखण्ड ज्योति संस्थान को होती है। इसीलिए बारंबार अनुरोध किया जा रहा है कि ग्राहक / पाठक-संख्या कम-से-कम पाँच गुनी कर देना हम सबका लक्ष्य बन जाए- यह संकल्प सन् 2000 के आगमन की वेला में सभी लें
अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अंतराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में श्रद्धा कहा गया है। जिसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्श के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है
देश के कोने-कोने में बिखरे प्रज्ञामंडल-स्वाध्याय मंडल-प्रज्ञासंस्थान हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दिखती हैं, उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान-नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग कार्य करता देखा जा सकता है। निश्चित ही यह अखण्ड ज्योति की प्राणचेतना का ही प्रभाव है कि उसने हम सबको एकजुट रख युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में गतिशील बनाए रखा है। एक शब्द में यही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके प्रतिनिधि रूप में ऋषियुग्म की सत्ता का सूक्ष्म सूत्र-संचालन है
उसे घर के एक सदस्य की तरह ही लोग मान देते हैं। अखण्ड ज्योति की प्रतीक्षा भी हर माह एी तरह कह जाती है
अखण्ड ज्योति अब बढ़े हुए कलेवर (68 पृष्ठ) में चार रंगीन पृष्ठों सहित आगामी माह से प्रकाशित होगी। बढ़े कलेवर में होने के बावजूद इसका मूल्य वही होगा- वार्षिक चंदा साठ रुपये, आजीवन सात सौ पचास रुपये तथा विदेश के लिए पाँच सौ प्रतिवर्ष। आज जितनी भी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं, वे कागज व छपाई के बढ़े मूल्यों के कारण अपना अस्तित्व नहीं बचा पाती, मात्र विज्ञापन के पृष्ठ ही उन्हें सहारा देते हैं
जिस प्रयोजन के लिए परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी, वशिष्ठ-अरुंधती स्तर की चलती रही हो, वह निश्चित रूप से उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता के प्रभाव से पूरा होगा, यह विश्वास किया जाना चाहिए। अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यह अत्यंत अनिवार्य है कि अखण्ड ज्योति पत्रिका व उसके संगी-साथियों की वर्तमान संख्या में पाँच गुना वृद्धि हो। यदि एक परिजन-पाठक भी न्यूनतम पाँच व्यक्तियों को प्रेरित करें, तो इस लक्ष्य की प्राप्ति असंभव नहीं है
अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर सूत्र-संचालक का, युगऋषि का दिव्यप्राण आदि से अंत तक घुला अनुभव किया जा सकता है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले हैं। देश के कोने-कोने में बिखरे प्रज्ञामंडल-स्वाध्याय मंडल-प्रज्ञासंस्थान हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दिखती हैं, उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान-नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग कार्य करता देखा जा सकता है। निश्चित ही यह अखण्ड ज्योति की प्राणचेतना का ही प्रभाव है कि उसने हम सबको एकजुट रख युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में गतिशील बनाए रखा है
“स्वस्थ शरीर-स्वच्छ मन” के साथ सबको सद्बुद्धि- सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना का संकल्प इस प्रथम चरण में जोड़ा गया था। अनुयाजक्रम 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी तक चलेगा, जिसमें मिशन की ‘अखण्ड ज्योति’ सहित सभी पत्रिकाओं की पाठक संख्या अब से पाँच गुना करने तथा कम से कम इतने ही घरों में चौबीस पुस्तिकाओं वाले क्रान्तिधर्मी साहित्य को स्थापित किया जाना है। इसके सेट शान्तिकुञ्ज हरिद्वार एवं अपने-अपने साधना प्रशिक्षण केंद्रों से प्राप्त किए जा सकते हैं
दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर टिका है। अखण्ड ज्योति के माध्यम से पूज्यवर की योजनाएँ प्रेरणाएँ जन-जन तक पहुँचती हैं एवं पाठक-परिजनों के विशालकाय परिकर द्वारा संपन्न होती हैं
संपर्क सूत्र अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अन्य विवरण के साथ हिंदी से गुजराती अनुवाद का अनुभव, प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 55,56,57 का अनुवाद भी संलग्न करें
महापूर्णाहुति की पावनवेला में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वित प्रतिपादनों से लेकर भारतीय संस्कृति का युगानुकूल प्रस्तुतीकरण एवं सर्वसुगम साधना पद्धतियाँ से लेकर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा समय-समय पद दिए गए नवीनतम सूत्रों का समावेश लिए नए कलेवर वाली अखण्ड ज्योति को घर-घर तक पहुँचाने का पुण्यपरमार्थ जा भी करेगा, वह बारह वर्षीय युगसंधि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का पुण्यफल भी सहज ही प्राप्त करेगा, यह सुनिश्चित मानना चाहिए
( दिसंबर 1950 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अग्रलेख)
परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की सूक्ष्म चेतना इन पृष्ठों में प्रवाहित होती देखी जा सकती है। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया ‘हसतामलकवत्’ प्रत्यक्ष है। इसकी उपयोगिता एवं क्षमता को हर पारखी ने भूरि भूरि सराहा है। इसके प्रतिपादनों को तर्क, तथ्य और प्रमाणों के अंबार प्रस्तुत करते हुए कहीं भी कोई भी सिद्ध कर सकता है
उसी दिशा में कहीं कोई प्रयास सार्थक रूप में चलता दिखाई नहीं देता। सहायकों का अभाव, पूँजी की कमी, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बच पाने जैसे अवरोधों के होते हुए भी परमपूज्य गुरुदेव ने जिस अखण्ड ज्योति को निरंतर प्रज्वलित रखा, कभी बुझने न दिया वह सतत् प्रकाशित हो प्रतिमास संजीवनी के रूप में परिजनों के पास पहुँचती हैं। योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाशपुँज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव युगों-युगों तक प्रकाश देता रहेगा-यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए
प्रस्तुत प्रसंग इस संदर्भ में उद्धृत किया गया कि जो पाठ्य सामग्री अखण्ड ज्योति पत्रिका के पृष्ठों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचती है, यदि बादलों का आश्रय न पा सकी-अमृत कलश बनकर रैपरों में बद रखी रह गई तो अगणित लोग उस लाभ से वंचित रह जाएँगे, जो बादलों के बरसने से मिलता। अखण्ड ज्योति जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना की संवाहिका है, कितने ही सारगर्भित प्रतिपादनों के साथ विगत 62 वर्षों से अनवरत प्रकाशित हो रही है। छपने-कटिंग व रैपर में बंद होने के बाद उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ‘पोस्टमैन’ रूपी हमारी अग्रणी श्रेणी के उन परिजनों की है, जो सतत् इसी पुरुषार्थ में लगे रहकर उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाते हैं। पत्र की प्रतीक्षा में कई लोग पोस्टमैन की राह जोहते खड़े रहते हैं
जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना। इस ऊर्जाकेन्द्र को गुरुसत्ता ने अंतस् की पिटारी में न बंद कर जन-जन के अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप में बारह वर्ष के अन्दर 1937-38 में प्रस्तुत कर दिया गया। इस पत्रिका का भी तिरसठवाँ वर्ष आगामी माह से आरंभ होने जा रहा है। भली-भाँति समझा जा सकता है कि युगधर्म की महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड ज्योति एक प्रतीक बनी, अनवरत जली एवं उसने समय की चुनौती को स्वीकार कर युगपरिवर्तन की आँधी को जन्म दिया
अन्य विवरण के साथ हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव, प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 55,56,57 का अनुवाद भी संलग्न करें
आज जितनी भी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं, वे कागज व छपाई के बढ़े मूल्यों के कारण अपना अस्तित्व नहीं बचा पाती, मात्र विज्ञापन के पृष्ठ ही उन्हें सहारा देते हैं। अखण्ड ज्योति पत्रिका जिस पावन पुनीत उद्देश्य को लेकर प्रकाशित होती है, उसमें गायत्री तपोभूमि की स्थापना के बाद से ही संकल्पित हो इसने विज्ञापनों से स्वयं को दूर रखा है। पचास वर्ष से जो संकल्प निभाते रहा जा रहा है, उसे आगे भी निभाया जाएगा। यह तभी संभव है जब पत्रिका बड़ी संख्या में प्रकाशित हो- अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचे
अखण्ड ज्योति प्रतीक रूप में स्थापना है- खंडित न होने वाले, निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान ‘अखण्ड दीपक’ के कलेवर की, जिसकी स्थापना 1926 में एक अखण्ड यज्ञ के रूप में की गई थी। तब से सतत् जल रहा यह अखण्ड दीपक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सतत् जाज्वल्यमान रह आगामी वर्ष अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना
महापूर्णाहुति के पाँच चरण घोषित हो चुके। प्रथम चरण (पूर्वाभ्यास दीपयज्ञ) का अनुयाज यही है कि सभी पाठक 3 दिसंबर से 10 फरवरी 2000 तक की सत्तर दिन की अवधि में मिशन की सभी पत्रिकाओं अखण्ड ज्योति तथा युगनिर्माण योजना मासिक, प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ तथा ‘युगशक्ति’ ‘गायत्री” (गुजराती, उड़िया, बंगला, इंग्लिश) की पाठक संख्या पाँच गुना कर साठ लाख लोगों तक पहुँचा दें। जब यही 10 व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाएगी, तो छह करोड़ व्यक्तियों तक युगांतरीय चेतना को संदेश पहुँचेगा। सभी पत्रिकाएँ निर्धारित माह की प्रथम तारीख के आसपास समय मिलने लगें, यह प्रयास भी इस जनवरी से किया जाएगा
अब तक गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान-युगांतरीय चेतना-युगनिर्माण योजना के रूप में जो भी कुछ कार्य विस्तार बन पड़ा है उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को जितना श्रेय दिया जा सकता है, उससे हजार गुना श्रेय उनको दिया जाना चाहिए, जो इस परिकर से जुड़े हैं और अपने श्रम सहयोग से अपने क्षेत्र में अपनी रुचि एवं सामर्थ्यानुसार नवसृजन के प्रयासों में लगें हैं। अखण्ड ज्योति यदि मस्तिष्क है तो पाठक परिजनों के रूप में फैला विशालकाय परिकर उसका कायकलेवर। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर टिका है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युगावतारी निष्कलंक भगवान् द्वारा होने जा रहा है, वह और कोई नहीं, विशुद्ध रूप में अपना युगनिर्माण आँदोलन ही है। ”(परमपूज्य गुरुदेव ‘अखण्ड ज्योति’ 1970 − पृष्ठ 60)। यह सिंह-गर्जना परमपूज्य गुरुदेव की है
वस्तुतः उिच्ष्कमर्र कसे बंधनमुक्ति ब्रह्म से युक्त होकर ही मिल सकती है। परमपूज्य गुरुदेव की ‘अखण्ड ज्योति’ के दो संदर्भों के माध्यम से इसी भाव की पुष्टि की गई थी। अब आगे की चर्चा इस अंक में
ऐसे परिजन अपने पासपोर्ट साइज का फोटो तथा पूरा विवरण लिखकर शीघ्रातिशीघ्र भेज दें। नाम, पूरा पता, सदस्य संख्या, जन्मतिथि, अखण्ड ज्योति की संख्या, मिशन की और किन्हीं पत्रिकाओं की संख्या, मिशन से कब जुड़े, संगठन की दृष्टि से सक्रियता आदि
हमने भी गायत्री परिवार के नाम से जो परिवार बनाया है, उसके लिए खरच करते हैं। जब मिशन छोटा था और हम तपोभूमि में रहते थे, उस समय अखण्ड ज्योति निकलती, तो हमने ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ शब्द का इस्तेमाल किया है। पुराने लेटर पैड पड़े होंगे, उनमें यही छपा है। जब गायत्री का प्रचार हमने शुरू किया तो ‘गायत्री परिवार’ बना दिया
गायत्री और यज्ञ दो ऐसी महत्त्वपूर्ण विधाएँ हैं, जो हमारी गुरुसत्ता ने जन-जन के मन में स्थापित कर दीं। इसमें निश्चित ही इस साहित्य ने बड़ी भूमिका निभाई, जो ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रहा था तथा गायत्री साहित्य के छोटे-छोटे ट्रैक्ट्स के रूप में उपलब्ध था। फिर भी मन तो शंकालु होता है। ऐसी कई बातों का समाधान तो मात्र पत्रों से हो पाता है या व्यक्तिगत चर्चा से
हमारे समर्पित परिजन जो दिन-रात एक करके परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना ‘अखण्ड ज्योति’ को घर-घर पहुँचाते हैं, उनके लिए एक विशेष योजना बनी है कि उन्हें विशिष्ट परिचयपत्र यहाँ से दिये जाएं। अभी यह योजना उन्हीं के लिए बनी है जो 1, 2 या 5 पत्रिका या उससे अधिक मंगाते हैं। इन भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट परिचयपत्रकों के साथ विशेष सम्मान उन्हें मिलेगा
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
देश-विदेश में बसे अपने देव-परिवार के असंख्य सदस्यों की गहरी भावनाएँ इससे जुड़ी हैं। इन सबके लिए ‘अखण्ड ज्योति’ मात्र एक पत्रिका नहीं, उनके परिवार की ज्येष्ठतम सदस्य है, उनकी अभिभावक है। जिसे वे बड़ी ही श्रद्धा एवं सम्मान से देखते हैं, पढ़ते हैं और उसके परामर्शों को भक्तिपूर्ण हृदय से स्वीकारते हैं। अखण्ड ज्योति के पठन-पाठन में उन्हें अपने सद्गुरु की चेतना के स्पर्श की अनुभूति होती है
छुट्टियों में जब-तब वह अपने गाँव बैरीपुर आया करते थे। वहाँ गाँव वालों को, अपने परिवार के अन्य सदस्यों को गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति की पुरानी लेकिन प्रामाणिक बातें सुनाते। ऐसे ही उन्होंने अपनी भतीजी गिरजा के बेटे को सुनाते हुए कहा- राजा! जानते हो सन् 1942-45 के दिनों में अखण्ड ज्योति में छोटी-छोटी किन्तु बड़ी ही असरकारक साधनाएँ छपा करती थीं। ये साधनाएँ छपती तो अभी भी हैं, पर तब खास बात यह थी कि जिज्ञासा करने पर पत्र लिखने पर उन दिनों गुरुदेव अपने पास बुला लिया करते थे
अखण्ड ज्योति, जीवन यज्ञ दो पत्रिकाएँ उन दिनों निकलती थीं। बाद में जीवन यज्ञ बंद हुआ फिर युगनिर्माण योजना पत्रिका प्रकाशित की गई। प्रत्येक में काव्य को स्थान दिया गया था
अपने पिता की ही भाँति श्री राजेन्द्रकुमार द्विवेद्वी ने अपने तीनों बच्चों को अखण्ड ज्योति का अनुराग दिया। उनके सभी भाइयों और छोटी बहन ने भी अपने बड़े भाई का अनुगमन करते हुए अपनी सभी सन्तानों और रिश्तेदारों के जीवन में अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरणें उड़ेंली। और आज श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी के बच्चे अपने बच्चों को अखण्ड ज्योति के प्रति श्रद्धा एवं अनुराग का पाठ पढ़ा रहे हैं। इस तरह इस परिवार की चौथी पीढ़ी भी अपने पूर्व पुरुषों का अनुगमन कर रही है
और अब तो उनके परिवार में चौथी पीढ़ी भी जन्म ले चुकी है, जिसे अपनी दादी-नानी के मुख से लोरी के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित होने वाली लघुकथाएँ और कहानियाँ सुनने को मिल रही है। श्री द्विवेदी के माता-पिता श्रीमती रामरती द्विवेदी एवं श्री चन्द्रसेन द्विवेदी परम पूज्य गुरुदेव से तब मिले और जुड़े, जब अखण्ड ज्योति का शुरुआती दौर था। इसे प्रकाशित होते हुए अभी कुछ ही वर्ष बीते थे। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति दोनों को एक साथ गहन श्रद्धा से अपना लिया
देवमाता गायत्री की शक्ति से जन्में, पनपे और बढ़े और माता के नाम से जाने जाने वाले इस गायत्री परिवार में कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें अखण्ड ज्योति पीढ़ियों से अपना प्यार दे रही है। उनके लिए अखण्ड ज्योति गुरुदेव एवं गायत्री की जीवन्त प्रतिमा है। उनके आराध्य का साकार रूप है। मन को शान्ति, समाधान एवं प्रकाश देने वाला कल्पतरु है
“मार्च की अखण्ड ज्योति आपने पढ़ी होगी। न पढ़ी हो तो उसे एक बार फिर पढ़ लें। आगामी गायत्री जयंती से जो युगनिर्माण विद्यालय आरंभ होने जा रहा है, उसके तथा प्रथम पंचवर्षीय योजना के संबंध में अपना अभिमत लिखें
उनके परिवार एवं पीढ़ियों के साथ अपने देव परिवार में और भी परिवार एवं पीढ़ियाँ हैं, जो अखण्ड ज्योति को अपने परिवार एवं परम्परा की आदि माता मानती है। इनके लिए यह पत्रिका छपे हुए कागज की पुलिन्दा नहीं, सद्गुरु की पाती है। वे जानते हैं कि इसमें शब्दों को गूँथ कर पंक्तियाँ बनाने वाले हाथ भले ही लौकिक हों, पर पाती अलौकिक है
परंपरागत कोर्स इसमें नहीं होंगे, परंतु जो कोर्स प्रारंभ होने जा रहे हैं, उनके पाठ्यक्रम शीघ्रातिशीघ्र लिखे जाने हैं। इन्हीं सब उद्देश्यों को दृष्टिगत रख स्वायत्तशासी, पूर्णतः परिजनों के अंशदान पर निर्भर इस अद्वितीय विश्वविद्यालय पर एक विशेषांक जून, 22 के अखण्ड ज्योति अंक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। परिजनों को वह पुस्तकाकार में भी मिल सकेगा। सभी से उसको पढ़कर फीडबैक भेजने का अनुरोध किया जा रहा है, ताकि इसका सुव्यवस्थित संचालन आरंभ किया जा सके
इस द्विवेदी परिवार में अखण्ड ज्योति में श्रद्धा यूँ नहीं पनपी। इन सभी लोगों ने अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कृपा की अनेकों अनुभूतियों को जिया है। अपने समूचे परिवार और इसकी पीढ़ियों को अखण्ड ज्योति से जोड़ने वाले श्री चन्द्रसेन द्विवेदी उत्तर रेलवे में स्टेशन-मास्टर थे। छुट्टियों में जब-तब वह अपने गाँव बैरीपुर आया करते थे
आगे भी अनगिन वर्ष बीतेंगे, कलम थामने वाली अंगुलियाँ बदलेंगी, पर सद्गुरु के विचार उसी तरह से प्रवाहित होते रहेंगे। न काल की गति रुकेगी, न अखण्ड ज्योति का प्रकाश मन्द पड़ेगा। इसकी प्रखर ज्योति में असंख्य परिवारों एवं इनकी अनगिन पीढ़ियों की भावनाएँ इसी तरह झिलमिलाती रहेंगी, जैसे कि आज और अभी जगमग ज्योतित हो रही हैं
लौकिक काम मुकदमा, बीमारी और घर-परिवार की ढेरों समस्याएँ तो गुरुदेव चुटकियों में हल कर दिया करते थे। सारी समस्याओं को सुनकर वह कहते तुम लोग चिन्ता क्यों करते हो, समस्याएँ हैं तो क्या हुआ, हम हैं, अखण्ड ज्योति है। जिज्ञासुओं की जिज्ञासा होती- गुरुदेव आप हैं यह तो समझ में आता है। आप अपने तप से हमें त्राण दिलाते हैं, परन्तु अखण्ड ज्योति इसमें क्या करेगी
आज से तीन दशक से भी पूर्व स्वर्गीय श्री चन्द्रसेन द्विवेदी कहा करते थे- कि परम पूज्य गुरुदेव ने मुझसे कहा है कि मेरे न मिलने पर, मेरे न रहने पर अखण्ड ज्योति मिशन में गुरु की भूमिका निभाएगी। उनके अनुसार गुरुदेव कहते- ‘आज सिक्खों का गुरु कौन है, ग्रन्थ साहिब ही न। सिक्खों के लिए यह ग्रन्थ साहिब ही उनके गुरुओं के, सत्पुरुषों के सद्विचारों का प्रेरक प्रकाश पुञ्ज है
पहले कानपुर देहात के गोपालपुर गाँव, फिर ग्राम-बैरीपुर और अब लखनऊ शहर के राजाजीपुरम् में रह रहे इस द्विवेदी परिवार ने अपने निवास तो कई बदले पर उनकी अखण्ड ज्योति के प्रति आस्था नहीं बदली। अपने पिता की ही भाँति श्री राजेन्द्रकुमार द्विवेद्वी ने अपने तीनों बच्चों को अखण्ड ज्योति का अनुराग दिया। उनके सभी भाइयों और छोटी बहन ने भी अपने बड़े भाई का अनुगमन करते हुए अपनी सभी सन्तानों और रिश्तेदारों के जीवन में अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरणें उड़ेंली
अखण्ड ज्योति श्रद्धावानों को अहसास ही नहीं होने देती कि परम पूज्य गुरुदेव आज नहीं हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि वे हैं, और हैं ही नहीं अखण्ड ज्योति के रूप में हर महीने अपने परिवार के सदस्यों से मिलने, अपने परिजनों को परामर्श देने उनके घर पहुँचते हैं
उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति दोनों को एक साथ गहन श्रद्धा से अपना लिया। अपने चारों पुत्रों एवं एक सुपुत्री यानि की पाँचों सन्तानों को उन्होंने उच्चशिक्षा एवं संस्कारों के साथ गुरुदेव की कृपा छाया एवं अखण्ड ज्योति का प्रकाश विरासत में दिया
सिक्खों के लिए यह ग्रन्थ साहिब ही उनके गुरुओं के, सत्पुरुषों के सद्विचारों का प्रेरक प्रकाश पुञ्ज है। अखण्ड ज्योति का भी यही स्वरूप है। इसमें मेरी चेतना की धारा सतत प्रवाहित होती रहेगी। समय बीतता रहेगा, महीने बीतेंगे, वर्ष बीतेंगे, दशक बीतेंगे, शतक बीतेंगे, पर पुरातन होने पर भी अखण्ड ज्योति सनातन और नित्य नूतन बनी रहेगी
श्रद्धा इसमें जीवन के समाधान पाती है। अखण्ड ज्योति श्रद्धावानों को अहसास ही नहीं होने देती कि परम पूज्य गुरुदेव आज नहीं हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि वे हैं, और हैं ही नहीं अखण्ड ज्योति के रूप में हर महीने अपने परिवार के सदस्यों से मिलने, अपने परिजनों को परामर्श देने उनके घर पहुँचते हैं
वे अपने लिए भी लिखते हैं कि पारंपरिक औपन्यासिक कहानियाँ जो मनोरंजन करती है, वे नहीं लिखते, मात्र धार्मिक साहित्य का लेखन करते है। जिसका प्रमाण उनकी पंद्रह वर्षीय पुरानी अखण्ड ज्योति पत्रिका थी, जिसके माध्यम से मोहनराज जी जुड़े थे। पारिश्रमिक पर जो टिप्पणी है, वह भी हृदय को स्पर्श कर जाती है। यह एक पत्र नहीं, दस्तावेज है, एक नूतन उभरते साहित्यकार को दिए जा रहे मार्गदर्शन का, उँगली पकड़कर सिखाने वाले स्तर की गुरुसत्ता के परामर्श का
सिवनी के श्री ध्रुवनारायण जौहरी अच्छे चिंतक हैं, शिक्षाविद् हैं एवं ‘अखण्ड ज्योति’ का वैज्ञानिक अध्यात्मवादपरक परिवर्द्धक होने के बहुत पूर्व से पूज्यवर से जुड़े रहे हैं। आज भी वे हमारे संपर्क में हैं, समय-समय पर हमें भी परामर्श देते रहते हैं। उन्हें 17-1-70 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
सन् 2002 ई. के इस अप्रैल महीने में ‘अखण्ड ज्योति’ का 748 वाँ अंक आपके हाथों में है। पूरे 62 वर्ष और चार महीनों से यह अपने प्रकाश और प्रभा से लोकमानस में उजाला फैला रही है। देश-विदेश में बसे अपने देव-परिवार के असंख्य सदस्यों की गहरी भावनाएँ इससे जुड़ी हैं
लीजिए बनाइए चित्र। किसके लिए बनाएँ? हमारी अखण्ड ज्योति के लिए बनाइए। गुरुजी! आप तो पाँच सौ रुपये तो वैसे ही दे देंगे, देखिए चित्र बनाकर लाया हूँ। बेटे! ये तूने क्या बनाया? हमारा कागज भी बरबाद कर दिया और रंग भी खराब कर दिया और ऐसे ही लकीरें बना लाया
पहले कानपुर देहात के गोपालपुर गाँव, फिर ग्राम-बैरीपुर और अब लखनऊ शहर के राजाजीपुरम् में रह रहे इस द्विवेदी परिवार ने अपने निवास तो कई बदले पर उनकी अखण्ड ज्योति के प्रति आस्था नहीं बदली। अपने पिता की ही भाँति श्री राजेन्द्रकुमार द्विवेद्वी ने अपने तीनों बच्चों को अखण्ड ज्योति का अनुराग दिया। उनके सभी भाइयों और छोटी बहन ने भी अपने बड़े भाई का अनुगमन करते हुए अपनी सभी सन्तानों और रिश्तेदारों के जीवन में अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरणें उड़ेंली। और आज श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी के बच्चे अपने बच्चों को अखण्ड ज्योति के प्रति श्रद्धा एवं अनुराग का पाठ पढ़ा रहे हैं
इसमें मेरी चेतना की धारा सतत प्रवाहित होती रहेगी। समय बीतता रहेगा, महीने बीतेंगे, वर्ष बीतेंगे, दशक बीतेंगे, शतक बीतेंगे, पर पुरातन होने पर भी अखण्ड ज्योति सनातन और नित्य नूतन बनी रहेगी। ’ गुरुदेव के इन वचनों को श्री द्विवेदी ने अपने परिवार और पीढ़ियों को विरासत में दिया
इसके लिए सुसंस्कृत साधक पहले बनना होता है। ” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1942 पृष्ठ 36)। वास्तविकता यही है। गौरव बोध से होने वाला काम, जिसके पीछे स्वार्थ और अहं की प्रेरणा न हो, पुण्य बन जाता है
असंख्य जनों की श्रद्धा, प्रेम एवं आतुर भावनाएँ बड़ी ही आकुलता से हर महीने अखण्ड ज्योति का इन्तजार करती हैं। दादा और दादी के साथ, नाना और नानी के साथ, पोते-पोतियों, नाती-नातियों और इनके माता-पिता इसकी प्रतीक्षा करते हैं। 62 वर्षों से यह क्रम चल रहा है, अब तो 63 वाँ साल भी लग चुका है
उनके सभी भाइयों और छोटी बहन ने भी अपने बड़े भाई का अनुगमन करते हुए अपनी सभी सन्तानों और रिश्तेदारों के जीवन में अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरणें उड़ेंली। और आज श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी के बच्चे अपने बच्चों को अखण्ड ज्योति के प्रति श्रद्धा एवं अनुराग का पाठ पढ़ा रहे हैं। इस तरह इस परिवार की चौथी पीढ़ी भी अपने पूर्व पुरुषों का अनुगमन कर रही है
इस द्विवेदी परिवार की तीन पीढ़ियाँ अखण्ड ज्योति का प्रकाश पीकर ही पली-बढ़ी हैं। और अब तो उनके परिवार में चौथी पीढ़ी भी जन्म ले चुकी है, जिसे अपनी दादी-नानी के मुख से लोरी के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित होने वाली लघुकथाएँ और कहानियाँ सुनने को मिल रही है। श्री द्विवेदी के माता-पिता श्रीमती रामरती द्विवेदी एवं श्री चन्द्रसेन द्विवेदी परम पूज्य गुरुदेव से तब मिले और जुड़े, जब अखण्ड ज्योति का शुरुआती दौर था। इसे प्रकाशित होते हुए अभी कुछ ही वर्ष बीते थे
इन सभी लोगों ने अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कृपा की अनेकों अनुभूतियों को जिया है। अपने समूचे परिवार और इसकी पीढ़ियों को अखण्ड ज्योति से जोड़ने वाले श्री चन्द्रसेन द्विवेदी उत्तर रेलवे में स्टेशन-मास्टर थे। छुट्टियों में जब-तब वह अपने गाँव बैरीपुर आया करते थे। वहाँ गाँव वालों को, अपने परिवार के अन्य सदस्यों को गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति की पुरानी लेकिन प्रामाणिक बातें सुनाते
जिज्ञासुओं की जिज्ञासा होती- गुरुदेव आप हैं यह तो समझ में आता है। आप अपने तप से हमें त्राण दिलाते हैं, परन्तु अखण्ड ज्योति इसमें क्या करेगी। गुरुदेव कहते- अखण्ड ज्योति को मुझसे अलग मत समझो। जो श्रद्धावान है, उन्हें सदा ही इसमें अपनी समस्याओं के समाधान मिलते रहेंगे
जिसे वे बड़ी ही श्रद्धा एवं सम्मान से देखते हैं, पढ़ते हैं और उसके परामर्शों को भक्तिपूर्ण हृदय से स्वीकारते हैं। अखण्ड ज्योति के पठन-पाठन में उन्हें अपने सद्गुरु की चेतना के स्पर्श की अनुभूति होती है। इसके किसी भी अंक को माथा नवाकर उन्हें गुरु चरणों में माथा नवाने का सुख मिलता है
इसे प्रकाशित होते हुए अभी कुछ ही वर्ष बीते थे। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति दोनों को एक साथ गहन श्रद्धा से अपना लिया। अपने चारों पुत्रों एवं एक सुपुत्री यानि की पाँचों सन्तानों को उन्होंने उच्चशिक्षा एवं संस्कारों के साथ गुरुदेव की कृपा छाया एवं अखण्ड ज्योति का प्रकाश विरासत में दिया
कितने का बिका ये चित्र? बहुत दाम का बिका। हम अखण्ड ज्योति के कवरपेज की डिजाइन बनवाते हैं। उसके लिए हमें पाँच सौ रुपये देने पड़ते है। चित्रकार दो दिन में बना देता है
देवमाता गायत्री की शक्ति से जन्में, पनपे और बढ़े और माता के नाम से जाने जाने वाले इस गायत्री परिवार में कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें अखण्ड ज्योति पीढ़ियों से अपना प्यार दे रही है। उनके लिए अखण्ड ज्योति गुरुदेव एवं गायत्री की जीवन्त प्रतिमा है। उनके आराध्य का साकार रूप है
उपर्युक्त पाठ्य सामग्री मधुसंचय की तरह से पूज्यवर द्वारा एक नहीं, ढेरों व्यक्तियों को प्रेरित कर लिखवा ली गई। समय-समय पर उसका अखण्ड ज्योति पत्रिका में उपयोग भी हुआ, पर विलक्षण बात यह थी कि विज्ञान, परामनोविज्ञान की सामग्री भेजने वाला लेखक-शिष्य भी जब छपकर आए लेख को देखता था तो बस उँगली दाँतों तले दबाकर रह जाता था। वैज्ञानिक तथ्यों की गवाही लेकर किस तरह ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ स्थापित किया गया, इस पर समय रहते जब भी शोध होगी, कई अनजाने पहलू सामने आएंगे। गुरुसत्ता ने सभी को अवसर दिया, वे स्वाध्याय करें, पाठ्य सामग्री का संकलन करें व उसे नियमित भेजते रहें
ऐसा ही एक परिवार श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी का है। इस द्विवेदी परिवार की तीन पीढ़ियाँ अखण्ड ज्योति का प्रकाश पीकर ही पली-बढ़ी हैं। और अब तो उनके परिवार में चौथी पीढ़ी भी जन्म ले चुकी है, जिसे अपनी दादी-नानी के मुख से लोरी के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित होने वाली लघुकथाएँ और कहानियाँ सुनने को मिल रही है। श्री द्विवेदी के माता-पिता श्रीमती रामरती द्विवेदी एवं श्री चन्द्रसेन द्विवेदी परम पूज्य गुरुदेव से तब मिले और जुड़े, जब अखण्ड ज्योति का शुरुआती दौर था
वहाँ गाँव वालों को, अपने परिवार के अन्य सदस्यों को गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति की पुरानी लेकिन प्रामाणिक बातें सुनाते। ऐसे ही उन्होंने अपनी भतीजी गिरजा के बेटे को सुनाते हुए कहा- राजा! जानते हो सन् 1942-45 के दिनों में अखण्ड ज्योति में छोटी-छोटी किन्तु बड़ी ही असरकारक साधनाएँ छपा करती थीं। ये साधनाएँ छपती तो अभी भी हैं, पर तब खास बात यह थी कि जिज्ञासा करने पर पत्र लिखने पर उन दिनों गुरुदेव अपने पास बुला लिया करते थे। और जिज्ञासु को इन साधनाओं को अपने सामने बिठाकर सिखा देते
पत्र में मंगलकामनाएँ हैं कवि के लिए व पूर्व से दिया जा रहा आह्वान है कि वे अपनी कविताएँ अन्य पत्रिकाओं के अलावा अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान पाक्षिक आदि पत्रिकाओं के लिए भी भेजते रहें। पं. रामस्वरूप जी निरंतर काव्य-लेखन करते रहे एवं पूज्यवर अपनी पत्रिकाओं में उन्हें अग्रणी स्थान देते रहे। पत्र छोटा-सा है, पर एक साधक-कवि को प्रेरणा दी गई है एवं उसके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ व्यक्त की हैं
परमपूज्य गुरुदेव ने जुलाई 77 (पृष्ठ 54-55) की अखण्ड ज्योति के संपादकीय में लिखा, “परिवार शब्द हमारी नस-नस में उत्साह भर देता हैं। उसका निखरा हुआ स्वरूप कहीं भी बनता दिखे तो आँखें चमकने लगती है। गायत्री परिवार, युगनिर्माण परिवार नामकरण हम इसी दृष्टि से करते आए हैं
कुछ अधिक अक्षरों की अधिक लंबी लाइनें हों, चार-चार लाइन के छंदों की शैली हमें अधिक रुचिकर लगती है। जीवन यज्ञ तथा अखण्ड ज्योति में आप अक्सर वैसी ही कविताएँ देखते होंगे। इस प्रकार की रचनाएँ बनाने का प्रयास करें तो हमें और भी अधिक प्रसन्नता होगी। आशा है आप सानंद होंगे
महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र में योग का सत्य बताते हैं और परम पूज्य गुरुदेव इसे अपने जीवन के प्रयोग से सिद्ध करते हैं। योग क्या है? इसे अपने जीवन में गुरुदेव ने कैसे अनुभव किया? साधना के प्रवेश द्वार के पश्चात् साधक को पहली अनुभूति क्या होती है? इन सवालों का सटीक समाधान अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में मिलेगा। इसे पढ़कर ‘योग का स्वरूप’ बोध होना निश्चित है
आप अपने तप से हमें त्राण दिलाते हैं, परन्तु अखण्ड ज्योति इसमें क्या करेगी। गुरुदेव कहते- अखण्ड ज्योति को मुझसे अलग मत समझो। जो श्रद्धावान है, उन्हें सदा ही इसमें अपनी समस्याओं के समाधान मिलते रहेंगे। यह मेरी ही चेतना की अभिव्यक्ति है, मेरा अपना ही प्राकट्य है
इस द्विवेदी परिवार में अखण्ड ज्योति में श्रद्धा यूँ नहीं पनपी। इन सभी लोगों ने अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कृपा की अनेकों अनुभूतियों को जिया है। अपने समूचे परिवार और इसकी पीढ़ियों को अखण्ड ज्योति से जोड़ने वाले श्री चन्द्रसेन द्विवेदी उत्तर रेलवे में स्टेशन-मास्टर थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
महायोगी परम पूज्य गुरुदेव तंत्र विद्या के महान् आचार्य भी थे। अखण्ड ज्योति जून 1940 के ये कुछ पृष्ठ उनके इसी आचार्यत्व का प्रामाणिक दस्तावेज हैं
अखण्ड ज्योति के पुराने पन्नों में परम पूज्य गुरुदेव के जीवन के नए रहस्य हैं। इनमें गुरुदेव के ‘जन्म कर्म च में दिव्यमेवं’ की झलक है। उनकी सेवा-साधना का प्रकाश है
‘ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ नहीं’ शीर्षक से विगत मई 2002 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में परिजन विस्तार से पढ़ चुके हैं कि ज्ञान की पूर्णता पर पहुँचा हुआ साधक अपनी श्रद्धा, संयमशीलता एवं तत्परता द्वारा भगवत्प्राप्ति रूपी परम शाँति को प्राप्त होता है। भगवान इन समापन के श्लोकों में ज्ञान के साथ श्रद्धा, आदर्शों में असीम प्यार, श्रेष्ठता को प्राप्त करने की अटूट लगन पर सर्वाधिक जोर देते हैं। वे कहते हैं कि श्रद्धाहीन अज्ञानी संशय से भरा मनुष्य तो परमार्थ पथ से भटक जाता है एवं अंततः उसका नाश होता है
फिर भी कुछ प्रयोगों के जो निष्कर्ष सामने आए हैं, वे अति उत्साहवर्धक है। जिज्ञासु इन्हें अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर पढ़ेंगे। इन निष्कर्षों से जहाँ अध्यात्मविद्या की समर्थता प्रकट होती है। वहीं यह सत्य भी प्रकट होता है कि देश व विश्व के जन-जन को इनसे लाभान्वित करने के लिए इनमें आधुनिक विज्ञान की तकनीकों का समावेश जरूरी है
लेखनी के हर कोण से वे मातृशक्ति की अर्घ्य करते दिखाई देते हैं। चाहे वह उनका निरंतर अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण के लिए किया गया लेखन हो अथवा ‘महिला जाग्रति अभियान’ पत्रिका के लिए लिखे गए उनके मार्गदर्शन हों, सभी तरफ यही करुणा दिखाई देती है। उनके लिखे पत्रों में विशेष रूप से एक मार्गदर्शक शैली भी दृष्टिगोचर होती है, जो पत्र लेखन कला का एक विलक्षण नमूना है
परम पूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर ‘तंत्र विज्ञान की अद्भुत शक्ति! अपने कष्ट मिटाने में हमारी सेवा स्वीकार कीजिए। ’ शीर्षक से एक आमंत्रण लेख लिखा था। इसमें गुरुदेव ने लिखा- ‘शारीरिक रोगों की चिकित्सा के लिए अब यह नियम बना दिया गया है कि केवल वे ही रोगी पत्र व्यवहार करें जिन्हें जीवन का खतरा है
हम सब भी इसके पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी
उनकी सेवा-साधना का प्रकाश है। सन् 1940 ई. की अप्रैल और जून माह की अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर ऐसा ही एक रहस्यमय प्रसंग अंकित है। उन दिनों गुरुदेव ने ‘आनन्द प्रतिष्ठान’ नाम की एक संस्था की स्थापना की थी। यह संस्था तंत्र विज्ञान की साधना-शिक्षण एवं इसकी विभूतियों व उपलब्धियों से लोक सेवा हेतु संकल्पित थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-June
घुमा-फिरा कर आशा का केन्द्र अपने गायत्री परिवार के परिजनों के साथ ऐसे पुण्यात्मा जन ही हैं। अखण्ड ज्योति को इस समय थामे हुए हाथों से ही प्रकाश के दान की अपेक्षा की गई है। इन पंक्तियों के सभी पाठक चाहे वे कोई भी क्यों न हों, अपने अपनत्व के घेरे में हैं। सारी आशाएँ उन्हीं पर टिकी हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
यदि आज का युगधर्म निभना है, तो वह युगपुरुष-हमारे अपने गुरु के वचनों पर विश्वास-गहरी श्रद्धा टिकाने पर ही संभव हो सकेगा। अखण्ड ज्योति मई 1970 में पूज्यवर ने लिखी” सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युगावतारी-निष्कलंक भगवान द्वारा होने वाला है, वह और काई नहीं, विशुद्ध रूप में अपना युगनिर्माण आँदोलन ही है। ” (पृष्ठ 6) इसके बाद भी संशयात्मा हैं, तो विनाश सुनिश्चित है। इस व अंतिम दो श्लोक की विस्तार से व्याख्या जुलाई अंक में
परम पूज्य गुरुदेव को साधना काल में जो सन्देश मिला, जो संकेत प्रकट हुए उन्हीं के आधार पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की योजना बनी। यह दैवी संकल्प का दिव्य प्राकट्य था। उन दिनों न तो मिशन था और न साधन
इस प्रथम अंक का प्रथम लेख परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया सम्पादकीय है। जिसके ऊपर अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कार्यशैली को स्पष्ट करने वाली दो पंक्तियाँ छपी है। ये पंक्तियाँ हैं-
जनवरी 1940 से भी काफी पहले अखण्ड ज्योति परम पूज्य गुरुदेव के हृदय में एक दिव्य संदेश की भाँति अवतरित हुई। अपनी साधना में समाधिस्थ गुरुदेव को हिमालय के ऋषियों का यह सन्देश मिला कि “आध्यात्मिक जगत् में भारत माता की बेड़ियाँ टूट चुकी हैं। राष्ट्र की स्वतंत्रता की घोषणा की जा चुकी है
उनकी चाहत एक जैसी होगी- अखण्ड ज्योति के इस पहले अंक की कथा को जानने की। सभी के हृदयों में अंकुरित हो रहा यह प्रश्न-पादप एक सा होगा कि जनवरी 1940 में प्रकाशित हुआ अखण्ड ज्योति का यह पहला अंक कैसा था?
अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक की कथा बड़ी प्रेरक है। आज तो इन क्षणों में अपने परिजन इसके 749 वें अंक को अपने हाथों में थामे हुए हैं। उन्हें शायद आज से 62 वर्ष और कुछ महीने पूर्व प्रकाशित हुए इस अंक की ठीक से कल्पना भी नहीं हो पा रही होगी
गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता का वरद्हस्त था। अपने हृदय में अलौकिक ऊर्जा को संजोये गुरुदेव ने ठीक समय पर अखण्ड ज्योति के पहले अंक को प्रकाशित कर ही दिया
इसका वार्षिक शुल्क मात्र 1.50 रुपये था। 24 आने में पूरे वर्ष भर अखण्ड ज्योति के 35 पृष्ठो में उत्कृष्ट विषय वस्तु को मुद्रित कर पाने एवं प्रकाशित करवाने का बीड़ा गुरुदेव ने उठाया। उनका उद्देश्य था कि कम से कम खर्च में पठनीय और उत्कृष्ट सामग्री जन सामान्य तक पहुँचे। वह अखण्ड ज्योति को केवल विचारशील वर्ग की पत्रिका बनाने में विश्वास नहीं रखते थे
मुद्रण के साथ इसके प्रकाशन की व्यवस्था भी आगरा से ही बनी। उन दिनों गुरुदेव ने आगरा शहर के फ्रीगंज मुहल्ले में ‘अखण्ड ज्योति’ का कार्यालय खोला हुआ था। यहीं से इसके प्रकाशन एवं वितरण की व्यवस्था बनायी गई
यह कार्य उनने पत्रों से भी किया। अखण्ड ज्योति पत्रिका से भी तथा ढेरों कार्यकर्त्ताओं को सामने बिठाकर भी किया। यदि सही अर्थों में उन्हें आचार्य-युगाचार्य-संस्कृतिपुरुष कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। क्योंकि जो भी माध्यम मिले, वे उनसे जीवनभर शिक्षण देते रहे, लोगों को योग्य बनाते रहे
व्यवस्थापक
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
इस आकर्षक चित्र की ही भाँति इसकी विषय वस्तु भी आकर्षक है। अखण्ड ज्योति के इस प्रथम अंक में प्रकाशित सामग्री के शीर्षक अग्रलिखित हैं- 1. अखण्ड ज्योति क्यों?, 2. कर्त्तव्य की पुकार, 3. धर्म का सच्चा स्वरूप, 4. मौन एक दैवी रेडियो, 5. धर्म और विज्ञान, 6. मनुष्य का मनोबल, 7. शीर्षासन का महत्त्व, 8. जहाँ चाह - वहाँ राह। इसी के साथ इसके अन्तिम पृष्ठ पर ‘आत्मचिन्ता’ शीर्षक से एक कविता प्रकाशित हुई है
उनका उद्देश्य था कि कम से कम खर्च में पठनीय और उत्कृष्ट सामग्री जन सामान्य तक पहुँचे। वह अखण्ड ज्योति को केवल विचारशील वर्ग की पत्रिका बनाने में विश्वास नहीं रखते थे। उनका उद्देश्य जन सामान्य को विचारशीलों के समुदाय के रूप में विकसित करना था। इसके सरंजाम उन्होंने इसके प्रथम अंक से जुटाए थे
अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक के सम्पादकीय के अंश, गुरुदेव की लेखनी से निःसृत सत्य- किस तरह अखण्ड ज्योति एवं उसके पाठकों का जीवन सत्य बना हुआ है- इससे हम सभी परिचित हैं। इसके अलौकिक प्रकाश में हमारे देव परिवार के सभी सदस्य इसी तरह अपने जीवन सत्य और जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे, ऐसा विश्वास है। इसके प्रथम अंक से जो जीवन बोध का निर्झरिणी प्रवाहित हुई, वह सदा-सदा यूँ ही प्रवाहित होती रहेगी
परमपूज्य गुरुदेव के मूर्तिमान स्वरूप वांग्मय को घर-घर पहुँचाने के लिए निष्ठावान परिजनों की आवश्यकता है। जो भाई इस कार्य हेतु अपने को योग्य समझते हों, निम्नलिखित विवरण सहित अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से संपर्क करें। समुदाय की अवधि दो माह की रहेगी। टोलियाँ प्रत्येक माह की 1 से 14 तारीख से निकलेंगी
इसके मालिक पं. मधुसूदन शरण शर्मा परम पूज्य गुरुदेव, तब के ‘मत्त जी’ के व्यक्तित्व से परिचित ही नहीं, प्रेरित और प्रभावित भी थे। उन्होंने अखण्ड ज्योति के इस प्रथम अंक के मुद्रण को न केवल ठीक समय पर सम्पन्न किया बल्कि इसकी उत्कृष्टता का भी ध्यान रखा। मुद्रण के साथ इसके प्रकाशन की व्यवस्था भी आगरा से ही बनी। उन दिनों गुरुदेव ने आगरा शहर के फ्रीगंज मुहल्ले में ‘अखण्ड ज्योति’ का कार्यालय खोला हुआ था
सबकी जड़ तो साधना है। बेटा, मथुरा के अखण्ड ज्योति संस्थान में जो 9&9 की कोठरी है, वहीं पर मैंने सब कुछ देख समझ लिया था। वहीं पर उसी कोठरी में साधना करते हुए मैंने मिशन का आज का वर्तमान और आगे का भविष्य देखा था। अपने साधनाकाल में ध्यान करते हुए मैंने शान्तिकुञ्ज देखा था, तुम सबको देखा था
सदाचार और अध्यात्म विद्या को एक ही चीज के दो पहलू कहना चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ इसी अध्यात्म विद्या की चर्चा करने के लिए अवतीर्ण हुई है। ’ (अखण्ड ज्योति, जनवरी, 1940, पृ. 3)
साज-सज्जा की दृष्टि से अखण्ड ज्योति अपने पहले अंक से ही आकर्षण का केन्द्र बन गयी। इसके पहले अंक के कवर पेज पर योगिराज भगवान् श्री कृष्ण का चित्र प्रकाशित किया गया। प्रथम अंक के कवर पेज पर छपे हुए इस चित्र में जो संकेत है, उनसे पत्रिका के रीति-नीति ही नहीं गुरुदेव के जीवन को भी अभिव्यक्ति मिलती है
पर इन पंक्तियों को पढ़ रहे सभी जनों के मनों में जिज्ञासा के भाव एक समान होंगे। उनकी चाहत एक जैसी होगी- अखण्ड ज्योति के इस पहले अंक की कथा को जानने की। सभी के हृदयों में अंकुरित हो रहा यह प्रश्न-पादप एक सा होगा कि जनवरी 1940 में प्रकाशित हुआ अखण्ड ज्योति का यह पहला अंक कैसा था?
इसमें विस्तार से इस स्थापना की अवधारणा एवं अनंत संभावनाओं का वर्णन है। अतिरिक्त प्रतियों के लिए पाठकगण ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ से संपर्क करें
युगनिर्माण योजना का सूत्रपात उन्होंने किया एवं नवयुग का संविधान रचा। पंचकोशी साधना का पत्राचार पाठ्यक्रम ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से एवं कुछ साधकों की धुरी पर क्राँतिकारी परिवर्तन कैसे आएगा। इस पर ‘महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ नामक लेखमाला उन्होंने जून - अक्टूबर 1967 में लिखी। फिर पुस्तक रूप में उसकी प्रस्तुति 1968 में की
अखण्ड ज्योति के प्रथम वर्ष के प्रथम अंक की कीमत मात्र दो आने थी। इसका वार्षिक शुल्क मात्र 1.50 रुपये था। 24 आने में पूरे वर्ष भर अखण्ड ज्योति के 35 पृष्ठो में उत्कृष्ट विषय वस्तु को मुद्रित कर पाने एवं प्रकाशित करवाने का बीड़ा गुरुदेव ने उठाया
हमें यह स्पष्ट मस्तिष्क लेकर चलना चाहिए कि परखे हुए अध्यापकों द्वारा व्यक्ति और समाज का सर्वांगपूर्ण विकास प्रस्तुत कर सकने में समर्थ शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए और उसे प्राप्त करने वाले मस्तिष्क में यह तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए कि नौकरी के लिए नहीं प्रतिभा संवर्द्धन के लिए पढ़ा जा रहा है। (संपादकीय- जून 1970,अखण्ड ज्योति पृष्ठ 57-58)
‘अखण्ड ज्योति’ इसी अध्यात्म विद्या की चर्चा करने के लिए अवतीर्ण हुई है। ’ (अखण्ड ज्योति, जनवरी, 1940, पृ. 3)
अपने जीवन सत्य की इस काव्यमयी अभिव्यक्ति के साथ उन्होंने अखण्ड ज्योति के आध्यात्मिक सत्य को स्पष्ट करते हुए इस प्रथम अंक में लिखा- ‘आज तक जितने भी मानवता के महान् आचार्य हुए हैं, उन्होंने एक स्वर से चिल्ला-चिल्लाकर कहा है। असली आनन्द, सुख-सन्तोष और शान्ति मनुष्यता की उपासना में है। इस समय जितनी गुत्थियाँ दुनिया के सामने हैं, उनकी जड़ में एक ही कारण है- मनुष्यता का अभाव
अखण्ड ज्योति का अगला अंक ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय विशेषाँक’ है। इसमें विस्तार से इस स्थापना की अवधारणा एवं अनंत संभावनाओं का वर्णन है। अतिरिक्त प्रतियों के लिए पाठकगण ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ से संपर्क करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
इसके अगले सूत्र में महर्षि ने विपर्यय वृत्ति की चर्चा की है, जो अंतर्यात्रा में प्रधान बाधा है। इसकी विस्तृत व्याख्या अखण्ड ज्योति के अगले अंक में
अखण्ड ज्योति पत्रिका अधिकाधिक तक पहुँचे, यही हमारा लक्ष्य हो
तपोभूमि से डेढ़ किलोमीटर पूर्व ( दक्षिण की ओर ) अखण्ड ज्योति संस्थान से लेकर जनजागरण प्रेस, बिड़ला मंदिर (उत्तर की ओर ) तथा पूरे वृंदावन में पीत वस्त्रधारी ही चारों ओर दिखाई दे रहे थे
ठीक यही बात साधना के बारे में हैं। केवल गायत्री महाविज्ञान पढ़ने से, अखण्ड ज्योति के पन्ने उलट लेने से कुछ खास होने वाला नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जो लिखा है, उसे भावभरी श्रद्धा एवं दृढं संकल्प के साथ लंबे समय तक करके देखो, तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। यह कहते हुए वह धीरे से बोले, गायत्री महाविज्ञान में ऐसा एक अक्षर भी नहीं है, जो मेरी अनुभूतियों से न गुजरा हो
पत्रकारों तथा अनेक संगठनों की उक्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रमाण है। तपोभूमि से डेढ़ किलोमीटर पूर्व ( दक्षिण की ओर ) अखण्ड ज्योति संस्थान से लेकर जनजागरण प्रेस, बिड़ला मंदिर (उत्तर की ओर ) तथा पूरे वृंदावन में पीत वस्त्रधारी ही चारों ओर दिखाई दे रहे थे। मूर्ति स्थापना समारोह के बाद अनेकों परिजनों ने वैसी ही अनुभूति की, जैसी कि प्राण प्रतिष्ठा के समय 1952-53 में साधकों ने की थी। चर्चा के समय सभी ने अपनी अनुभूतियाँ बताई
और भी विराटता देखनी हो तो पटना मोकामा क्षेत्र में इसे स्टीमर से पार कर देखिए या पटना के विशाल गाँधी सेतु पर खड़े होकर उसका विहंगम दृश्य देखिए। अखण्ड ज्योति भी ज्ञान की गंगा को लेकर 1937-38 में प्रकाशित होकर आरंभ हुई एवं इसी तरह बढ़ते बढ़ते उस स्वरूप में आ गई, जहाँ ढाई सौ से बढ़कर अब छह लाख उनके हिंदी में एवं इतने ही अन्य भाषाओं में ग्राहक हैं। इससे पाँच से दस गुना पाठक माने जाने चाहिए, जो इसे नियमित पढ़ते हैं। लाखों व्यक्तियों के जीवन को इसने बदला है, उनका कायाकल्प कर दिया है
इससे पूर्व गायत्री परिजनों के लिए लगाई गई एक संक्षिप्त किंतु समग्र जानकारी देने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन अखण्ड ज्योति संस्थान के व्यवस्थापन श्री मृत्युँजय शर्मा जी द्वारा हो चुका था। भारी संख्या में मथुरा नगरवासी व तीर्थयात्री इसे देखने आए। संध्या सात बजे से काफी पूर्व सभी ओर से कार्यकर्ताओं के दल प्रवचन स्थल (चूड़ी वालों की बगीची) की ओर कतारबद्ध होकर जाते दिखाई दे रहे थे
कार्यों का सुनियोजन देखने योग्य था। अखण्ड ज्योति संस्थान, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शाँतिकुँज हरिद्वार के सभी कार्यकर्ताओं ने कंधे से कंधा मिलाकर यज्ञीय भाव के साथ इस पुण्य आयोजन को एक मिसाल बना दिया। सन 1971 के बाद संपन्न हुआ यह कुँभ सभी की स्मृति में ऐसा समा गया है कि अब हर पल उसी का ध्यान मन में रहेगा। लिए गए संकल्प सतत याद आते रहें एवं सक्रियता का उफान निश्चित ही युग परिवर्तन की प्रक्रिया को त्वरित गति देगा, यह विश्वास है
अखण्ड ज्योति पत्रिका विगत 65 वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो, अब इस माह के साथ 66वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। गिनी चुनी पत्रिकाएँ ही हैं, जो इतनी लंबी यात्रा पूरी कर पाई हैं। गंगा गंगोत्री से निकलती है, तो उसकी धारा इतनी कम चौड़ाई की होती है कि कोई लंबी कूद वाला खिलाड़ी उसे पल में छलाँग जाए, पर ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ती है, देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती हैं, मार्ग में झरनों से अनेकानेक छोटी सरिताओं से मिलकर मैदानी क्षेत्र में उतरती है, तो इसका विराट् स्वरूप देखते बनता है
‘हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ’ प्रसंग से अखण्ड ज्योति पत्रिका में एक धारावाहिक शृंखला परमपूज्य गुरुदेव की विदाई की पूर्ववेला में प्रकाशित हुई थी। इसमें उनने अपनी जीवन-साधना के तीन चरणों का उल्लेख किया था, मातृवत् परदारेषु-परद्रव्येषु लोष्ठवत् एवं तीसरा आत्मवत् सर्वभूतेषु। अपने समान सबको देखना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
लेकिन यह आन्तरिक सत्य कम ही लोग अनुभव कर पाते हैं कि इस व्यापक प्रभाव का कारण प्रकाशन तंत्र का सर्वसमर्थ परमेश्वर के प्रति अटूट विश्वास और अडिग आस्था है। विश्वास व आस्था की इसी अविचलता ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठो, पंक्तियों तथा प्रकाशन व्यवस्था के प्रत्येक क्रिया-कलापों में ईश्वरीय प्रकाश के दैवी अवतरण को सहज सम्भव बनाया है। अखण्ड ज्योति के सभी साधन और साध्य भगवद्-विश्वास के रस में भीगे और डूबे हैं। यही वह वास्तविक पूँजी है, जिसके बल बूते इसका प्रकाशन प्रारम्भ हो सका
इस विभाग के प्राध्यापक एवं विद्यार्थी ब्रह्मवर्चस शोध अनुसन्धान के शोध वैज्ञानिकों से मिलकर उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। इसके सामयिक निष्कर्ष अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर प्रकाशित भी हुए हैं। आगे आने वाले दिनों में इस शोध कार्य की गति और भी तीव्र होगी। ताकि उसके निष्कर्षों में प्रतिपादित यौगिक जीवन की तकनीकों को अपनाकर सामान्य जन उत्कृष्ट मानसिक स्वास्थ्य एवं उच्चतम आन्तरिक शक्तियों के जागरण व विकास से लाभान्वित हो सके
इस कलात्मकता में भावनाओं और विचारों के अनेकों रंग उभरते एवं निखरते हैं। इन क्षणों में अपने पाठकों व परिजनों की आँखें अखण्ड ज्योति पत्रिका के जिन पृष्ठो को निहार रही है, उनमें भी लेखन कला का ही महिमामय प्रकाश है। अन्तर्चेतना के भावनात्मक सौंदर्य को इसी से अभिव्यक्ति मिलती है। विपुल साहित्य राशि का उद्गम स्रोत यही है
ज्ञान के प्रसार व विस्तार के लिए ऋषियों की यह परम्परा सर्वकालिक एवं शाश्वत है। इस लेखन कला के द्वारा ही अखण्ड ज्योति के पृष्ठ शाश्वत को सामयिक अभिव्यक्ति देकर ऋषि चिन्तन को विश्वव्यापी बना रहे हैं
चाहे तुम पंद्रह मिनट ही उपासना करो, पर ऐसे तल्लीन हो जाओ कि बस आनंद आ जाए। हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक चित्र है, जो अभी भी है। गुरुजी जब उपासना में बैठते थे तो छह घंटे यह नहीं मालूम पड़ते थे कि जाने कहाँ निकल गए। फिर सारा दिन काम करते थे
ज्यादातर पाठक-परिजन तो इसके प्रभावशाली बाह्य विस्तार के आत्मीय बन्धन में अपने-आपको लपेटा-समेटा हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें यह भी अनुभूति होती है कि अखण्ड ज्योति ईश्वरीय प्रकाश का प्रकाशन है। इसमें प्रकाशित होने वाले भाव और विचारों के साथ प्रकाशन व्यवस्था के प्रत्येक पहलू में इस दैवी प्रकाश की प्रदीप्ति है। इसके पवित्र उजाले से लाखों अन्तःकरण प्रतिमास प्रकाशित और प्रभावित होते हैं
इसी सब को उन्होंने अपनी निधि माना था। इसी वास्तविक पूँजी के सहारे उन्होंने अखण्ड ज्योति का प्रकाशन शुरू किया था। जब-जब झंझावातों के दौर आए। तब-तब वह अपने प्रभु विश्वास की निष्कम्प ज्योति को लिए चलते रहे
इस महिमा की अभिव्यक्ति गुरुगीता की अगली कथा-गाथा में होगी। अखण्ड ज्योति के अगले अंक में इसकी उज्ज्वल किरणें प्रकाशित होंगी। क्रमशः
अखण्ड ज्योति की अंतर्कथा से कम ही लोग परिचित हैं। ज्यादातर पाठक-परिजन तो इसके प्रभावशाली बाह्य विस्तार के आत्मीय बन्धन में अपने-आपको लपेटा-समेटा हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें यह भी अनुभूति होती है कि अखण्ड ज्योति ईश्वरीय प्रकाश का प्रकाशन है
सतत कर्म करते हुए उन्होंने गायत्री तपोभूमि की स्थापना के इस स्वर्ण जयंती वर्ष में देह का त्याग कर दिया। उनके अंतिम संस्कार में उनके स्वजनों एवं गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्ताओं के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान के परिजनों तथा शाँतिकुँज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्हें भावभीनी अंतिम विदाई देते हुए सभी के हृदयों से यही पुकार उठ रही थी कि पंडित जी की ज्योतिर्मय आत्मा सदा ही हम सभी को, अपने गायत्री परिजनों को उच्चस्तरीय प्रेरणा व प्रकाश देती रहे। परम गुरुभक्त, गुरुदेव एवं माताजी के अमर सपूत पं. लीलापति शर्मा को शत्-शत् नमन, शत्-शत् नमन
ईश्वर विश्वास को अपना दृढ़ अवलम्ब मानकर अधिक से अधिक श्रम करते रहना- यही अखण्ड ज्योति की प्रकाशन नीति है। परम पूज्य गुरुदेव ने यही सीख दी है कि अखण्ड ज्योति के साध्य से कभी विचलित मत होना। सर्व समर्थ प्रभु स्वयं ही साधनों के अम्बार लगा देंगे। भक्तों के प्रेरक भगवान् स्वयं ही अपने प्रिय भक्तों को इस पवित्र कार्य के लिए माध्यम बनाते रहेंगे
विश्वास व आस्था की इसी अविचलता ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठो, पंक्तियों तथा प्रकाशन व्यवस्था के प्रत्येक क्रिया-कलापों में ईश्वरीय प्रकाश के दैवी अवतरण को सहज सम्भव बनाया है। अखण्ड ज्योति के सभी साधन और साध्य भगवद्-विश्वास के रस में भीगे और डूबे हैं। यही वह वास्तविक पूँजी है, जिसके बल बूते इसका प्रकाशन प्रारम्भ हो सका। वर्तमान में भी यही अलौकिक निधि काम आ रही है
भक्तों के प्रेरक भगवान् स्वयं ही अपने प्रिय भक्तों को इस पवित्र कार्य के लिए माध्यम बनाते रहेंगे। अखण्ड ज्योति की अंतर्कथा यूँ ही अपनी अनन्त यात्रा के भक्ति, विश्वास एवं श्रद्धा से परिपूर्ण विवरणों को अपने आप में संजोती रहेगी
आपने हमारी पुस्तक से कुछ लेख ले लिए, इसमें कोई अनोखी बात नहीं हुई। यदि अखण्ड ज्योति प्रकाशन में से कभी कोई वस्तु उपयोगी जँचा करें, तो भी उसे बिना पूछे निस्संकोच उसका उपयोग कर लिया करें
युगधर्म की व्याख्या परमपूज्य गुरुदेव के एक लेख के माध्यम से समझाना चाहेंगे। यह लेख ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका अप्रैल 1983 के लिए लिखा गया था, शीर्षक था, ‘जागृतात्माएं युगधर्म का निर्वाह करें’ (पृष्ठ 51)। पूज्यवर लिखते हैं, “आपत्तिकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए समर्थ भावनाशीलों को आगे आना पड़ता है। अग्निकाँड, भूकंप, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष जैसे संकट आ खड़े होने पर उदारचेता अपने काम-धंधे में हर्ज करके भी दौड़ते और संत्रस्त जनसमुदाय की सहायता करने में कुछ उठा नहीं रखते
अपने जन्म से ही प्रचण्ड भगवद्विश्वास की प्राण शक्ति के सहारे अखण्ड ज्योति ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की। कठिनाइयाँ और संकट पग-पग पर आए, पर हर बार प्रभुविश्वास ही सहारा बना। अखण्ड ज्योति की इस अंतर्कथा को उजागर करते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1940 के अप्रैल अंक में लिखा- ‘कदाचित कुछ प्रेमी इस बाहरी रूप को देखकर अखण्ड ज्योति की भीतरी स्थिति भी जानना चाहते होंगे
(अ) हमारी प्रारंभिक इकाई है हमारे परिजन। ये अखण्ड ज्योति वह अन्य पत्रिकाओं के पाठक भी हो सकते हैं, दीक्षित भी, उपासक भी, ज्ञानघट, धर्मघटधारी, अंशदानी, सहयोगी, श्रद्धालु एवं समर्थक भी। इनकी संख्या आज लगभग पाँच से सात करोड़ के बीच आँकी जाती है
ईश्वर विश्वास को अपना दृढ़ अवलम्ब मानकर अधिक से अधिक श्रम करते रहना- यही अखण्ड ज्योति की प्रकाशन नीति है। परम पूज्य गुरुदेव ने यही सीख दी है कि अखण्ड ज्योति के साध्य से कभी विचलित मत होना। सर्व समर्थ प्रभु स्वयं ही साधनों के अम्बार लगा देंगे
अखण्ड ज्योति परिवार गुण ग्राहकों, सच्ची सेवा का महत्व जानने वाले बुध जनों, उच्च अधिकारारुढ़ों, धनी मानियों, महापुरुषों, साधु महात्माओं, ईश्वर भक्तों और सुहृदयों से भरा पड़ा है। ईश्वर जब उनके हृदयों में प्रेरणा करेगा तो वे अपनी श्रद्धानुसार इस मुरझाते हुए धर्मतरु को सींचने के लिए स्वयं दौड़ेंगे। यह काम हमारा नहीं है कि अपने विशुद्ध तप के कर्त्तव्य को पूरा करने के लिए साथ-साथ हम झोली भी फैलाये घूमें
इस अंतर्कथा का पहला सत्य यह है कि ‘अखण्ड ज्योति का संचालक इन पंक्तियों का लेखक, सम्पादक आर्थिक दृष्टि से कोई ऊँचा व्यक्ति नहीं है। अपनी कुछ एक हजार रुपये की छोटी सी पूँजी से उसने इतने बड़े उत्तरदायित्व के जहाज का लंगर खोल दिया है। उसका विश्वास है ‘नरसी भगत’ वाले ‘साँवलिय्य शाह’ इस जहाज को पार लगावेंगे
परिस्थितियों की चुनौती हर बार हारी। अखण्ड ज्योति सदा ही ईश्वरीय प्रकाश का वितरण करती रही। अपने जीवन का यही सत्य उन्होंने अपने अनुयायी शिष्यों-साधकों को भी सिखाया
विपन्नता की इस संकट भरी दशा में उनका प्रभु विश्वास सम्पूर्ण रूप से समृद्ध रहा। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा- ‘अखण्ड ज्योति के लिए अपने उदार बन्धुओं से याचना करते तो झोली खाली न रहती। परन्तु हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि लोकोपयोगी कार्य, जो जनता जनार्दन की निस्वार्थ सेवा के लिए पवित्र भावनाओं से किए गए हैं, यह है
कठिनाइयाँ और संकट पग-पग पर आए, पर हर बार प्रभुविश्वास ही सहारा बना। अखण्ड ज्योति की इस अंतर्कथा को उजागर करते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1940 के अप्रैल अंक में लिखा- ‘कदाचित कुछ प्रेमी इस बाहरी रूप को देखकर अखण्ड ज्योति की भीतरी स्थिति भी जानना चाहते होंगे। उन्हें कुछ थोड़ा सा भीतरी परिचय करा देना इसलिए आवश्यक प्रतीत होता है, क्योंकि पाठकों को हम अपना परिवार समझते हैं। उन्हें हक है कि अपनी चीज के बाहरी रूप को देखने के साथ भीतरी बातें भी जानें
ऐसे में हमसे एक सुयोग्य चिकित्सक की भूमिका निभाने को कहा जा रहा है। हम अर्थात् ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठक, संवेदना की धुरी से मिशन के उद्देश्यों से जुड़े परिजन, लोकसेवी, कर्मयोग में निरत हर कोई सामान्यजन। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि हमें कर्मसंन्यास व कर्मयोग दोनों में से चुनना पड़े, तो युगधर्म की छवि से चिकित्सक वाला, लोकशिक्षण वाला कर्मयोग का मार्ग चुनना चाहिए। कभी-कभी संन्यासी बनने की हुड़क मन में उठती है
हर पत्र में कहीं-न-कहीं उसका हवाला अवश्य रहता था। प्यार के दो बोल लिखने के बाद वे यह लिखने में नहीं चूकते थे कि अखण्ड ज्योति पत्रिका को वे न्यूनतम 5 या 10 व्यक्तियों को अवश्य पढ़ाएँ अथवा युगनिर्माण योजना (मिशन-शतसूत्री संकल्प) के उद्देश्यों से अवगत कराएँ। 24-12-1963 में श्री ब्रजेंद्र लाल गुप्त को लिखे पत्र का हवाला लेते हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
तपःस्थली का विशेष स्थान−परमवंदनीय माता जी ने इसी स्थान से एक साधिका, सर्वप्रथम शिष्या के रूप में इस संगठन का प्रथम सदस्य बनने का सौभाग्य अर्जित किया एवं बाद में उन्होंने अखण्ड ज्योति संस्थान में अखण्ड−ज्योति पत्रिका के संपादन के साथ−साथ इस विराट परिवार के सहसंरक्षक की भूमिका भी निबाही। यों तो ऋषियुग्म का निवास अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी, मथुरा (1941 से अब तक इस पत्रिका का प्रकाशन केंद्र) ही था, पर नित्य दोनों गायत्री तपोभूमि आते थे एवं नियमित चलने वाले सत्रों में साधकों का मार्गदर्शन करते थे। इस प्रकार गुरुसत्ता की चरणरज से यह सारा क्षेत्र, उसका कण−कण ऊर्जावान बना हुआ है
तपःस्थली का विशेष स्थान−परमवंदनीय माता जी ने इसी स्थान से एक साधिका, सर्वप्रथम शिष्या के रूप में इस संगठन का प्रथम सदस्य बनने का सौभाग्य अर्जित किया एवं बाद में उन्होंने अखण्ड ज्योति संस्थान में अखण्ड−ज्योति पत्रिका के संपादन के साथ−साथ इस विराट परिवार के सहसंरक्षक की भूमिका भी निबाही। यों तो ऋषियुग्म का निवास अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी, मथुरा (1941 से अब तक इस पत्रिका का प्रकाशन केंद्र) ही था, पर नित्य दोनों गायत्री तपोभूमि आते थे एवं नियमित चलने वाले सत्रों में साधकों का मार्गदर्शन करते थे। इस प्रकार गुरुसत्ता की चरणरज से यह सारा क्षेत्र, उसका कण−कण ऊर्जावान बना हुआ है। गायत्री महाविज्ञान से लेकर वेद−पुराण−उपनिषद्−स्मृति−योगवासिष्ठ−तंत्र महाविज्ञान आदि ग्रंथों का भाष्य−लेखन−मुद्रण यहीं पर हुआ है
फिर भी यदि किसी को कोई शंका हो तो गायत्री महाविज्ञान के पृष्ठो से आवश्यक निर्देश प्राप्त किए जा सकते हैं। अखण्ड ज्योति के पुराने अंकों में भी इस तरह की नवरात्रि-साधना सम्बन्धी सामग्री प्रकाशित होती रही है, वहाँ से भी यह जानकारी पायी जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
सम्पादक की लेखनी तो इसमें गुरुदेव के निर्देशों के अनुसार केवल समीचीन सन्दर्भों को जोड़ इसे सजाती संवारती और सामयिक अभिव्यक्ति देती है। यही वह कारण है, जिसकी वजह से अखण्ड ज्योति में आज भी बाहर के लेख न तो आमंत्रित किए जाते हैं और न ही स्वीकारे जाते हैं
अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर इन महर्षियों के अनुभवों को बाँटने व अनुभूतियों को देने का सिलसिला अब से प्रतिमास चलेगा और चलता रहेगा। इस क्रम में महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों की व्याख्या होगी, ठीक उस भाँति जैसा कि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे, बताते थे। यह व्याख्या शास्त्रीय एवं सिद्धान्तीय नहीं पूज्यवर की जीवन साधना के अनुरूप होगी
‘हिन्दी की आध्यात्मिक पत्रकारिता में अखण्ड ज्योति’, यही वह शोध है, जिस पर डॉ. भगवान देव पाण्डेय अपने निर्देशन में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सहयोग से शोध कार्य कर रहे हैं। इस शोध कार्य के महत्त्वपूर्ण बिन्दु निम्न है- 1. विषय प्रवर्तन, 2. अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, 3. अखण्ड ज्योति का प्रकाशन, 4. अखण्ड ज्योति के सम्पादक, 5. अखण्ड ज्योति की विषय वस्तु, 6. अखण्ड ज्योति में साहित्य शिल्प, 7. अखण्ड ज्योति का सम्पादन वैशिष्ट्य एवं 8. उपसंहार। अपनी ही एक परिजन अंजली सिंह इस कार्य को कर रही है। अखण्ड ज्योति का प्रत्येक आयाम हिन्दी साहित्य एवं शोध जगत् के लिए आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है
लक्ष्य एक ही रहा सभी ज्ञान पाएँ, विचारों के पतन को रोकें, आत्मपर्यवेक्षण कर आत्मिक प्रगति के सोपानों पर चढ़ें। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को भी वे ज्ञान चेतना की, उनकी प्राणचेतना की संवाहिका कह गए हैं। फरवरी 1970 की अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं-
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को भी वे ज्ञान चेतना की, उनकी प्राणचेतना की संवाहिका कह गए हैं। फरवरी 1970 की अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं-
जिसके सान्निध्य में 24 लक्ष के 24 गायत्री महामंत्र के महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चलीं। इसी के साथ अखण्ड ज्योति की लौ से अपने सत्शिष्य की आत्म ज्योति को जलाया, जगाया एवं प्रकाशित किया
देश-विदेश के असंख्य पाठक एवं परिजन इससे प्रेरणा पाते हैं। अब तो यह शोध सत्य भी है कि अखण्ड ज्योति को पढ़ना परम पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना में निमग्न होना है। और उन अनुभूतियों में अनायास भागीदार होना है, जो गुरुदेव ने अपनी दीर्घावधि साधना में पायी। इसको स्वयं पढ़ने और अधिकाधिक लोगों को पढ़ाने से बड़ी न तो कोई जनसेवा है और न ही आध्यात्मिक साधना
” इस समय का उपयोग ज्ञान के विस्तार में लगें, यहीं उनका जीवनभर लक्ष्य रहा। वे सितंबर 1969 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “जपात्मक और होमात्मक यज्ञ के स्तर का ही हम दूसरा धर्मानुष्ठान “ज्ञानयज्ञ’ चलाते रहे हैं। हमारा जीवनक्रम इन दो पहियों पर ही लुढ़कता आ रहा है। उपासना और साधना यही दो आत्मिक प्रगति के आधार है
पहले से ही नागपुर, वाराणसी , मुजफ्फरपुर, टाटानगर, गया, बुलंदशहर, शिवपुरी, राजसमंद, देवरिया, इंदौर, कोटा, विलासपुर, भीलवाड़ा में ये सक्रिय है। मिशन का सारा साहित्य, अखण्ड ज्योति सहित सभी पत्रिकाएं तथा आँडियों-वीडियो कैसेट्स, वनौषधियाँ, प्रज्ञापेय अब केंद्र के अतिरिक्त यहाँ से भी मंगाए जा सकते है। इनका उद्देश्य है-ज्ञानयज्ञ-विचारक्राँति का आलोक विश्वव्यापी बनाना
डॉ. भगवान देव पाण्डेय गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके अनुसार अखण्ड ज्योति के आध्यात्मिक एवं साहित्यिक पहलुओं को उजागर करना आज की सामयिक आवश्यकता है। आज जबकि हिन्दी पत्रकारिता एक खोखला व्यवसाय बनकर रह गई है। ऐसे में अखण्ड ज्योति किस तरह से अपना आध्यात्मिक प्रकाश फैला रही है, यह एक शोध का विषय है
अपनी ही एक परिजन अंजली सिंह इस कार्य को कर रही है। अखण्ड ज्योति का प्रत्येक आयाम हिन्दी साहित्य एवं शोध जगत् के लिए आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है। हो भी क्यों नहीं, सत्य एवं संवेदना इसके प्रत्येक शब्द से झर-झर झरती है। देश-विदेश के असंख्य पाठक एवं परिजन इससे प्रेरणा पाते हैं
वर्ष 1940 ई. की बसन्त पंचमी को अखण्ड ज्योति का यह अद्भुत स्वरूप अक्षरों एवं शब्दों के रूप में प्रथम बार प्रकाशित हुआ। इसका प्रकाशन परम पूज्य गुरुदेव के लिए एक कठोर साधना से कम न था। अनेकों तप अनुबन्ध इससे जुड़े थे
‘हिन्दी की आध्यात्मिक पत्रकारिता में अखण्ड ज्योति’, यही वह शोध है, जिस पर डॉ. भगवान देव पाण्डेय अपने निर्देशन में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सहयोग से शोध कार्य कर रहे हैं। इस शोध कार्य के महत्त्वपूर्ण बिन्दु निम्न है- 1. विषय प्रवर्तन, 2. अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, 3. अखण्ड ज्योति का प्रकाशन, 4. अखण्ड ज्योति के सम्पादक, 5. अखण्ड ज्योति की विषय वस्तु, 6. अखण्ड ज्योति में साहित्य शिल्प, 7. अखण्ड ज्योति का सम्पादन वैशिष्ट्य एवं 8. उपसंहार। अपनी ही एक परिजन अंजली सिंह इस कार्य को कर रही है
तीसरे अनुबन्ध के रूप में सब कुछ के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी करते हुए इसके वितरण की व्यवस्था करनी थी। और चौथे अनुबन्ध के रूप में अखण्ड ज्योति के सदस्यों के साथ भावनात्मक भागीदारी निभानी थी। अपने निजी परिवार के सदस्यों की तरह उनके सुख-दुःख में बराबर की भागीदारी करनी थी। उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी देना था
उनका ज्ञान बौद्धिक होने के साथ अतीन्द्रिय एवं अतिमानसिक भी था। अखण्ड ज्योति के लेखन के लिए वह नियमित अध्ययन के साथ अपनी अन्तःप्रज्ञा एवं दिव्यदृष्टि का भी प्रयोग करते थे। उनकी अपरिमित आध्यात्मिक शक्तियों के कारण विविध विषयों पर लेख लिखना हंसी खेल जैसा था। जहाँ तक बात बाहरी विद्वानों के लेखों को न स्वीकारने की है, तो इसके पीछे भी एक रहस्य है
और फिर अध्यात्म तो है ही असम्भव को सम्भव करने का विज्ञान। सचमुच ही असम्भव, सम्भव हुआ और अखण्ड ज्योति प्रकाशित होने लगी
यह होगा दोनों महर्षियों का मिलन अपने शिष्यों के साथ, साधकों के साथ। अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर साथ-साथ प्रतिमास प्रकट होते रहेंगे, अपने अनुभवों को बाँटने और जिज्ञासाओं का समाधान करने। और साधकों को उनके साधना प्रयोगों में अग्रसर करने के लिए। आप सब-हम सब रहें इसके लिए प्रतिमास साधनारत
आज जबकि हिन्दी पत्रकारिता एक खोखला व्यवसाय बनकर रह गई है। ऐसे में अखण्ड ज्योति किस तरह से अपना आध्यात्मिक प्रकाश फैला रही है, यह एक शोध का विषय है। इस शोध से अनेकों ऐसे पहलू प्रकट होंगे, जो हिन्दी पत्रकारिता की दशा को सुधारने और उसकी दिशा को सही करने में अपना सार्थक योगदान देंगे
इस सबके अलावा उनके हाथों से स्वयं लिखा हुआ अप्रकाशित साहित्य अभी भी प्रचुर मात्रा में है। जो अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर प्रतिमास प्रकाशित होता है। सम्पादक की लेखनी तो इसमें गुरुदेव के निर्देशों के अनुसार केवल समीचीन सन्दर्भों को जोड़ इसे सजाती संवारती और सामयिक अभिव्यक्ति देती है। यही वह कारण है, जिसकी वजह से अखण्ड ज्योति में आज भी बाहर के लेख न तो आमंत्रित किए जाते हैं और न ही स्वीकारे जाते हैं
अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के दैवी निर्देश के साथ उपरोक्त सारे कठोर अनुबन्ध जुड़े थे। जिस समय, जिस स्थिति की यह बात है, उस समय इसे सबने असम्भव माना था। और आज भी कोई इसे असम्भव ही कहेगा
इस लेखक कहे जाने वाले, सम्पादक कहे जाने वाले यंत्र के नियंत्रक एवं नियामक आज भी वही होते हैं। अखण्ड ज्योति के सुदीर्घ भविष्य के लिए नीति वह स्वयं ही तैयार करके गए हैं। जिन विषयों पर लिखा जा रहा है अथवा भविष्य में लिखा जाना है, उसके संकेत उन्होंने स्वयं ही अपने शरीर को छोड़ने से पूर्व लिखवाए थे, बताए थे। इस सबके अलावा उनके हाथों से स्वयं लिखा हुआ अप्रकाशित साहित्य अभी भी प्रचुर मात्रा में है
वर्ष 1926 ई. की बसन्त पंचमी को हिमालय वासी परमगुरु के दिव्य सान्निध्य में जो अखण्ड दीप जला, उसकी ज्योति दो स्थानों पर एक साथ प्रकट हुई और अखण्ड बनी। अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति का एक प्राकट्य गुरुदेव की पूजा स्थली पर हुआ। जिसके सान्निध्य में 24 लक्ष के 24 गायत्री महामंत्र के महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चलीं। इसी के साथ अखण्ड ज्योति की लौ से अपने सत्शिष्य की आत्म ज्योति को जलाया, जगाया एवं प्रकाशित किया
अखण्ड ज्योति के ये दोनों दृश्य एवं अदृश्य रूप लगातार 14 वर्षों तक अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को सघन करते रहे। अनेकों दिव्य प्रेरणाएँ इन्हें स्पर्श करती रहीं। अनगिन दिव्य आत्माओं का इन्हें संरक्षण मिलता रहा
अविराम साधना के इसी काल में एक दैवी निर्देश का अवतरण हुआ। यह दिव्य निर्देश अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति के सान्निध्य में ध्यानस्थ, साधनारत गुरुदेव की आत्मा में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति में अवतरित हुआ। यह अद्भुत निर्देश था- अखण्ड ज्योति के दृश्य एवं अदृश्य इन दोनों रूपों से भिन्न एक तीसरे स्वरूप को प्रकाशित करना था। ऐसा स्वरूप जिसमें पहले के दोनों रूपों की आभा, ऊर्जा एवं प्रकाश समाया हो
यह दिव्य निर्देश अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति के सान्निध्य में ध्यानस्थ, साधनारत गुरुदेव की आत्मा में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति में अवतरित हुआ। यह अद्भुत निर्देश था- अखण्ड ज्योति के दृश्य एवं अदृश्य इन दोनों रूपों से भिन्न एक तीसरे स्वरूप को प्रकाशित करना था। ऐसा स्वरूप जिसमें पहले के दोनों रूपों की आभा, ऊर्जा एवं प्रकाश समाया हो
इस आश्चर्यजनक किन्तु सत्य को उजागर करना, उद्घाटित करना, प्रकाशित करना शोधकर्त्ताओं का कार्य है। अखण्ड ज्योति का प्रकाश गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना से उपजता है। उन्हीं की आध्यात्मिक सामर्थ्य इसे ऊर्जावान बनाती है। शोध-अनुसंधान की प्रवृत्ति रखने वाले वरिष्ठ एवं विशेषज्ञ प्रारम्भ से ही इसे अपनी शोध का विषय बनाने के इच्छुक रहे हैं
अपने प्रारम्भ की शुभ घड़ी से लेकर आज तक अखण्ड ज्योति के दृश्य स्वरूप का संचालन, संरक्षण अनगिनत दिव्य शक्तियाँ करती रही हैं। इसके प्रकाशन, सम्पादन, लेखन के अनेकों रहस्यमय पहलू हैं, इसमें निहित परम पूज्य गुरुदेव के अनेकों जीवन प्रसंग हैं, जिन्हें आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। इस आश्चर्यजनक किन्तु सत्य को उजागर करना, उद्घाटित करना, प्रकाशित करना शोधकर्त्ताओं का कार्य है
अखण्ड ज्योति परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जीवन की ज्योति है। उनकी गहन आध्यात्मिक साधनाओं के गर्भ से यह जन्मी है। और उन्हीं के तप का अमृतपान कर इसका विकास हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
युगऋषि का वाङ्मय प्रकाशित हुआ एवं ज्ञानचेतना को झकझोरने वाली छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई, जो लाखों व्यक्तियों तक पहुँची। गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान के ज्ञान प्रधान तथा शाँतिकुँज हरिद्वार के श्रद्धा व कर्म प्रधान कार्य ने मिशन को चहुँमुखी विस्तार दिया है। अब इस साधना-संगठन-सशक्तीकरण वर्ष में विशिष्टों को उभारने की वेला आई है। अपनी जीवन-साधना को और प्रभावी बनाकर नवसृजन के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के निर्माण की अवधि है यह
जहाँ ‘ज्ञान’ के प्रतीक के रूप में उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका है, जो अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित होती है, वहाँ तप’ के प्रतीक के रूप में उनके द्वार प्रज्वलित अखंड अग्नि (गायत्री तपोभूमि की यज्ञशाला) एवं अखंड दीपक ‘शाँतिकुँज में विद्यमान 1926 से सतत प्रज्वलित है। अखण्ड ज्योति संस्थान उनकी ज्ञान साधना का साक्षी रहा वह केंद्र है, जो आज भी मथुरा जाने वालों को दर्शन करने पर सतत उस सूक्ष्मसत्ता से साक्षात्कार कराता रहता है गुरुसत्ता के ज्ञानशरीर के रूप में सत्तर खंडों में प्रकाशित वाङ्मय है, जो उनके द्वारा लिखा गया जीवनभर का पुरुषार्थ है। हर समस्या का समाधान है एक संजीवनी है। गायत्री तपोभूमि 1951 से 11971 तक बीस वर्ष की अवधि, में गुरुसत्ता द्वारा जिए गए तपस्वी जीवन की साक्षी है
जहाँ ‘ज्ञान’ के प्रतीक के रूप में उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका है, जो अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित होती है, वहाँ तप’ के प्रतीक के रूप में उनके द्वार प्रज्वलित अखंड अग्नि (गायत्री तपोभूमि की यज्ञशाला) एवं अखंड दीपक ‘शाँतिकुँज में विद्यमान 1926 से सतत प्रज्वलित है। अखण्ड ज्योति संस्थान उनकी ज्ञान साधना का साक्षी रहा वह केंद्र है, जो आज भी मथुरा जाने वालों को दर्शन करने पर सतत उस सूक्ष्मसत्ता से साक्षात्कार कराता रहता है गुरुसत्ता के ज्ञानशरीर के रूप में सत्तर खंडों में प्रकाशित वाङ्मय है, जो उनके द्वारा लिखा गया जीवनभर का पुरुषार्थ है। हर समस्या का समाधान है एक संजीवनी है
इन सूत्रों की व्याख्या से ही उन रहस्यों का उद्घाटन हो सकेगा, जो साधकों की अन्तर्यात्रा के लिए अनिवार्य है। इस क्रम में अखण्ड ज्योति के अगले अंक में प्रमाणवृत्ति के स्वरूप एवं साधना को स्पष्ट किया जाएगा। तब तक साधकगण इन पाँचों वृत्तियों के सामान्य परिचय के सत्य को अपनी अंतर्चेतना में आत्मसात करें
प्रस्तुत समाचार स्तंभ ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठकों के लिए इस कारण आरंभ किया गया कि केंद्र व सारी जगती में कहाँ क्या घट रहा है, इसकी जानकारी उन्हें मिल सके। चूँकि सभी परिजन-पाठक पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ नहीं मँगाते, समाचार उन्हें मिल नहीं पाते, इसलिए यह स्तंभ आरंभ किया गया। यह पत्रिका तीन माह पूर्व छपने चली जाती है, इसमें समाचार तब के ही होते है, जो पढ़ते समय पुराने लगते है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
हालाँकि यहाँ उनका साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा। अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था
अखण्ड ज्योति संस्थान के आँगन में माता भगवती प्रायः सभी की माता जी बन गयीं। पास-पड़ोस के बच्चे ही नहीं, अखण्ड ज्योति कार्यालय में आने-जाने वाले लोग भी उन्हें ‘माताजी’ कहने लगे थे। यहाँ आते ही उन्होंने अनेकों जिम्मेदारियाँ एक साथ सम्भाल लीं
माताजी ने अपनी देख-रेख में इस महायज्ञ का कर्मकाण्ड तैयार करवाया। परिजनों को इसकी विस्तृत जानकारी देने के लिए अखण्ड ज्योति के सम्पादक ने एवं श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने मिलकर अखण्ड ज्योति का एक सम्पूर्ण विशेषाँक (नवम्बर 1992) तैयार किया। क्षेत्रों में इन आयोजनों की व्यापक विधि-व्यवस्था की गयी। ये सभी कार्य वन्दनीया माताजी के निर्देशन में पूरे हुए
अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था। मथुरा में पहले लिया गया किराये का मकान भी छोटा पड़ने लगा था
मन को कितना भी समझाने की कोशिश करते, पर बार-बार वह समस्याओं के जाल में जकड़ जाता। शिविर के दूसरे दिन जब वह खाना खाने के लिए अखण्ड ज्योति संस्थान गए, तब उनके मन की स्थिति कुछ ऐसी ही थी। वह अपने को कितना भी सम्हालने की कोशिश करते, पर उद्विग्नता किसी भी तरह मन को छोड़ नहीं रही थी
नयी परिस्थितियों के अनुरूप वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान के मकान को किराए पर लिया गया। और माता भगवती, ताई जी, बच्चों व अपने आराध्य के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान (वर्तमान का घीयामंडी वाला आवास)के आँगन में आकर वास करने लगीं
पिछले कुछ वर्षों से वह कई कठोर व्रतों का पालन करते हुए गायत्री अनुष्ठान कर रहे थे। अखण्ड ज्योति संस्थान आने पर उन्हें माताजी के द्वारा परोसे हुए खाने को खाने का सौभाग्य मिला। भोजन करते समय माताजी की एक झलक पाकर वह अपनी किन्हीं अनुभूतियों में डूब गए। अचानक न जाने क्यों उनके मुख से निकला- माँ तुम किस तरह माँ हो? इस प्रश्न के उत्तर में माताजी बोलीं- बेटा, माँ इस या उस तरह की नहीं होती
निश्चित तिथि पर वे सभी मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि पहुँच गए। उन दिनों आने वाले ठहरते तो गायत्री तपोभूमि में थे, पर खाना अखण्ड ज्योति संस्थान में खाते थे। इसी नियम के अनुसार ठाकुर साहब भी अपने परिवार के साथ भोजन हेतु अखण्ड ज्योति संस्थान में गए। माता जी ने स्वयं अपने हाथों से परोस कर उन्हें भोजन कराया
पहली बार गुरुदेव जब हिमालय गए थे, तब गायत्री तपोभूमि के क्रिया-कलापों का विस्तार न हुआ था। सारे काम-काज का केन्द्र अखण्ड ज्योति संस्थान था। हर महीने निश्चित समय पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के अलावा दूसरी कोई विशेष जिम्मेदारी न थी। मिशन का बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण आगन्तुक जन भी थोड़े ही थे
मथुरा में पहले लिया गया किराये का मकान भी छोटा पड़ने लगा था। नयी परिस्थितियों के अनुरूप वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान के मकान को किराए पर लिया गया। और माता भगवती, ताई जी, बच्चों व अपने आराध्य के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान (वर्तमान का घीयामंडी वाला आवास)के आँगन में आकर वास करने लगीं
एक दूसरे से बताते कि हमने यह बात तो गुरुजी को कही थी, लेकिन माताजी तक कैसे पहुँच गयी? जबकि गुरुजी तो अभी तपोभूमि में ही हैं। अथवा ये बातें तो अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी से कही गयी थीं, तपोभूमि में बैठे हुए गुरुदेव को किस तरह पता चल गयी। उन दिनों तो वहाँ कोई टेलीफोन जैसे माध्यम भी न थे। जिससे कि ये अनुमान लगाए जा सकते कि टेलीफोन द्वारा बात कह दी गयी होगी
साधना से उठने पर अपने नित्य-नियम के अनुरूप उन्होंने घर और अखण्ड ज्योति के कार्यालय के जरूरी काम निबटाए। इसके बाद परिजनों के आए हुए पत्रों को पढ़ने और उनके उत्तर लिखने का क्रम आया। यह काम परम पूज्य गुरुदेव एवं माताजी मिलकर किया करते थे
जिन्हें सदा अपना अंग अवयव माना, अपने प्राणों के अनुदान देकर जिन्हें पाला, उनसे विदाई गुरुदेव के लिए हृदय विदारक थी। अपने हृदय की इस व्यथा को वह पिछले साल-डेढ़ साल से अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में लिखकर परिजनों को अवगत भी कराते रहे थे
इस क्रम में उन्होंने सबसे पहले पुत्र सतीश (मृत्युँजय शर्मा) की शादी की। उन्हें “अखण्ड ज्योति संस्थान” का भार क्रमशः सौंपना आरम्भ कर दिया। बहू निर्मल ने आकर माताजी के गृहकार्य में सहयोग देना शुरू कर दिया। माताजी उसे घर की सारी जिम्मेदारियाँ सौंपने लगीं
अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए माताजी हमेशा प्रयासलीन रहती थीं। गायत्री तपोभूमि व अखण्ड ज्योति संस्थान में रहने वाले, काम करने वाले और आने-जाने वाले सभी उनके बच्चे थे। वह सभी की अपनी सगी माँ थीं। माँ कौन होती है? इसके बारे में उनकी अपनी मौलिक दृष्टि थी
विदा उन्हें बेटे और बहू से भी होना था। जिन पर कच्ची उम्र में अखण्ड ज्योति संस्थान का गुरुतर भार सौंपकर वे जा रही थीं। बेटे सतीश (मृत्युञ्जय) को उस समय तक काम का कोई खास अनुभव न हुआ था। बहू निर्मल भी अभी घर की सारी बातों पर प्रायः उन्हीं पर निर्भर थी
ऐसा कहते हुए वह कहती- “अब मेरी ही ले लो। मैंने क्या-क्या किया कोई कुछ जानता है क्या? अखण्ड ज्योति संस्थान में आधी रात से पहले उठ जाती थी। प्रायः सारी रात गुरुजी के साथ साधना में बिता देती। लेकिन घर के दूसरे लोगों के जागने से पहले उठ जाती और बाद में उनके उठने पर फिर से स्नान करती
मातृत्व के इस अनन्त विस्तार का परिचय किन्हीं विलक्षण क्षणों में वह स्वयं भी दे देती थीं। एक बार एक प्रखर गायत्री साधक रामसजीवन अखण्ड ज्योति संस्थान आए। पिछले कुछ वर्षों से वह कई कठोर व्रतों का पालन करते हुए गायत्री अनुष्ठान कर रहे थे। अखण्ड ज्योति संस्थान आने पर उन्हें माताजी के द्वारा परोसे हुए खाने को खाने का सौभाग्य मिला
‘ए जू’ के सहयोग से काम की गति तो बढ़ी पर माताजी की श्रमशीलता में जरा भी कमी नहीं आयी। वह घर के सामान्य काम-काज के अलावा अखण्ड ज्योति कार्यालय के कामों में भी हाथ बंटाया करती थी। परिजनों को भेजी जाने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका के रैपरों में वह टिकट चिपकाती, उन्हें भेजने की व्यवस्था करती
उनके प्यार भरे बर्ताव से सभी सम्बन्धी एवं कुटुम्बी प्रायः अभिभूत बने रहते थे। अखण्ड ज्योति संस्थान के निवास के इन्हीं प्रारम्भिक वर्षों में वह दो सन्तानों की जननी बनीं। उनकी पवित्र कोख से पहले मृत्युञ्जय शर्मा तथा बाद में शैलबाला का जन्म हुआ। धन्य हैं ये विशिष्ट विभूतियाँ जिन्हें विश्व जननी ने अपनी कोख में रखा
गुरुजी की इन बातों ने विष्णु नारायण को एक बार फिर से हैरत में डाल दिया। वे सोच ही नहीं पाए कि अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी द्वारा कही गयी बातें गुरुजी को कैसे पता चल गयी। उनकी इस हैरानी को दूर करते हुए गुरुजी ने कहा- “अरे बेटा! हम और माताजी कोई दो थोड़े ही हैं। बस केवल बाहर से दिखने के लिए दो हैं
सारे काम-काज का केन्द्र अखण्ड ज्योति संस्थान था। हर महीने निश्चित समय पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के अलावा दूसरी कोई विशेष जिम्मेदारी न थी। मिशन का बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण आगन्तुक जन भी थोड़े ही थे। लेकिन अब दूसरी बार की हिमालय यात्रा की स्थितियाँ एकदम अलग थीं
उनसे किसी विशेष मदद की आशा न थी। अपने अकेले के दम पर ही उन्हें साधना, गृहकार्य, पत्र लेखन, अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि के कार्यों की देखभाल करनी थी। यह ठीक है कि इन सभी कार्यों में सहयोग के लिए कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे सब के सब सहयोगी नहीं थे
परिवार के सदस्य, उनकी धर्मपत्नी उनके इन दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों से बुरी तरह परेशान थे। पता नहीं किस तरह परिवार के लोगों को ‘अखण्ड ज्योति’ की एक प्रति हाथ लग गयी। इसमें गायत्री तपोभूमि और यहाँ चलने वाले शिविरों के बारे में काफी कुछ छपा था। सारी बातें पढ़कर परिवार के सदस्यों एवं उनकी पत्नी ने सोचा कि ठाकुर साहब को वहाँ ले चला जाय
उन दिनों आने वाले ठहरते तो गायत्री तपोभूमि में थे, पर खाना अखण्ड ज्योति संस्थान में खाते थे। इसी नियम के अनुसार ठाकुर साहब भी अपने परिवार के साथ भोजन हेतु अखण्ड ज्योति संस्थान में गए। माता जी ने स्वयं अपने हाथों से परोस कर उन्हें भोजन कराया। मुर्गा-माँस-शराब के अभ्यस्त ठाकुर साहब हालाँकि इस तरह के साधारण भोजन के आदी न थे
गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला अपने अन्तिम चरण में थी। अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका का प्रकाशन विधिवत प्रारम्भ हो चुका था। आज का विशालकाय गायत्री परिवार तब अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में अंकुरित होने लगा था। इसकी उपयुक्त सार-संभार के लिए, सही पालन-पोषण के लिए माँ की आवश्यकता थी
वह घर के सामान्य काम-काज के अलावा अखण्ड ज्योति कार्यालय के कामों में भी हाथ बंटाया करती थी। परिजनों को भेजी जाने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका के रैपरों में वह टिकट चिपकाती, उन्हें भेजने की व्यवस्था करती
मातृत्व के विस्तार की सजल संवेदना की छुअन से आने-जाने वाले बरबस अभिभूत हो जाते थे। अखण्ड ज्योति संस्थान में आकर उन्हें हमेशा ऐसा लगता, जैसे वे अपनी सगी माँ के पास आए हैं। इनमें से कइयों को माताजी अपनी सगी माँ से कहीं बढ़कर लगती। वे अनुभव करते कि सगी माँ तो फिर भी कभी थकान, परेशानी अथवा कार्यव्यस्तता वश अपने बच्चों को नजर अन्दाज कर देती है, लेकिन माताजी का प्यार कभी कम नहीं पड़ता
उनके लिए जितने प्यारे सतीश और शैलो थे, उतना ही प्यारा अब्दुल लतीफ था। यह मुसलमान युवक अखण्ड ज्योति संस्थान में मशीन मैन था। पत्रिका की छपाई का काम-काज देखा करता था। अपने परिवार के सदस्यों के साथ माताजी इसके भी खाने की व्यवस्था किया करती थीं
अखण्ड ज्योति संस्थान के आँगन में माता भगवती प्रायः सभी की माता जी बन गयीं। पास-पड़ोस के बच्चे ही नहीं, अखण्ड ज्योति कार्यालय में आने-जाने वाले लोग भी उन्हें ‘माताजी’ कहने लगे थे। यहाँ आते ही उन्होंने अनेकों जिम्मेदारियाँ एक साथ सम्भाल लीं। प्रेम, सदाशयता, सहिष्णुता और श्रमशीलता की प्रकाश-रश्मियों का पुञ्ज उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रकाशित करने लगा
अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका का प्रकाशन विधिवत प्रारम्भ हो चुका था। आज का विशालकाय गायत्री परिवार तब अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में अंकुरित होने लगा था। इसकी उपयुक्त सार-संभार के लिए, सही पालन-पोषण के लिए माँ की आवश्यकता थी। माँ का अर्थ केवल एक-दो सन्तानों को जन्म देने तक सीमित नहीं थीं
रोज-मर्रा किए जाने वाले छोटे-बड़े हर क्रिया-कलाप के माध्यम से उनके प्राण अपने आराध्य के महाप्राणों में समाहित होते रहते थे। बाहरी रूप से घर-परिवार, सगे-सम्बन्धियों, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि के अनेकों लौकिक दायित्व निभाते हुए भी उनका आन्तरिक जीवन इस लौकिकता से पूरी तरह से अछूता, एकदम अलौकिक था। साँसारिक कर्त्तव्यों को मनोयोगपूर्वक पूरा करने का सार्थक प्रयास करते हुए भी उनकी आन्तरिक भावनाओं में कहीं भी साँसारिक विषयों की लेशमात्र गन्ध नहीं थी
उसका नाम था ‘गुलाबो’। हर बात में उसकी ‘ए जू’ कहने की आदत के कारण अखण्ड ज्योति संस्थान में उसका नाम ही ‘ए जू’ हो गया था। सभी लोग उसे इसी नाम से बुलाने लगे
माताजी की दिनचर्या में तप साधना के अलावा अपने परिजनों के पत्रों के उत्तर देना, अखण्ड ज्योति पत्रिका के सम्पादन की व्यवस्था करना, सभी के भोजन का समुचित रूप से इन्तजाम करना शामिल था। इन सभी कामों के साथ वे अपने साथ रहने वाली बालिकाओं के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था भी जुटाती थी, जिससे कि उनको अपने घर का अथवा माता-पिता का अभाव न खले। इस व्यवस्था में उन्हें कुछ-कुछ नयी विशेष चीजें अपने हाथों से बनाकर खिलाना आदि शामिल था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
जनवरी 1944 बसंत पंचमी पर आर्यसमाजी पद्धति से हवन दालान में किया गया। सड़क पर बोर्ड लगा दिया गया अखण्ड ज्योति कार्यालय’ उस हवन के बाद न वहाँ भूत प्रेत नजर आए न वह आवाज ही सुनाई दी। पूरे मकान में प्रेस प्रकाशन व आवास की व्यवस्था हो गयी। भूत महाकाल के अग्रदूत को डरा भी कैसे सकते थे
गतिविधियां क्या-क्या चलें, इस का संकेत वे “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत अखण्ड ज्योति व युग शक्ति गायत्री युग निर्माण योजना में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक पत्रों में सतत् करते रहें। प्रतिमाओं के दर्शन के माध्यम से आगंतुकों को ऋतम्भरा प्रज्ञा का दर्शन समझाना, जिज्ञासुओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान करना, नियमित साधना-उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे
घीया मण्डी वाले वर्तमान “अखण्ड ज्योति संस्थान” में जनवरी 1944 में आने से पूर्व पूज्य गुरुदेव दो तीन मकान बदल चुके थे सभी मकान छोटे थे। परिवार में पाँच सदस्य थे माँ को मिलाकर और आने वालों की कमी नहीं थी। मकान की तलाश जारी थी
यह एक अनसुलझी गुत्थी है कि कब कैसे उन सभी नोट्स का अध्ययन किया गया होगा क्योंकि कुछ ही माह बाद सभी ने देखा कि अखण्ड ज्योति की प्रतिपादन शैली धारदार तर्कों द्वारा आस्तिकता के तत्वदर्शन की काट करने वाले पक्षों पर एक दूसरा ही विवेचन प्रस्तुत करने लगी थी। सभी आधार विज्ञान सम्मत थे व लगने लगा था कि अभी तक सोचा जा रहा ढर्रा गलत था। 1969 में प्रकाशित कुछ लेखों के शीर्षक दृष्टव्य हैं लोकोत्तर जीवन विज्ञान-भूत भी, धर्मरहित विज्ञान हमारा विनाश करके छोड़ेगा, बिन्दु में समाया सिन्धु नास्तिक दर्शन पर वैज्ञानिक आक्रमण, आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण-भूत, परलोक और पृथ्वी-कितने दूर कितने पास, जीवकोषों के मन और मानसोपचार, अन्तरिक्ष के सूक्ष्म शक्ति प्रवाह इत्यादि
अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया। पर यह सिलसिला पंद्रह वर्ष तक चला
इस लेखनी का चमत्कार कहें या उनकी प्राणशक्ति का। पर परिजन जरूरी चिट्ठी की तरह अपनी प्रिय अखण्ड ज्योति की प्रतीक्षा हर माह करते थे
यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृन्दावन जाने वाले मार्ग पर स्थित था। वे अखण्ड ज्योति के जनवरी 1942 अंक में लिखते है कि “मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है। ब्रह्मविद्या के गंभीर अन्वेषण एवं विशद विस्तार के लिए एक केन्द्रीय स्थान जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया व अब वहाँ गायत्री माता का मन्दिर व तपोभूमि बननी है
1984 में वही लतीफ कराची से वीसा लेकर भारत आया व वंदनीया माताजी व गुरुदेव से मिल कर गया। 1947 से अब तक सतत् एक अखण्ड ज्योति 3876, कौरंगी कालोनी कराची लतीफ मियाँ के पते पर जाती है
प्रतिदिन 24 से 30 पृष्ठ प्रति घण्टे पढ़ना उनका प्रिय व्यसन था। पढ़ना भी वही जो अखण्ड ज्योति या पुस्तकों के लिए लिखना है। इस ज्ञान के आधार पर ही वे तीस वर्ष की आयु में “ मैं क्या हूँ “ लिखकर लगभग साढ़े तीन हजार पुस्तकों के लेखक बन सके
इतना जरूर किया कि किसी के कष्ट को मृत्यु स्तर से कम कर छोटी-मोटी दुर्घटना के रूप में टाल दिया गया। अखण्ड ज्योति के इस अंक में अन्यत्र ऐसे कई महत्वपूर्ण घटना प्रसंगों का विवरण दिया गया है जिन पर उनके जीवन काल में उनकी इच्छानुसार पर्दा ही पड़ा रहा
वस्तुतः इनकी संख्या 108 न रहकर 1008 से भी अधिक हो गई एवं ये पाँच व नौ कुण्डी से 108 यज्ञ स्तर के हुए। पहली बार अखिल भारतीय गायत्री परिवार का सदस्यता का पत्र सितम्बर 1953 की अखण्ड ज्योति में छापा गया व बाकायदा अधिकृत शाखाएँ स्थापित कर दी गई। यह प्रगतिक्रम बताता है कि कितने सुनियोजित ढंग से संगठन का सूत्रपात पूज्यवर द्वारा किया गया
इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति
पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं दिनों अपने स्वाध्याय के आधार पर अपनी पहली पुस्तक लिखी थी “मैं क्या हूँ। ” यह पुस्तक अखण्ड ज्योति कार्यालय फ्रीगंज आगरा से उसी वर्ष प्रकाशित हुई थी। इस प्रथम चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना
उनने इन विषयों का प्रतिपादन या पुष्टि न अपनी पत्रिका में की, न ही इन पुस्तकों में। 1940 की ही एक अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं कि “इस पत्र में तंत्र शास्त्र, मैस्मरेज्म, प्रेतवाद, मनोविज्ञान आदि की चर्चा करने में कुछ विलक्षणता और अटपटापन देख कर किसी को न तो भ्रम में पड़ना चाहिए, नहीं आश्चर्य करना चाहिए। यह सब मनोविज्ञान और अध्यात्म विद्या द्वारा सामयिक रोगों की चिकित्सा विधि मात्र है। यह रोते हुए बच्चों को खिलौने देना है
जिसमें परमार्थी महत्त्वाकांक्षाएं ही प्रधान हो जाती हैं एवं संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त हो जाता है”। (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 7 से 9 अगस्त 1971)
अपनी प्रचण्ड तपश्चर्या एवं गायत्री महाशक्ति की सुनियोजित उपासना कर वर्चस् की सिद्धि करने वाले पूज्य गुरुदेव ने सदैव डंके की चोट पर यह कहा कि जो भी उनके द्वारा निर्देशित साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा। ” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है
अपना यही संदेश तरह तरह से भिन्न भिन्न अवसरों पर अखण्ड ज्योति व पुस्तकों के माध्यम से दोहराते हुए वे मनुष्य को ईश्वर का अंश-अविनाशी राजकुमार आत्मा परमवैभवशाली परमात्मा की विभूतिवान संतान कहकर संबोधित करते रहे
रास्ते में गोरखपुर आरोग्य मंदिर के संचालक श्री मोदी से मिलने की इच्छा हुई। उनसे प्रत्यक्ष भेंट के बाद जब गुरुदेव ने बताया कि वे अपनी “अखण्ड ज्योति” पत्रिका को बिना विज्ञापन के निकालना चाहते है तो मोदी जी ने कहा-”मैं आपकी स्थिति अच्छी तरह देख रहा हूँ। आपके बेडिंग पर लगा पैबन्द व आपके कपड़े बताते है कि आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ नहीं है। अपना यह पक्ष सशक्त बनाने के बाद कोई व्रत लेना चाहिए
जो लोग पूज्य गुरुदेव के संपर्क में आए हैं, वे भली भाँति जानते हैं कि उनने समय समय पर तीनों ही सामर्थ्यों का उपयोग कर मनुष्य में छिपे देवत्व को जगाने की, प्रसुप्त को उभारने की चेष्टा की। अखण्ड ज्योति का शुभारंभ उनकी इन विभिन्न शक्ति रूपों का आरंभिक परिचय ही था
अपने गुरु से हिमालय की पावन भूमि पर सशरीर प्रथम साक्षात्कार का प्रसंग अप्रैल 1985 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए पूज्य गुरुदेव वर्णन करते है “तपोवन का पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की ऊंची श्रृंखला है। इसके बाद नन्दन वन आता है
इस शोध ग्रन्थ में अंत में प्रवासी भारतीयों की वर्तमान स्थिति, विदेशों में भारतीयता प्रेमी संगठनों की जानकारी तथा भारतीय तत्वज्ञान को विश्वव्यापी कैसे बनाया जाय, यह मार्गदर्शन है। इस ग्रन्थ ने प्रबुद्ध वर्ग में न केवल अच्छी खास ख्याति प्राप्त की, सभी अखण्ड ज्योति पाठकों को अपने गौरवमय अतीत की झाँकी भी करा दी। यही पुस्तक प्रवासी परिजनों के लिए भावी मार्गदर्शन का आधार भी बनी। अब इसे हिन्दी व अंग्रेजी में पुनः प्रकाशित किया
अखण्ड ज्योति के फरवरी 1940 अंक में तीसरे पृष्ठ पर यह पंक्तियाँ छपी है। माह भर पहले प्रकाशित अखण्ड ज्योति के प्रवेशांक में सम्मोहन विद्या, निद्रा विज्ञान, स्वरयोग, शारीरिक लक्षणों से मनुष्य की पहचान जैसे चार विषयों पर लेख प्रकाशित हुए थे, इन्हीं की प्रतिक्रिया ऊपर व्यक्त की गयी थी
अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रारंभिक वर्ष में अन्दर के टाइटिल पृष्ठ पर दो पंक्तियाँ निकलती थी जिनका हवाला इस विशेषाँक के प्रारंभ में दिया गया था
जो अखण्ड ज्योति एकाकी एक व्यक्ति द्वारा आंवलखेड़ा से मथुरा एवं फिर वहाँ से शांतिकुंज तक प्रज्ज्वलित रखी गई थी, उसका विराट रूप उस दावानल के रूप में देखा जा सकता है जो विचारक्रान्ति से मिले हुए गायत्री उपासना कार्यक्रम के रूप में दावानल की तरह व्यापक क्षेत्र में फैलती और गजब की ऊर्जा उत्पन्न करती चली गयी
उन सभी रसायनशास्त्र, जैविकी, मनोविज्ञान, भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान, आणविक भौतिकी, वैद्युतिकी, भूगर्भशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों पर विशद विवेचना करने वाले नोट्स मंगाए गये थे। विषय का खुलासा उनने अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अपने उद्बोधन में कर दिया था कि “विज्ञान और बुद्धिवाद की मान्यताओं ने मानवीय आदर्शवादिता को गहरा आघात पहुँचाया है और साँस्कृतिक मूल्यों के विनाश का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। जड़ परमाणुओं से चेतना जन्म लेती हैं, मानवीय अस्तित्व एक संयोग मात्र है, आत्मा का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं- शरीर के साथ ही जीवन समाप्त हो जाता है, कर्मफल की दण्ड व्यवस्था नाम की किसी चीज का अस्तित्व है नहीं, प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण ही जीव का स्वाभाविक धर्म है, कामवृत्ति की तृप्ति आवश्यक है, उसे रोकने से कांप्लेक्सेस पैदा होते हैं व माँसाहार विज्ञान सम्मत है, किसी की पीड़ा का कोई महत्व नहीं- इन प्रतिपादनों ने मनुष्य को बंदर से विकसित हुआ एक नर पशु मात्र बना दिया है। नैतिक और सामाजिक उच्छृंखलताओं का कारण यही आस्था संकट है
शुरुआत उन लोगों से करना उनने अनिवार्य समझा जो भारत के राजदूत बनकर पीढ़ियों से वहीं जा बसे थे इनमें प्रधानता गुजरात प्रान्त से जाने वालों की, किन्तु राजस्थान, पंजाब व अन्यान्य स्थानों से रोजगार हेतु बाहर गए परिजनों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें से कई पूज्य गुरुदेव से अखण्ड ज्योति के माध्यम से जुड़े हुए थे। इन से पत्र व्यवहार व मार्गदर्शन का क्रम चल ही रहा था। ये व्यक्ति न केवल अफ्रीका के तंज़ानिया, केन्या, मोमबासा, जाम्बिया, जिंबाबे, काँगो यूगांडा, साउथ अफ्रीका, मलावी जैसे देशों में बसे हुए हैं, बल्कि यूरोप के इंग्लैण्ड, नार्वे, डेनमार्क, हालैण्ड जर्मनी तथा कनाडा, सूरीनाम, फिजी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, मलेशिया एवं अमेरिका आदि राष्ट्रों में भी बहुतायत से विद्यमान हैं
लेखों को पढ़ने के बाद लगता है, मानों पाठकों को निजी तौर पर संबोधित करते हुए ये लिखे गये है। एक नमूना अगस्त 1940 की पत्रिका से उद्धृत है-”हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति के पाठक कुछ न कुछ भजन पूजा, साधना, अनुष्ठान करते होंगे। वे जैसा भी कुछ अपने विश्वास के कारण करते हों करें। परंतु एक साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था
हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परमसिद्ध महात्मा विशुद्धानन्द जी महाराज ने उनके विषय में दिसम्बर 1957 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए अपने उद्गार इस तरह व्यक्त किए है
अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन परोक्ष रूप से उनने प्रारंभ से अंत तक किया था किंतु 1971 के याद यह दायित्व दूसरों के कन्धों पर डालकर अपनी लेखनी अंत तक चालू रखी। जब पत्रिका सहयोगियों के सम्पादन द्वारा प्रकाशित होती थी तो प्रारंभ के कुछ वर्षों में तो वे उसे डिस्पेच होने से पहले देखते, किंतु 1982 के बाद वे भेज देने का निर्देश देकर उसकी समीक्षा छपकर आने के बाद करते थे। कभी कोई गूढ़ वैज्ञानिक विवेचना वाला लेख प्रकाशित होता तो वे बड़े प्यार से उस कार्यकर्ता को पास में बिठाकर समझाते कि-यदि तुम स्वयं अपने बच्चे को यह बात समझा रहे होते तो क्या इतनी क्लिष्ट भाषा में लिखते? लिखते समय ध्यान रखा करो कि एक छठी-सातवीं कक्षा का विज्ञान का छात्र तुम्हारा पाठक है व तुम उसे संबोधित कर रहे हो
जिस प्रकार चालीस दिन में एक गायत्री अनुष्ठान (सवालक्ष का) पूर्ण हो जाता है, इसी प्रकार चालीस वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृतदीप भी “सिद्ध ज्योति” बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका एवं सारे परिवार ने क्रमशः चौबीस घण्टे जागरण रखकर उसे जलाये रखा तो अब दस वर्ष के लिए ही इस अधूरा क्यों छोड़ा जाय?” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1959 पृष्ठ 6,7,8)। चूँकि अभी 1971 के बाद के निर्धारणों का रहस्योद्घाटन पूज्यवर ने हिमालय यात्रा से लौटने के बाद तक के लिए सुरक्षित रखा था, स्थान परिवर्तन पर हरिद्वार में पुनः इसी ज्योति को अखण्ड जलाये रखने के प्रसंग की चर्चा यहाँ नहीं की थी। जो हो पूज्यवर के निर्देशों का वंदनीया माताजी ने अक्षरशः पालन किया
“अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक को देख कर कई पाठकों ने शिकायत के पत्र भेजे है कि उसमें सम्मोहन, तंत्र, संतानोत्पत्ति और योग आदि क्रियाओं का बहुत थोड़ा बयान है। अपने इन स्नेही बंधुओं से हमें एक प्रार्थना करनी है कि जल्दी न करें। धीर-धीरे और थोड़ा-थोड़ा ही वे ग्रहण करके मनन करते जाएँ और उसे अभ्यास में लाते जाएं
अखण्ड ज्योति परिवार की स्थापना एक साधारण मनोरंजन करने वाली पत्रिका के सदस्यों का परिकर बनाने के लिए नहीं की गयी थी अपितु इसके संपर्क में आने वाली हर संस्कारवान आत्मा को सत्परामर्श व स्वाध्याय हेतु श्रेष्ठतम पाठ्य सामग्री प्रदान की गयी थी। जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं
जब 1941, 1951 व 1960 में पूज्य गुरुदेव हिमांचल यात्रा पर गए तब भी यह अनुशासन भली प्रकार पाला गया। वंदनीया माता जी अक्टूबर 1951 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखती हैं कि-अब अखण्ड ज्योति को संभालने का गुरुतम दायित्व मुझ पर आ गया है। सम्पादिका के रूप में यह उनका पहला अंक था क्योंकि इस बार पूज्य गुरुदेव का हिमांचल प्रवास एक वर्ष से अधिक था। जो तीन प्रमुख काम गुरुदेव वंदनीया माताजी को सौंप गए थे, उनमें पहला था-”अखण्ड घृतदीप को दस वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय
पीड़ित मानवता को समर्पित एक साधक की या अन्तर्वेदना है जो अप्रैल 1972 की अखण्ड ज्योति में “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित हुई। यह प्रत्येक परिजन के लिए उनका उलाहना है कि जिन्हें आदर्शवाद को जीवन में उबार कर अग्रगामी भूमिका निभानी है, वे प्रमादग्रस्त क्यों होते जा रहे हैं? जो स्वयं समाज को ऊँचा उठाने के लिए तिल तिल कर जला हो उसकी यह व्यथा स्वाभाविक है व यह अभिव्यक्ति भी कि “क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा”?
जिसे उचित समझा वाणी से समझाया व जिसे और अधिक पात्र समझा उसके रोम में वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
पत्रिका और पुस्तकों का लेखन सम्पादन साधकों जिज्ञासुओं से संपर्क व दिशा निर्देशन, संगठन के संचालन आदि सभी कार्य अपने में महत्वपूर्ण थे। इन सबका सुनियोजन कर उपयुक्त व्यक्तियों को कार्यभार सौंप, वंदनीया माताजी को अखण्ड ज्योति के सम्पादन की गुरुतर जिम्मेदारी संभलवाई एवं एक वर्ष के लिए तप करने गंगोत्री गोमुख के दुर्गम हिमालय वाले क्षेत्र में चले गए। साथ में सारे आर्ष वाङ्मय का मूल संकलन भी ले गए ताकि तप से उद्भूत आत्मबल के प्रकाश में बाद में उत्तरकाशी में रहकर सारा भाष्य व टीका का कार्य सम्पन्न कर सके। “सुनसान के सहचर” पुस्तक यदि उनके हिमालय प्रवास के चिन्तन का नवनीत है तो समग्र आर्ष वाङ्मय उसके तुरन्त बाद उत्तरकाशी में मात्र छह माह की अवधि के उस पुरुषार्थ का सार है जो उनने लेखनी के माध्यम से एक मनीषी, ऋषि तत्वदर्शी की भूमिका निभाकर संपन्न किया
इसकी शुरुआत काफी पहले से हो चुकी मानी जानी चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रथम “अखण्ड ज्योति” अंकों के साथ सन् 1940 के दशक में ही अध्यात्म मान्यताओं के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण कार्य आरम्भ कर दिया था। “मैं क्या हूँ” जैसे गूढ़ दार्शनिक विषय पर मनोविज्ञान को आधार बनाकर उनने प्रतिपादित किया था कि व्यक्ति जैसा चाहे, स्वयं को बना सकता है। इस के लिए उसे “ऑटोसजेशन” की तकनीक का आश्रय लेना होगा जो कि मूलतः ध्यानयोग है
अखण्ड ज्योति के आह्वान को इस रूप में बदलने का क्या मर्म हो सकता है, यह गहन विश्लेषण का विषय है पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि देवत्व से अभिपूरित विचार जो इस पत्रिका द्वारा जन-जन तक पहुँचते थे, वे धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थिति का ही निर्माण कर रहे थे। पाठकों को न केवल आन्तरिक उल्लास की अनुभूति होती थी वरन् वे औरों से चर्चा कर उसका विस्तार ही करते थे। संभवतः पहले निमंत्रण को बड़ा चुनौती भरा मानकर विश्व युद्ध की विभीषिका का इल समीप आते देख उनने पहले ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी कि नवयुग का आगमन सन्निकट है जिसमें सब की मनःस्थिति बदली हुई होगी व परिस्थितियाँ भी स्वयं तब बदल जायेगी
इन पुस्तकों के अंश समय समय पर अखण्ड ज्योति में छपते थे। अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया
प्रस्तुत पंक्तियाँ अप्रैल 1984 को अखण्ड ज्योति के जीवन वृत्त विशेषाँक में पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखी यहाँ उद्धृत है। यह प्रसंग सहस्रकुंडीय यज्ञायोजन का चल रहा है जो वस्तुतः राजसूय बाजपेय स्तर का एक विशाल आयोजन था। कई रहस्यमयी विशेषताओं से भरा पूरा यह सारा कार्य क्रम रहा
1957 की दिसम्बर अखण्ड ज्योति में पूज्य गुरुदेव द्वारा बताया गया कि 14 सितम्बर 1958 से गुरु वे नेपच्यून की युति आरंभ हो रही है। ऐसे में पाँच वर्ष भयंकर आपदाओं से भरे हो सकते है। इसके लिए गायत्री परिवार के संभावित एक लाख सदस्यों द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान 1958 में किया जाना चाहिए
ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे अपने दृश्य कार्यों को एक पूर्व निर्धारित अवधि में समेट रहे थे ताकि वे अपने भावी उत्तरदायित्व को सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करने हेतु सक्षम हो सकें। ” शरीर के निष्प्राण के उपरान्त जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे वे इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे एवं यह आश्वासन हम देते हैं कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं। “ जैसे शब्दों से उनने दुखी परिजनों को आश्वासन भी दे दिया था कि वे स्वयं को संभालें व भावी सुनिश्चितता को समझते हुए सौंपे दायित्वों को पूरा भर करते चलें
घोषणा चौंकाने वाली थी क्योंकि उससे तो पौराणिक आशय नर बलि का ही निकलता था। पूज्यवर ने अखण्ड ज्योति के अंकों में इसका स्पष्टीकरण किया कि नरमेध का अर्थ है विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किसी उद्देश्य विशेष के लिए उच्चस्तरीय ड़ड़ड़ड़। अपना जीवन समाज को समर्पित करना तथा मन बुद्धि प्राण, जीवन, इच्छा, आकाँक्षा आदि की परमार्थ के लिए यज्ञ भगवान को आहुतियाँ दिया जाना। इस विशाल यज्ञ से जुड़ी नरमेध प्रक्रिया द्वारा उनने ऋषि रक्त में छिपे त्याग तत्व का आह्वान किया तथा परिजनों पाठकों की आत्माओं को झकझोरा
अपनी निराली शैली में उनने दो सौ चुने हुए विज्ञान की विभिन्न विधाओं से जुड़े व्यक्तियों को बसंत पर्व 1968 पर पत्र लिखें कि वे उनके माध्यम से अखण्ड ज्योति के लिए मानव मात्र के कल्याण के लिए आ चुके इस उत्तरार्ध में भी विज्ञान विषय का अध्ययन करना चाहते हैं। उन सभी रसायनशास्त्र, जैविकी, मनोविज्ञान, भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान, आणविक भौतिकी, वैद्युतिकी, भूगर्भशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों पर विशद विवेचना करने वाले नोट्स मंगाए गये थे। विषय का खुलासा उनने अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अपने उद्बोधन में कर दिया था कि “विज्ञान और बुद्धिवाद की मान्यताओं ने मानवीय आदर्शवादिता को गहरा आघात पहुँचाया है और साँस्कृतिक मूल्यों के विनाश का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है
इसके बाद महाकाल रौद्र रूप में ताण्डव नृत्य करने की मुद्रा में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (1967) से आने लगे व उन्हीं दिनों युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनने स्पष्ट किया। वे लिखते है-”महाप्रलय का अन्तिम ताण्डव नृत्य तब होता है, जब पंचतत्वों से बनी प्रकृति जराजीर्ण हो जाती है। तत्व बूढ़े होने के कारण अपना काम ठीक तरह समयानुसार नहीं कर पाते
लेखनी व कागज उनके व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व को अपनी सीमा में बाँध नहीं सकते क्योंकि ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी युगपुरुष को, जिसे निष्कलंक प्रज्ञावतार की गिनती में ही गिना जा सकता है कोई साधारण व्यक्ति लिपिबद्ध नहीं कर सकता। प्रस्तुत श्रद्धाँजलि ग्रन्थ स्मारक स्वरूप प्रस्तुत अखण्ड ज्योति संयुक्तांक में यह प्रयास किया गया है कि पूज्य गुरुदेव के जीवन के हर पक्ष की झाँकी, जन-जन को जो उनसे उनके जीवनकाल में जड़े अथवा विचारों के मनन के माध्यम से उनका परिचय पा सके अथवा प्रसुप्त सुसंस्कारिता के बीजाँकुर जिनमें विद्यमान हैं व भविष्य में जिनकी उस विराट नवयुग अभियान में जुड़ने की संभावना है, सभी को परिलक्षित हो। यदि इस प्रयास, में कुछ सफलता मिल सकी जिसमें कोई सन्देह नहीं है, तो यही गुरुसत्ता के प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि होगी
ये भी अखण्ड ज्योति पत्रिका के चालीसवें दशक में आज से पचास वर्ष पूर्व प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली प्रारंभिक पंक्तियाँ। इन पंक्तियों को अपने मुख पृष्ठ पर देने वाले, स्वयं विश्वव्यापी दुष्प्रवृत्तियों का हलाहल पीकर मृतकों को भी जिला कर उठ खड़ा कर देने वाली अमृत संजीवनी का करोड़ों को रसास्वादन कराने वाले युगपुरुष पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्थूल काया की गतिविधियों को समेटते हुए गायत्री जयन्ती के दिन (2 जून 1990 ) ही अपनी चेतना की माँ गायत्री में समाहित कर अपने दृश्य जीवन पर पटाक्षेप कर दिया
वे ही नवयुग निर्माण सतयुग की वापसी में प्रमुख भूमिका निबाहेंगी। इस के लिए उनने पूजा गृह में जल रहीं दीपक ज्योति को लक्ष्य कर “अखण्ड ज्योति” नाम से समय आने पर विचारक्राँति का सरंजाम पूरा करने वाली एक पत्रिका आरम्भ करने की बात कही व कहा कि उस दीपक को अब सतत् जलाते रहना। इसके प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी एवं समष्टिगत प्रवाह से वे तभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार नवयुग का सूत्रपात होना है। “अखण्ड दीपक ही समय-समय पर पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवी मार्गदर्शन को तुम तक पहुँचायेगा, अतः जहाँ भी रखो, इसे अपने पास पूजा गृह में रखना
अपनी इस पुस्तक “मैं क्या हूँ” के अंश उनने अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रथम वर्ष के अंकों पर स्थान स्थान पर दिए हैं। इन लेखों में उनने संकल्पशक्ति को मनोबल भी कहा है। उससे आगे प्राणबल और आत्मबल की विवेचना की है
अखण्ड ज्योति कार्यालय में तब पैर से चलने वाली ट्रेडिल मशीन लगी थी। बूढ़े नसरुमियाँ एवं लतीफ नाम का एक युवा लड़का मिलकर इसे चलाते थे व सतत् काम करते हुए अखण्ड ज्योति की छपाई करते थे। उनका अपना खर्च भी इसी से चल रहा था। इसी बीच 1947 का भारत-पाक विभाजन का दौर आया
पूज्य गुरुदेव अगस्त 1953 की अखण्ड ज्योति की “गायत्री चर्चा” स्तम्भ में लिखते है कि गायत्री तपोभूमि की स्थापना माँ भगवती की इच्छा और प्रेरणा से ही हुई है। इसका मुख्य कार्य होगा। भारतीय संस्कृति धर्म और आत्मविज्ञान की आधारशिला गायत्री का जन-जन तक विस्तार
इतनी विलक्षण स्मृति थी। लगभग ढाई हजार पुस्तकों के रूप में, अनूदित भाष्यों के रूप में स्वरचित प्रज्ञापुराण के रूप में इतना कुछ वे दे गए है वह आने वाले दस वर्षों के लिए इतना कुछ लिख कर दे गये है कि अखण्ड ज्योति सतत् प्रकाशित होती रहेगी; सदा ज्वलन्त देदीप्यमान बनी रहेगी। भले ही लेखनी किसी की भी हो विचार उन्हीं की प्रेरणा से आयेंगे। गीता विश्व कोष के रूप में विशाल महाग्रन्थ की रूप-रेखा वे बना गए है, वह भी अगले दिनों उनका सूक्ष्म व कारण शरीर लिखवाएगा तथा 14 खण्ड प्रज्ञा पुराण के भी
पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला
1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
जन-साधारण में गायत्री साधना का विस्तार करने की जो योजना है उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरम पुष्प प्रस्फुटित होंगे। ” (पृष्ठ 21 अगस्त 1953 अखण्ड ज्योति) पहली बार वे इसी अंक में लिखते है कि “अब सभी गायत्री उपासकों को जो हमसे जुड़े हैं अपना दैनिक उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए। ”
लोक हित में दीप बनकर, फिर अहर्निश वह जला। लहलहाने विश्व उपवन, बीज बन कर खुद गला॥
सघन तम की चोर छाती, फिर अखण्ड ज्योति जली। और युग निर्माण करने, योजना नूतन चली॥
बड़े-बड़े कार्य मात्र संकल्प बल के सहारे संभव हो पाते है। अखण्ड ज्योति का प्रथम पुष्प प्रकाशित करने का दुस्साहस करने के साथ उनने सबको पत्र लिखने के अलावा एक और काम किया था, सबके पते अपने हाथ से लिखे व डाकघर तक भी उन्हें पहुँचाया। प्रथम अंक में यह भी लिखा है कि “अगला अंक हम निश्चित तिथि पर ही छपाकर तैयार रख लेंगे और रजिस्ट्रेशन नंबर आए पत्रिका भेजने में तिगुना पोस्टेज लगेगा इसलिए अगले अंक के लिए पूरी फरवरी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि फिर भी नंबर न आया तो 27 फरवरी को तिगुना पोस्टेज लगाकर भी “ज्योति” अवश्य भेज देंगे
जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं
ये सभी पुस्तकें तब की 6 आना सीरीज के नाम से प्रख्यात हुई व जहाँ पहुँची, चमत्कार दिखाती चली गयी। इन पुस्तकों के अंश समय समय पर अखण्ड ज्योति में छपते थे। अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे
वे यह भी कहते थे कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और प्राण की पंचधा सूक्ष्म काया स्थूल शरीर से असंख्य गुनी सामर्थ्यवान है। (अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1971, पृष्ठ 84)
दुर्भाग्यवश इन कविताओं का संकलन अब उपलब्ध नहीं है, नहीं तो पाठकों को उनके शोर लेखक स्वरूप की जानकारी मिलती। 1940 की “अखण्ड ज्योति” प्रकाशित करने से पूर्व तो वे “सैनिक’ पत्र में ही मत्त जी नाम से कार्य भी करते रहे थे तथा स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रान्तिकारी स्तर का संघर्ष भी करते रहे। मत्त नाम उनका पड़ने के दो कारण बताये जाते हैं एक तो वे देशभक्ति के लिए उन्मत्त थे जिसमें अंग्रेजों के कुशासन से देश को मुक्त कराने के लिए प्राणपण से लगना उन्हें पसंद था। दूसरे एक घटना जिसकी चर्चा आगे की गई है, में पुलिस पिटाई से इतना बेहोश होकर कीचड़ में रात्रि भर पड़े रहे थे कि अगले दिन लोग यह सोचकर ढूंढ़ने निकले कि शायद अब मर-मरा गये होंगे
अखण्ड ज्योति कार्यालय में तब पैर से चलने वाली ट्रेडिल मशीन लगी थी। बूढ़े नसरुमियाँ एवं लतीफ नाम का एक युवा लड़का मिलकर इसे चलाते थे व सतत् काम करते हुए अखण्ड ज्योति की छपाई करते थे। उनका अपना खर्च भी इसी से चल रहा था
इसके लिए चरण-चरण में मार्गदर्शन उनकी दुर्गम हिमालयवासी सत्ता करती रही। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते अपनी भूमिका निभाकर, “सैनिक” समाचार पत्र के सम्पादन से मुक्ति लेकर जब “अखण्ड ज्योति” पत्रिका के रूप में अपने विचारों के विस्तार द्वारा उनने अपनी छूटी हुई तप साधना को अगले चरण पर पहुँचाया तो उनका लक्ष्य था आत्मशक्ति का संवर्धन तथा तप से उद्भूत लेखनी द्वारा तत्कालीन समाज का बहुमुखी मार्गदर्शन। लेखनी दो तरह से चली एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श, प्रत्येक व्यक्ति को पत्र द्वारा स्वयं की लेखनी से। दूसरे लेखों के रूप में-जिनमें व्यक्ति, परिवार समाज से जुड़ी समस्याओं का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समाधान समाहित रहता था
अपने पाठकों को श्रेय देने के लिए उनके नगण्य से अनुदान को भी अखण्ड ज्योति में छापा व जिन जिन ने नैष्ठिक उपासना की, उनके चित्र जुलाई अंक में छापे। जिनमें सावित्री देवी, शिवशंकर जी मिश्र बाला शंकर जी भट्ट, नन्दकिशोर उपाध्याय, पुरुषोत्तम साखरे तथा शालिग्राम जी दुबे कुछ नाम है। वस्तुतः जुलाई 1942 का अंक ही गायत्री साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था
यह समय आते आते उन्हें ऐसा लगा कि अब प्रबुद्ध वर्ग में अखण्ड ज्योति की गहरी पैठ हो चुकी है व प्रबुद्ध पाठक उनके प्रतिपादनों को पसंद कर रहा है। उनने अनुभव किया कि यदि वे इस प्रतिपादन से भरी पूरी और सामग्री अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर देते रहे तो वह वर्ग, जो अध्यात्म साधनाएँ, धर्म-धारणा, कर्मकाण्ड, प्रतीक उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा
अखण्ड ज्योति पढ़ने वाले पाठक निरन्तर प्रकाश प्रेरणा पा रहे थे वे गायत्री की सद्बुद्धि विस्तार की प्रेरणाओं को जन जन तक फैला रहे थे। इसी वर्ष 1955 में पूज्य गुरुदेव ने मथुरा में भादों से महामृत्युंजय यज्ञ, विष्णुयज्ञ, शतचण्डीयज्ञ, नवग्रहयज्ञ तथा चारों वेदों के यज्ञों के आयोजन किए व जो मथुरा न आ सके उनसे अपने यहाँ एक छोटा सा यज्ञ प्रति सप्ताह कर लेने का निवेदन किया। साथ ही नित्य नियमित जप करते रहने व मंत्र लेखन का अनुरोध भी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
भगीरथ ने राह बनायी और पतित पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परम पूज्य गुरुदेव नहीं रहे, पर उनकी वाणी-उनका हृदय, उनका अन्तःकरण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है। इस गंगोत्री का प्रवाह अनन्तकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी सन्देह नहीं रहना चाहिए। वह जितना आगे बढ़ेगी, उतनी ही विराट् होती चली जायेगी
उसके अतिरिक्त सावित्री महाविद्या, यज्ञ विज्ञान तथा गीता दर्शन पर लिखी उनकी सर्वथा अप्रकाशित सामग्री पाठकों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जा रही है। उनके जीवन के वह अछूते प्रसंग जो अब तक अविज्ञात रहे हैं, अब अखण्ड ज्योति में परिजनों को नियमित रूप से पढ़ने को मिलते रहेंगे। विश्वास किया जाना चाहिए, अखण्ड-ज्योति विद्या विस्तार का मेरुदण्ड है। कोई भी ऐसा शिक्षित घर नहीं बचना चाहिए, जहाँ अखण्ड-ज्योति पढ़ी और सुनी न जाती हो
समीपवर्ती रेलवे स्टेशन का नाम अँग्रेजी के कैपिटल अक्षरों में वेर्स्टन, सदर्न या नार्दन रेलवे जो हो, उसके सहित अंकित करके भेजें। ड्राफ्ट अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के नाम बनवाकर भेजना चाहिए
आत्मीय कुटुम्बियों को ज्ञात होगा, परम पूज्य गुरुदेव की स्मृति में निकाला गया अगस्त सितम्बर अखण्ड ज्योति विशेषांक 240 पेज अर्थात् चार अखण्ड-ज्योति पत्रिकाओं के बराबर का है। 84 पृष्ठ के आफसेट रंगीन चित्र और लगभग उतने ही श्वेत-श्याम चित्रों के ब्लॉक है। उसे निकालने में कागज छपाई, ब्लॉक प्रोसेसिंग आदि में प्रायः पच्चीस लाख रुपयों का बैंकों का कर्ज हो गया है
अखण्ड ज्योति का व्यापक विस्तार
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
जनवरी 1944 बसंत पंचमी पर आर्यसमाजी पद्धति से हवन दालान में किया गया। सड़क पर बोर्ड लगा दिया गया अखण्ड ज्योति कार्यालय’ उस हवन के बाद न वहाँ भूत प्रेत नजर आए न वह आवाज ही सुनाई दी। पूरे मकान में प्रेस प्रकाशन व आवास की व्यवस्था हो गयी। भूत महाकाल के अग्रदूत को डरा भी कैसे सकते थे
गतिविधियां क्या-क्या चलें, इस का संकेत वे “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत अखण्ड ज्योति व युग शक्ति गायत्री युग निर्माण योजना में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक पत्रों में सतत् करते रहें। प्रतिमाओं के दर्शन के माध्यम से आगंतुकों को ऋतम्भरा प्रज्ञा का दर्शन समझाना, जिज्ञासुओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान करना, नियमित साधना-उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे
घीया मण्डी वाले वर्तमान “अखण्ड ज्योति संस्थान” में जनवरी 1944 में आने से पूर्व पूज्य गुरुदेव दो तीन मकान बदल चुके थे सभी मकान छोटे थे। परिवार में पाँच सदस्य थे माँ को मिलाकर और आने वालों की कमी नहीं थी। मकान की तलाश जारी थी
यह एक अनसुलझी गुत्थी है कि कब कैसे उन सभी नोट्स का अध्ययन किया गया होगा क्योंकि कुछ ही माह बाद सभी ने देखा कि अखण्ड ज्योति की प्रतिपादन शैली धारदार तर्कों द्वारा आस्तिकता के तत्वदर्शन की काट करने वाले पक्षों पर एक दूसरा ही विवेचन प्रस्तुत करने लगी थी। सभी आधार विज्ञान सम्मत थे व लगने लगा था कि अभी तक सोचा जा रहा ढर्रा गलत था। 1969 में प्रकाशित कुछ लेखों के शीर्षक दृष्टव्य हैं लोकोत्तर जीवन विज्ञान-भूत भी, धर्मरहित विज्ञान हमारा विनाश करके छोड़ेगा, बिन्दु में समाया सिन्धु नास्तिक दर्शन पर वैज्ञानिक आक्रमण, आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण-भूत, परलोक और पृथ्वी-कितने दूर कितने पास, जीवकोषों के मन और मानसोपचार, अन्तरिक्ष के सूक्ष्म शक्ति प्रवाह इत्यादि
अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया। पर यह सिलसिला पंद्रह वर्ष तक चला
इस लेखनी का चमत्कार कहें या उनकी प्राणशक्ति का। पर परिजन जरूरी चिट्ठी की तरह अपनी प्रिय अखण्ड ज्योति की प्रतीक्षा हर माह करते थे
यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृन्दावन जाने वाले मार्ग पर स्थित था। वे अखण्ड ज्योति के जनवरी 1942 अंक में लिखते है कि “मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है। ब्रह्मविद्या के गंभीर अन्वेषण एवं विशद विस्तार के लिए एक केन्द्रीय स्थान जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया व अब वहाँ गायत्री माता का मन्दिर व तपोभूमि बननी है
1984 में वही लतीफ कराची से वीसा लेकर भारत आया व वंदनीया माताजी व गुरुदेव से मिल कर गया। 1947 से अब तक सतत् एक अखण्ड ज्योति 3876, कौरंगी कालोनी कराची लतीफ मियाँ के पते पर जाती है
प्रतिदिन 24 से 30 पृष्ठ प्रति घण्टे पढ़ना उनका प्रिय व्यसन था। पढ़ना भी वही जो अखण्ड ज्योति या पुस्तकों के लिए लिखना है। इस ज्ञान के आधार पर ही वे तीस वर्ष की आयु में “ मैं क्या हूँ “ लिखकर लगभग साढ़े तीन हजार पुस्तकों के लेखक बन सके
इतना जरूर किया कि किसी के कष्ट को मृत्यु स्तर से कम कर छोटी-मोटी दुर्घटना के रूप में टाल दिया गया। अखण्ड ज्योति के इस अंक में अन्यत्र ऐसे कई महत्वपूर्ण घटना प्रसंगों का विवरण दिया गया है जिन पर उनके जीवन काल में उनकी इच्छानुसार पर्दा ही पड़ा रहा
वस्तुतः इनकी संख्या 108 न रहकर 1008 से भी अधिक हो गई एवं ये पाँच व नौ कुण्डी से 108 यज्ञ स्तर के हुए। पहली बार अखिल भारतीय गायत्री परिवार का सदस्यता का पत्र सितम्बर 1953 की अखण्ड ज्योति में छापा गया व बाकायदा अधिकृत शाखाएँ स्थापित कर दी गई। यह प्रगतिक्रम बताता है कि कितने सुनियोजित ढंग से संगठन का सूत्रपात पूज्यवर द्वारा किया गया
इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति
पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं दिनों अपने स्वाध्याय के आधार पर अपनी पहली पुस्तक लिखी थी “मैं क्या हूँ। ” यह पुस्तक अखण्ड ज्योति कार्यालय फ्रीगंज आगरा से उसी वर्ष प्रकाशित हुई थी। इस प्रथम चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना
उनने इन विषयों का प्रतिपादन या पुष्टि न अपनी पत्रिका में की, न ही इन पुस्तकों में। 1940 की ही एक अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं कि “इस पत्र में तंत्र शास्त्र, मैस्मरेज्म, प्रेतवाद, मनोविज्ञान आदि की चर्चा करने में कुछ विलक्षणता और अटपटापन देख कर किसी को न तो भ्रम में पड़ना चाहिए, नहीं आश्चर्य करना चाहिए। यह सब मनोविज्ञान और अध्यात्म विद्या द्वारा सामयिक रोगों की चिकित्सा विधि मात्र है। यह रोते हुए बच्चों को खिलौने देना है
जिसमें परमार्थी महत्त्वाकांक्षाएं ही प्रधान हो जाती हैं एवं संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त हो जाता है”। (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 7 से 9 अगस्त 1971)
अपनी प्रचण्ड तपश्चर्या एवं गायत्री महाशक्ति की सुनियोजित उपासना कर वर्चस् की सिद्धि करने वाले पूज्य गुरुदेव ने सदैव डंके की चोट पर यह कहा कि जो भी उनके द्वारा निर्देशित साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा। ” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है
अपना यही संदेश तरह तरह से भिन्न भिन्न अवसरों पर अखण्ड ज्योति व पुस्तकों के माध्यम से दोहराते हुए वे मनुष्य को ईश्वर का अंश-अविनाशी राजकुमार आत्मा परमवैभवशाली परमात्मा की विभूतिवान संतान कहकर संबोधित करते रहे
रास्ते में गोरखपुर आरोग्य मंदिर के संचालक श्री मोदी से मिलने की इच्छा हुई। उनसे प्रत्यक्ष भेंट के बाद जब गुरुदेव ने बताया कि वे अपनी “अखण्ड ज्योति” पत्रिका को बिना विज्ञापन के निकालना चाहते है तो मोदी जी ने कहा-”मैं आपकी स्थिति अच्छी तरह देख रहा हूँ। आपके बेडिंग पर लगा पैबन्द व आपके कपड़े बताते है कि आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ नहीं है। अपना यह पक्ष सशक्त बनाने के बाद कोई व्रत लेना चाहिए
जो लोग पूज्य गुरुदेव के संपर्क में आए हैं, वे भली भाँति जानते हैं कि उनने समय समय पर तीनों ही सामर्थ्यों का उपयोग कर मनुष्य में छिपे देवत्व को जगाने की, प्रसुप्त को उभारने की चेष्टा की। अखण्ड ज्योति का शुभारंभ उनकी इन विभिन्न शक्ति रूपों का आरंभिक परिचय ही था
अपने गुरु से हिमालय की पावन भूमि पर सशरीर प्रथम साक्षात्कार का प्रसंग अप्रैल 1985 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए पूज्य गुरुदेव वर्णन करते है “तपोवन का पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की ऊंची श्रृंखला है। इसके बाद नन्दन वन आता है
इस शोध ग्रन्थ में अंत में प्रवासी भारतीयों की वर्तमान स्थिति, विदेशों में भारतीयता प्रेमी संगठनों की जानकारी तथा भारतीय तत्वज्ञान को विश्वव्यापी कैसे बनाया जाय, यह मार्गदर्शन है। इस ग्रन्थ ने प्रबुद्ध वर्ग में न केवल अच्छी खास ख्याति प्राप्त की, सभी अखण्ड ज्योति पाठकों को अपने गौरवमय अतीत की झाँकी भी करा दी। यही पुस्तक प्रवासी परिजनों के लिए भावी मार्गदर्शन का आधार भी बनी। अब इसे हिन्दी व अंग्रेजी में पुनः प्रकाशित किया
अखण्ड ज्योति के फरवरी 1940 अंक में तीसरे पृष्ठ पर यह पंक्तियाँ छपी है। माह भर पहले प्रकाशित अखण्ड ज्योति के प्रवेशांक में सम्मोहन विद्या, निद्रा विज्ञान, स्वरयोग, शारीरिक लक्षणों से मनुष्य की पहचान जैसे चार विषयों पर लेख प्रकाशित हुए थे, इन्हीं की प्रतिक्रिया ऊपर व्यक्त की गयी थी
अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रारंभिक वर्ष में अन्दर के टाइटिल पृष्ठ पर दो पंक्तियाँ निकलती थी जिनका हवाला इस विशेषाँक के प्रारंभ में दिया गया था
जो अखण्ड ज्योति एकाकी एक व्यक्ति द्वारा आंवलखेड़ा से मथुरा एवं फिर वहाँ से शांतिकुंज तक प्रज्ज्वलित रखी गई थी, उसका विराट रूप उस दावानल के रूप में देखा जा सकता है जो विचारक्रान्ति से मिले हुए गायत्री उपासना कार्यक्रम के रूप में दावानल की तरह व्यापक क्षेत्र में फैलती और गजब की ऊर्जा उत्पन्न करती चली गयी
उन सभी रसायनशास्त्र, जैविकी, मनोविज्ञान, भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान, आणविक भौतिकी, वैद्युतिकी, भूगर्भशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों पर विशद विवेचना करने वाले नोट्स मंगाए गये थे। विषय का खुलासा उनने अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अपने उद्बोधन में कर दिया था कि “विज्ञान और बुद्धिवाद की मान्यताओं ने मानवीय आदर्शवादिता को गहरा आघात पहुँचाया है और साँस्कृतिक मूल्यों के विनाश का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। जड़ परमाणुओं से चेतना जन्म लेती हैं, मानवीय अस्तित्व एक संयोग मात्र है, आत्मा का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं- शरीर के साथ ही जीवन समाप्त हो जाता है, कर्मफल की दण्ड व्यवस्था नाम की किसी चीज का अस्तित्व है नहीं, प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण ही जीव का स्वाभाविक धर्म है, कामवृत्ति की तृप्ति आवश्यक है, उसे रोकने से कांप्लेक्सेस पैदा होते हैं व माँसाहार विज्ञान सम्मत है, किसी की पीड़ा का कोई महत्व नहीं- इन प्रतिपादनों ने मनुष्य को बंदर से विकसित हुआ एक नर पशु मात्र बना दिया है। नैतिक और सामाजिक उच्छृंखलताओं का कारण यही आस्था संकट है
शुरुआत उन लोगों से करना उनने अनिवार्य समझा जो भारत के राजदूत बनकर पीढ़ियों से वहीं जा बसे थे इनमें प्रधानता गुजरात प्रान्त से जाने वालों की, किन्तु राजस्थान, पंजाब व अन्यान्य स्थानों से रोजगार हेतु बाहर गए परिजनों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें से कई पूज्य गुरुदेव से अखण्ड ज्योति के माध्यम से जुड़े हुए थे। इन से पत्र व्यवहार व मार्गदर्शन का क्रम चल ही रहा था। ये व्यक्ति न केवल अफ्रीका के तंज़ानिया, केन्या, मोमबासा, जाम्बिया, जिंबाबे, काँगो यूगांडा, साउथ अफ्रीका, मलावी जैसे देशों में बसे हुए हैं, बल्कि यूरोप के इंग्लैण्ड, नार्वे, डेनमार्क, हालैण्ड जर्मनी तथा कनाडा, सूरीनाम, फिजी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, मलेशिया एवं अमेरिका आदि राष्ट्रों में भी बहुतायत से विद्यमान हैं
लेखों को पढ़ने के बाद लगता है, मानों पाठकों को निजी तौर पर संबोधित करते हुए ये लिखे गये है। एक नमूना अगस्त 1940 की पत्रिका से उद्धृत है-”हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति के पाठक कुछ न कुछ भजन पूजा, साधना, अनुष्ठान करते होंगे। वे जैसा भी कुछ अपने विश्वास के कारण करते हों करें। परंतु एक साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था
हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परमसिद्ध महात्मा विशुद्धानन्द जी महाराज ने उनके विषय में दिसम्बर 1957 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए अपने उद्गार इस तरह व्यक्त किए है
अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन परोक्ष रूप से उनने प्रारंभ से अंत तक किया था किंतु 1971 के याद यह दायित्व दूसरों के कन्धों पर डालकर अपनी लेखनी अंत तक चालू रखी। जब पत्रिका सहयोगियों के सम्पादन द्वारा प्रकाशित होती थी तो प्रारंभ के कुछ वर्षों में तो वे उसे डिस्पेच होने से पहले देखते, किंतु 1982 के बाद वे भेज देने का निर्देश देकर उसकी समीक्षा छपकर आने के बाद करते थे। कभी कोई गूढ़ वैज्ञानिक विवेचना वाला लेख प्रकाशित होता तो वे बड़े प्यार से उस कार्यकर्ता को पास में बिठाकर समझाते कि-यदि तुम स्वयं अपने बच्चे को यह बात समझा रहे होते तो क्या इतनी क्लिष्ट भाषा में लिखते? लिखते समय ध्यान रखा करो कि एक छठी-सातवीं कक्षा का विज्ञान का छात्र तुम्हारा पाठक है व तुम उसे संबोधित कर रहे हो
जिस प्रकार चालीस दिन में एक गायत्री अनुष्ठान (सवालक्ष का) पूर्ण हो जाता है, इसी प्रकार चालीस वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृतदीप भी “सिद्ध ज्योति” बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका एवं सारे परिवार ने क्रमशः चौबीस घण्टे जागरण रखकर उसे जलाये रखा तो अब दस वर्ष के लिए ही इस अधूरा क्यों छोड़ा जाय?” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1959 पृष्ठ 6,7,8)। चूँकि अभी 1971 के बाद के निर्धारणों का रहस्योद्घाटन पूज्यवर ने हिमालय यात्रा से लौटने के बाद तक के लिए सुरक्षित रखा था, स्थान परिवर्तन पर हरिद्वार में पुनः इसी ज्योति को अखण्ड जलाये रखने के प्रसंग की चर्चा यहाँ नहीं की थी। जो हो पूज्यवर के निर्देशों का वंदनीया माताजी ने अक्षरशः पालन किया
“अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक को देख कर कई पाठकों ने शिकायत के पत्र भेजे है कि उसमें सम्मोहन, तंत्र, संतानोत्पत्ति और योग आदि क्रियाओं का बहुत थोड़ा बयान है। अपने इन स्नेही बंधुओं से हमें एक प्रार्थना करनी है कि जल्दी न करें। धीर-धीरे और थोड़ा-थोड़ा ही वे ग्रहण करके मनन करते जाएँ और उसे अभ्यास में लाते जाएं
अखण्ड ज्योति परिवार की स्थापना एक साधारण मनोरंजन करने वाली पत्रिका के सदस्यों का परिकर बनाने के लिए नहीं की गयी थी अपितु इसके संपर्क में आने वाली हर संस्कारवान आत्मा को सत्परामर्श व स्वाध्याय हेतु श्रेष्ठतम पाठ्य सामग्री प्रदान की गयी थी। जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं
जब 1941, 1951 व 1960 में पूज्य गुरुदेव हिमांचल यात्रा पर गए तब भी यह अनुशासन भली प्रकार पाला गया। वंदनीया माता जी अक्टूबर 1951 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखती हैं कि-अब अखण्ड ज्योति को संभालने का गुरुतम दायित्व मुझ पर आ गया है। सम्पादिका के रूप में यह उनका पहला अंक था क्योंकि इस बार पूज्य गुरुदेव का हिमांचल प्रवास एक वर्ष से अधिक था। जो तीन प्रमुख काम गुरुदेव वंदनीया माताजी को सौंप गए थे, उनमें पहला था-”अखण्ड घृतदीप को दस वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय
पीड़ित मानवता को समर्पित एक साधक की या अन्तर्वेदना है जो अप्रैल 1972 की अखण्ड ज्योति में “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित हुई। यह प्रत्येक परिजन के लिए उनका उलाहना है कि जिन्हें आदर्शवाद को जीवन में उबार कर अग्रगामी भूमिका निभानी है, वे प्रमादग्रस्त क्यों होते जा रहे हैं? जो स्वयं समाज को ऊँचा उठाने के लिए तिल तिल कर जला हो उसकी यह व्यथा स्वाभाविक है व यह अभिव्यक्ति भी कि “क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा”?
जिसे उचित समझा वाणी से समझाया व जिसे और अधिक पात्र समझा उसके रोम में वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
पत्रिका और पुस्तकों का लेखन सम्पादन साधकों जिज्ञासुओं से संपर्क व दिशा निर्देशन, संगठन के संचालन आदि सभी कार्य अपने में महत्वपूर्ण थे। इन सबका सुनियोजन कर उपयुक्त व्यक्तियों को कार्यभार सौंप, वंदनीया माताजी को अखण्ड ज्योति के सम्पादन की गुरुतर जिम्मेदारी संभलवाई एवं एक वर्ष के लिए तप करने गंगोत्री गोमुख के दुर्गम हिमालय वाले क्षेत्र में चले गए। साथ में सारे आर्ष वाङ्मय का मूल संकलन भी ले गए ताकि तप से उद्भूत आत्मबल के प्रकाश में बाद में उत्तरकाशी में रहकर सारा भाष्य व टीका का कार्य सम्पन्न कर सके। “सुनसान के सहचर” पुस्तक यदि उनके हिमालय प्रवास के चिन्तन का नवनीत है तो समग्र आर्ष वाङ्मय उसके तुरन्त बाद उत्तरकाशी में मात्र छह माह की अवधि के उस पुरुषार्थ का सार है जो उनने लेखनी के माध्यम से एक मनीषी, ऋषि तत्वदर्शी की भूमिका निभाकर संपन्न किया
इसकी शुरुआत काफी पहले से हो चुकी मानी जानी चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रथम “अखण्ड ज्योति” अंकों के साथ सन् 1940 के दशक में ही अध्यात्म मान्यताओं के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण कार्य आरम्भ कर दिया था। “मैं क्या हूँ” जैसे गूढ़ दार्शनिक विषय पर मनोविज्ञान को आधार बनाकर उनने प्रतिपादित किया था कि व्यक्ति जैसा चाहे, स्वयं को बना सकता है। इस के लिए उसे “ऑटोसजेशन” की तकनीक का आश्रय लेना होगा जो कि मूलतः ध्यानयोग है
अखण्ड ज्योति के आह्वान को इस रूप में बदलने का क्या मर्म हो सकता है, यह गहन विश्लेषण का विषय है पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि देवत्व से अभिपूरित विचार जो इस पत्रिका द्वारा जन-जन तक पहुँचते थे, वे धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थिति का ही निर्माण कर रहे थे। पाठकों को न केवल आन्तरिक उल्लास की अनुभूति होती थी वरन् वे औरों से चर्चा कर उसका विस्तार ही करते थे। संभवतः पहले निमंत्रण को बड़ा चुनौती भरा मानकर विश्व युद्ध की विभीषिका का इल समीप आते देख उनने पहले ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी कि नवयुग का आगमन सन्निकट है जिसमें सब की मनःस्थिति बदली हुई होगी व परिस्थितियाँ भी स्वयं तब बदल जायेगी
इन पुस्तकों के अंश समय समय पर अखण्ड ज्योति में छपते थे। अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया
प्रस्तुत पंक्तियाँ अप्रैल 1984 को अखण्ड ज्योति के जीवन वृत्त विशेषाँक में पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखी यहाँ उद्धृत है। यह प्रसंग सहस्रकुंडीय यज्ञायोजन का चल रहा है जो वस्तुतः राजसूय बाजपेय स्तर का एक विशाल आयोजन था। कई रहस्यमयी विशेषताओं से भरा पूरा यह सारा कार्य क्रम रहा
1957 की दिसम्बर अखण्ड ज्योति में पूज्य गुरुदेव द्वारा बताया गया कि 14 सितम्बर 1958 से गुरु वे नेपच्यून की युति आरंभ हो रही है। ऐसे में पाँच वर्ष भयंकर आपदाओं से भरे हो सकते है। इसके लिए गायत्री परिवार के संभावित एक लाख सदस्यों द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान 1958 में किया जाना चाहिए
ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे अपने दृश्य कार्यों को एक पूर्व निर्धारित अवधि में समेट रहे थे ताकि वे अपने भावी उत्तरदायित्व को सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करने हेतु सक्षम हो सकें। ” शरीर के निष्प्राण के उपरान्त जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे वे इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे एवं यह आश्वासन हम देते हैं कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं। “ जैसे शब्दों से उनने दुखी परिजनों को आश्वासन भी दे दिया था कि वे स्वयं को संभालें व भावी सुनिश्चितता को समझते हुए सौंपे दायित्वों को पूरा भर करते चलें
घोषणा चौंकाने वाली थी क्योंकि उससे तो पौराणिक आशय नर बलि का ही निकलता था। पूज्यवर ने अखण्ड ज्योति के अंकों में इसका स्पष्टीकरण किया कि नरमेध का अर्थ है विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किसी उद्देश्य विशेष के लिए उच्चस्तरीय ड़ड़ड़ड़। अपना जीवन समाज को समर्पित करना तथा मन बुद्धि प्राण, जीवन, इच्छा, आकाँक्षा आदि की परमार्थ के लिए यज्ञ भगवान को आहुतियाँ दिया जाना। इस विशाल यज्ञ से जुड़ी नरमेध प्रक्रिया द्वारा उनने ऋषि रक्त में छिपे त्याग तत्व का आह्वान किया तथा परिजनों पाठकों की आत्माओं को झकझोरा
अपनी निराली शैली में उनने दो सौ चुने हुए विज्ञान की विभिन्न विधाओं से जुड़े व्यक्तियों को बसंत पर्व 1968 पर पत्र लिखें कि वे उनके माध्यम से अखण्ड ज्योति के लिए मानव मात्र के कल्याण के लिए आ चुके इस उत्तरार्ध में भी विज्ञान विषय का अध्ययन करना चाहते हैं। उन सभी रसायनशास्त्र, जैविकी, मनोविज्ञान, भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान, आणविक भौतिकी, वैद्युतिकी, भूगर्भशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों पर विशद विवेचना करने वाले नोट्स मंगाए गये थे। विषय का खुलासा उनने अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अपने उद्बोधन में कर दिया था कि “विज्ञान और बुद्धिवाद की मान्यताओं ने मानवीय आदर्शवादिता को गहरा आघात पहुँचाया है और साँस्कृतिक मूल्यों के विनाश का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है
इसके बाद महाकाल रौद्र रूप में ताण्डव नृत्य करने की मुद्रा में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (1967) से आने लगे व उन्हीं दिनों युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनने स्पष्ट किया। वे लिखते है-”महाप्रलय का अन्तिम ताण्डव नृत्य तब होता है, जब पंचतत्वों से बनी प्रकृति जराजीर्ण हो जाती है। तत्व बूढ़े होने के कारण अपना काम ठीक तरह समयानुसार नहीं कर पाते
लेखनी व कागज उनके व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व को अपनी सीमा में बाँध नहीं सकते क्योंकि ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी युगपुरुष को, जिसे निष्कलंक प्रज्ञावतार की गिनती में ही गिना जा सकता है कोई साधारण व्यक्ति लिपिबद्ध नहीं कर सकता। प्रस्तुत श्रद्धाँजलि ग्रन्थ स्मारक स्वरूप प्रस्तुत अखण्ड ज्योति संयुक्तांक में यह प्रयास किया गया है कि पूज्य गुरुदेव के जीवन के हर पक्ष की झाँकी, जन-जन को जो उनसे उनके जीवनकाल में जड़े अथवा विचारों के मनन के माध्यम से उनका परिचय पा सके अथवा प्रसुप्त सुसंस्कारिता के बीजाँकुर जिनमें विद्यमान हैं व भविष्य में जिनकी उस विराट नवयुग अभियान में जुड़ने की संभावना है, सभी को परिलक्षित हो। यदि इस प्रयास, में कुछ सफलता मिल सकी जिसमें कोई सन्देह नहीं है, तो यही गुरुसत्ता के प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि होगी
ये भी अखण्ड ज्योति पत्रिका के चालीसवें दशक में आज से पचास वर्ष पूर्व प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली प्रारंभिक पंक्तियाँ। इन पंक्तियों को अपने मुख पृष्ठ पर देने वाले, स्वयं विश्वव्यापी दुष्प्रवृत्तियों का हलाहल पीकर मृतकों को भी जिला कर उठ खड़ा कर देने वाली अमृत संजीवनी का करोड़ों को रसास्वादन कराने वाले युगपुरुष पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्थूल काया की गतिविधियों को समेटते हुए गायत्री जयन्ती के दिन (2 जून 1990 ) ही अपनी चेतना की माँ गायत्री में समाहित कर अपने दृश्य जीवन पर पटाक्षेप कर दिया
वे ही नवयुग निर्माण सतयुग की वापसी में प्रमुख भूमिका निबाहेंगी। इस के लिए उनने पूजा गृह में जल रहीं दीपक ज्योति को लक्ष्य कर “अखण्ड ज्योति” नाम से समय आने पर विचारक्राँति का सरंजाम पूरा करने वाली एक पत्रिका आरम्भ करने की बात कही व कहा कि उस दीपक को अब सतत् जलाते रहना। इसके प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी एवं समष्टिगत प्रवाह से वे तभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार नवयुग का सूत्रपात होना है। “अखण्ड दीपक ही समय-समय पर पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवी मार्गदर्शन को तुम तक पहुँचायेगा, अतः जहाँ भी रखो, इसे अपने पास पूजा गृह में रखना
अपनी इस पुस्तक “मैं क्या हूँ” के अंश उनने अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रथम वर्ष के अंकों पर स्थान स्थान पर दिए हैं। इन लेखों में उनने संकल्पशक्ति को मनोबल भी कहा है। उससे आगे प्राणबल और आत्मबल की विवेचना की है
अखण्ड ज्योति कार्यालय में तब पैर से चलने वाली ट्रेडिल मशीन लगी थी। बूढ़े नसरुमियाँ एवं लतीफ नाम का एक युवा लड़का मिलकर इसे चलाते थे व सतत् काम करते हुए अखण्ड ज्योति की छपाई करते थे। उनका अपना खर्च भी इसी से चल रहा था। इसी बीच 1947 का भारत-पाक विभाजन का दौर आया
पूज्य गुरुदेव अगस्त 1953 की अखण्ड ज्योति की “गायत्री चर्चा” स्तम्भ में लिखते है कि गायत्री तपोभूमि की स्थापना माँ भगवती की इच्छा और प्रेरणा से ही हुई है। इसका मुख्य कार्य होगा। भारतीय संस्कृति धर्म और आत्मविज्ञान की आधारशिला गायत्री का जन-जन तक विस्तार
इतनी विलक्षण स्मृति थी। लगभग ढाई हजार पुस्तकों के रूप में, अनूदित भाष्यों के रूप में स्वरचित प्रज्ञापुराण के रूप में इतना कुछ वे दे गए है वह आने वाले दस वर्षों के लिए इतना कुछ लिख कर दे गये है कि अखण्ड ज्योति सतत् प्रकाशित होती रहेगी; सदा ज्वलन्त देदीप्यमान बनी रहेगी। भले ही लेखनी किसी की भी हो विचार उन्हीं की प्रेरणा से आयेंगे। गीता विश्व कोष के रूप में विशाल महाग्रन्थ की रूप-रेखा वे बना गए है, वह भी अगले दिनों उनका सूक्ष्म व कारण शरीर लिखवाएगा तथा 14 खण्ड प्रज्ञा पुराण के भी
पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला
1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
जन-साधारण में गायत्री साधना का विस्तार करने की जो योजना है उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरम पुष्प प्रस्फुटित होंगे। ” (पृष्ठ 21 अगस्त 1953 अखण्ड ज्योति) पहली बार वे इसी अंक में लिखते है कि “अब सभी गायत्री उपासकों को जो हमसे जुड़े हैं अपना दैनिक उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए। ”
लोक हित में दीप बनकर, फिर अहर्निश वह जला। लहलहाने विश्व उपवन, बीज बन कर खुद गला॥
सघन तम की चोर छाती, फिर अखण्ड ज्योति जली। और युग निर्माण करने, योजना नूतन चली॥
बड़े-बड़े कार्य मात्र संकल्प बल के सहारे संभव हो पाते है। अखण्ड ज्योति का प्रथम पुष्प प्रकाशित करने का दुस्साहस करने के साथ उनने सबको पत्र लिखने के अलावा एक और काम किया था, सबके पते अपने हाथ से लिखे व डाकघर तक भी उन्हें पहुँचाया। प्रथम अंक में यह भी लिखा है कि “अगला अंक हम निश्चित तिथि पर ही छपाकर तैयार रख लेंगे और रजिस्ट्रेशन नंबर आए पत्रिका भेजने में तिगुना पोस्टेज लगेगा इसलिए अगले अंक के लिए पूरी फरवरी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि फिर भी नंबर न आया तो 27 फरवरी को तिगुना पोस्टेज लगाकर भी “ज्योति” अवश्य भेज देंगे
जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं
ये सभी पुस्तकें तब की 6 आना सीरीज के नाम से प्रख्यात हुई व जहाँ पहुँची, चमत्कार दिखाती चली गयी। इन पुस्तकों के अंश समय समय पर अखण्ड ज्योति में छपते थे। अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे
वे यह भी कहते थे कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और प्राण की पंचधा सूक्ष्म काया स्थूल शरीर से असंख्य गुनी सामर्थ्यवान है। (अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1971, पृष्ठ 84)
दुर्भाग्यवश इन कविताओं का संकलन अब उपलब्ध नहीं है, नहीं तो पाठकों को उनके शोर लेखक स्वरूप की जानकारी मिलती। 1940 की “अखण्ड ज्योति” प्रकाशित करने से पूर्व तो वे “सैनिक’ पत्र में ही मत्त जी नाम से कार्य भी करते रहे थे तथा स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रान्तिकारी स्तर का संघर्ष भी करते रहे। मत्त नाम उनका पड़ने के दो कारण बताये जाते हैं एक तो वे देशभक्ति के लिए उन्मत्त थे जिसमें अंग्रेजों के कुशासन से देश को मुक्त कराने के लिए प्राणपण से लगना उन्हें पसंद था। दूसरे एक घटना जिसकी चर्चा आगे की गई है, में पुलिस पिटाई से इतना बेहोश होकर कीचड़ में रात्रि भर पड़े रहे थे कि अगले दिन लोग यह सोचकर ढूंढ़ने निकले कि शायद अब मर-मरा गये होंगे
अखण्ड ज्योति कार्यालय में तब पैर से चलने वाली ट्रेडिल मशीन लगी थी। बूढ़े नसरुमियाँ एवं लतीफ नाम का एक युवा लड़का मिलकर इसे चलाते थे व सतत् काम करते हुए अखण्ड ज्योति की छपाई करते थे। उनका अपना खर्च भी इसी से चल रहा था
इसके लिए चरण-चरण में मार्गदर्शन उनकी दुर्गम हिमालयवासी सत्ता करती रही। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते अपनी भूमिका निभाकर, “सैनिक” समाचार पत्र के सम्पादन से मुक्ति लेकर जब “अखण्ड ज्योति” पत्रिका के रूप में अपने विचारों के विस्तार द्वारा उनने अपनी छूटी हुई तप साधना को अगले चरण पर पहुँचाया तो उनका लक्ष्य था आत्मशक्ति का संवर्धन तथा तप से उद्भूत लेखनी द्वारा तत्कालीन समाज का बहुमुखी मार्गदर्शन। लेखनी दो तरह से चली एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श, प्रत्येक व्यक्ति को पत्र द्वारा स्वयं की लेखनी से। दूसरे लेखों के रूप में-जिनमें व्यक्ति, परिवार समाज से जुड़ी समस्याओं का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समाधान समाहित रहता था
अपने पाठकों को श्रेय देने के लिए उनके नगण्य से अनुदान को भी अखण्ड ज्योति में छापा व जिन जिन ने नैष्ठिक उपासना की, उनके चित्र जुलाई अंक में छापे। जिनमें सावित्री देवी, शिवशंकर जी मिश्र बाला शंकर जी भट्ट, नन्दकिशोर उपाध्याय, पुरुषोत्तम साखरे तथा शालिग्राम जी दुबे कुछ नाम है। वस्तुतः जुलाई 1942 का अंक ही गायत्री साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था
यह समय आते आते उन्हें ऐसा लगा कि अब प्रबुद्ध वर्ग में अखण्ड ज्योति की गहरी पैठ हो चुकी है व प्रबुद्ध पाठक उनके प्रतिपादनों को पसंद कर रहा है। उनने अनुभव किया कि यदि वे इस प्रतिपादन से भरी पूरी और सामग्री अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर देते रहे तो वह वर्ग, जो अध्यात्म साधनाएँ, धर्म-धारणा, कर्मकाण्ड, प्रतीक उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा
अखण्ड ज्योति पढ़ने वाले पाठक निरन्तर प्रकाश प्रेरणा पा रहे थे वे गायत्री की सद्बुद्धि विस्तार की प्रेरणाओं को जन जन तक फैला रहे थे। इसी वर्ष 1955 में पूज्य गुरुदेव ने मथुरा में भादों से महामृत्युंजय यज्ञ, विष्णुयज्ञ, शतचण्डीयज्ञ, नवग्रहयज्ञ तथा चारों वेदों के यज्ञों के आयोजन किए व जो मथुरा न आ सके उनसे अपने यहाँ एक छोटा सा यज्ञ प्रति सप्ताह कर लेने का निवेदन किया। साथ ही नित्य नियमित जप करते रहने व मंत्र लेखन का अनुरोध भी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
युगऋषि की लेखनी इक्कीसवीं सदी में भी सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर के माध्यम से यथावत चलती रहेगी। अखण्ड ज्योति को मात्र पत्रिका नहीं; उनकी प्रखर चिंतन चेतना का जीता-जागता स्वरूप माने, जो सतयुग की आधारशिला रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है। पत्रिकाओं का पठन-पाठन ही परोक्षरूप से उनके द्वारा दी गई ज्ञानदीक्षा है
1. माह में एक बार गुरुदेव माता जी को अपने घर अवश्य बुलाएँ। यह कार्य अखण्ड ज्योति युगशक्ति गायत्री आदि में से किसी पत्रिका की एक प्रति अपने यहाँ मंगाने से पूरा हो सकता है। गुरुसत्ता की प्राणचेतना से घनिष्ठता स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठतम माध्यम हैं। बन पड़े तो पाँच अनुपाठक और तैयार करे तथा प्रत्येक से पाँच-पाँच साथी और बढ़ाने को कहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
गत मास की पत्रिका से जुड़े हुए पत्रक में अखण्ड ज्योति परिजनों को कुछ विशेष उद्बोधन दिए गए हैं और उनके संबंध में कुछ अतिरिक्त विवरण पूछे गए हैं। प्रसन्नता की बात है कि उस सामयिक सूचना को समुचित उत्साह और ध्यानपूर्वक पढ़ा गया है। उत्तर और परिचय आने शुरू हो गए हैं
परिवारों और गिरोहों की गणना इसी आधार पर संभव और संपन्न होती है। अखण्ड ज्योति परिजन, पत्रिका में छपती रहने वाली सामग्री से, पुस्तकों से, पत्रों से कुछ प्रभाव ग्रहण न करते हों, सो बात नहीं, एक से अनेक होने में, चिनगारी के ज्वालमाल बनने में इस आधार पर भी बहुत हद तक सफलता मिली है, फिर भी वह आवश्यकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई कि युगचेतना के उद्गम केंद्र शान्तिकुञ्ज पहुँचा जाए और वहाँ किन्हीं सत्रों में सम्मिलित होकर विद्यमान वातावरण और प्राण-प्रवाह के सान्निध्य का लाभ उठाया जाए
सन् 90 अपने ढंग का विलक्षण है, विशेषतया अखण्ड ज्योति परिजनों के लिए, क्योंकि उनमें से अधिकांश को अगले दिनों अपने-अपने स्तर के अनेक उत्तरदायित्व निबाहने पड़ेंगे। अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ— अतिरिक्त शक्ति भी चाहती है, अतिरिक्त निर्माण भी और अतिरिक्त क्रियाकलापों को संपन्न करने के लिए नए स्तर का नया मार्गदर्शन भी। इस समय की माँग को ध्यान में रखते हुए सन् 90 में जो पाँच-पाँच दिन के
प्रायः 60 सत्र संपन्न होने जा रहे हैं, उसकी गरिमा और उपयोगिता गंभीरतापूर्वक समझी जानी चाहिए